रागी (मंडुआ)कोदों, कुटकी की खेती | अदभुत एवं अलौकिक अनाज |

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धान, गेँहू के अलावा घांस कुल में मोटे अनाज वाली फसले जैसे जुआर, बाजरा तथा लघु धन्य जैसे कोदो, कुटी और रागी आती है। परम्पगत खाद्य श्रृंखला में इन फसलों का विशेष महत्व होता था और इसी बजह से पहले हमारी खाद्य सुरक्षा के साथ साथ पोषण सुरक्षा का भी पुख्ता इंतजाम था। अब इन फसलों का अस्तित्व खतरे में नज़र आ रहा है। एक तरफ हरित क्रांति के कारण धान और गेंहू की खेती के रकबे में भारी इजाफा हुआ और तदनुसार उत्पादन में भी आशातीत बढोत्तरी हुई। परन्तु मोटे (पोषक) अनाज वाली फसलो का रकबा निरंतर कम होता जा रहा है । दूसरी तरफ देश की सार्वजानिक वितरण प्रणाली में गेंहू और चावल को ही सर्वोपर्य स्थान मिला हुआ है। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक में भी पोषण सुरक्षा मुहैया कराने वाले हमारे पारंपरिक अलौकिक अनाजो यथा मक्का, जुआर,बाजरा तथा लघु धन्य जैसे रागी, कोदो, कुटकी आदि को शामिल नहीं किया जाना भारत की भावी पीडी के लिए सुभ संकेत नहीं है।

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भूली बिसरी इन फसलो को सरकार के समर्थन मूल्य का सहारा नहीं मिल पा रहा है। इन्ही कारणों से इन फसलो का रकबा दिनों दिन कम होता जा रहा है। भारत में 1410 लाख हैक्टेयर कुल कृषिगत क्षेत्रफल में से, लगभग 177 जिलो में, 850 लाख हैक्टेयर क्षेत्र सिंचाई के लिए मानसून वर्षा पर निर्भर है । यह देश के कुल कृषि क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्र आता है । वर्षा निर्भर कृषि से देश में 44 प्रतिशत अनाज, 75 प्रतिशत दालें और 90 प्रतिशत से अधिक मात्रा में ज्वार, मूंगफली पैदा होती है । हालांकि आजादी के 50 सालो में वर्षा आधारित क्षेत्रो पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है, फिर भी यह क्षेत्र देश के अमूमन आधे ग्रामीण मजदूरो के लिए रोजगार और 60 प्रतिशत मवेशिय के लिए पोषण सुरक्षा भी उपलब्ध करा रहे है । मोटे अनाजो की खेती न केवल उत्पादन देती है वरन यह एक ऐसी विचारधारा है जिसके माध्यम से कृषक जैव विविधता, पारिस्थितिकीय उपज प्रणालियो तथा खाद्यान्न प्रधानता जैसे सिद्धातो को वास्तविकता में बदल देते है । वास्तव में यह एक अदभुत खाद्यान्न प्रणाली है जो भारत में खाद्यान्न व पोषण सुरक्षा के साथ- साथ हमारी परम्परागत कृषि के भविष्य को सुरक्षित रख सकती है । क्योकि गेंहू और चावल का मौजूदा उत्पादन तथा उपलब्ध अन्न भंडार प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अनुरूप देश भर की जनता की खाद्यान्न आवश्यकता की पूर्ती नहीं कर पायेगा। ऐसे में मोटे अनाजो को भी इसमें शामिल करना अनेक कारणों से बेहतर होगा। जुआर , बाजरा, रागी,कोदो, कुटकी, जौ, जई आदि भले ही गुणवत्ता में गेंहू और चावल के समान न हो लेकिन पोषण स्टार के मामले में वे उनसे बीस ही साबित होते है।

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भरपूर पोषण देती है ये फसले –

पोषण के लगभग सभी मापदंडो से, यह अनाज चावल या गेंहू से आगे है । गेंहू व चावल के मुकाबले उनके अंदर खनिज पदार्थ की मात्रा काफी ज्यादा है । इनमें से प्रत्येक अनाज में चावल व गेंहू के मुकाबले ज्यादा रेशा रहता है । किसी-किसी अनाज में तो चावल से 50 गुणा ज्यादा । रागी में चावल के मुकाबले 30 गुणा ज्यादा कैल्शियम होता है और बाकी अनाज की किस्मो में कम से कम दुगुना कैल्शियम रहता है । लौह तत्व में, काकुन और कुटकी इतने ज्यादा परिपूर्ण है कि चावल उनके मुकाबले कहीं नहीं ठहरता है । जहां हम बीटा कैटी न नामक सूक्ष्म-पुष्टिकारक दवाओ व गोलिओ में ढूंढते रहते है, अनाज की यह किस्में इससे भी परिपूर्ण है । यहां तक कि चावल जैसे लोकप्रिय खाद्य में यह महत्वपूर्ण सूक्ष्म-पुष्टिकारक है ही नही है । इसी प्रकार एक-एक पुष्टिकारक को देखें, तो अनाजो की हर किस्म चावल व गेंहू से कहीं ज्यादा उत्तम है और यही कारण है कि वे कुपोषण, जिससे भारत में काफी जन संख्या त्रस्त है, के लिए उत्तम उपाय है । तो क्यों ना हम इन अनाजो को मोटे अनाज की जगह पोषक अनाज के नाम से संबोधित करे।

इन अदभुत अनाजो के उत्पादन के लिए बहुत कम खाद- पानी की आवश्यकता पड़ती है । सिंचित और नगदी फसलें जिन्हे हमारी वर्तमान नीतियो में बढ़ावा दिया जा रहा है, के मुकाबले अनाज की इन प्रजातियो के सिंचाई की कोई आवश्यकता नहीं होती है । गन्ने तथा केले जैसी फसलो के मुकाबले इन फसलो को केवल 25 प्रतिशत वर्षा की ही आवश्यकता पड़ती है ।

इन अनाजो की फसल को बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है । ज्वार, बाजरा और रागी के लिए गन्ने और केले के मुकाबले 25 प्रतिशत कम और धान के मुकाबले 30 प्रतिशत कम बारिश की जरूरत ह¨ती है । हम 1 किलो धान पैदा करने के लिए 4000 लीटर पानी का उपयोग करते है, जबकि इन सभी अनाजो की फसलें बिना सिंचाई के ही पैदा हो जाती है । ऐसे समय में जब पानी और खाद्यान्न की भारी कमी संभावित है, वहां अनाज की यह फसलें हमारे लिए खाद्यान्न सुरक्षा का साधन बन सकती है ।

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फसल वर्षा की आवश्यकता के बारे में बात करें तो गन्ना 2000-2200 (मिमी), धान 1200-1300 (मिमी), कपास 600-650 (मिमी), मक्का 500-550 (मिमी), मूंगफली 450-500 (मिमी), मिर्च 600 (मिमी), ज्वार 400-500 (मिमी), बाजरा 350-400 (मिमी), रागी 350-400 (मिमी), दालें 300-350 (मिमी), तिल 300-350 (मिमी) की जलमाँग होती है। उपरोक्त बातो के अलावा मोटे अनाज की फसलें सभी प्रकार की भूमि-जलवायु में आसानी से उगाई जा सकती है साथ ही विभिन्न प्रकार के मौसमी उतार-चढ़ाव तथा परिस्थितिकीय संकट और कीट रोग व्याधियो को झेलने में सक्षम होती है।

ज्वार – ज्वार विश्व की एक मोटे अनाज वाली महत्वपूर्ण फसल है । पारंपरिक रूप से खाद्य तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इसकी खेती की जाती है, लेकिन अब यह संभावित जैव-ऊर्जा फसल के रूप में भी उभर रही है । खाद्यान्न फसलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से ज्वार का भारत में तृतीय स्थान है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में ज्वार सबसे लोकप्रिय फसल हैं। एक ओर जहाँ ज्वार सूखे का सक्षमता से सामना कर सकती है, वहीं कुछ समय के लिये भूमि में जलमग्नता को भी सहन कर सकती है। ज्वार का पौधा अन्य अनाज वाली फसलों की अपेक्षा कम प्रकाष संष्लेषण एवं प्रति इकाई समय में अधिक शुष्क पदार्थ का निर्माण करता है।
ज्वार की पानी उपयोग करने की क्षमता भी अन्य अनाज वाली फसलों की तुलना में अधिक है। ज्वार की खेती उत्तरी भारत में खरीफ के मौसम में और दक्षिणी भारत में खरीफ एंव रबी दोनों मौसमों में की जाती है। ज्वार की खेती अनाज व चारे के लिये की जाती है। ज्वार को आजकल औद्यौगिक फसल के रूप में देखा जा रहा है ।सफेद ज्वार के आटे से ब्रेड, बिस्किट एवं केक बनाये जा सकते हैं। ज्वार के आटे के स्वाभाविक रूप से मीठा होने के कारण चीनी की मात्रा कम रखकर मधुमेह रोगियों के लिए अच्छा स्नैक तैयार किया जा सकता है। ब्रेड बनाने के लिए ज्वार और गेहूँ के आटे की मात्रा 60 प्रतिशत व 40 प्रतिशत रखी जाती है। सामान्य रूप से बीयर, जौ, मक्का अथवा धान से तैयार की जाती है, परन्तु ज्वार के अनाज से भी स्वादिश्ट एवं सुगंधित बियर बनाई जा सकती है, जो अन्य धान्य से बनाई बियर से सस्ती पड़ती है। ज्वार की विशेष किस्म से स्टार्च तैयार किया जाता है । अलकोहल उपलब्ध कराने का भी ज्वार एक उत्कृष्ट साधन है । इस प्रकार से ओद्योगिक क्षेत्रों में ज्वार की मांग बढ़ने से ज्वार उत्पादक किसानो को अब ज्वार की बेहतर कीमत प्राप्त हो रही है।

बाजरा – मोटे अनाज वाली फसलों में बाजरा (पेनीसीटम टाइफाइड) का महत्वपूर्ण स्थान है। बाजरा कम लागत तथा शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाने वाली ज्वार से भी लोकप्रिय फसल है जिसे दाने व चारे के लिए उगाया जाता है। यह गरीबो का मुख्य भोजन माना जाता है । अमीर लोग जाडे में कभी-कभी इसे स्वाद बदलने के लिए खाते है । इसका प्रभाव गर्म प्रकृति का होता है, अतः गर्म ऋतु में यथासंभव इसे नहीं खाना चाहिए ।
बाजरे के दाने में 12.4 प्रतिशत नमी, 11.6 प्रतिशत प्रोटीन, 5.0 प्रतिशत वसा, 67.5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 0.05 प्रतिशत कैल्शियम, 0.35 प्रतिशत फास्फोरस तथा 8.8 प्रतिशत लोहा पाया जाता है।
इस प्रकार बाजरे का दाना ज्वार की अपेक्षा अधिक पौष्टिक होता है।बाजरे को खाने के काम में लाने से पूर्व इसके दाने को कूटकर भूसी अलग कर लिया जाता है। दानों को पीसकर आटा तैयार करते हैं और माल्टेड आटा के रूप में प्रयोग करते हैं। उत्तरी भारत में जाड़े के दिनों में बाजरा रोटी (चपाती) के रूप में खाया जाता है। बाजरे की र¨टी और दूध का भोजन चावल से भी अधिक पौष्टिक माना गया है । कुछ स्थानों पर बाजरे के दानों को चावल की तरह पकाया और खाया जाता है। गांवो में दाने की हरी बालियाँ भूनकर मक्के के भुट्टे की तरह खाई जाती हैं। दाने को भूनकर लाई भी बनाते हैं। इस प्रकार दाना भूनकर, उबालकर या आटा बनाकर प्रयोग में आता है ।बाजरा दुधारू पशुओं को दलिया एंव मुर्गियों को दाने के रूप में खिलाया जाता है।

लघु धान्य (मोटे अनाज)- मोटे अनाज छोटे दाने वाली धान्य फसलों को कहा जाता है। मिलेट धान्य प्रजाति के भारत में विकसित पौधे हैं, जिसके अन्र्तगत छोटे-छोटे परन्तु पौष्टिक दानों वाली कई फसलें शामिल हैं। मोटे अनाजों को लघोन्न फसलें भी कहा जाता है। यहाँ पर इस शब्द का प्रथम अर्द्ध भाग अर्थात् ’लघु’ का अभिप्राय इन फसलों के दाने के आकार का और शेष अंतिम भाग ’अन्न’ इन्हें खाद्यान्नों की श्रेणी में रखने का द्योतक है। मोटे या लघु धान्य फसलों में कोदों,रागी , कुटकी, सावाँ, काकुन आदि सम्मलित किये जाते हैं।
इन सभी फसलों के दानों का आकार इनके पौधों के आकार की अपेक्षा छोटा होता है। अतः इन्हें छोटे या मोटे या लघु धान्य के नाम से जाना जाता है। इन फसलों की खेती प्रायः शुष्क क्षेत्रों में की जाती है। इन खाद्यान्नों की खेती उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ की भूमि दूसरे उत्तम धान्य उगाने योग्य नहीं रहती है तथा अधिकांश क्षेत्र शुष्क खेती की परिधि में आते है। लघु धान्य फसलों की अवधि भी मुख्य फसलों की अपेक्षा बहुत कम होती है। इन फसलों में सूखा एंव अकाल जैसी विषम परिस्थितियों को सहन करने की अद्भुत क्षमता होती है। इन फसलों पर कीट एंव रोगों का प्रकोप भी कम होता है। अतः इनको सूखाग्रस्त क्षेत्रों, सीमान्त भूमि और आदिवासी क्षेत्रों की आधारभूत फसलें माना जाता है।

सभी लघु धान्य फसलें दानें के रूप में रोटी बनाकर या कुछ फसलें चावल की भाँति उबालकर खाने के काम में लाई जाती हैं। दाने के अलावा इन फसलों से पशुओ के लिए चारा-भूसा भी प्राप्त होता है। देश के पहाड़ी-पठारी क्षेत्रों में अत्यधिक भौगौलिक विषमताओ के कारण ऐसी फसलों की उपयोगिता बढ़ जाती है जो असिंचित व कम उपजाऊ भूमि में उगाई जा सके।

रागी (मंडुआ) – भारत में उगाए जाने वाले लघु धान्यों में रागी (मंडुवा) सबसे महत्वपूर्ण एंव जीविका प्रदान करने वाला अन्न है। प्रायः गरीब आदिवासी लोग ही इसके दाने का प्रयोग खाने में करते है । खाने में इसका स्वाद भले ही अच्छा न लगें परन्तु रागी का दाना काफी पौष्टिक होता है जिसका आटा व दलिया बनाया जाता है। आटे से रोटी, पारिज, हलवा व पुडिंग तैयार किया जाता है। मधुमेय के रोगियो के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी है। मधुमेह पीड़ित व्यत्कियों के लिए चावल के स्थान पर मंडुवा का सेवन उत्तम बताया गया है। कृषि महाविद्यालय, जगदलपुर के वैज्ञानिकों द्वारा रागी के प्रसंस्करण से आटा तैयार किया गया है जो कि मधुमेय पीड़ित व्यक्तियों के लिए वरदान सिद्ध हो रहा है। रागी के अंकुरित बीजों से माल्ट भी बनाते हैं जो कि शिशु आहार तैयार करने में काम आता है। बहुत समय से इसके दानों से उत्तम गुणों वाली शराब भी तैयार की जाती है। बाबरनामा नामक पुस्तक में इसकी शराब का वर्णन मिलता है । इसके दाने की यह भी विशेषता है कि बिना खराब हुए रागी को अनेक वर्षो तक संचित रखा जा सकता है ।

कोदों – कोदो भारत का एक प्राचीन अन्न है जिसे ऋषि अन्न माना जाता था। यह एक जल्दी पकने वाली सबसे अधिक सूखा अवरोधी लघु धान्य फसल है। इसका प्रयोग उबालकर चावल की तरह खाने में किया जाता है। प्रयोग करने से पूर्व इसके दाने के ऊपर उपस्थित छिलके को कूटकर हटाना आवश्यक रहता है । इसकी उपज को लम्बे समय तक सहेज कर रखा जा सकता है तथा अकाल आदि की विषम परिस्थितियो में खाद्यान्न के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है । इसके दाने में 8.3 प्रतिशत प्रोटीन, 1.4 प्रतिशत वसा, 65.9 कार्बोहाइड्रेट तथा 2.9 प्रतिशत राख पाई जाती है। यह गरीबों की फसल मानी जाती है क्योकि इसकी खेती गैर-उपजाऊ भूमियों में बगैर खाद-पानी के की जाती है। मधुमेह के रोगियों के लिए चावल व गेहूँ के स्थान पर कोदों विशेष लाभकारी रहता है।

कुटकी – Panicum antidotale Retz
कुटकी वर्षा ऋतु की तमाम फसलो में सबसे पहले तैयार होने वाली धान्य प्रजाति की फसल है । संभवतः इसलिए इसे पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रो में अधिक पसंद किया जाता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रो में इसे चिकमा नाम से भी जाना जाता है । इसे गरीबों की फसल की संज्ञा दी गई है। कुटकी जल्दी पकने वाली सूखा और जल भराव जैसी विषम परिस्थितियों को सहन करने वाली फसल है। यह एक पौष्टिक लघु धान्य हैं। इसके 100 ग्राम दाने में 8.7 ग्राम प्रोटीन, 75.7 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 5.3 ग्राम वसा, 8.6 ग्राम रेशा के अलावा खनिज तत्व, कैल्शियम एंव फास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
उपरोक्त मोटे अलौकिक अनाजो को आज भले ही हमने खाद्य श्रृंखला से बाहर कर दिया हो परन्तु पशुओ एवं पछियो के भोजन तथा ओद्योगिक इस्तेमाल के कारण इनका अस्तित्व अभी भी बचा है। इनके महत्व को देखते हुए आज चिकित्सक भी इन अनाजो को भोजन में शामिल करने का सुझाव दे रहे है। पारम्परिक पाक विधिओ में मोटे अनाजो का इस्तेमाल शिशु आहार बनाने वाले उद्योग तथा अन्य खाद्य पदार्थो के उत्पादन में किया जा रहा है। जुआर का उपयोग ग्लूकोस और अन्य पेय निर्माण उद्योग में किया जा रहाएन्हु है अब रागी और गेंहू के मिश्रण से निर्मित वर्मिसिल बाजार में उपलब्ध है। सुपर मार्केट और माल में मल्टी-ग्रेन आटा अब नव धनाड्य वर्ग में लोकप्रिय होता जा रहा है।
भारत में लागू ऐतहासिक खाद्यान्न सुरक्षा कानून का हम स्वागत करते है। वास्तव में हमें खाद्यान्न सुरक्षा के साथ-साथ पोषण सुरक्षा पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। देश में बड़ी संख्या में बच्चे व युवा कुपोषित और अल्प भारित है जिनके सुपोषण की वयवस्था भी हमें करना चाहिए। हमारी परम्परागत फसलों से ही लोगो को पोष्टिक खाद्यान प्राप्त हो सकता है। मोटे अनाज वाली फासले असिंचित अथवा सूखाग्रस्त क्षेत्रो में सीमित लगत में आसानी से उगाई जा सकती है। अब तो इनका बाजार भाव भी अच्छा मिल रहा है। मोटे अनाजो के घटते उत्पादन और बढती मांग को देखते हुए इन फसलो की खेती को प्रोत्साहित कर खेती में विविधिता लाने का हम सब को मिल कर प्रयास करना चाहिए जिससे देश में बहुसंख्यक आबादी को खाद्यान्न सुरक्षा के साथ पोषण सुरक्षा भी मुहैया हो सके।

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