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Friday, December 4, 2020
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भिंडी की जैविक खेती कैसे करें

भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) पूरे देश मे की जाती है। भिंडी की मांग पूरे साल रहती है । और ऑफ सीजन में भिंडी का रेट भी अच्छा मिलता है । इसलिए भिंडी की खेती किसानों के लिए एक अच्छा आय का स्रोत है । भिंडी को okra भी कहते हैं।

भिंडी की उन्नत खेती के तरीके bhindi ki kheti
भिंडी की उन्नत खेती के तरीके bhindi ki kheti

कुरकुरी भिंडी या फिर भरवां भिंडी की यह सब्जी सभी की खास पसन्द है । भिंडी सब्जी के अलावा इसके औषधीय गुणों के लिए भी महत्वपूर्ण है । इसमें पाए जाने वाले तत्व हमारे शरीर को पोषण देते हैं । तथा कई खतरनाक बीमारियों से भी बचाते हैं । भिंडी में 30 फीसदी कैलोरी होती है । भिंडी vitamin C व मैग्नीशियम का एक अच्छा स्रोत माना जाता है। भिंडी का पानी मधुमेह जैसी कई बीमारियों से बचाता है ।
Okra juice benefits in hindi
एक गिलास भिंडी के रस में
– काले टमाटर की खेती Indigo Rose Tomato farming
– 6 ग्राम कार्बोहाइड्रेट
– 80 माइक्रोग्राम फोलेट
– 3 ग्राम फाइबर और
– 2 ग्राम प्रोटीन मिलता है ।
भिंडी खाने के फायदे –
– भिंडी मधुमेह डायबिटीज कम करता है ।
– कोलेस्ट्रॉल के लेवल को कम करता है ।
– अस्थमा के रोगियों के लिए भिंडी रामबाण है ।
– शरीर मे इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है ।
-जैतून तेल में नींबू का रस मिलाकर पीने से कमाल का रिजल्ट मिलता है ।
– भिंडी गुर्दे की बीमारी को दूर करती है ।
घर मे भिंडी का रस बनाने का तरीका –
ताजी 5 से 6 भिंडी लें । इन सभी को इनके किनारे से काट लें । फिर बीच से काटकर एक बर्तन में रख लें । फिर उसमें एक दो कटोरी पानी डालकर 4 से 5 घण्टे के लिए रख दें । इसके बाद जब समय हो जाये । भिंडी के सभी टुकड़ो को निचोडकर निकाल लें । एक गिलास में भिंडी के रस को डालें । अगर कम हो तो सादा पानी मिला लें । इसे नाश्ते के पहले पीने से मधुमेह व मोटापा कम करने में मदद मिलती है। भिंडी का रस अपच भी दूर करता है ।
लाल भिंडी की उन्नत खेती (Lal bhindi ki kheti )
आज हम भिंडी की उन्नत खेती कैसे की जाती है । इस आर्टिकल में पूरी जानकारी देंगे । भिंडी की वैज्ञानिक खेती से अच्छी पैदावार कैसे पाएं ! सभी जानकारी देंगे । bhindi ki kheti kaise karen

okra farming – bhindi ki Unnat Kheti in Kheti kisani

जलवायु व तापमान –

Climate and temperature for bhindi ki kheti
फसल ग्रीष्म तथा खरीफ, दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती है।भिंडी का पौधा दीर्घ अवधि का गर्म व नम वातावरण में अच्छा विकास करता है। भिंडी के बीज उगने के लिये 27-30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उपयुक्त होता है। 17 डिग्री से कम जलवायु भिंडी के बीज में अंकुरण नही होता है ।

भूमि का चयन

Land selection
भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) के लिए कार्बनिक जीवाश्म युक्त दोमट भूमि अच्छी होती है । भिंडी की उन्नत खेती के लिए भूमि का पी0 एच मान 7.0 से 7.8 होना चाहिए ।
आमतौर पर सभी प्रकार की भूमि में लिया जा सकता है। फिर भी, अच्छी तरह से सूखा, अच्छी तरह से सूखा, तलछटी और मध्यम आकार की मिट्टी अधिक उपयुक्त है। अत्यधिक काली मिट्टी में, मानसून के दौरान, पानी भरा जा रहा है, इसलिए गर्मी के मौसम में जमीन की फसल अच्छी तरह से काटी जा सकती है।

मिट्टी की तैयारी –

Soil preparation for okra cultivation
पिछली फसल की अच्छी तरह से खेती करने और पिछली फसल के कटे हुए खरपतवारों को अच्छी तरह से पोंछने के बाद। मरम्मत और मरम्मत के लिए जमीन तैयार करना। इस तरह की तैयार मिट्टी में, उर्वरक द्वारा उर्वरक के साथ-साथ आधार में रासायनिक उर्वरक प्रदान करने के लिए हल द्वारा हल खोला जाता है।

भिंडी की उन्नत किस्में

Advanced Varieties of Okra for lady finger farming
पूसा ए-4 : यह किस्म ICAR नई दिल्ली द्वारा 1995 में विकसित की गई है । फल 12 से 15 सेमी लंबे व आकर्षक होते हैं । यह किस्म एफिड तथा जैसिड तथा पीतरोग यैलो वेन मोजैक विषाणु रोग के प्रति सहनशील है । बुवाई के दो हफ्ते में फूल निकलते है व डेढ़ माह में पहली तुड़ाई के लिए फल तैयार हो जाते हैं । गर्मी में 10 टन व खरीफ में 15 टन तक उपज मिलती है ।
VRO – 6 : यह किस्म 2003 में भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान वाराणसी द्वारा विकसित की गई है । इसे काशी प्रगति भी कहा जाता है। भिंडी की यह किस्म येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी हैं। इस किस्म का पौधा वर्षा ऋतु में 175 सेमी तथा गर्मी में 130 सेमी लम्बा होता है । इस किस्म से उपज गर्मी में 13.5 टन एवं बरसात में 18.0 टन प्रति हे0 तक होती है।
हिसार उन्नत : वर्षा तथा गर्मियों दोनों मौसमों में उगाई जाने वाली यह प्रजाति चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा निकाली विकसित की गई है । इस किस्म के पौधे 90-120 सेमी तक ऊंचाई वाले होते हैं । तथा इंटरनोड पासपास होते हैं ।पौधे में 3-4 शाखाएं प्रत्येक नोड से निकलती हैं। इस किस्म के फल 15-16 सेंमी लम्बे हरे तथा आकर्षक होते हैं। पहली तुड़ाई हेतु 46-47 दिनों बाद भिंडी में फल तैयार हो जाते है । 12-13 टन प्रति है की दर से उपज मिलती है।
अर्का अभय : येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी यह प्रजाति भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा निकाली गई है ।
यह प्रजाति है। इसके पौधे ऊँचे 120-150 सेमी सीधे तथा अच्छी शाखा युक्त होते हैं।
अर्का अनामिका : येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी यह उन्नत भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा निकाली गई है। दोनों मौसमों में उगाई जाती है । पौधे 120-150 सेमी तक होती ह उपज तक 12-15 टन प्रति है0 तक मिलती है ।
परभनी क्रांति : भिंडी की यह पीत-रोगरोधी प्रजाति का विकास 1985 में मराठवाड़ाई कृषि विश्वविद्यालय, परभनी द्वारा किया गया है ।फल गहरे हरे एवं 15-18 सेंमी लम्बे होते हैं। बुवाई के 50 दिन बाद फल आना शुरू हो जाते हैं । इस किस्म की पैदावार 9-12 टन प्रति है।
पंजाब-7 : यह किस्म भी पीतरोग रोधी है। यह प्रजाति पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा निकाली गई है। फल हरे एवं मध्यम आकार के होते हैं। बुआई के लगभग 55 दिन बाद फल आने शुरू हो जाते हैं। इसकी पैदावार 8-12 टन प्रति है।

बुवाई का समय –

Time of sowing
भिंडी की पूरे साल मांग रहती है । इसलिए इसे दो मौसमों में उगाया जाता है । मानसून के खरीफ मौसम में यह फसल जून-जुलाई महीने में बोई जाती है । तो वहीं गर्मियों के लिए फरवरी-मार्च में बोई जाती है।

बुवाई विधि और बीज दर –

Sowing method and seed rate
भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) में बीज की मात्रा उन्नत किस्म, मिट्टी की क्वालिटी, बुवाई की दशाओं पर निर्भर करता है । ख़रीफ़ की फसल में कम बीज लगता है। वहीं ग्रीष्म क़ालीन भिंडी की खेती में बीज की मात्रा लगभग दुगुनी लगती है। वर्षा क़ालीन भिंडी की खेती में 8-10 किलोग्राम तथा ग्रीष्म क़ालीन भिंडी की खेती में 18-20 किलोग्राम उन्नत किस्म का प्रमाणित बीज की आवश्यकता होती है। बुवाई के पहले बीज को 10-15 घंटे तक पानी में भिगो दे । फिर बीज को निकाल कर छाया में एक घंटे लगभग सुखा लें। ऐसा करने से बीज में अंकुरण अच्छा होता है। खेत में बीजों को लाइन से लाइन की दूरी 45-60 सेमी0 व पौध से पौध की दूरी 25-30 सेमी0 के अंतरण पर 3-4 सेमी0 गहराई पर बो दें।

उर्वरक

Fertilizer
आजकल जैविक खाद से तैयार सब्जियों का बाजार में मूल्य अच्छा मिलता है । इसलिए जहां तक हो सके रासायनिक खादों का प्रयोग न करके, जैविक खादों का ही प्रयोग करें । भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) हेतु तैयारी के समय 20 से 30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खाद डालें। इसके अलावा रासायनिक ऊर्वरक के रूप में नाइट्रोजन 100,फास्फोरस 60 तथा पोटाश 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से दें। खेत की तैयारी से पहले नत्रजन की 40 किलोग्राम व फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा मिट्टी में मिला दें । शेष बची नाइट्रोजन की मात्रा को खड़ी फसल में दो बार टॉप ड्रेसिंग के माध्यम से दें।

सिंचाई

Irrigation
मानसून में भिंडी की फसल में अधिक सिचाई की जरूरत नही पड़ती है । लेकिन गर्मियों के सिचाई का विशेष ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है । ड्रिप विधि से सिंचाई करके अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है । इससे सिंचाई में इस्तेमाल होने वाले पानी की अनावश्यक बर्बादी भी रोकी जा सकती है ।

निराई गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण –

Weeding and weed control
भिंडी की फसल (bhindi ki kheti ) में शुरुआत में समय समय पर निराई – गुड़ाई कर खरपतवार निकालते रहें । तथा पौधों की जड़ों में मिट्टी चढ़ा दें । मानसून की भिंडी की फसल में 4 से 5 बार निराई – गुड़ाई कर दें। इसके बाद 15-20 दिन में एक बार निराई करें। इसके अलावा रासायनिक खरपतवार नाशक के रूप में पेंडिमिथालीन या फ्लुक्लोरालिन का भी प्रयोग कर सकते हैं । पैडीमिथालिन (स्टाम्प) 1.0 कि0ग्रा0 या बेसालिन 10 लीटर प्रति ग्राम को 700-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर में छिड़काव करने से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।

फसल संरक्षण –

Crop Protection
भि‍ंडी की खेती में होने वाली बीमारियां व उनकी रोकथाम
पीला रोग- bhindi ki kheti में लगने वाला यह भयंकर रोग है। इसके प्रकोप से पौधों में फलन कम होती है । बीमारी में भिण्डी के पत्तो पर पीली रंग की धारियां पड़ जाती है और उस के बाद पूरा पता पीला हो जाता है जिस के कारण फल का रंग पीला हो जाता है । इसके उपचार के सावधानी बरतें। बुवाई के पहले की पीला रोग प्रतिरोधी क़िस्मों की बुवाईं करें। हिसार उन्नत या पी-8, पी-7 यह पीला रोग प्रतिरोधी क़िस्में हैं इन्हें अपनाएँ। रोगी पौधे को उखाड़कर ज़मीन के नीचे दबा दें। या फिर खेत से दूर ले जाकर जला दें।
सस्कोस्पोरा झुलसा – भिंडी की खेती (bhindi ki kheti ) को झुलसा सबसे अधिक नुक़सान पहुँचाता है। इस रोग के करन फलों की गुणवत्ता ख़राब हो जाती है। इस रोग के कारण भिण्डी के पत्ताो पर विभिन्न प्रकार के लम्बूतरे धब्बे उभर आते हैं तथा किनारों से मुड़ जाते है। इस रोग के बचाव हेतु शुरुआत में ही झुलसा प्रतिरोधी क़िस्मों का चुनाव करें तो बेहतर है। इसके अलावा रोगी पौधे को उखाड़कर ज़मीन के नीचे दबा दें। या फिर खेत से दूर ले जाकर जला दें। डायथेन एम-45 (0.25%) 250 ग्राम दवाई का 200-300 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें तथा 15 दिनों के पश्चात फिर से उस दवाई का छिड़काव करे।

भि‍ण्‍डी की खेती में लगने वाले कीट व उनकी रोकथाम

भिंडी में लगने वाले कीट का नाम हानिकारक कीट की विशेषताएँ रोकथाम व उपचार
लालमाईट कीट अष्टपदी नामक कीट लालमाइट कीट लाल रंग का कीट है। इस कीट के शिशु तथा व्यस्क दोनो की भिंडी की फसल को हानि पहुँचाते हैं। यह पत्तों के नीचे की सतह से रस चूसते है। पत्तियों को पोषण न मिलने के कारण व आकार छोटा हो जाता है। रस चूसने के कारण पत्तियों में धब्बे बन जाते है। वयस्क लाल कीट भिण्डी के पर मकड़ी की तरह जाला बना देते है । तथा पत्तियों के नोक पर जमा हो जाते हैं। इस कीट के कारण पत्ते सूख जाते हैं। पौधें में फलन कम लगती है। लाल माइट कीट की रोकथाम के लिए प्रेम्पट 25 ई0सी0 600 मि0ली0 बाय की दवाई का 400-600 लीटर पानी के साथ घोल बनाकर एक हेक्टेयर भूमि के अन्दर छिड़काव करने से लाल माईट को नियन्त्रित किया जा सकता है।
भिंडी की सफेद मक्खी  सफेद मक्खी भी लालमाइट के जैसे ही फसल को नुक़सान पहुँचाती है । पत्तियों की नीचे की सतह पर शिशु एवं वयस्क कीट चिपक कर रस चूसते हैं। पत्तियों को पोषण ना मिलने के कारण पौधे की पत्तियों में पीला सिरारोग (येलो मौजेक वायरस) रोग फैल जाता है । मानसून वाली भिंडी की खेती में यह रोग तेज़ी से फैलता है। भिंडी की सफ़ेद मक्खी के नियंत्रण के लिए 300-500 मि0ली0 मैलाथियान 50 ई0सी0 नामक दवाई को 200-300 लीटर पानी में अच्छी तरह घोलकर एक एकड़ भूमि में छिड़काव करें।
फली छेदक सुण्डियां यह कीट पौधे की टहनियों तथा पत्तियों में व कलियों में छेद करती है । उसके बाद फल में सुराख करके फल को नुकसान पहुंचाती है । सुण्डियों के प्रकोप की प्रारंभिक अवस्था में टहनियां झडने लगती हैं और पौधा मर जाता है। फल विकृत हो जाते हैं। जिससे फलों की गुणवत्ता ख़राब हो जाती है। किसं को अच्छा बाज़ार भाव नही मिल पाता है। जिस के कारण किसान की फसल का बाजार में उचित मूल्य नहीं मिलता इसके कारण किसान को हानि होती है। विकसित हो रहा फल विकृत हो जाता है। फली छेदक सूड़ियो के फसल पर लक्षण देखते ही मैलाथियॉन 0.05% या कार्बेरिल 0.1% या 75-80 मि0ली0 स्पाईनोसैड 45 ई0सी0 को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ में छिड़काव करें। एक हेक्टेयर के लिए मात्रा डबल कर लें। तथा दो सप्ताह के बाद एक छिड़काव और कर दें
हरा तेला भिंडी के फसल पर लाल माइट व सफ़ेद मक्खी की भाँति हरा तेला कीट के  शिशु व व्यस्क कीट कोमल पत्तियों के नीचे की सतह से कोषिकाओं के रस को चूस लेते है। जिस के कारण पत्तियों की उपरी सतह छोटे-छोटे हल्के पीले रंग के धब्बे बन जाते है। पोषण ना मिलने से पत्ते पीले पड़कर सूख जाते हैं। भिण्डी को तेले से बचाने के लिए मेलाथियान 0.05% (100 मि0ली0 साईथियान/मैलाथियॉन/मासथियॉन 50 ई0सी0) दवाई को 150 से 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें

हार्मोन छिड़काव –

Hormones spraying
वैज्ञनिकों का मानना है कि भिंडी की फसल पर हार्मोन्स के छिड़काव से 5 फीसदी तक उत्पादन में बढ़ोतरी की जा सकती है । गुजरात कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार 3 PPM की दर से साइकोसाइल हार्मोन का छिड़काव करने से पौधे में फलियों की संख्या बढ़ जाती है ।

उपज

Yield
कृषि की सभी दशाएं सामान्य रही तो भिंडी की खेती से 3 से 5 टन हरी फली का उत्पादन प्रति हेक्टेयर मिल सकता है ।

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