कचरी की खेती | मरुजा की खेती – Kachri Ki Kheti

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कचरी को काचर, मृगाक्षी,मरुजा, Kachri (Kachari,kuchri, Kacher भी कहा जाता है । कचरी का वैज्ञानिक नाम Kachri Cucumis pubescens, Citrullus colocynthis है। हम आपको बता दें कि कचरी की खेती नही की जाती है। कचरी बरसात के मौसम में फसलों के जैसे अरहर, उर्द, मूंग, धान, जैसे फसलों के साथ एक खरपतवार के जैसे उग आती है।
काचर, एक ऐसा शब्‍द जो थार में बात को नया रस देता है । काचर, एक ऐसा फल (या सब्‍जी) जो छठ बारह महीने थार में थाली को चटपटा बनाए रखता है। दो मुहावरे हैं- काचर गा बीज और अठे कै काचर ल्‍ये (काचर का बीज/ यहां क्‍या काचर ले रहा है.) काचर अपने तीखी खटास या अम्‍ल के लिए भी जाना जाता है। काचर के एक छोटे से बीज को अगर एक मण (40 किलो लगभग) दूध में डाल दें तो वह पूरे दूध को फाड़ देगा. खराब कर देगा । यहीं से ‘काचर का बीज’ मुआवरा निकलता है यानी कुचमादी, गुड़ गोबर करने वाला, अच्‍छे भले काम को बिगाड़ने वाला. इसी तरह ‘यहां क्‍या काचर ले रहा है’ मतलब यहां क्‍या भाड़ झोंक रहा है, जाकर अपना काम क्‍यों नहीं करते? किसी विशेषकर छोटे या बच्‍चे की खिंचाई करने के लिए काचर का बीज, काचर सा न हो तो, काचर‍ बिखरने जैसे वाक्‍य मुआवरे हर किसी की जुबान पर रहते हैं । अधिक शरारती को मटकाचर (बड़ा काचर) कह दिया जाता है।
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Kachri Ki Kheti खाने में काचर की बात की जाए । काचर यानी ककड़ी Citrullus colocynthis का छोटे से छोटा रूप, काचर, काकड़ी, मतीरा, खरबूजा ये लगभग एक ही वंशकुल के तथा थार की बालुई मिट्टी में कम पानी में होने वाले फल सब्जियां हैं । वैसे ये सभी फल हैं लेकिन इनका काम सब्जियों में ज्‍यादा होता है । काचर तो काचर ही है । काचर हरा होता है तो बहुत खट्टा मीठा होता है और उसे कच्‍चा खाने का सोचते ही मुहं में कुछ होने लगता है । कच्‍चे काचर को लाल मिर्च और थोड़े से लहसुन के साथ कुंडी में रगड़कर, चुंटिए, दही या छा के साथ खाने को जो मजा है, मानिए गूंगे का गुड़ है । वैसे काचरी को आयुर्वेद में मृगाक्षी कहा जाता है और काचरी बिगड़े हुए जुकाम, पित्‍त, कफ, कब्‍ज, परमेह सहित कई रोगों में बेहतरीन दवा मानी गई है । काचर थोक में होता है । उसके छिलके को उतारकर टुकड़ों में काट जाता है और धूप में सुखा लिया जाता है. सूखकर काचर, काचरी हो जाता है और काचरी की चटनी तो कहते हैं कि आजकल पांच सितारा होटलों में विशेष रूप से परोसी जाती है । काचरी की चटनी तो बनती ही है इसे कढ़ी में डाल दिया जाता है, सांगरी के साथ बना लिया जाता है या किसी और रूप में भी । कचरी की चटनी का सही स्‍वाद उसे साबुत लाल मिर्च के साथ कुंडी में या सिलबट्टे पर रखड़कर बनाने व खाने में ही है । काचर काचरी थार में घरों में छठ बारह महीने उपलब्‍ध रहते हैं । भोजन में स्‍वाद और बातों में रस घोलते रहते हैं ।

कचरी, काचर के फायदे –

कचरी Citrullus colocynthis राजस्थान तथा आसपास के प्रदेशों की एक सुपरिचित तरकारी है। कचरी से बनी हुई लौंजी (सब्जी) अत्यन्त स्वादिष्ट एवं रूचिकर होती है। मरु-प्रदेश में अत्यधिक पैदा होने के कारण कचरी का एक नाम ‘मरुजा’ भी है। कचरी के साथ मिर्च या कचरी के साथ आलू इत्यादि का मिश्रण करके सब्जी बनाने की परिपाटी भी है। जब यह फल कच्चे होते हैं, तो हरे एवं सफेद रंग लिए हुए चितकबरे प्रतीत होते हैं तथा अत्यन्त कड़वे होते हैं। पकने पर यही पीले पड़ जाते हैं। अधपकी एवं पूर्ण पक्व कचरियों से अत्यन्त मधुर एवं भीनी-भीनी खुशबू आती रहती है। इसलिए बहुत से लोग केवल सुगन्ध के लिए ही कचरियों को अपने पास रखते हैं तथा बार-बार सूँघकर इसकी सुगन्ध से आह्लादित होते रहते हैं। कचरी को उगाया नहीं जाता है, अपितु इसकी बेल वर्षा ऋतु में विशेष रूप से खरीफ की फसल के समय खेतों में स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है, कचरी कच्ची अवस्था में अत्यन्त कड़वी तथा पक जाने पर खट्टी-मीठी हो जाती है।
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Kachri Ki Kheti कचरी में अनेक औषधीय गुण होते हैं। आयुर्वेदीय शास्त्रों ने इसे कर्कटी वर्ग की वनौषधि माना है। आयुर्वेदीय ग्रंथों के अनुसार कचरी की बेल खीरे जैसी होती है, किन्तु उससे लम्बाई में कुछ छोटी होती है। इसके पत्ते छोटे तथा चार इंच तक लम्बे तथा छह इंच तक चौड़े, नरम तथा कोमल होते हैं। आकार में बिलकुल ककड़ी के पत्तों जैसे ही होते हैं। कचरी की बेल में छोटे-छोटे पीले रंग के खूबसूरत फूल लगते हैं। भाद्रपद मास में छोटे-छोटे लम्बे-गोल फल लगने लगते हैं। यही फल कचरी कहलाते हैं। कचरी को आयुर्वेद में मृगाक्षी कहा जाता है और काचरी बिगड़े हुए जुकाम, पित्‍त, कफ, कब्‍ज, परमेह सहित कई रोगों में बेहतरीन दवा मानी गई है। प्रसिद्ध आयुर्वेदीय ग्रंथ ‘राज-निघंटु’ में कचरी का वर्णन करते हुए बताया गया है कि यह एवं तिक्तरंस वाली, विपाक में अम्ल वातनाशक पित्तकारक तथा पुराने बिगड़े हुए जुकाम को कम करने वाली दीपन तथा उत्तम रुचिकारक है।

हकीमों के अनुसार कचरी Citrullus colocynthis गर्म और खुश्क होती है। यह मीठी, हल्की तथा आमाशय को मृदु बनाने वाली, भूख बढ़ाने वाली, कामोद्दीपक तथा बवासीर, लकवा इत्यादि वात-कफज रोगों में आराम देती है। चूँकि कचरी में सुगन्ध होती है, इसलिए यह दिल व दिमाग को ताकत देती है। वायु रोगों में इसका सेवन ‘सोंठ’ के साथ कराया जाता हैं भोजन पचाने तथा भूख बढ़ाने वाले चूर्ण में भी कचरियाँ मिलाई जाती हैं। कचरी के सेवन करने के बाद पेशाब खुलकर आता है। गरम तासीर वालों को कचरी का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए अन्यथा बेचैनी, सिरदर्द, दस्त, बुखार, इत्यादि उपद्रव हो सकते हैं। इन उपद्रवों की अवस्था में धनिए का सेवन करना लाभप्रद होता है। कचरी के उत्तम दीपन-पाचन गुणों के कारण इसे दाल में भी डालने का प्रचलन है। इससे गैस के रोगियों को भी लाभ होता है। बवासीर में कचरी की धूनी देना बहुत लाभदायक होता हैं कचरी की जड़ में ‘पथरी’ नष्ट करने की क्षमता होती है।
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पकी कचरी Kachri Ki Kheti को सीधे ही, बिना सब्जी बनाए ज्यादा खा लेने से मुँह में छाले हो जाते हैं तथा जीभ कट-फट जाती है। कुछ लोगों को इससे बुखार भी आ जाता है। बड़ी कचरी के बीज को माशे की मात्रा में लेकर, चावल के धोवन के साथ पीसकर छानकर उसमें थोड़ा लाल-चन्दन घिसकर मिलाए। पेशाब की कठिनाई वाले रोगों को पिलाने से पेशाब खुलकर आने लगता है। कच्ची कचरी का साग दस्तों में उपयोगी माना जाता है। तम्बाकू का सेवन करने वालों के लिए भी कचरी लाभप्रद है। सुखाई हुई कचरियाँ रुचिकारक, दीपन, दस्तावर तथा भोजन में अरुचि, पेट के कीड़ों, जड़ता इत्यादि के दूर करने वाली होती हैं।

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