अरबी की खेती | घुइयाँ की खेती

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TARO FARMING | ARBI FARMING | GHUINYA KI KHETI

भारत देश में रबी सीजन की कटाई के बाद अधिकांश खेत खाली रहते हैं। यहां गर्मी की फसल पैदाकर किसान को आर्थिक फायदा हो सकता है।

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अरबी की खेती हेतु जलवायु एवं तापमान | Taro Arabi Kheti Suitable Climate and Temperature

कृषि विशेषज्ञों का कहना है अरबी की फसल को गर्म और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है।
इसलिए इसे ग्रीष्म और बारिश दोनों ही मौसम में उगाया जा सकता है। जायद सीजन में इसे अप्रैल में उगा सकते हैं। अरबी की बुआई के लिए पर्याप्त जीवांश वाली रेतीली दोमट मिट्‌टी अच्छी रहती है। इससे कड़ी परत न हो। साथ ही जल निकासी की अच्छी पर्याप्त व्यवस्था हो। इसमें गर्मी के दिनों में 6-7 दिन के अंतराल में सिंचाई करना जरूरी है।

भूमि और तैयारी | Field Preparation for TARO Root Farming

अरबी की अच्छी फसल लेने के लिए बलुई दोमट आदर्श भूमि हैं| दोमट और चिकनी दोमट में भी उत्तम जल निकास के साथ इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती हैं| इसकी खेती के लिए 5. 5 से 7.0 पी एच मान वाली भूमि उपयुक्त होती हैं| रोपण हेतु खेत तैयार करने के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल एवं दो जुताई कल्टीवेटर से करके पाटा चलाकर मिट्टी को भुरीभुरी बना लेना चाहिए|

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उन्नत किस्में | Advanced New Improved Varieties For Arbi Cultivation

इंदिरा अरबी 1-

इस किस्म के पत्ते मध्यम आकार और हरे रंग के होते हैं| तने (पर्णवृन्त) का रंग ऊपर- नीचे बैंगनी तथा बीच में हरा होता हैं| इस किस्म में 9 से 10 मुख्य पुत्री धनकंद पाये जाते है| इसके कंद स्वादिष्ट खाने योग्य होते हैं और पकाने पर शीघ्र पकते हैं, यह किस्म 210 से 220 दिन में खुदाई योग्य हो जाती हैं| इसकी औसत पैदावार 22 से 33 टन प्रति हेक्टेयर हैं|

श्रीरश्मि-

इसका पौधा लम्बा, सीधा और पत्तियाँ झुकी हुई, हरे रंग की बैंगनी किनरा लिये होती है| तना (पर्णवृन्त) का ऊपरी भाग हरा, मध्य तथा निचला भाग बैंगनी हरा होता हैं| इसका मातृ कंद बडा और बेलनाकार होता हैं| पुत्री धनकंद मध्यम आकार के व नुकीले होते हैं| इस किस्म के कंद कंदिकाएँ, पत्तियां और पर्णवृन्त सभी तीक्ष्णता (खुजलाहट) रहित होते हैं तथा उबालने पर शीघ्र पकते हैं| यह किस्म 200 से 201 दिन में खुदाई के लिये तैयार हो जाती हैं और इससे औसत 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर पैदावार प्राप्त होती हैं|

पंचमुखी-

इस किस्म में सामान्यतः पॉच मुख्य पुत्री कंदिकाये पायी जाती हैं, कंदिकायें खाने योग्य होती है और पकने पर शीघ्र पक जाती हैं| रोपण के 180 से 200 दिन बाद इसके कंद खुदाई योग्य हो जाते हैं| इस किस्म से 18 से 25 टन प्रति हेक्टेयर औसत कंद पैदावार प्राप्त होती हैं|

व्हाइट गौरेइया-

अरबी की यह किस्म रोपण के 180 से 190 दिन में खुदाई योग्य हो जाती हैं| इसके मातृ तथा पुत्री कंद व पत्तियां खाने योग्य होती हैं| इसकी पत्तियां डंठल और कंद खुजलाहट मुक्त होते हैं| उबालने या पकाने पर कंद शीघ्र पकते है| इस किस्म की औसत पैदावार 17 से 19 टन प्रति हेक्टेयर हैं|

नरेन्द्र अरबी-

इस किस्म के पत्ते मध्यम आकार के तथा हरे रंग के होते हैं| पर्णवृन्त का ऊपरी और मध्य भाग हरा निचला भाग हरा होता हैं| यह 170 से 180 दिनों में तैयार हो जाती हैं| इसकी औसत पैदावार 12 से 15 टन प्रति हेक्टेयर हैं| इस किस्म की पत्तियॉ, पर्णवृन्त एवं कंद सभी पकाकर खाने योग्य होते हैं|

श्री पल्लवी-

यह किस्म 210 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 16 से 18 टन प्रति हेक्टेयर है|

श्रीकिरण-

यह किस्म 190 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 17 से 18 टन प्रति हेक्टेयर है|

सतमुखी-

यह किस्म 200 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर है|

आजाद अरबी-

यह किस्म 135 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 28 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

मुक्ताकेशी-

यह किस्म 160 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 20 टन प्रति हेक्टेयर है|

बिलासपुर अरूम-

यह किस्म 190 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

बीज की बुवाई एवं रोपण का समय | ARBI Farming Showing Time And Showing Methods

अरबी का रोपण जून से जुलाई (खरीफ फसल) में किया जाता हैं| उत्तरी भारत में इसे फरवरी से मार्च में भी लगाया जाता हैं|

बीज की मात्रा | Seed Rate For TARO Cropping

बीज दर किस्म और कंद के आकार तथा वजन पर निर्भर करती हैं| सामान्य रूप से 1 हेक्टेयर में रोपण हेतु 15 से 20 क्विटल कंद बीज की आवश्यकता होती हैं| इसके मातृ एवं पुत्री कंदों (20 से 25 ग्राम) दोनों को रोपण सामग्री हेतु प्रयुक्त किया जाता हैं|

बीज उपचार | Seed Treatment for Taro Ki Kheti

कंदों को रिडोमिल एम जेड- 72 की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम कंद की दर से उपचारित करना चाहिए| कंदों को बुआई पूर्व फफूंदनाशक के घोल में 10 से 15 मिनट डुबाकर रखना चाहिए|

कंद रोपण विधियाँ |Tuber planting methods-

मेड़नाली विधि-

इस विधि में तैयार खेत में 60 सेंटीमीटर की दूरी पर मेड़ व नाली का निर्माण किया जाता हैं तथा 10 सेंटीमीटर उंची मेड पर 45 सेंटीमीटर की दूरी पर प्रत्येक कंद बीज को 5 सेंटीमीटर की गहराई में रोपा जाता हैं|

ऊँची समतल क्यारी मेड़नाली विधि- इस विधि में खेत में 8 से 10 सेंटीमीटर ऊँची समतल क्यारियाँ बनाते हैं, जिसके चारो तरफ जल निकास नाली 50 सेंटीमीटर की होती हैं| इन क्यारियों पर लाईन की दूरी 60 सेंटीमीटर की रखते हुए 45 सेंटीमीटर के अंतराल पर बीजों का रोपण 5 सेंटीमीटर की गहराई पर किया जाता है| इस विधि में रोपण के दो माह बाद निंदाई-गुड़ाई के साथ उर्वरक की बची मात्रा देने के बाद पौधों पर मिट्टी चढाकर बेड को मेडनाली में परिवर्तित करते हैं, यह विधि अरबी की खरीफ फसल के लिये उपयुक्त हैं|

नालीमेड विधि-

इस विधि में अरबी का रोपण 8 से 10 सेंटीमीटर गहरी नालियों में 60 से 65 सेंटीमीटर के अंतराल पर करना चाहिए| रोपण से पूर्व नालियों में आधार खाद और उर्वरक देना चाहिए| रोपण के 2 माह बाद बचे हुए उर्वरक की मात्रा देने के साथ नालियों को मिट्टी से उपर तक भर पौधों पर मिट्टी चढाकर मेड नाली पद्धति में परिवर्तित कर देना चाहिए| यह विधि रेतीली दोमट और नदी किनारे भूमि के लिए उपयुक्त हैं|

खाद और उर्वरक| Nutrition Management

अरबी के लिए भूमि तैयार करते समय 15 से 25 टन प्रति हेक्टेयर सडी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद और आधार उर्वरक को अंतिम जुताई करते समय मिला देना चाहिए| रासायनिक उर्वरक नत्रजन 80 से 100 किलोग्राम, फास्फोरस 60 किलोग्राम और पोटाश 80 से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग लाभप्रद हैं| नत्रजन तथा पोटाश की पहली मात्रा आधार के रूप में रोपण के पूर्व देना चाहिए| रोपण के एक माह नत्रजन की दूसरी मात्रा का प्रयोग निंदाई-गुड़ाई के साथ करना चाहिए| दो माह पश्चात् नत्रजन की तीसरी तथा पोटाश की दूसरी मात्रा को निंदाई-गुड़ाई के साथ देने के बाद पौधों पर मिट्टी चढा देना चाहिए|

सिंचाई प्रबंधन | Irrigation Management

अरबी की पत्तियों का फैलाव ज्यादा होने के कारण वाष्पोत्सर्जन ज्यादा होता हैं| इसलिए प्रति इकाई पानी की आवश्यकता अन्य फसलों से ज्यादा होती हैं| सिंचित अवस्था में रोपी गयी फसल में 7 से 10 दिन के अंतराल पर 5 माह तक सिंचाई आवश्यक हैं| वर्षा आधारित फसल में 15 से 20 दिन तक वर्षा न होतो सिंचाई के साधन उपलब्ध होने पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिए| परिपक्व होने पर भी अरबी की फसल हरी दिखती हैं, सिर्फ पत्तों का आकार छोटा हो जाता हैं| खुदाई के एक माह पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिए, जिससे नये पत्ते नहीं निकलते हैं तथा फसल पूर्णरूपेण परिपक्व हो जाती हैं|

अरबी की खेती | घुइयाँ की खेती 3

पैदावार | Yield

अरबी की खेती करने पर सामान्य अवस्था में अरबी से किस्म के अनुसार वर्षा आधारित फसल के रूप में 20 सर 25 टन तथा सिंचित अवस्था की फसल में 25 से 35 टन प्रति हेक्टेयर कंद पैदावार प्राप्त होती हैं| जब लगातार पत्तियों की कटाई की जाती है, तब कंद एवं कंदिकाओं की पैदावार 6 से 9 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है, जबकि एक हेक्टेयर से 8 से 11 टन हरी पत्तियों की पैदावार होती हैं|

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