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Saturday, December 5, 2020
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Arhar ki kheti – अरहर की खेती कैसे करें

Arhar ki kheti kaise kare in hindi – अरहर या तुर की उन्नत खेती कैसे करें, खेती किसानी जानकारी – Latest Kheti Kisani News in Hindi – खेती किसानी समाचार में आज इसी टोपिक पर जानकारी देने जा रहे हैं । खेती किसानी की लेटेस्ट जानकारी के लिए हमारे आर्टिकल Agriculture science पढ़ने वाले इंटर कृषि व बीएससी कृषि (BSC Agriculture) एमएससी कृषि (MSc Agriculture) के छात्र भी पढ़ते हैं ।

Arhar ki kheti in hindi –  modern tur ki kheti in hindi read full article

Arhar ki kheti – अरहर की खेती कैसे करें

भारत देश में अरहर को अरहर, तुर, रेड ग्राम, व पिजन पी के नाम से जाना जाता है। अरहर की दाल प्रोटीन का विशेष स्रोत है | प्रोटीन की कमी से ही हमारा शारीरिक व मानसिक विकास रुक जाता है । अरहर का वैज्ञानिक नाम Scientific name of pigeon pea- Cajanus Cajan L. है । अरहर में 22 गुणसूत्र होते हैं । अरहर का जन्मस्थान वैज्ञानिक भारत व दक्षिण अफ़्रीका मानते हैं । हम भारत वासियों के लिए यह बड़े गर्व की बात है । घर घर में प्रोटीन का मुख्या स्रोत के लिए मशहूर अरहर हमारे देश का पौधा है । लेग्यूम फसलों अथवा दलहनी फसलों की खेती में अरहर की खेती दूसरे नम्बर पर मानी जानी है ।

खेती किसानी जानकारी – Latest Kheti Kisani News in Hindi – खेती किसानी समाचार |

भारतीय किसान इसे वर्षों से अरहर की एकल खेती  (Arhar ki kheti) के अलावा अरहर को बाजरा, ज्वार, उर्द और कपास, अरहर के साथ उगाते चले आ रहें हैं । कृषि वैज्ञानिक भूमि के कटाव को रोकने के लिए भी अरहर की खेती करने की सिफ़ारिश करते हैं । अरहर के खेती से प्रोटीनयुक्त दाल के साथ इसकी सूखी लकड़ियों का उपयोग टोकरी,छप्पर,मकान की छत तथा ईधन के रूप में किया जाता है |हमारे देश में अरहर का कुल क्षेत्रफल का 20 प्रतिशत भाग उत्तर प्रदेश में उगाया जाता है | उत्त्तर प्रदेश में अरहर की खेती फतेहपुर, कानपुर,हमीरपुर, जालौन, प्रतापगढ़, आदि जिलों में होती है |

Climate and temperature for Arhar ki kheti

जलवायु व तापमान

अरहर नम तथा शुष्क जलवायु का पौधा है | इसकी वानस्पतिक वृद्धि व बढवार के लिए नम जलवायु की आवश्यकता होती है | अरहर के पौधे में फूल, फली व दाने बनते समय शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है | 75 से 100 सेंटीमीटर वाले स्थानों में अरहर की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है | किसान भाई अरहर की खेती  (Arhar ki kheti) भारी वर्षा वाले स्थानों में बिलकुल न करें |

How to select land for pigeon cultivation

अरहर की खेती के लिए भूमि का चयन एक बड़ा प्वाइंट –

अच्छी पैदावार के लिए जीवांश युक्त बलुई दोमट वा दोमट भूमि अच्छी होती है। उचित जल निकास तथा हल्के ढालू खेत अरहर के लिए सर्वोत्तम होते हैं। लवणीय तथा क्षारीय भूमि में इसकी खेती सफलतापूर्वक नहीं की जा सकती है। अरहर की खेती काली मृदा में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है | अच्छी जल धारण व चूने की पर्याप्त उपलब्धता वाली भूमि में अरहर की खेती से अधिकतम उत्पादन लिय जा सकता है |

Focus on preparing the field for maximum yield from Arhar ki kheti

अरहर की खेती से अधिकतम पैदावार के लिए खेत की तैयारी पर फ़ोकस करें 

गर्मी के खेती की जुताई देशी हल से करें । देशी हल अथवा बड़े क्षेत्र में ट्रैक्टर से कल्टीवेटर से 2 से 3 जुताइयाँ करें । गोबर की खाद खेतों में बिखेर दें । धूप लगने से खेतों में मौजूद कीड़े व कवक भी नष्ट हो जाएँगे । जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को तैयार कर लेना चाहिए।

Select the improved species recommended by scientists for the cultivation of pigeonpea –

अरहर की खेती के लिए वैज्ञानिकों द्वारा संस्तुत उन्नतशील प्रजातियों का चयन करें –

अरहर की प्रजातियों का विस्तृत विवरण निम्नवत् है –

अगेती प्रजातियां

– पारस – यह अरहर की अगेती किस्म है । उत्तर प्रदेश का पश्चिमी क्षेत्र इस किस्म के लिए बेहद उपयुक्त है । इसकी बुवाई जून के पहले सप्ताह में की जाती है । पारस किस्म 130 से 140 दिन में पकती है । इस किस्म से 18-20 कुंतल प्रति हेक्टर उपज प्राप्त की जा सकती है ।
– पूसा – 992 यह किस्म भी अगेती किस्म है । 1 जून से 10 जून तक इस किस्म की बुवाई की जाती है । यह किस्म अरहर की खेती में लगने वाले उकठा किस्म के प्रति सहनशील है । अरहर की पूसा – 992 किस्म 150 – 160 दिन में पकती है । यह किस्म 15-20 कुंतल प्रति हैक्टयर उपज देती है ।
– टा-21 – अरहर की खेती हेतु खेती किसानी इस किस्म को 1 अप्रैल से जून के प्रथम सप्ताह में बुवाई के लिए रिकमंड करता है । यह किस्म को पूरे उत्तर प्रदेश में उगाया जा सकता है । यह किस्म 160-170 दिन में पककर तैयार हो जाती है । इससे 15-20 कुंतल प्रति हेक्टर तक पैदावार मिलती है ।
UPAS – 120 – अरहर की खेती के लिए पूरे उत्तर प्रदेश में बोयी जाने वाली किस्म है । इसे मैदानी भागों में सफलता पूर्वक उगाया जाता है । इस किस्म की बुवाई जून से पहले सप्ताह में की जाती है । अगेती क़िस्मों की अन्य क़िस्मों के मुक़ाबले जल्दी पकती है । यह किस्म 130-140 दिन में तैयार हो जाती है । इस किस्म से 15-20 कुंतल प्रति हेक्टर उपज देती है ।

Learn about the late maturing varieties for pigeonpea cultivation –

अरहर की खेती (Arhar ki kheti) के लिए देर से पकने वाली क़िस्मों के बारे में जाने –

अरहर की देर बोयी जाने वाली क़िस्में आमतौर पर 260 से 280 दिन में तैयार होती है । लेट बुवाई वाली क़िस्मों में अगेती क़िस्मों के मुक़ाबले समय तो थोड़ा अधिक लगता है । लेकिन ये अगेती से अधिक उपज देती हैं । इन क़िस्मों से 25 से 30 कुंतल पैदावार आसानी से देती हैं । इसके साथ ही देर से बुवाई वाली – बहार , अमर, नरेंद्र अरहर -1, नरेंद्र अरहर -2, पूसा- 9, मालवीय विकास (MA-4) मालवीय चमत्कार (MA-6), PDA-11, आज़ाद, इन क़िस्मों में अरहर की खेती में लगने वाला बँझा रोग, उकठा रोग रोग आदि नही लगते हैं ।

Sowing time of pigeonpea

अरहर की बुवाई का समय –

अरहर की खेती से अच्छी पैदावार के लिए अरहर की खेती (Arhar ki kheti) वैज्ञानिक तरीक़े से करना चाहिए । वैज्ञानिकों द्वारा अरहर की बुवाई का समय अगेती व सिंचाई वाले इलाक़ों में 15 जून तक व देर से पकने वाली अरहर की उन्नत क़िस्मों की बुवाई जुलाई महीने में करनी चाहिए । इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जो क़िस्में 270 दिन में पकती है उनकी बुवाई जुलाई महीने में पूरी कर लेनी चाहिए । अरहर की टा-21 प्रजाति को अप्रैल 15 अप्रैल तक बोने से अच्छी पैदावार मिलती है ।अधिक उपज लेने के लिए (प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों में तरार्इ को छोड़कर) ग्रीष्म कालीन मूंग के साथ सह-फसल के रूप में बोने के लिए जायद में बल दिया जा चुका है।
इसके तीन लाभ है –
– फसल नवम्बर के मध्य तक तैयार हो जाती है एवं गेहूं की बुवाई में देर नहीं होती है
– इसकी उपज जून में (खरीफ) बोई गई फसल से अधिक होती है।
– मेड़ो पर बोने से अच्छी उपज मिलती है।

Seed treatment

बीज का उपचार

सर्वप्रथम एक कि.ग्रा. बीज को 2 ग्राम थीरम तथा एक ग्राम कार्बोन्डाजिम के मिश्रण अथवा 4 ग्राम ट्रइकोडर्मा + 1 ग्राम कारबाक्सिन या कार्बिन्डाजिम से उपचारित करें। बोने से पहले हर बीज को अरहर के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें। एक पैकेट 10 कि.ग्रा. बीज के ऊपर छिड़ककर हल्के हाथ से मिलायें जिससे बीज के ऊपर एक हल्की पर्त बन जाये। इस बीज की बुवाई तुरन्त करें। तेज धूप से कल्चर के जीवणु के मरने की आशंका रहती है। ऐसे खेतों में जहां अरहर पहली बार काफी समय बाद बोई जा रही हो, कल्चर का प्रयोग अवश्य करें बुवाई ।

Seed quantity and method of sowing

बीज की मात्रा तथा बुवाई विधि –

बुवाई हल के पीछे कूंड़ों में करनी चाहिए। प्रजाति तथा मौसम के अनुसार बीज की मात्रा तथा बुवाई की दूरी निम्न प्रकार रखनी चाहिए। बुवाई के 20-25 दिन बाद पौधे की दूरी, सघन पौधे को निकालकर निश्चित कर देनी चाहिए। यदि बुवाई रिज विधि से की जाए तो पैदावार अधिक मिलती है।

अगेती किस्म के लिए 12 से 15 किलो ग्राम तथा पिछेती क़िस्मों के लिए भी 15-18 किलो ग्राम बीज की मात्रा प्रति हैo उपयुक्त होता है । बुवाई की दूरी 60 X 20 रखनी चाहिए । वहीं देर से बुवाई की जाने वाली क़िस्मों में 60 X 20 सेमी0 की दूरी रखनी चाहिए । पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाढ़ या लगातार वर्षा के कारण बुवाई में विलम्ब होने की दशा में सितम्बर के प्रथम पखवारे में बहार की शुद्ध फसल के रूप में बुवाई की जा सकती है, परन्तु कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. एवं बीज की मात्रा 20-25 कि.ग्रा./हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए।

Use of fertilizers and fertilizers

खाद तथा उर्वरकों का प्रयोग –

अरहर की अच्छी उपज लेने के लिए 10-15 कि.ग्रा. नत्रजन, 40-45 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 20 किग्रा. सल्फर की प्रति हे. आवश्यकता होती है। अरहर की अधिक से अधिक उपज के लिए फास्फोरस युक्त उर्वरकों जैसे सिंगल सुपर फास्फेट, डाई अमोनियम फास्फेट का प्रयोग करना चाहिए। सिंगिल सुपर फास्फेट प्रति हे. 250 कि.ग्रा. या 100 कि.ग्रा. डाई अमोनियम फास्फेट तथा 20 किग्रा. सल्फर पंक्तियों में बुवाई के समय चोंगा या नाई सहायता से देना चाहिए जिससे उर्वरक का बीज के साथ सम्पर्क न हो।

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यह उपयुक्त होगा कि फास्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा सिंगिल सुपर फास्फेट से दी जाय जिससे 12 प्रतिशत सल्फर की पूर्ति भी हो सके। यूरिया खाद की थोड़ी मात्रा (15-20 कि.ग्रा. प्रति हे.) केवल उन खेतों में जो नत्रजन तत्व में कमजोर हो, देना चाहिए। उर्द जैसी सह-फसलों को अरहर के लिए प्रयुक्त खाद की आधी मात्रा दे। ज्वार तथा बाजरा की सह फसलों के रूप में बुवाई के समय उनकी पंक्तियों में 20 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हे. की दर से दें तथा एक महीना बाद 10 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर की टापड्रेसिंग करें। सितम्बर में बुवाई हेतु 30 से 40 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर नत्रजन के प्रयोग से अच्छी उपज प्राप्त होती है।

Irrigation and Water Management –

सिंचाई तथा जल प्रबन्धन –

अरहर टा-21 तथा यू.पी.ए.एस.-120 तथा आई.सी.पी.एल.-151 को पलेवा करके तथा अन्य प्रजातियों को वर्षाकाल में पर्याप्त नमी होने पर बोना चाहिए। खेत में कम नमी की अवस्था में एक सिंचाई फलियां बनने के समय अक्टूबर माह में अवश्य की जाय। देर से पकने वाली प्रजातियों में पाले से बचाव हेतु दिसम्बर या जनवरी माह में सिंचाई करना लाभप्रद रहता है।

Weeding and Weed Control –

निकाई-गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण –

अरहर के खेत में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए एलाक्लोर 50 डब्लू.पी. लासो को 4.0 से 5.0 किग्रा. की दर से बुवाई के दो दिनों में प्रयोग करें । अथवा फ्लूक्लोरेलिन 45 ई.सी. बेसलिन 1500-2000 मिली.को 600 से 800 मिली. बुवाई के तुरन्त पहले स्प्रे करने के बाद मृदा में मिला दें । केवल घास कुल के खरपतवारों के नियंत्रण के लिए क्विजैलोफाप 5 ई.सी. टर्गासुपर 800-1000 मिली बुवाई के 15-20 दिन बाद प्रयोग करें

Crop harvesting

फसल की कटाई – मड़ाई-

अरहर के पौधों पर लगी 80 प्रतिशत फलियाँ पककर भूरे रंग की हो जाएँ | किसान भाई तब फसल की कटाई कर लें | कटाई के एक 7 से 10 सिन बाद जब पौधे पूरी तरह सूख जाएँ तब लकड़ी से पीट-पीटकर अथवा जमीन में पटक कर फलियों को अरहर के पेड़ से अलग कर लें | इसके बाद किसान भाई डंडे अथवा बैलों की सहायता से अरहर के दाने निकाल लें | दानों को 7 से 10 दिन धूप में सुखाकर 8 से 10 प्रतिशत नमी रह जाने पर भंडारित कर लेना चाहिए |

Yield from tur cultivation –

अरहर की खेती से उपज –

अरहर की उन्नतशील किस्मों से 15 से 25 कुंतल अरहर,50-60 कुंतल लकड़ी व 10 से 15 कुंतल भूसा प्राप्त हो जाता है ।

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