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Tuesday, June 28, 2022
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Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ

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Poplar Tree Farming Tips, Profit: भारत हमारे देश भारत एक कृषि प्रधान देश है और खेती की बदौलत ही बड़ी आबादी की रोजी-रोटी चलती है। यूं तो लोग अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए सालों से खेती का सहारा लेते आ रहे हैं, लेकिन अब भी खेती-किसानी को ज्यादा प्रॉफिट वाला नहीं माना जाता है।

Poplar Tree Farming Grow More Profits

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अतीत में बड़ी संख्या में किसान कभी कर्ज तो कभी फसल की बर्बादी की वजह से आत्महत्या करते आए हैं। हालांकि, खेती करके कई किसान लाखों-करोड़ों रुपये भी कमाते हैं। कई तरह की फसलें होती हैं, जिनकी मदद से किसान आमदनी को बढ़ा सकता है. उसी तरह, कई तरह के पेड़ों की डिमांड भी मार्केट में बहुत है और उसकी लकड़ियों की अच्छी-खासी रकम मिलती है. इसी तरह यदि आप पोपलर के पेड़ों की खेती करते हैं तो फिर आपको अच्छा लाभ मिल सकता है। पॉपुलर की खेती कैसे करें (Popular Farming in Hindi), तथा पॉपुलर की लकड़ी का क्या बनता है? और Poplar Tree Rate कितना होता है, आदि के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी जा रही है |

Poplar Tree Farming Income, Profit | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ

दुनिया में कहां उगाए जाते हैं पॉपुलर के पेड़?

पॉपुलर के पेड़ों की खेती सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के कई हिस्सों में होती है. एशिया, नॉर्थ अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका के देशों में पॉपुलर के पेड़ उगाए जाते हैं।

भारत में कहाँ होती है पोपलर की खेती | Where to Poplar Tree Farming in इंडिया

भारत में हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, अरूणाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल मुख्य पोपलर उत्पादक राज्य हैं।

पोपलर के पेड़ का उपयोग | Uses of Poplar Tree

पॉपुलर के पेड़ का विभिन्न कामों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस पेड़ का इस्तेमाल पेपर को बनाने में, हल्की प्लाईवुड, चॉप स्टिक्स, बॉक्सेस, माचिस आदि बनाने के लिए किया जाता है।

किस तापमान में उगता है पोपलर का पेड़? (Poplar Tree Farming Temperature)

पॉपुलर के पेड़ की खेती के लिए तापमान की बात करें तो भारत उसके लिए सबसे सही वातावरण वाले देशों में एक है। दरअसल, पॉपुलर की खेती के लिए पांच
डिग्री सेल्सियस से लेकर 45 डिग्री सेल्सियस के तापमान की जरूरत होती है। इसे सूरज की सीधी रौशनी की आवश्यकता होती है। पॉपुलर के पौधे सामान्य तापमान वाले होते है, तथा पौध रोपाई के लिए 18 से 20 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है | इसकी खेती में 750 से 800 MM वर्षा उपयुक्त होती है | इसके पौधे अधिकतम 45 डिग्री तथा न्यूनतम 10 डिग्री तापमान पर अच्छे से विकास कर सकते है |

पॉपुलर के लिए उपयुक्त मिट्टी का चयन कैसे करें

वहीं, नीचे की मिट्टी से यह पेड़ आसानी से मॉइश्चर भी हासिल कर लेता है। हालांकि, जिन जगह खूब बर्फबारी होती है, वहां पर पॉपुलर के पेड़ नहीं उगाए जा सकते हैं। इसकी खेती के लिए आपके खेत की मिट्टी 6 से 8.5 पीएच के बीच में होनी चाहिए।

पोपलर की खेती में भूमि की तैयारी (Popular Farming Land Preparation)

पॉपुलर के पौधों को खेत में लगाने से पूर्व भूमि को ठीक तरह से तैयार कर ले | इसके लिए खेत की मिट्टी पलटने वाले हलो से गहरी जुताई कर दे | इसके बाद खेत में पानी लगा दे | पानी लगे खेत में जब पानी सूख जाये तो रोटावेटर लगाकर दो से तीन तिरछी जुताई करे | इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाएगी | जिसके बाद खेत में पाटा लगाकर खेत को समतल कर दे | यदि खेत की मिट्टी में जिंक की कमी पायी जाती है, तो भूमि तैयारी के समय प्रति एकड़ के हिसाब से 10 KG जिंक सल्फेट की मात्रा का छिड़काव करे | इसके बाद पौधों की रोपाई के लिए खेत में गड्डो को तैयार कर लिया जाता है।

Advanced Improved Varieties For Poplar Tree Farming | पॉपलर के पेड़ की खेती के लिए उन्नत किस्में

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 8

पॉपुलर के बीजो की रोपाई का तरीका (Popular Seeds Planting Method)

पॉपुलर की फसल उगाने से पहले बीज से पौधों को तैयार कर लिया जाता है | इसके बाद तैयार पौधों को खेत में बनाये गए गड्डो में लगाना होता है | किसान भाई
चाहे तो पौधों को किसी रजिस्टर्ड नर्सरी से भी खरीद सकते है, इससे उन्हें पैदावार प्राप्त करने में अधिक समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा | खेत में 5
मीटर की दूरी रखते हुए पंक्तियों को तैयार कर लिया जाता है | इन पंक्तियों में पौधों की रोपाई 5 से 6 मीटर की दूरी पर तैयार 1 मीटर गहरे गड्डो में की जाती है | एक एकड़ के खेत में तक़रीबन 476 पौधों को लगाया जा सकता है | इन गड्डो में 2 KG गोबर की खाद, 25 GM म्यूरेट ऑफ़ पोटाश के साथ 50 GM सुपर
फास्फेट को अच्छी तरह से मिट्टी में मिलाकर गड्डो में भर दिया जाता है |

पॉपुलर के पौध की रोपाई का उचित समय| Sutable Time to Poplar Plantation

पॉपुलर के पौधों की रोपाई के लिए जनवरी से फ़रवरी का महीना सबसे अच्छा माना जाता है, तथा 15 फ़रवरी से 10 मार्च तक भी पौधों को लगा सकते है |

Inter cropping with Poplar| पॉपुलर के पेड़ों संग हो सकती है अन्य की खेती भी

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अगर आप अपने खेत में पॉपुलर के पेड़ों को लगाना चाहते हैं तो सिर्फ उसी पेड़ को लगाना ही आवश्यक नहीं है. बल्कि आप अन्य जरूरत वाली चीजों की खेती
भी कर सकते हैं. पेड़ों के बीच आप गेंहू, गन्ने, हल्दी, आलू, धनिया, टमाटर आदि को भी उगा सकते हैं और उससे भी अच्छी कमाई कर सकते हैं. एक पेड़ से
दूसरे पेड़ के बीच में दूरी तकरीबन 12 से 15 फीट के बीच की रख सकते हैं । इसके बीच में आप अन्य गन्ना या फिर कोई और चीज की बुआई कर सकते हैं.

पॉपुलर की खेती से कमाई अनलिमिटेड | Popular Farming Earning More Profit, Benefits

कोई भी खेती करने से पहले उससे होने वाली कमाई पर सबसे पहले ध्यान जाता है। यदि आप पॉपुलर की खेती कर रहे हैं तो आपको इससे बंपर कमाई हो सकती है.
पॉपुलर के पेड़ों की लकड़कियां 700-800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिकती हैं। एक पेड़ का लट्ठ आसानी से 2000 रुपये तक बिकता है। अगर पॉपुलर के
पेड़ों की सही तरीके से देखभाल की जाए तो एक हेक्टेयर में 250 पेड़ तक उगाए जा सकते हैं। जमीन से एक पेड़ की ऊंचाई तकरीबन 80 फीट तक होती है. आप एक हेक्टेयर की पॉपुलर की खेती से छह से सात लाख रुपये तक की कमाई कर सकते हैं।

बेल की खेती | Wood Apple Farming | बेल की उन्नत बागवानी

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बेल एक बागबानी फसल है, जिसके फलो की खेती औषधीय रूप में भी की जाती है | इसकी जड़े, पत्ते, छाल और फलो को औषधीय रूप से इस्तेमाल में लाया जाता है |बेल एक घरेलू फल वाला वृक्ष है, जिसकी भारत में धार्मिक रूप में भी बहुत महत्ता हैं|

Bael Ki Kheti – Wood Apple Gardening Full Details In Hindi |

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 10

इसको बंगाली बेल, भारती बेल, सुनहरी सेब, पवित्र फल, पथरीला सेब आदि नाम के साथ भी जाना जाता हैं|इसके अलावा इसे शैलपत्र, सदाफल, पतिवात, बिल्व, लक्ष्मीपुत्र और शिवेष्ट के नाम से भी जानते है | हिन्दू धर्म में इस पौधे को बहुत ही पवित्र माना जाता है, तथा वैदिक संस्कृत साहित्य में इस वृक्ष को दिव्य वृक्ष का दर्जा दिया गया है | ऐसा भी कहा जाता है, कि इसकी जड़ो में महादेव शिव निवास करते है | जिस वजह से इस पेड़ को शिव का रूप भी कहते हैँ। बेल को प्राचीन काल से ही ‘श्रीफल’ के नाम से भी जाना जाता है |

बेल में पाए जाने वाले पोषक तत्व | Nutrition Value in Wood apple

बेल को पोषक तत्वों और औषधीय गुणों के कारण बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है| बेल का फल पोषक तत्व और औषधीय गुणों से भरपूर होता है | इसके फल में विभिन्न प्रकार के एल्कलाॅइड, सेपोनिन्स, फ्लेवोनाॅइड्स, फिनोल्स कई तरह के फाइटोकेमिकल्स विटामिन-ए, बी.सी., खनिज तत्व व कार्बोहाइड्रेट पाये जाते हैं। बेल के फल के गूदे (Pulp) में अत्यधिक ऊर्जा, प्रोटीन, फाइबर, विभिन्न प्रकार के विटामिन व खनिज और एक उदारवादी एंटीआक्सीडेंट पाया जाता है । इससे अनेक प्रकार के पदार्थ मुरब्बा, शरबत को बनाया जाता है |

बेल का औषधीय उपयोग | Wood Apple Uses On Ayurveda

फलों के गूदे का उपयोग पेट के विकार में किया जाता है। फलों का उपयोग पेचिश, दस्त, हेपेटाइटिस बी, टी वी के उपचार में किया जाता है। पत्तियों का प्रयोग पेप्टिक अल्सर, श्वसन विकार में किया जाता है।
जडों का प्रयोग सर्पविष, घाव भरने तथा कान सबंधी रोगों के इलाज में किया जाता है। बेल सबसे पौष्टिक फल होता है इसलिए इसका प्रयोग कैंडी, शरबत, टाफी के निर्माण में किया जाता है।

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बेल के जड़, छाल, पत्ते शाख और फल औषधि रूप में मानव जीवन के लिये उपयोगी हैं। बेल से तैयार दवाइयाँ दस्त, पेट दर्द, फूड पाईप, मरोड़ आदि के लिए प्रयोग की जाती हैं| इसका प्रयोग शुगर के इलाज, सूक्ष्म-जीवों से बचाने, त्वचा सड़ने के इलाज, दर्द कम करने के लिए, मास-पेशियों के दर्द, पाचन क्रिया आदि के लिए की जाने के कारण, इसको औषधीय पौधे के रूप में जाना जाता हैं| इससे अनेक परिरक्षित पदार्थ (शरबत, मुरब्बा) बनाया जा सकता है।

Botanical Details of Wood Apple | बेल का वानस्पतिक विवरण

यह एक पतझड़ वाला वृक्ष हैं, जिसकी ऊंचाई 6-8 मीटर होती है और इसके फूल हरे-सफ़ेद और मीठी सुगंध वाले होते हैं| इसके फल लम्बाकार होते है, जो ऊपर से पतले और नीचे से मोटे होते हैं|

Bael Farming in india | भारत में बेल की खेती कहाँ होती है

भारत में बेल की खेती को उत्तर पूर्वी राज्यों में मुख्य रूप से उगाया जा रहा है | यह हिमालय तलहठी, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, उत्तरांचल, झारखंण्ड, मध्य प्रदेश, डैकनी पठान और पूर्वी तट आदि क्षेत्रों में पाया जाता हैं | इसके अलावा झारखण्ड राज्य के तक़रीबन सभी जिलों में बेल की खेती अधिक मात्रा में की जा रही है | बेल की व्यापारिक खेती धनबाद, गिरिडीह, चतरा, कोडरमा, बोकारो, गढ़वा, देवघर, राँची, लातेहार और हजारीबाग में की जा सकती है |

तापमान एवं जलवायु | Suitable Cimate and Temperature Wood Apple Farming

बेल का पौधा शुष्क और अर्धशुष्क जलवायु वाला होता है | सामान्य सर्दी और गर्मी वाले मौसम में इसके पौधे अच्छे से विकास करते है | किन्तु अधिक समय तक सर्दी का मौसम बने रहने और गिरने वाला पाला पौधों को कुछ हानि पहुँचाता है | इसके पौधों को वर्षा की जरूरत नहीं होती है | इसके पौधे सामान्य तापमान में अच्छे से विकास करते है | बेल के पौधे अधिकतम 50 डिग्री तथा न्यूनतम 0 डिग्री तापमान को आसानी से सहन कर सकते है, तथा 30 डिग्री तापमान पर पौधे अच्छे से विकास करते है । समुद्रतट से 700-800 मीटर ऊंचाई तक के प्रदेषों में इसके पौधे हरे-भरे पाए जाते है ।

बेल की खेती के उपयुक्त मिट्टी का चयन | Fied/Soil Selection for Bel Farming/Bel ki kheti

बेल की खेती किसी भी उपजाऊ मिट्टी में की जा सकती है | इसकी फसल को पठारी, कंकरीली, बंजर, कठोर, कंकरीली, खादर, बीहड़ रेतीली सभी तरह की भूमि में आसानी से ऊगा सकते है |

किन्तु बलुई दोमट मिट्टी में इसकी पैदावार अधिक मात्रा में प्राप्त होती है | इसकी खेती में भूमि उचित जल-निकासी वाली होनी चाहिए, क्योकि जलभराव में इसके पौधों में कई रोग लग जाते है | इसकी खेती में भूमि का P.H. मान 5 से 8 के मध्य होना चाहिए |

बेल के खेती हेतु भूमि की तैयारी और उवर्रक प्रबंधन (Vine Field Preparation and Fertilizer)

बेल के पौधों की रोपाई गड्डो में की जाती है | इसलिए खेत में गड्डो को तैयार करने के लिए सबसे पहले खेत की गहरी जुताई कर दी जाती है | इसके बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है, इससे खेत की मिट्टी में सूर्य की धूप ठीक तरह से लग जाती है | इसके बाद कल्टीवेटर लगाकर खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर दी जाती है | जुताई के बाद खेत में पानी लगा दिया जाता है, पानी लगाने के पश्चात् जब खेत की मिट्टी ऊपर से सूखी दिखाई देने लगती है, उस दौरान रोटावेटर लगाकर खेत की जुताई कर दी जाती है, इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है | मिट्टी को भुरभुरा करने के पश्चात पाटा लगाकर खेत को समतल कर दे | इस तरह से खेत तैयार हो जाता है | इसके बाद समतल खेत में 6 मीटर की दूरी रखते हुए एक से डेढ़ फ़ीट चौड़े और एक फ़ीट गहरे गड्डो को तैयार कर लिया जाता है | यह सभी गड्डे खेत में 5 से 6 मीटर की दूरी रखते हुए कतारों में तैयार करे | इन गड्डो को तैयार करते समय उसमे रासायनिक और जैविक खाद को मिट्टी के साथ मिलाकर गड्डो में भर दिया जाता है | इसके लिए 10 KG जैविक खाद और 50GM पोटाश, 50GM नाइट्रोजन और 25GM फास्फोरस की मात्रा को ठीक तरह से मिट्टी में मिलाकर गड्डो में भर दे | यह सभी गड्डे पौध रोपाई से एक माह पूर्व तैयार किये जाते है |

उवर्रक की इस मात्रा को पौधों पर फल लगने के समय तक देना होता है, तथा पूर्ण रूप से तैयार पौधे को वर्ष में 20 से 25KG जैविक खाद तथा 1KG रासायनिक खाद की मात्रा को देना होता है | उवर्रक की मात्रा देने के पश्चात् खेत की सिंचाई कर दी जाती है, इससे पौधों की जड़ो तक पोषक तत्व आसानी से पहुंच जाते है |

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बेल की प्रजातियां (Advanced Improved Varieties for Wood apple/Vine Species)

सी आई एस एच बी

बेल की इस क़िस्म को तैयार होने में सामान्य समय लगता है | इसके पौधे अप्रैल से मई माह तक पैदावार देना आरम्भ करदेते है | इसके पौधों में निकलने वाले फलो का आकार अंडाकार होता है, तथा फल स्वाद में स्वादिष्ठ और मीठे होते है |

नरेन्द्र बेल

इस क़िस्म के पौधों पर निकलने वाले फल आकार में गोल और अंडाकार पाए जाते है | इसके पौधों पर पूर्ण रूप से पके फलो का रंग हल्का पीला होता है, तथा फलो का गुदा अधिक मीठा होता है | इसके पूर्ण विकसित एक पौधे से 50 KG का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है | यह क़िस्म फैज़ाबाद की नरेंद्र देव यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी द्वारा तैयार की गयी है |

गोमा यशी

यह किस्म सेंट्रल हॉर्टिकल्चर एक्सपेरिमेंट स्टेशन, गोधरा (गुजरात) के माध्यम से तैयार किया गया है | इस क़िस्म की बेल कम समय में अधिक उत्पादन देने के लिए तैयार की गयी है | इस क़िस्म के एक पेड़ से सालाना 70 KG का उत्पादन प्राप्त हो जाता है |

नरेन्द्र बेल 5

बेल की यह क़िस्म नरेंद्र देव यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, फैज़ाबाद द्वारा तैयार की गयी है | इसके पौधों में लगने वाला फल हल्का चपटा और सामान्य आकार का पाया जाता है, जो स्वाद में मीठा होता है | इसका पूर्ण विकसित पौधा प्रति वर्ष औसतन 70 से 80KG की पैदावार दे देता है |

नरेन्द्र बेल 7

इस क़िस्म के बेल में निकलने वाले फल आकार में बड़े होते है, जिसके एक फल का वजन तक़रीबन 3KG के आसपास होता है | इसका पूर्ण विकसित पौधा वर्ष में 80 KG का उत्पादन दे देता है | बेल की यह क़िस्म फैज़ाबाद, नरेंद्र देव यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी द्वारा तैयार की गयी है |

पंत अर्पणा

बेल की इस क़िस्म में पौधों पर अधिक शाखाएं पाई जाती है, जिस वजह से शाखाएं नीचे की और झुकी हुई होती है | इसमें निकलने वाले फल सामान्य आकार के होते है, जिसमे मीठा और स्वादिष्ट गुदा पाया जाता है | इसका एक पौधा एक वर्ष में 50 KG का उत्पादन दे देता है |

पंत सुजाता

बेल की इस क़िस्म में निकलने वाले पौधे सामान्य लम्बाई के होते है, तथा पौधों पर बनने वाली शाखाए अधिक चौड़ी होती है | इसके पौधों पर निकलने वाले फलो का सिरा चपटा और आकार सामान्य होता है | इस क़िस्म में निकलने वाले फल हल्के पीले रंग होते है, जिसमे अधिक मात्रा में रेशेदार गुदा पाया जाता है |

पूसा उर्वशी

इस क़िस्म के पौधों की लम्बाई अधिक पाई जाती है, तथा यह क़िस्म कम समय में अधिक पैदावार दे देती है | इसके पौधों पर लगने वाले फल अंडाकार आकार के होते है, जिसमे गुदा अधिक मात्रा में पाया जाता है | इस क़िस्म का एक पौधा 60 से 80 KG की पैदावार दे देता है |

बेल की बागवानी के लिए गड्ढे की तैयारी | Planting Preparation for Bel ki Bagwani

गड्ढ़ों का आकार 90 × 90 × 90 सेन्टीमीटर तथा एक गड्ढे से दूसरे गड्ढे की दूरी 8 मीटर रखनी चाहिए। बूंद-बूंद सिंचाई विधि से 5 X 5 मीटर की दूरी पर सधन बाग स्थापना की जा सकती है। यदि जमीन में कंकड़ की तह हो तो उसे निकाल देना चाहिए। इन गड्ढों को 20-30 दिनों तक खुला छोड़कर वर्षा शुरू होते ही बाग़ की मिट्टी और 25 किलो रूडी की खाद, 1 किलो नीम तेल केक और 1 किलो हड्डीओं के चूरे का मिश्रण गड्ढों में डालें| ऊसर भूमि में प्रति गड्ढे के हिसाब से 20-25 किलोग्राम बालू तथा पी.एच मान के अनुसार 5-8 किलोग्राम जिप्सम/ पाइराइट भी मिला कर 6-8 इंच ऊँचाई तक गड्ढों को भर देना चाहिए। एक-दो वर्षा हो जाने पर गड्ढ़े की मिट्टी जब खूब बैठ जाए तो इनमें पौधों को लगा देना चाहिए।

बेल के पौधों की रोपाई का सही समय और तरीका (Vine Plants Right time and Method of Transplanting)

बेल के बीज की रोपाई पौध के रूप में की जाती है | इन पौधों को खेत में तैयार कर लिया जाता है, या किसी सरकारी रजिस्टर्ड नर्सरी से खरीद लिया जाता है | इसके बाद इन पौधों को खेत में एक महीने पूर्व तैयार गड्डो में लगा दिया जाता है | पौधा रोपाई से पहले तैयार गड्डो के बीच में एक छोटे आकार का गड्डा बना लिया जाता है | इसी छोटे गड्डे में पौधों की रोपाई कर उसे चारो तरफ अच्छे से मिट्टी से ढक दिया जाता है |

पौध रोपाई से पूर्व बाविस्टीन या गोमूत्र की उचित मात्रा से गड्डो को उपचारित कर लिया जाता है | इससे पौधों को आरम्भ में रोग लगने का खतरा कम हो जाता है, और पौधों का विकास भी अच्छे से होता है | बेल के पौधों की रोपाई किसी भी समय की जा सकती है, किन्तु सर्दियों का मौसम पौध रोपाई के लिए उपयुक्त नहीं होता है | यदि किसान भाई बेल की खेती व्यापारिक तौर पर कर रहे है, तो उन्हें पौधों की रोपाई मई और जून के महीने में कर देना चाहिए| सिंचित जगहों पर इसके पौधों की रोपाई मार्च के महीने में भी की जा सकती है |

बेल का प्रवर्धन

बेल का प्रवर्धन साधारणतया बीज द्वारा ही किया जाता है. प्रवर्धन की इस विधि से पौधों में विभिन्नता आ जाती है. बेल को वानस्पतिक प्रवर्धन से भी उगाया जा सकता है. जड़ से निकले पौधे को मूल तने से इस प्रकार अलग कर लेते हैं कि कुछ हिस्सा पौधे के साथ निकल सके इन पौधों को बसन्त में लगाने से काफी सफलता मिलती है. बेल को चष्में द्वारा भी बड़ी सरलता तथा पूर्ण सफलता के साथ उगाया जा सकता है. मई या जून के महीने में जब फल पकने लगता है, पके फल के बीजों को निकालकर तुरन्त नर्सरी में बो देना चाहिए. जब पौधा 20 सेन्टीमीटर का हो जाए तो उसे दूसरी क्यारियों में 30 सेन्टीमीटर दूरी पर बदल देना चाहिए. दो वर्ष के पश्चात् पौधों पर चष्मा बांधा जाता है. मई से जुलाई तक चष्मा बांधने में सफलता अधिक प्राप्त होती है.

चष्मा बांधने के लिए उस पेड़ की जिसकी कि कलम लेना चाहते हैं, स्वस्थ तथा कांटों से रहित अधपकी टहनी से आंख का चुनाव करना चाहिए, टहनी से 2-3 सेन्टीमीटर के आकार का छिलका आंख के साथ निकालकर दो वर्ष पुराने बीजू पौधे के तने पर 10-12 सेन्टीमीटर ऊंचाई पर इसी प्रकार के हटाये हुए छिलके के खाली स्थान पर बैठा देना चाहिए. फिर इस पर अलकाथीन की 1 सेन्टीमीटर चैड़ी तथा 20 सेन्टीमीटर लम्बी पट्टी से कसकर बांध देना चाहिए. इस क्रिया के 15 दिन बाद बंधे हुए चष्मों के 8 सेन्टीमीटर ऊपर से बीजू पौधे के शीर्ष भाग को काटकर अलग कर देना चाहिए. जिससे आंख से कली शीघ्र निकल आए. चष्मा बांधने के बाद जब तक कली 12 से 15 सेन्टीमीटर की न हो जाए उनकी क्यारियों को हमेषा नमी से तर रखना चाहिए जिससे कली सूखने न पाए.

बेल के पौधों की सिंचाई (Irrigation in Vine Plants)

बेल के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है | इसकी पहली सिंचाई पौध रोपाई के तुरंत बाद कर दी जाती है | इसके अलावा गर्मियों के मौसम में इसके पौधों को 8 से 10 दिन के अंतराल में पानी देना होता है, तथा सर्दियों के मौसम में इसके पौधों को 15 से 20 दिन के अंतराल में पानी दे | बारिश के मौसम में जरूरत पड़ने पर ही पौधों को पानी दे | जब इसका पौधा पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है, उस दौरान इसके पेड़ो को वर्ष में केवल 4 से 5 सिंचाई की ही आवश्यकता होती है |

खाद एवं उर्वरक | Nutrition Management in Bel ki kheti

साधारणतया यह पौधा बिना खाद और पानी के भी अच्छी तरह फलता-फूलता रहता है. लेकिन अच्छी फलत प्राप्त करने के लिए इसको उचित खाद की मात्रा उचित समय पर देना आवष्यक है | पांच वर्ष के फलदार पेड़ के लिए 375 ग्राम नत्रजन, 200 ग्राम फासफोरस एवं 375 ग्राम पोटाष की मात्रा प्रति पेड़ देनी चाहिए. चूंकि बेल में जस्ते की कमी के लक्षण पत्तियों पर आते हैं अतः जस्ते की पूर्ति के लिए 0.5 प्रतिषत जिंक सल्फेट का छिड़काव क्रमषः जुलाई, अक्टूबर और दिसम्बर में करना चाहिए । खाद को थालों में पेड़ की जड़ से 0.75 से 1.00 मीटर दूर चारों तरफ छिड़ककर जमीन की गुड़ाई कर देनी चाहिए. खाद की मात्रा दो बार में, एक बार जुलाई-अगस्त में तथा दूसरी बार जनवरी-फरवरी में देनी चाहिए

ज़मीन की तैयारी के समय 25 किलो रूडी की खाद, 1 किलो नीम तेल केक और 1 किलो हड्डियों का चूरा डालें और मिट्टी में मिला दें| पनीरी लगाने के बाद 10 किलो रूडी की खाद, 500 ग्राम नाइट्रोजन, 250 फास्फोरस और 500 ग्राम पोटाशियम प्रति पौधे में डालें| कटाई के बाद फलों के बनावटी स्टोरेज के लिए एथ्रेल (2-क्लोरोइथेन फोस्फोनिक एसिड ) 1,000 से 15,000 ppm डालें और 86° फारनहीट(30°सैल्सिअस) पर स्टोर करें|

संधाई-छंटाई

पौधों की सधाई का कार्य शुरू के 4-5 वर्षो में करना चाहिए। मुख्य तने को 75 सें.मी. तक शाखा रहित रखना चाहिए। इसके बाद 4-6 मुख्य शाखायें चारों दिशाओं में बढ़ने देनी चाहिए। बेल के पेड़ों में विशेष छंटाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है परन्तु सूखी, कीड़ों एवं बीमारियों से ग्रसित टहनियों को समय-समय पर निकालते रहना चाहिए।

अंत: फसलें | Inter Cropping in Wood apple Gardening

शुरू के वर्षो में नये पौधों के बीच खाली जगह में अंत: फसल लेते समय ऐसी फसलें न लें जिन्हें पानी की अधिक आवश्यकता हो और वह बेल के पौधों को प्रभावित करें। टांड की फसलें लगाकर उन्हें वर्षा ऋतु में पलट देने से भूमि की दशा में भी सुधार किया जा सकता है।

फलत

बीजू पौधे रोपण के 7-8 वर्ष बाद फूलने लगते हैं. लेकिन यदि चष्में से तैयार किए गए पौधे लगाए जाएं तो उनकी फलत 4-5 वर्ष पश्चात् ही शुरू हो जाती है. बेल का पेड़ लगभग 15 वर्ष के बाद पूरी फलत में आता है. दस से पन्द्रह वर्ष पुराने पेड़ से 100-150 फल प्राप्त होते हैं. बेल के पेड़ में फूल, जून-जुलाई में आते हैं और अगले वर्ष मई-जून में पककर तैयार हो जाते हैं.

बेल के फलो की तुड़ाई, पैदावार और लाभ (Bael Fruit Harvesting, Yield and Benefits)

बेल के पौधों को पैदावार देने में 7 वर्षा का समय लग जाता है |बेल का डण्ठल इतना मजबूत होता है कि फल पकने के बाद भी पेड़ पर काफी दिन तक लगे रहते हैं. कच्चे फल का रंग हरा तथा पकने पर पीला सुर्ख हो जाता है. साधारणतया ऐसा देखा जाता है कि फल का जो हिस्सा धूप की तरफ पड़ता है उस पर पीला रंग जल्दी आ जाता है और इस कारण पेड़ पर लगे फलों को पकने में असामानता आ जाती है. फल को अच्छी तरह तथा समान रूप से पका हुआ प्राप्त करने के लिए उसे पाल में पकाना चाहिए।

जब फलों में पीलापन आना शुरू हो जाए उस समय उनको डण्ठल के साथ तोड़ लेना चाहिए. इनके लम्बे-लम्बे डण्ठलों को केवल 2 सेन्टीमीटर फल पर छोड़कर काट देना चाहिए और उनको टोकरियों में बेल पत्तों से ढककर कमरे के अन्दर रख देना चाहिए. इस तरह के फल 10-12 दिन में अच्छी तरह पककर तैयार हो जाते हैं. फल आकार में बड़े होने के कारण इनकी संख्या पेड़ पर कम होती है. बेल के एक पौधे से आरम्भ में तक़रीबन 40KG का उत्पादन प्राप्त हो जाता है | यह उत्पादन पेड़ की आयु बढ़ने के साथ-साथ बढ़ जाता है | पूर्ण फलत में आए हुए बेल से 1-1.5 क्ंवटल फल की उपज प्राप्त होती है ।फलो की तुड़ाई कर उन्हें बाजार में बेचने के लिए एकत्रित कर ले | बेल का बाज़ारी भाव काफी अच्छा होता है, जिससे किसान भाई बेल की खेती कर अच्छा लाभ कमा सकते है |

Plant Protection Management in Wood apple gardening

बेल वृक्ष के रोग | Diseases on Wood apple Plants

बेल का कैंकर

यह रोग जैन्थोमोनस विल्वी बैक्टीरिया द्वारा होता है। प्रभावित भागों पर पानीदार धब्बे बनते हैं जो बाद में बढ़ कर भूरे रंग के हो जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लिन सल्फेट (200 पी.पी.एम.) को पानी में घोल कर 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।

डाई बैक

इस रोग का प्रकोप लेसिया डिप्लोडिया नामक फफूंद द्वारा होता है। इस रोग में पौधों की टहनियां ऊपर से नीचे की तरफ सूखने लगती है। इस रोग के नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (0.3 प्रतिशत) का दो छिड़काव सूखी टहनियों को छांट कर 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए।

पत्तियों पर काले धब्बे

बेल की पत्तियाँ पर दोनों सतहों पर काले धब्बे बनते हैं, जिनका आकार आमतौर पर 2-3 मि.मी. का होता है। इन धब्बों पर काली फफूंदी नजर आती है, जिसे आइसेरेआप्सिस कहते हैं। इसके रोकथाम के लिए बैविस्टीन (0.1 प्रतिशत) या डाईफोलेटान (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव करना चाहिए।

फलों पर गांठें पड़ना

यह बीमारी जेथोमोनस बिलवई कारण होती है| यह बीमारी पौधे के हिस्सों, पत्तों और फलों पर धब्बे डाल देती है| इसकी रोकथाम के लिए दो-मुँह वाली टहनियों को छाँट दें और नष्ट कर दें या स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट(20 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी)+ कॉपर ऑक्सीक्लोराइड(0.3%) 10-15 दिनों के फासले पर डालें|

फल का फटना और गिरना

यह दोनों बीमारियां फल की बनावट को बिगाड़ देती है| इसकी रोकथाम के लिए बोरेक्स 0.1% दो बार फूल के खिलने पर और फल के गुच्छे बनने के समय डालें|

पत्तों पर सफेद फंगस

यह बीमारी भी बेल की फसल में आम पायी जाती है और इसकी रोकथाम के लिए घुलनशील सल्फर+क्लोरपाइरीफोस/ मिथाइल पैराथियान+गम एकेशियाँ (0.2+0.1+0.3%) की स्प्रे करें|

बेल के कीट | Pest control on Wood apple Gardening

नींबू की मक्खी

यह पपीलियो डेमोलियस के कारण होती है| इसकी रोकथाम के लिए नरसरी वाले पौधों पर स्पिनोसेड @ 60 मि.ली. की छिड़काव 8 दिनों के फासले पर करें|

बेल की तितली

यह बेक्टोसेरा ज़ोनाटा के कारण होती है| इसकी रोकथाम के लिए पौधों पर स्पिनोसेड @ 60 मि.ली. की छिड़काव 10-15 दिनों के फासले पर करें|

पत्तें खाने वाली सुंडी

यह सुंडी नये पौधे निकलते समय ज्यादा नुकसान करती है और इसकी रोकथाम के लिए थियोडेन 0.1% डालें|

चंदन की खेती | Chandan Ki Kheti Ki Jankari

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भारत देश मे ये एक तरह का एंटी बायोटिक तत्व है जो की सर दर्द ,घाव भरने ,खुजली दूर करने तनाव दूर करने और दात दर्द में रहत देता है और स्किन संबंधी रोगों में चन्दन एक बहु उपयोगी ओषधि की तरह है चन्दन का उपयोग तेल, धूप, ओषधि, इत्र और सौन्दर्य प्रसाधन के निर्माण, में तो होता ही है इसके अलावा चन्दन बहुत ही पुराने समय से आयुर्वेद के उपचार और ओषधि के रूप में भी लिए किया जाता है ।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 13

Sandalwood Farming Cost And Benefits | How To Grow Commercial Sandalwood Farming in Hindi

चंदन को सबसे ज्यादा मुनाफे देने वाला पेड़ माना जाता है. इस पेड़ की खेती से किसान आसानी से लाखों- करोड़ों कमा सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चंदन की अत्यधिक मांग है। हालांकि इस डिमांड को अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है. यही कारण है कि चंदन के पेड़ों की लकड़ियों के कीमतों में पिछले कई सालों से भारी वृद्धि देखी गई है।

भारत की तकरीबन 55 से 60 प्रतिशत जनसंख्या खेती पर निर्भर है. इसके बावजूद खेती-किसानी को मुनाफा ना देने वाला सेक्टर माना जाता है. किसान भी अक्सर
शिकायत करते हैं कि कृषि से उन्हें वैसा मुनाफा नहीं हासिल हो रहा है जैसी की उम्मीद थी. कृषि विशेषज्ञ इसके पीछे खेती को लेकर किसानों की पारंपरिक और पुरानी सोच को दोष देते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार कई किसान अब भी ऐसे हैं कि वे नए जमाने की फसलों की खेती और तकनीकों अपनाने में संकोच करते
हैं।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 14

Sandalwood Businesses Farming in Hindi | चंदन की व्यवसायिक खेती कैसे करें

कई किसान तुरंत मुनाफा हासिल करने की चाह रखते हैं, लेकिन चंदन की खेती के लिए आपको धैर्य रखने की जरूरत है. इसकी खेती के दीर्घकालिक लाभ है. एक बार चंदन का पेड़ 8 साल का हो जाता है, तो उसका हर्टवुड बनना शुरू हो जाता है और रोपण के 12 से 15 साल बाद कटाई के लिए तैयार हो जाता है.जब पेड़ बड़ा हो जाता है तो किसान हर साल 15-20 किलो लकड़ी आसानी से काट सकता है। यह लकड़ी बाजार में करीब 3-7 हजार रुपए प्रति किलो बिकती है. कभी-कभी इसकी कीमतें 10000 रुपए प्रति किलो तक भी पहुंच जाती है।

हालांकि, यहां यह बताने की जरूरत है कि सरकार ने आम लोगों के बीच चंदन की लकड़ी की खरीद-फरोख्त करने पर रोक लगा रखी है। लेकिन कोई भी किसान चंदन की खेती कर सकता है। इसकी खरीद सरकार करती है। चंदन की तस्करी से जुडी फ़िल्म Pushpa Raj अभी हाल ही के रिलीज हुई है। जिसमे चंदन की तस्करी गैर कानूनी तरीके से कैसे की जाती है, दिखाया गया है।

वहीं, चंदन का पेड़ लगाने के लिए आपको उसका पौधा लेना होगा. एक पौधे की कीमत सिर्फ 100 रुपये से लेकर 150 रुपये के बीच में होती है।

IWST के अनुमान के अनुसार, प्रति हेक्टेयर चंदन की खेती( 15 वर्ष के लिए फसल चक्र के लिए) की लागत लगभग 30 लाख रुपये आती है. लेकिन इस दौरान चंदन के पौधों के पेड़ बनने के बाद किसान आसानी से 1.2 करोड़ रुपये से 1.5 करोड़ रुपये तक मुनाफा कमाया जा सकता है.

चन्दन की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु | Suitable Climate for Chandan ki kheti

चन्दन की खेती के लिए हमे ऐसी जलवायु का चुनाव करना चाहिये जो की गर्म और शुष्क हो। अगर हम आदर्श तापमान की बात करे तो मध्यम वर्षा वाले और धुप वाले वे क्षेत्र जहा का तापमान 12 °C से 35 °C के बीच का हो । चंदन का पौधा शुष्क जलवायु वाला होता है, इसलिए इसके पौधों को अधिक सर्द जलवायु की आवश्यकता नहीं होती है | क्योकि सर्दियों में गिरने वाला पाला इसके पौधों के लिए उचित नहीं होता है | इसके पौधों को अधिकतम 500 से 625 मिमी बारिश की आवश्यकता होती है | चंदन के पौधों को अधिक 35 डिग्री तथा न्यूनतम 15 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है | इसके पौधे अधिक धूप को
आसानी से सहन कर सकते है |

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 15

Suitable Soil Selection for Sandalwood farming | चंदन की खेती के लिए उपयुक्त भूमि का चयन

चन्दन की खेती के लिए हमे ऐसी उपजाऊ भूमि की आवश्यकता होती है जिसमे की जल का भराव आधिक न होता हो चिकनी बुलई मिट्टी जिसका की ph मान 6.5 से 7.5 के मध्य में हो। सफेद चंदन की खेती उन जगहों पर की जा सकती है जहां पर पानी की पीएच वैल्यू साढे छह से उपर होती है। जबकि लाल चंदन की खेती उन जगहों पर होती है जहां पर पानी की पीएच वैल्यू साढ़े छह से कम होती है. चंदन खेती करने वाले किसान वे कहा कि जहां पर पानी पीने के बाद आपका पेट खराब नहीं होता है उन जगहों पर आप सफेद चंदन की खेती कर सकते हैं. चंदन की खेती दोमट मिट्टी में सबसे अच्छी होती है. पर इसे लाल मिट्टी और अन्य जगहों पर भी कर सकते हैं, पर रेतीली मिट्टी में आप इसकी खेती नहीं कर सकते हैं. सिर्फ इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस जमीन कर चंदन की खेती की गयी वहां पर जलजमाव नहीं होना चाहिए. वरना पौधा खराब हो सकता है. पौधों की अच्छी ग्रोथ के लिए हर तीन से चार महीने में वर्मी कंपोस्ट और केचुंआ खाद डालते रहना चाहिए. साथ ही फर्टिलाइजर का स्प्रे भी कर सकते हैं।

चंदन के खेत की तैयारी । Sandalwood Field Preparation And Plant Nutrition Need

चंदन की खेती करने से पहले उसके खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लिया जाता है | इसके लिए सबसे पहले खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई कर दी जाती है, इससे खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष पूरी तरह से नष्ट हो जाते है | जुताई के बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है | इससे बाद खेत में पानी लगाकर पलेव कर ले| पलेव के बाद रोटावेटर लगाकर खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर दी जाती है। इसके बाद खेत में पौधों की रोपाई के लिए गड्डो को तैयार कर लिया जाता है| यह गड्डे 10 फीट की दूरी पर 2 फ़ीट गहरे और 3 से 4 फ़ीट चौड़े होने चाहिए | इसके बाद इन गड्डो में मिट्टी के साथ गोबर की खाद को अच्छे से मिलाकर भर दिया जाता है | यदि आप चाहे तो गोबर की खाद के स्थान पर जैविक खाद का भी उपयोग कर सकते है |

इसके पौधों को रासायनिक खाद की जरूरत नहीं होती है | चंदन का पौधा पोषक तत्व को प्राप्त करने के लिए दूसरे पौधों पर निर्भर रहता है, इसलिए इसके पौधों को खास उवर्रक की भी आवश्यकता नहीं होती है | इसके पौधे सिरिस, नागफनी, हरड और नीम के पौधों से स्वयं का भोजन, पानी और खनिज तत्वों को ग्रहण करते है | इसलिए इसकी खेती में इस तरह के पौधों को जरूर लगाए | खाद के रूप में 5 से 10 KG गोबर की मात्रा को मिट्टी में अच्छे से मिलाकर गड्डो में भरा जाता है | यह खाद चंदन के पौधों को वर्ष में दो बार अवश्य दे |

Advaced Improved Modern Varities for Sandalwood farming | चन्दन की खेती हेतु उन्नत किसमें

लाल चन्दन

इस किस्म की चंदन को रक्त चंदन के नाम से भी जाना जाता है | लाल चंदन के पौधों में सफ़ेद चंदन की भांति खुशबु नहीं आती है | चंदन की यह किस्म मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु राज्यों में पाई जाती है, जिसे इत्र,दवाई, हवन सामग्री और महंगी सजावट की चीजों को बनाने के लिए इस्तेमाल में लाते है | इसका पूर्ण विकसित पौधा सफ़ेद चंदन के पौधे से कम लम्बा होता है |

सफ़ेद चन्दन

इस किस्म की चंदन की लकड़ी का रंग सफ़ेद होता है, इसे मुख्य रूप से व्यापारिक इस्तेमाल के लिए उगाया जाता है | सफ़ेद चंदन की लकड़ी अधिक खुशबु वाली
होती है, जिस वजह से सफ़ेद चंदन की कीमत लाल चंदन की अपेक्षा काफी अधिक होती है | इसे तेज़, औषधि, साबुन, इत्र और चंदन तेल जैसी महंगी चीजों को बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है | इसका पूर्ण विकसित पौधा 15 मीटर से अधिक लम्बा हो सकता है |

चंदन की नर्सरी | Chandan Nursery For Chandan Ki Kheti

चन्दन की खेती में पौधे सीधे तौर पर नर्सरी से लाकर या फिर बीज के माध्यम से भी लगा सकते है । एक एकड़ में हमे करीब 435 पौधो की आवश्यकता होती है पौधों से पौधों की दूरी 10 फुट की होनी चाहिए । बीज रोपण हेतु गड्ढ़े का आकार (45 सेमी * 45सेमी * 45 सेमी) होना चाहिए ।

किसान एक एकड़ में लगभग 450 से अधिक चंदन के पौधे लगा सकते हैं. पौधे के बीच 12X15 फीट की दूरी होती है. इस खेती में जमीन का काफी हिस्सा किसान के
पास होता है, इसमें वो खेती करके पैसे कमा सकते हैं।

Plantation Time for Sandalwood Farming | चंदन के पौध की रोपाई का समय

इन पौधो को अपने खेत में लगाने के समय की बात करे तो ये हम अप्रैल के अंतिम सप्ताह से अक्टुम्बर तक लगा सकते है।

चंदन के पौधों की सिंचाई (Sandalwood Plants Irrigation)

चंदन के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है | इसलिए इसकी पौध रोपाई बारिश के मौसम में की जाती है | बारिश के मौसम में इसके पौधों की सिंचाई जरूरत पड़ने पर ही की जाती है | गर्मियों के मौसम में पौधों में नमी बनाये रखने के लिए दो से तीन दिन में पोधो को पानी दे | इसके अलावा सर्दियों के मौसम में सप्ताह में एक बार पौधों की सिंचाई अवश्य करे |

सहायक फसलें (Subsidiary Crops)

चन्दन के पौधो को तैयार होने में 12 से 15 वर्ष का समय लग जाता है | इस दौरान चंदन के पौधों के मध्य दलहन या बागबानी फसल उगाकर अतिरिक्त कमाई की जा सकती है | जिससे किसान भाई को आर्थिक परिस्थितियों से नहीं गुजरना पड़ेगा |

चंदन के पौधों पर खरपतवार नियंत्रण (Sandalwood Plants Weed Control)

चंदन के पौधों को आरम्भ में ही खरपतवार पर नियंत्रण की आवश्यकता होती है, इसलिए शुरुआत में खेत में पौधों के समीप खरपतवार दिखाई देने पर उसकी गुड़ाई कर निकाल दे | इसके अलावा चंदन के पौधों को जंगली पौधों से बचाना होता है | इसलिए खेत में जंगली पौधा न उगने दे |

चंदन के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Sandalwood Plants Diseases and Prevention)

चंदन के पौधों पर न के बराबर ही रोग देखने को मिलते है, किन्तु कुछ रोग ऐसे होते है, जो चंदन के पौधों को अधिक हानि पहुंचाते है | इसमें संक्रामक वानस्पतिक और सैंडल स्पाइक नामक रोग रहस्यपूर्ण तथा अधिक खतरनाक है | इस रोग से बचाव के लिए अभी तक कोई भी उपचार कारगर साबित नहीं हुआ है | इस रोग से प्रभावित पौधे की पत्तियां ऐंठकर छोटी होने लगती है, जिससे पौधा विकृत रूप ले लेता है |

इस रोग की रोकथाम के लिए चंदन के पौधों के समीप ही नीम के पौधों को लगाया जाता है | इससे पौधों को भोजन भी प्राप्त होता रहता है, और रोग लगने का खतरा भी कम हो जाता है |

चंदन के पौधों की कटाई, पैदावार और लाभ (Sandalwood Plants Harvesting, Yield and Benefits)

चंदन के पौधों को तैयार होने में पौध रोपाई से तक़रीबन 12 से 15 वर्ष का समय लग जाता है | इसका पौधा जितना पुराना होता है, उतना ही अच्छा होता है | इसके पेड़ की कटाई न करके उसे जड़ से उखाड़ लिया जाता है | इसके बाद इसकी कटाई गुणवत्ता के आधार पर की जाती है | चंदन की कटाई से पहले सरकार से परमिशन लेना होता है | इसके अतिरिक्त यदि आपका लगाया पेड़ चोरी हो जाता है, तो उसके लिए आप पुलिस में शिकायत भी कर सकते है | चंदन के पौधों को तैयार होने में अधिक समय लगता है, किन्तु आमदनी के मामले में यह सबसे अच्छा होता है |

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 16

चंदन के एक विकसित पेड़ से 20 से 30 KG की लकड़ी प्राप्त हो जाती है, तथा एक एकड़ के खेत में 400 पौधों को तैयार किया जा सकता है | चंदन की लड़की का बाज़ारी भाव 6 से 12 हजार रूपए प्रति KG है | जिससे किसान भाई 20 KG के एक पेड़ से 12 से 15 वर्षो में 1 से 2 लाख तक की कमाई आसानी से कर सकते है, तथा एक एकड़ में तैयार 400 पेड़ो से किसान भाई 5 से 8 करोड़ की कमाई कर करोड़पति बन सकते है |

चंदन के बीज | Chandan Seeds

चंदन की नर्सरी लगाकर खेती करने के अलावा हम चंदन के बीज से भी चन्दन की खेती कर सकते है । इसके लिए अगस्त से मार्च तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है इस तरह से चन्दन के पौधे को बढ़ने के लिए 15 से 20 साल तक का समय लगता है ।

पौधा से पेड़ बनने में कितना वक्त लगता है

चंदन के पौधों को पेड़ बनने में करीब 12 से 15 साल का समय लगता है. 12 साल में इसका वजन 15 किलो आता है, जबकि 15 साल होते तक इसका वजन 20 किलो हो जाता है. यह पेड़ का वजन नहीं है इसके अंदर से जो पाउडर निकाल कर बेचा जाता है उसका वजन है. हरियाणा में चंदन फार्म के संचालक ने बताया कि वो लोगों को दो साल का पैाधा देते हैं. इसके बाद किसानों को उसे 12 साल तक लगाकर उसकी देखभाल करनी पड़ती है। इसके बाद एक पेड़ से करीब करीब 18-19 किलो वजन आता है. इनके फार्म में सफेद चंदन के पेड़ लगे हुए हैं।

चन्दन की खेती के साथ सहायक फसलें (Subsidiary Crops)

चन्दन के पौधो को तैयार होने में 12 से 15 वर्ष का समय लग जाता है | इस दौरान चंदन के पौधों के मध्य दलहन या बागबानी फसल उगाकर अतिरिक्त कमाई की जा सकती है | जिससे किसान भाई को आर्थिक परिस्थितियों से नहीं गुजरना पड़ेगा |

पारासइट प्लांट है चंदन

चंदन एक पारासाइट प्लांट है, पारासइट उन्हें कहा जाता है जो दूसरे प्राणीयों के शरीर में रहते हैं और उनसे अपना भोजन ग्रहण करते हैं. इसी तरह चंदन का पेड़ भी दूसरे पेड़ों के जड़ से अपना भोजन लेता है. इसलिए इस पेड़ को अकेला कहीं पर नहीं लगाना चाहिए नहीं तो इसका पौधा मर जाएगा।

असली चंदन की पहचान | How To Identified Original Chandan

असली चन्दन की पहचान करने का सबसे आसान तरीका है हम चन्दन को किसी ठोस सतह या फर्श पर तब तक घिसते है जब तक की ये गर्म ना हो जाये तब हम देखते है इससे सुगंधित खुशबू आती है जो की पहचान है की चंदन असली है चन्दन की बनी किसी और वस्तु को खरीदने से पहले कोई भी दुकानदार अगर हमे इसकी अनुमति अगर नहीं देता है तो हो सकता है ये चंदन नकली हो । ये ही असली चंदन को पहचानने का एक सही और आसान तरीका है।

चंदन का पेड़ लगाने के लिए परमिशन | How to get Permission for Chandan ki खेती

चंदन की खेती करने वाले किसान चंदन वाले ने बताया कि 2017 से पहले ऐसा नियम था की चंदन की खेती करने से पहले सरकार से परमिशन लेनी पड़ती थी. पर
अब ऐसा नहीं है. अब आम आराम से इसे लगा सकते हैं. इसके बाद पटवारी को इसकी जानकारी देनी होती है, साथ ही डीएफओ को एक आवेदन देना पड़ता है.

सरकार की तरफ से मिलती है सब्सिडी |How to Get Subsidy in Sandalwood farming

चंदन खेती पर बैन हटाने के बाद अब सरकार चंदन की खेती के लिए प्रति एकड़ 28400 की सब्सिडी देती है। इसके लिए विभाग से संपर्क किया जा सकता है।

बादाम की खेती की कैसे करें | बादाम उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक

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भारत देश मे बादाम हालांकि एक मेवा होता है | ड्राई फ्रूट में बादाम का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान हैं। इसका उपयोग खाने के अलावा मिठाई बनाने में किया जाता है। सर्दियों में बादाम के लड्डू बनाए जाते हैं जो काफी स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। बादाम का सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी अच्छा माना गया है। इसी के साथ इसका तेल का उपयोग बालों और दिमाग के लिए लाभकारी बताया गया है। भारत में बादाम का प्रयोग शादियों, जन्मदिन और नव वर्ष पर गिफ्ट पैक के रूप में किया जाता है। प्रमुख त्योहारों और मांगलिक अवसरों पर आज मिठाई की जगह लोग ड्राई फ्रूट का आदान-प्रदान करते हैं जिसमें बादाम को प्रमुख रूप से शामिल किया जाता है।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 17

किन्तु तकनीकी दृष्टि से यह बादाम के पेड़ के फल का बीज होता है। बादाम का पेड़ एक मध्यम आकार का पेड़ होता है और जिसमें गुलाबी और सफेद रंग के सुगंधित फूल लगते हैं।

Almond Commercial Cultivation Information | Grow More Profit in Almond Farming

ये पेड़ पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसके तने मोटे होते हैं। इसके पत्ते लम्बे, चौड़े और मुलायम होते हैं। इसके फल के अन्दर की मिंगी को बादाम कहते हैं।बादाम के पेड़ बादाम एक गुलाब वर्गीय एक ऐसा पेड़ है जिसका फल दिखने में आडू की तरह का होता है बादाम के पेड़ में हल्के गुलाबी और सफेद रंग के सुगंधित फूल लगते हैं। बादाम के पेड़ का तना मोटा होते हैं। एवंम इसके पत्ते लम्बे, चौड़े और मुलायम होते हैं।

विश्व में कहां-कहां होती है बादाम की खेती | (Almond Farming in World )

बादाम की खेती प्राय: ठन्डे क्षेत्रो में की जाती है जिसे बीज के द्वारा भी लगाया जा सकता है दुनियाभर में अमेरिका बादाम का सबसे बड़ा निर्यातक देश है जहा का कैलोफोर्निया बादाम दुनियाभर में खाया जाता है जो की आकार में भारतीय बादाम से बड़ा होता है । इसके अलावा बादाम की खेती स्पेन, इटली, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, मोरक्को, पुर्तगाल, तुर्की, फ्रांस, अल्जीरिया, अफगानिस्तान और पर्सिया जैसे देशों में भी बादाम की खेती की जा सकती है ।

भारत में कहां-कहां होती है बादाम की खेती | (Almond Farming in India)

भारत में बादाम की खेती मुख्य रूप से कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे ठंडे क्षेत्रों और चीन की सीमा से लगे तिब्बत, लाहौल एवं किन्नोर जिले आदि में की जाती है। लेकिन अब इसकी शौकिया तौर पर खेती बिहार, यूपी और एमपी में भी की जा रही है। बिहार-यूपी-एमपी जैसे राज्यों के किसानों ने बादाम के पौधे लगाए हैं जो अब बड़े होकर फल देने लगे हैं। हाल ही में ग्वालियर के डबरा कस्बे के एक किसान का न्यूज काफी वायरल हुआ था। दरअसल डबरा कस्बे के किसान प्रभुदयाल ने शौकिया तौर पर बादाम का पेड़ लगाया था जो अब फल देने लगा है। इससे यह सिद्ध होता है कि कुछ सावधानियों के साथ इसकी खेती गर्म जलवायु में भी की जा सकती है।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 18

Almond Farming Bussiness Idea | किसानों को मालामाल करेगी बादाम की खेती, बस एक बार लगाएं पौधा और 50 साल तक कमाते रहें मुनाफा!

बादाम के प्रकार-बाजार में कई प्रकार की बादाम मिलती है जिसमे मामरा , केलिफोर्निया या अमरीकन बादाम तथा छोटी गिरी मुख्य हैं। मीठी बादाम ही खाने में काम आती है। कड़वी बादाम का तेल निकाला जाता है।
मामरा बादाम मामरा बादाम और केलिफोर्निया बादाम में क्या फर्क होता है

मामरा बादाम और केलिफोर्निया बादाम में अंतर की बात करे तो जहा मामरा अफगानिस्तान में पैदा होता है एवंम इसका उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है। वही अमरीकन बादाम केलिफोर्निया में पैदा होता है और इसका उत्पादन अत्यधिक मात्रा में होता है। इसका कारण वैज्ञानिक तरीके से खेती करना है।

बादाम के प्रकार

वैसे तो ज्यादातर बादामों के नाम उनके देशों के हिसाब से भी है जैसे अमेरिकन बादाम, ईरानी बादाम, स्पेनिश बादाम लेकिर मुख्य रूप से दो ही प्रकार के बादाम होते है, कैलिफोर्निया (अमेरिकन) बादाम और मामरा बादाम।

Almond Advanced Improved Varieties | बादाम की उन्नत किस्में

बादाम की कुछ व्यावसायिक किस्मों में नॉन-पैरिल, कैलिफ़ोर्निया पेपर शेल, मर्सिड, आईएक्सएल, शालीमार, मखदूम, वारिस, प्रणयज, प्लस अल्ट्रा, प्रिमोर्स्कीज, पीयरलेस, कार्मेल, थॉम्पसन, प्राइस, बट्टे, मोंटेरे, रूबी, फ्रिट्ज, सोनोरा, पाद्रे, ड्रेक, थिनरोल्ड मुख्य रूप से बादाम की किस्मे है।

आप भी बादाम के प्लांट आसानी से उगा सकते हो |जुलाई के समय बादाम के प्लांट को आपने बगीचे में लगा सकते है।

बादाम की खेती के लिए खेत की तैयारी | Soil Preparation for Almomd Cultivation

बादाम के पौधे लगाने के लिए खेत को अच्छी प्रकार तैयार करना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से खेत की जुताई करनी चाहिए। इसके बाद 3 से 4 बार कल्टीवेटर या देशी हल से जुताई करें। इसके बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए।

बादाम खेती के लिए आवश्यक जलवायु और तापमान

Almond Farming Suitable Climate and Temperature

बादाम की खेतीं के लिए जलवायु की बात की जाये तो इसके लिए , गर्मियों में तापमान में 30 से 35 डिग्री सेल्सियस पौधे की वृद्धि और गिरी भरने के लिए आवश्यक है एवमं सर्दियों में 2.2 डिग्री सेल्सियस तक का सामना करना पड़ेगा, लेकिन पत्ती के गिरने के अवस्था में फूल 0.50 डिग्री सेल्सियस से -11 डिग्री सेल्सियस में क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। फूल जब छोटे होते है तब वे 2.2 डिग्री सेल्सियस से 3.3 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान का सामना कर सकते हैं, लेकिन अगर कम तापमान निरंतर लंबे समय तक बने रहने पर ये फसल को आसानी से नुकसान पंहुचा सकता हैं

बादाम में पाए जाने वाले पोषक तत्व | Almond Nutrition Value

बादाम भारतीयों की सबसे पसंदीदा गिरी है और खास मेवा है । यह सभी गिरियों में ज्यादा पोषक एवं औषधीय गुणयुक्त है। इसकी गिरी से महत्तवपूर्ण तेल बादाम रोगन प्राप्त होता है। जब गिरी पक जाती है तब तुड़ाई की जाती है। बादाम गिरी ऊर्जा का बहुत अच्छा स्रोत है। 100 ग्राम ताजी गिरी में 598 कैलोरी ऊर्जा, 19 ग्राम प्रोटीन, 59 ग्राम वसा तथा 21 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है गुणों से भरपूर बादाम का बहुत आधिक मात्रा में सेवन करना हमारे शरीर के लिए नुकसान दायक होता है।

Almond Health Benefits in Hindi | बादाम खाने के फायदे

बादाम एक तरह का मेवा होता है। आयुर्वेद में इसको बुद्धि और नसों के लिए गुणकारी बताया गया है। एक आउंस (28 ग्राम) बादाम में 160 कैलोरी होती हैं, इसीलिए यह शरीर को उर्जा प्रदान करता है। लेकिन बहुत अधिक खाने पर मोटापा भी दे सकता है। इसमें निहित कुल कैलोरी का तीन बटा चार भाग वसा से मिलता है, शेष कार्बोहाईड्रेट और प्रोटीन से मिलता है। इसका ग्लाईसेमिक लोड शून्य होता है। इसमें कार्बोहाईड्रेट बहुत कम होता है। इस कारण से बादाम से बना केक या बिस्कुट, आदि मधुमेह के रोगी भी खा सकते हैं। बादाम में फाईबर या आहारीय रेशा पाया जाता है जो पाचन में सहायक होता है और हृदय रोगों से बचने में भी मदद करता है, तथा पेट को अधिक देर तक भर कर रखता है। इस कारण कब्ज के रोगियों के लिए लाभदायक रहता है। बादाम में सोडियम नहीं होने से उच्च रक्तचाप रोगियों के लिए भी लाभदायक रहता है। इनके अलावा पोटेशियम, विटामिन ई, लौह, मैग्नीशियम, कैल्शियम, फास्फोरस भी होते हैं जो स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी लाभकारी हैं।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 19

बादाम की खेती में प्रवर्धन की विधियां

बादाम के पौधे का प्रवर्धन छल्ला चश्मा, टी चश्मा, कलम विधि द्वारा किया जाता है। चश्मा चढ़ाने का उचित समय अप्रैल-मई होता है। वहीं कलम बांधने का उचित समय जनवरी-फरवरी माना जाता है।

बादाम की खेती के लिए पौध रोपण (Planting for Almond Cultivation)

रोपाई के लिए बादाम का बीजू या एक साल पुराना ऐसा पौधा होना चाहिए जिसकी जड़े स्वस्थ्य और पत्ती रहित हो. खेत में तैयार गड्ढों में सबसे पहले गोबर खाद, केंचुए की खाद मिलाकर डाले. इसकी रोपाई का सही समय नवंबर से दिसंबर का महीना होता है. रोपाई से पहले 1×1×1 मीटर का गड्ढा तैयार करें. वहीं पौधे से पौधे की दूरी 6 मीटर तथा कतार से कतार की दूरी 7 मीटर रखना चाहिए. अच्छे परागण के लिए प्रति हेक्टेयर 5-7 डिब्बे मधुमक्खी के रखें।

बादाम की खेती के लिए सिंचाई (Irrigation for Almond Cultivation)

बादाम खेती में सर्दी के दिनों में 20 से 30 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करना चाहिए. जबकि गर्मियों में पेड़ों में 10 दिनों के अंतराल पर नियमित रूप से सिंचाई करना चाहिए. बता दें कि फल देने वालों पौधों में गर्मियों के दिनों में नियमित सिंचाई देना बेहद जरुरी होता है. इससे बिना पके फलों के गिरने की समस्या दूर हो जाती है. वहीं बादाम के वृक्षों के चारों तरफ मिट्टी के ऊपर भूसा, पत्तियों या फिर अन्य कार्बनिक पदार्थों का उपयोग करना चाहिए. इससे वृक्ष के आसपास खरपतवार कम निकलते हैं।

बादाम की खेती में खरपतवार नियंत्रण के उपाय | Weed Control in Almond farming

बादाम की खेती में खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई का काम करना चाहिए और खरपतवार को हाथ से निकल कर खेत से कहीं दूर फेंक देना चाहिए। बादाम के पौधे की पहली निराई रोपण के 10 से 15 दिन बाद करनी चाहिए। इसके बाद दूसरी निराई का काम 25 से 35 दिन के बाद करना चाहिए। वहीं तीसरी निराई 45 दिन बाद करनी चाहिए। यदि खेत में खरपतवार अधिक है तो 2 से 3 बार हाथ से निराई करनी चाहिए।

बादाम की तुड़ाई | Almong Harvesting

बादाम पौधे रोपने के तीसरे साल से यह फल देना शुरू कर देता है। फूल आने के 7-8 महीने बाद बादाम को तोड़ा जा सकता है। फल तोडऩे के बाद उससे छाया में सुखाना चाहिए फिर गिरी को फली से अलग कर देना चाहिए। बता दें कि हालांकि बादाम 3 से 4 साल में फल देना शुरू कर देता है लेकिन पूरी तरह से फल देने लायक 6 साल में होता है। एक बादाम के पेड़ से इस तरह 50 साल तक बादाम के फल प्राप्त किए जा सकते हैं।

बादाम के एक पेड़ से प्राप्त उपज | Yield from Almomd

बादाम की उपज क्षेत्र और किस्मों पर निर्भर करती है। फिर भी बादाम के एक पेड़ से 2 से 2.5 किलोग्राम सूखे बादाम प्रति पेड़ प्रति वर्ष प्राप्त हो जाते हैं।

बादाम का बाजार भाव

बाजार में बादाम का भाव 600 रुपए से 1000 रुपए प्रति किलोग्राम है। बाजार में बादाम की कीमत मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है जो इसके हिसाब से अलग-अलग हो सकती है।

कैसे करें बादाम के पौधे / बादाम के पेड़ की देखभाल

बादाम के पौधे अथवा पेड़ की आवश्यकतानुसार नियमित सिंचाई करनी चाहिए। इसके लिए टपक विधि को अपनाया जा सकता है।

युवा पौधों में हर 2 सप्ताह में सिंचाई की जा सकती है। जबकि वयस्कों पेड़ को 20-25 दिनों में एक बार सिंचाई की आवश्यकता होती है।

वसंत के मौसम में बादाम के पौधे/पेड़ में फर्टिलाइजर का प्रयोग जरूर करें। लेकिन फर्टिलाइजर देने केे बाद पौधे/पेड़ को पानी देना नहीं भूलें।

यदि फर्टिलाइजर बिना पानी एड किए दिया जाए या बिना पानी के दिया जाए तो पौधे के जलने की संभावना रहती है।

प्राथमिकता सर्कल को ढीला करने से पेड़ के विकास पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। पहली बार यह काम मार्च के अंत में 10-12 सेंटीमीटर की गहराई तक किया जाता है।

बादाम के पौधे से समय-समय पर खरपतवार को हटाना आवश्यक है। इसके लिए आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई कर खरपतवार निकालें और इसे खेत से दूर फेंक दें ताकि अन्य स्वस्थ पौधे इसके संपर्क में आ पाएं।

बादाम की खेती के साथ खेत में बची हुई जगह पर अन्य प्रकार की सब्जियां उगाई जा सकती हैं।

बादाम की खेती की सफलता के मूलमंत्र |

अगर आप बहुत अच्छी पैदावार चाहते हैं तो इसके साथ ही मधुमक्खी पालन भी करें, जो आपके पौधों में परागण को बढ़ाएंगी, जिससे उत्पादन बढ़ेगा।

बादाम की खेती करने से पहले कृषि विशेषज्ञ से अपनी अपनी मिट्टी की जांच करवा लें और साथ ही जलवायु के हिसाब से ये भी पता कर लें कि किस किस्म के बादामउगाने चाहिए। अलग-अलग जलवायु के हिसाब से अलग-अलग किस्म होती है। गलत किस्म लगाने से उत्पादन पर असर पड़ता है।

गर्मियों में हर 10 दिन में सिंचाई करनी चाहिए, जबकि ठंड में 20-25 दिन में सिंचाई करनी चाहिए। बादाम के पौधों को हवा से बचाने के लिए उसे बांस से सहारा देना चाहिए। बादाम की खेती के साथ-साथ अन्य तरह की सब्जियां भी उगाई जा सकती हैं।

बादाम की खेती से कितना मुनाफा?

वैसे तो बादाम का पेड़ 3-4 साल में फल देने लगता है, लेकिन पूरी क्षमता से फल देने में बादाम के पेड़ को करीब 6 साल लग जाते हैं। अच्छी बात ये है कि बादाम के पेड़ एक बार लगाने के बाद 50 साल तक फल देते रह सकते हैं। अलग-अलग किस्म के हिसाब से अलग-अलग उत्पादन मिलता है, इसलिए मुनाफा भी कम-ज्यादा हो सकता है। बाजार में बादाम का भाव 600 रुपए से 1000 रुपए प्रति किलोग्राम है। एक पेड़ से 2-2.5 किलो सूखे बादाम हर साल मिलते हैं। यानी आपको पहली बार खेती में खर्च करना होगा और फिर उसके बाद बस रख-रखाव करते रहें और फायदा कमाते रहें। वहीं बादाम के खेत में अन्य सब्जियों की खेती भी करें, जिससे आपका मुनाफा और बढ़ेगा।

बादाम की खेती अधिक जानकारी के यहां संपर्क करें :

1-केरल हॉर्टिकल्चर विभाग
पता : सनी डेल. मेड्स लेन. पलायम, तिरुवंतपुरम, केरल
फ़ोन : (0471) – 2330856

2- कश्मीर हार्टिकल्चर विभाग
पता : राज बाग़, श्रीनगर, जम्मू -कश्मीर-190008.
फोन : (0194) -2311456

चीकू की खेती | चीकू उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक | Sapota Farming

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चीकू ( Chiku ) या सपोटा (Sapota), सैपोटेसी कुल का पौधा है। भारत में चीकू अमेरिका के उष्ण कटिबन्धीय भाग से लाया गया था। चीकू का पक्का हुआ फल स्वादिष्ट होता है। चीकू के फलों की त्वचा मोटी व भूरे रंग का होती है। इसका फल छोटे आकार का होता है जिसमें 3 – 5 काले चमकदार बीज होते हैं।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 20

चीकू की खेेेेती फल उत्‍पादन तथा लेटेक्स उत्पादन के लिए की जाती है। चीकू के लेटेक्‍स का उपयोग चूइंगम तैयार करने के लिए किया जाता है। भारत में चीकू की खेती मुख्यत: फलों के लि‍‍‍ए की जाती है। चीकू फल का प्रयोग खाने के साथ-साथ जैम व जैली आदि बनाने में किया जाता है।

चीकू फल के लाभ | Benwfits of Chiku Sapota Fruits

चीकू में विटामिन ए, ग्लूकोज, टैनिन, जैसे तत्‍व पाऐ जाते है जो कब्ज, एनिमिया , तनाव , बवासीर और ज़ख़्म को ठीक करने के लिए सहायक होतेे हैं ।
चीकू में कुछ खास तत्व पाए जाते हैं जो श्वसन तंत्र से कफ और बलगम निकाल कर और पुरानी खांसी में राहत देता हैं। चीकू में लेटेक्स अच्छी मात्रा में पाया जाता हैं इसलिए यह दाँत की कैविटी को भरने के लिए भी इस्तेमाल किया
जाता हैं।
चीकू की व्यावसायिक खेती | Sapota Commercial Farming

भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों में इसकी बड़े क्षेत्रफल में खेती की जाती है। इस फल को उपजाने के लिये बहुत ज्यादा सिंचाई और अन्य रख-रखाव की जरूरत नहीं है। थोड़ा खाद और बहुत कम पानी से ही इसके पेड़ फलने-फूलने लगते हैं।

चीकू शेक के फायदे | Benefits of Chiku Sapota Sake

ठन्डे मीठे दूध या आइसक्रीम में चीकू को मिलाकर बनने वाले चीकू मिल्क शेक या चीकू शेक के फायदे कई तरह के है जिनमे खास तोर पर इसमें मोजूद प्राकृतिक ग्लूकोज एनर्जी,विटामिन A आँखों के लिए और विटामिन b स्किन के लिए साथ ही साथ चीकू में मोजूद कैल्शियम, फास्फोरस और आयरन जैसे तत्व हड्डियों के लिए फायदेमंद है। चीकू को सीधे खाने के अलावा चीकू की चटनी ,चीकू का हलवा और चीकू की खीर, जैम, जैली,जूस बना कर भी खाया जाता है

चीकू के नुकसान | Side Effect of Chiku Sapota

किसी भी चीज की अति बहुत ही नुकसान दायक होती उसी तरह इसको ज्यादा खाने के भी कुछ नुकसान है चीकू के नुकसान या चीकू खाने के साइड इफ़ेक्ट की बात करे तो आधिक मात्रा में खाने से वजन बढ़ने और पेट में दर्द होने के साथ मुह में छाले तक हो सकते है 100 gm तक की मात्रा में चीकू का सेवन हर दिन करना फायदेमंद होता है

चीकू की तासीर

चीकू तासीर में शीतल होता है और गुणों में चीकू में टैनिन प्रचुर मात्रा में होने से ये पित्तनाशक, और पौष्टिक होता है इसका स्वाद मीठा और रूचिकारक होता है ।

चीकू की खेती के लिए जलवायु | Climate for Sapota Farming | Chiku ki Kheti

गर्म जलवायु में लगभग सभी तरह की भूमि में की जाने वाली चीकू की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ, बलुई दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है।

पौधे लगाने का समय | Sapota Gardening Time

जुलाई से सितम्बर

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 21

चीकू की किस्मे | Advanced Varities For Sapota Farming

देश में चीकू की कई किस्में प्रचलित हैं। उत्तम किस्मों के फल बड़े, छिलके पतले एवं चिकने और गूदा मीठा और मुलायम होता हैं। क्रिकेट बाल, कालीपत्ती, भूरी पत्ती, पी.के.एम.1, डीएसएच-2 झुमकिया, आदि किस्में अति उपयुक्त हैं।

चीकू तीन तरह के होते है जिनमे

1 लम्बा गोल,2 साधारण लम्बा गोल,
3 गोल

काली पत्ती:

यह किस्म 2011 में जारी की गई है। यह अधिक उपज
वाली और अच्छी गुणवत्ता वाली किस्म है। इसके फल अंडाकार और कम बीज वाले होते हैं जैसे 1-4 बीज प्रति फल में होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 166 किलो प्रति वृक्ष होती है। फल मुख्यत: सर्दियों में पकते हैं।

क्रिकेट बाल:

यह किस्म 2011 में जारी की गई है। इसके फल बड़े, गोल आकार के होते हैै तथा गुद्दा दानेदार होता है । ये फल ज्यादा मीठे नहीं होते। इसकी औसतन पैदावार 157 किलो प्रति वृक्ष होती है।

बारामासी:

इस किस्म के फल मध्यम व गोलाकार होते हैं।

चीकू का पोधा सबसे आधिक चीकू के बीज द्वारा ही लगाया जाता है हालांकि कुछ व्यावसायिक स्तर पर इसे ग्राफ्टिंग और ऐसी ही अन्य तरीको से लगाया जाता हैं।
जुलाई से लेकर सितम्बर तक चीकू के पौधे लगाये जा सकते है।

पौधे की रोपाई | Plantation Methods for Chiku Farming

| Plantation Methods for Chiku Farming

चीकू की खेती के लिए, अच्छी तरह से तैयार ज़मीन की आवश्यकता होती है। मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए 2-3 बार जोताई करके ज़मीन को समतल करें। रोपाई के लिये गर्मी के दिनों में ही 7-8 मी. दूरी पर वर्गाकार विधि से 90 x 90 से.मी. आकार के गड्ढे तैयार कर लेना चाहिए। गड्ढा भरते समय मिट्टी के साथ लगभग 30 किलोग्राम गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद, 2 किलोग्राम करंज की खली एवं 5-7 कि.ग्रा. हड्डी का चूरा प्रत्येक गड्ढे के दल से मिला कर भर देना चाहिये। एक बरसात के बाद चीकू के पौधे को गढढे के बीचों बीच लगा दें तथा रोपने के बाद चारों ओर की मिट्टी अच्छी तरह से दबा कर थावला बना दें।

चीकू के पौधे को शुरुआत में दो – तीन साल तक विशेष रख-रखाव की जरूरत होती हैं।चीकू के एक पेड़ को करीब पांच से आठ साल लगते पूरी तरह फल देने लायक बनने में चीकू की घर पर पॉट में लगाना या अपने घर की छत पर किसी कंटेनर में भी लगाया जा सकता चीकू के रूट विकास के लिए एक पर्याप्त आकार का पॉट लेना है जो की व्यास में 18-24 इंच से आधिक और ऊंचाई में 20 ईंच से आधिक हो ।

खाद और उर्वरक | Nutrition Management for Cheeku Sapota Farming

पेड़ों में प्रतिवर्ष आवश्यकतानुसार खाद डालते रहना चाहिये जिससे उनकी वृद्धि अच्छी हो और उनमें फलन अच्छी रहें। रोपाई के एक वर्ष बाद से प्रति पेड़ 2-3 टोकरी गोबर की खाद, 2-3 कि.ग्रा. अरण्डी करंज की खली एवं एन.पी.के.की आवश्यक मात्रा प्रति पौधा प्रति वर्ष डालते रहना चाहिये। यह मात्रा 10 वर्ष तक बढ़ाते रहना चाहिए

तत्पश्चात 2200 : 3100 : 850 ग्रा. यूरिया : फॉस्फेट : पोटाश की मात्रा प्रत्येक वर्ष देना चाहिए। खाद एवं उर्वरक देने का उपयुक्त समय जून-जुलाई
है। खाद को पेड़ के फैलाव की परिधि के नीचे 50-60 सें.मी.चौड़ी व 15 सें.मी. गहरी नाली बनाकर डालने से अधिक फायदा होता है।

चीकू में समय समय पर दिए जाने वाले खाद और उर्वरक की बात करे नत्रजन सुपरफास्फेट व पोटाश के बजाय हम अपने खेतो में केंचुएं से बनी हुयी खाद का प्रयोग करके भी चीकू की खेती में अच्छे परिणाम पाये जा सकते है।

चीकू में अंतरफसली | Inter Cropping In Sapota Cultivation

| Inter Cropping In Sapota Cultivation

सिंचाई की उपलब्धता और जलवायु के आधार पर अनानास और कोकोआ, टमाटर, बैंगन, फूलगोभी, मटर, कद्दू, केला और पपीता को अंतरफसली के तौर पर उगाया जा
सकता है।

चीकू फसल का रख-रखाव | Caring Management for Sapota Cropping

| Caring Management for Sapota Cropping

चीकू के पौधे को शुरुआत में दो-तीन साल तक विशेष रख-रखाव की जरूरत होती है। उसके बाद बरसों तक इसकी फसल मिलती रहती है। जाड़े एवं ग्रीष्म ऋतु में
उचित सिंचाई एवं पाले से बचाव के लिये प्रबंध करना चाहिये।

छोटे पौधों को पाले से बचाने के लिये पुआल या घास के छप्पर से इस प्रकार ढक दिया जाता है कि वे तीन तरफ से ढके रहते हैं और दक्षिण-पूर्व दिशा धूप एवं प्रकाश के लिये खुला रहता है। चीकू का सदाबहार पेड़ बहुत सुंदर दिखाई पड़ता है।

इसका तना चिकना होता है और उसमें चारों ओर लगभग समान अंतर से शाखाएँ निकलती है जो भूमि के समानांतर चारों ओर फ़ैल जाती है। प्रत्येक शाखा में
अनेक छोटे-छोटे प्ररोह होते हैं, जिन पर फल लगते है। ये फल उत्पन्न करने वाले प्ररोह प्राकृतिक रूप से ही उचित अंतर पर पैदा होते हैं और उनके रूप एवं आकार में इतनी सुडौलता होती है कि उनको काट-छांट की आवश्यकता नहीं होती।

चीकू के पेड की काट-छाँट

पौधों की रोपाई करते समय मूल वृंत पर निकली हुई टहनियों को काटकर साफ़ कर देना चाहिए। पेड़ का क्षत्रक भूमि से 1 मी. ऊँचाई पर बनने देना चाहिए। जब
पेड़ बड़ा होता जाता है, तब उसकी निचली शाखायें झुकती चली जाती है और अंत में भूमि को छूने लगती है तथा पेड़ की ऊपर की शाखाओं से ढक जाती है।इन शाखाओं में फल लगने भी बंद हो जाते हैं। इस अवस्था में इन शाखाओं को छाँटकर निकाल देना चाहिये।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 22

चीकू के पेड की काट-छाँट

पौधों की रोपाई करते समय मूल वृंत पर निकली हुई टहनियों को काटकर साफ़ कर देना चाहिए। पेड़ का क्षत्रक भूमि से 1 मी. ऊँचाई पर बनने देना चाहिए। जब
पेड़ बड़ा होता जाता है, तब उसकी निचली शाखायें झुकती चली जाती है और अंत में भूमि को छूने लगती है तथा पेड़ की ऊपर की शाखाओं से ढक जाती है।

इन शाखाओं में फल लगने भी बंद हो जाते हैं। इस अवस्था में इन शाखाओं को छाँटकर निकाल देना चाहिये।
पुष्पन | Flowering in Sapota Farming

वानस्पतिक विधि द्वारा तैयार चीकू के पौधों में दो वर्षो के बाद फूल एवं फल आना आरम्भ हो जाता है। इसमें फल साल में दो बार आता है, पहला फरवरी से
जून तक और दूसरा सितम्बर से अक्टूबर तक।

फूल लगने से लेकर फल पककर तैयार होने में लगभग चार महीने लग जाते हैं। चीकू में फल गिरने की भी एक गंभीर समस्या है। फल गिरने से रोकने के लिये पुष्पन के समय फूलों पर जिबरेलिक अम्ल के 50 से 100 पी.पी.एम. अथवा फल लगने के तुरन्त बाद प्लैनोफिक्स 4 मिली./ली.पानी के घोल का छिड़काव करने से फलन
में वृद्धि एवं फल गिरने में कमी आती है।

चीकू में लगने वाले रोग और उपचार | Plant Protection Management in Sapota Gardening

चीकू में लगने वाला एक प्रमुख रोग है जिसमे पोधे की की पत्तिायों पर छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। उसके नियन्त्रण के लिये मैन्कोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से हर 15 दिन में छिडकाव करते रहना चाहिए जिससे चीकू की

एक रिपोर्ट के अनुसार एक हैक्टेयर में चीकू की अच्छी तरह बागवानी और खेती करके पांच महीने में 5 लाख से भी ज्यादा कमाया जा सकता हैं।

चीकू के कीट और रोकथाम

चीकू के पौधों पर रोग एवं कीटों का आक्रमण कम होता है। लेकिन कभी-कभी उपेक्षित बागों में पर्ण दाग रोग तथा कली बेधक, तना बेधक, पप्ती लपेटक एवं
मिलीबग आदि कीटों का प्रभाव देखा जता है।

पत्ते का जाला:

इससे पत्तों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। जिससे पत्ते सूख जाते हैं और वृक्ष की टहनियां भी सूख जाती हैं।

उपचार:

नई टहनियां बनने के समय या फलों की तुड़ाई के समय कार्बरील 600 ग्राम या क्लोरपाइरीफॉस 200 मि.ली. या क्विनलफॉस 300 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर 20 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें।

कली की सुंडी :

इसकी सुंडियां वनस्पति कलियों को खाकर उन्हें नष्ट करती हैं।

उपचार:

क्विनलफॉस 300 मि.ली. या फेम 20 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

बालों वाली सुंडी:

ये कीट नई टहनियों और पौधे को अपना भोजन बनाकर नष्ट कर देते हैं।

उपचार:

क्विनलफॉस 300 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

चीकू के रोग

पत्तों पर धब्बा रोग:

गहरे जामुनी भूरे रंग के धब्बे जो कि मध्य मे से सफेद रंग के होते हैं देखे जा सकते हैं। फल के तने और पंखुड़ियों पर लंबे धब्बे देखे जा सकते हैं।

उपचार:

कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 400 ग्राम को प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

तने का गलना :

यह एक फंगस वाली बीमारी है जिसके कारण तने और शाखाओं के मध्य में से लकड़ी गल जाती है।
उपचार: कार्बेनडाज़िम 400 ग्राम या डाइथेन जेड-78 को 400 ग्राम को 150 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

एंथ्राक्नोस :

तने और शाखाओं पर, कैंकर के गहरे धंसे हुए धब्बे देखे जा सकते हैं और पत्तों पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं।

उपचार:

कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या एम-45, 400 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

चीकू फलों की तुड़ाई

चीकू के फलों की तुड़ाई जुलाई – सितंबर महीने में की जाती है। कि‍सानों को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि अनपके फलों की तुड़ाई ना करें। तुड़ाई मुख्यत: फलों के हल्के संतरी या आलू रंग के होने पर जब फलों में कम चिपचिपा दुधिया रंग हो, तब की जाती है। फलों को वृक्ष से तोड़ना आसान होता है।

चीकू की खेती से प्राप्त उपज / पैदावार | Yields in Sapota Gardening

चीकू में रोपाई के दो वर्ष बाद फल मिलना प्रारम्भ हो जाता है। जैसे-जैसे पौधा पुराना होता जाता है। उपज में वृद्धि होती जाती है। मुख्यत: 5 – 10 वर्ष का वृक्ष 250-1000 फल देता है। एक 30 वर्ष के पेड़ से 2500 से 3000 तक फल प्रति वर्ष प्राप्त हो जाते है।

चीकू के फल का भंडारण | Storage Management in Sapota Commercial Farming

तुड़ाई के बाद, छंटाई की जाती है और 7-8 दिनों के लिए 20 डिगरी सेल्सियस पर स्टोर किया जाता है। भंडारण के बाद लकड़ी के बक्सों में पैकिंग की जाती
है और लंबी दूरी वाले स्थानों पर भेजा जाता है।

अरबी की खेती | घुइयाँ की खेती

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TARO FARMING | ARBI FARMING | GHUINYA KI KHETI

भारत देश में रबी सीजन की कटाई के बाद अधिकांश खेत खाली रहते हैं। यहां गर्मी की फसल पैदाकर किसान को आर्थिक फायदा हो सकता है।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 23

अरबी की खेती हेतु जलवायु एवं तापमान | Taro Arabi Kheti Suitable Climate and Temperature

कृषि विशेषज्ञों का कहना है अरबी की फसल को गर्म और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है।
इसलिए इसे ग्रीष्म और बारिश दोनों ही मौसम में उगाया जा सकता है। जायद सीजन में इसे अप्रैल में उगा सकते हैं। अरबी की बुआई के लिए पर्याप्त जीवांश वाली रेतीली दोमट मिट्‌टी अच्छी रहती है। इससे कड़ी परत न हो। साथ ही जल निकासी की अच्छी पर्याप्त व्यवस्था हो। इसमें गर्मी के दिनों में 6-7 दिन के अंतराल में सिंचाई करना जरूरी है।

भूमि और तैयारी | Field Preparation for TARO Root Farming

अरबी की अच्छी फसल लेने के लिए बलुई दोमट आदर्श भूमि हैं| दोमट और चिकनी दोमट में भी उत्तम जल निकास के साथ इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती हैं| इसकी खेती के लिए 5. 5 से 7.0 पी एच मान वाली भूमि उपयुक्त होती हैं| रोपण हेतु खेत तैयार करने के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल एवं दो जुताई कल्टीवेटर से करके पाटा चलाकर मिट्टी को भुरीभुरी बना लेना चाहिए|

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 24

उन्नत किस्में | Advanced New Improved Varieties For Arbi Cultivation

इंदिरा अरबी 1-

इस किस्म के पत्ते मध्यम आकार और हरे रंग के होते हैं| तने (पर्णवृन्त) का रंग ऊपर- नीचे बैंगनी तथा बीच में हरा होता हैं| इस किस्म में 9 से 10 मुख्य पुत्री धनकंद पाये जाते है| इसके कंद स्वादिष्ट खाने योग्य होते हैं और पकाने पर शीघ्र पकते हैं, यह किस्म 210 से 220 दिन में खुदाई योग्य हो जाती हैं| इसकी औसत पैदावार 22 से 33 टन प्रति हेक्टेयर हैं|

श्रीरश्मि-

इसका पौधा लम्बा, सीधा और पत्तियाँ झुकी हुई, हरे रंग की बैंगनी किनरा लिये होती है| तना (पर्णवृन्त) का ऊपरी भाग हरा, मध्य तथा निचला भाग बैंगनी हरा होता हैं| इसका मातृ कंद बडा और बेलनाकार होता हैं| पुत्री धनकंद मध्यम आकार के व नुकीले होते हैं| इस किस्म के कंद कंदिकाएँ, पत्तियां और पर्णवृन्त सभी तीक्ष्णता (खुजलाहट) रहित होते हैं तथा उबालने पर शीघ्र पकते हैं| यह किस्म 200 से 201 दिन में खुदाई के लिये तैयार हो जाती हैं और इससे औसत 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर पैदावार प्राप्त होती हैं|

पंचमुखी-

इस किस्म में सामान्यतः पॉच मुख्य पुत्री कंदिकाये पायी जाती हैं, कंदिकायें खाने योग्य होती है और पकने पर शीघ्र पक जाती हैं| रोपण के 180 से 200 दिन बाद इसके कंद खुदाई योग्य हो जाते हैं| इस किस्म से 18 से 25 टन प्रति हेक्टेयर औसत कंद पैदावार प्राप्त होती हैं|

व्हाइट गौरेइया-

अरबी की यह किस्म रोपण के 180 से 190 दिन में खुदाई योग्य हो जाती हैं| इसके मातृ तथा पुत्री कंद व पत्तियां खाने योग्य होती हैं| इसकी पत्तियां डंठल और कंद खुजलाहट मुक्त होते हैं| उबालने या पकाने पर कंद शीघ्र पकते है| इस किस्म की औसत पैदावार 17 से 19 टन प्रति हेक्टेयर हैं|

नरेन्द्र अरबी-

इस किस्म के पत्ते मध्यम आकार के तथा हरे रंग के होते हैं| पर्णवृन्त का ऊपरी और मध्य भाग हरा निचला भाग हरा होता हैं| यह 170 से 180 दिनों में तैयार हो जाती हैं| इसकी औसत पैदावार 12 से 15 टन प्रति हेक्टेयर हैं| इस किस्म की पत्तियॉ, पर्णवृन्त एवं कंद सभी पकाकर खाने योग्य होते हैं|

श्री पल्लवी-

यह किस्म 210 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 16 से 18 टन प्रति हेक्टेयर है|

श्रीकिरण-

यह किस्म 190 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 17 से 18 टन प्रति हेक्टेयर है|

सतमुखी-

यह किस्म 200 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर है|

आजाद अरबी-

यह किस्म 135 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 28 से 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

मुक्ताकेशी-

यह किस्म 160 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 20 टन प्रति हेक्टेयर है|

बिलासपुर अरूम-

यह किस्म 190 दिन में तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार 30 टन प्रति हेक्टेयर है|

बीज की बुवाई एवं रोपण का समय | ARBI Farming Showing Time And Showing Methods

अरबी का रोपण जून से जुलाई (खरीफ फसल) में किया जाता हैं| उत्तरी भारत में इसे फरवरी से मार्च में भी लगाया जाता हैं|

बीज की मात्रा | Seed Rate For TARO Cropping

बीज दर किस्म और कंद के आकार तथा वजन पर निर्भर करती हैं| सामान्य रूप से 1 हेक्टेयर में रोपण हेतु 15 से 20 क्विटल कंद बीज की आवश्यकता होती हैं| इसके मातृ एवं पुत्री कंदों (20 से 25 ग्राम) दोनों को रोपण सामग्री हेतु प्रयुक्त किया जाता हैं|

बीज उपचार | Seed Treatment for Taro Ki Kheti

कंदों को रिडोमिल एम जेड- 72 की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम कंद की दर से उपचारित करना चाहिए| कंदों को बुआई पूर्व फफूंदनाशक के घोल में 10 से 15 मिनट डुबाकर रखना चाहिए|

कंद रोपण विधियाँ |Tuber planting methods-

मेड़नाली विधि-

इस विधि में तैयार खेत में 60 सेंटीमीटर की दूरी पर मेड़ व नाली का निर्माण किया जाता हैं तथा 10 सेंटीमीटर उंची मेड पर 45 सेंटीमीटर की दूरी पर प्रत्येक कंद बीज को 5 सेंटीमीटर की गहराई में रोपा जाता हैं|

ऊँची समतल क्यारी मेड़नाली विधि- इस विधि में खेत में 8 से 10 सेंटीमीटर ऊँची समतल क्यारियाँ बनाते हैं, जिसके चारो तरफ जल निकास नाली 50 सेंटीमीटर की होती हैं| इन क्यारियों पर लाईन की दूरी 60 सेंटीमीटर की रखते हुए 45 सेंटीमीटर के अंतराल पर बीजों का रोपण 5 सेंटीमीटर की गहराई पर किया जाता है| इस विधि में रोपण के दो माह बाद निंदाई-गुड़ाई के साथ उर्वरक की बची मात्रा देने के बाद पौधों पर मिट्टी चढाकर बेड को मेडनाली में परिवर्तित करते हैं, यह विधि अरबी की खरीफ फसल के लिये उपयुक्त हैं|

नालीमेड विधि-

इस विधि में अरबी का रोपण 8 से 10 सेंटीमीटर गहरी नालियों में 60 से 65 सेंटीमीटर के अंतराल पर करना चाहिए| रोपण से पूर्व नालियों में आधार खाद और उर्वरक देना चाहिए| रोपण के 2 माह बाद बचे हुए उर्वरक की मात्रा देने के साथ नालियों को मिट्टी से उपर तक भर पौधों पर मिट्टी चढाकर मेड नाली पद्धति में परिवर्तित कर देना चाहिए| यह विधि रेतीली दोमट और नदी किनारे भूमि के लिए उपयुक्त हैं|

खाद और उर्वरक| Nutrition Management

अरबी के लिए भूमि तैयार करते समय 15 से 25 टन प्रति हेक्टेयर सडी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद और आधार उर्वरक को अंतिम जुताई करते समय मिला देना चाहिए| रासायनिक उर्वरक नत्रजन 80 से 100 किलोग्राम, फास्फोरस 60 किलोग्राम और पोटाश 80 से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग लाभप्रद हैं| नत्रजन तथा पोटाश की पहली मात्रा आधार के रूप में रोपण के पूर्व देना चाहिए| रोपण के एक माह नत्रजन की दूसरी मात्रा का प्रयोग निंदाई-गुड़ाई के साथ करना चाहिए| दो माह पश्चात् नत्रजन की तीसरी तथा पोटाश की दूसरी मात्रा को निंदाई-गुड़ाई के साथ देने के बाद पौधों पर मिट्टी चढा देना चाहिए|

सिंचाई प्रबंधन | Irrigation Management

अरबी की पत्तियों का फैलाव ज्यादा होने के कारण वाष्पोत्सर्जन ज्यादा होता हैं| इसलिए प्रति इकाई पानी की आवश्यकता अन्य फसलों से ज्यादा होती हैं| सिंचित अवस्था में रोपी गयी फसल में 7 से 10 दिन के अंतराल पर 5 माह तक सिंचाई आवश्यक हैं| वर्षा आधारित फसल में 15 से 20 दिन तक वर्षा न होतो सिंचाई के साधन उपलब्ध होने पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिए| परिपक्व होने पर भी अरबी की फसल हरी दिखती हैं, सिर्फ पत्तों का आकार छोटा हो जाता हैं| खुदाई के एक माह पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिए, जिससे नये पत्ते नहीं निकलते हैं तथा फसल पूर्णरूपेण परिपक्व हो जाती हैं|

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पैदावार | Yield

अरबी की खेती करने पर सामान्य अवस्था में अरबी से किस्म के अनुसार वर्षा आधारित फसल के रूप में 20 सर 25 टन तथा सिंचित अवस्था की फसल में 25 से 35 टन प्रति हेक्टेयर कंद पैदावार प्राप्त होती हैं| जब लगातार पत्तियों की कटाई की जाती है, तब कंद एवं कंदिकाओं की पैदावार 6 से 9 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है, जबकि एक हेक्टेयर से 8 से 11 टन हरी पत्तियों की पैदावार होती हैं|

गेंदा की खेती | Marigold Farming| Floriculture|

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भारत में पुष्प व्यवसाय में गेंदा का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसका धार्मिक तथा सामाजिक अवसरों पर वृहत् रूप में व्यवहार होता है। गेंदा फूल को पूजा अर्चना के अलावा शादी-ब्याह, जन्म दिन, सरकारी एवं निजी संस्थानों में आयोजित विभिन्न समारोहों के अवसर पर पंडाल, मंडप-द्वार तथा गाड़ी, सेज आदि सजाने एवं अतिथियों के स्वागतार्थ माला, बुके, फूलदान सजाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है। गेंदा के फूल का उपयोग मुर्गी के भोजन के रूप में भी आजकल बड़े पैमाने पर हो रहा है। इसके प्रयोग से मुर्गी के अंडे की जर्दी का रंग पीला हो जाता है, जिससे अण्डे की गुणवत्ता तो बढ़ती ही है, साथ ही आकर्षण भी बढ़ जाता है।

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गेंदे की खेती की उन्नत तकनीकी | गेंदा फूल की वैज्ञानिक खेती | Marigold Farming Advanced Technology

गेंदा के औषधीय गुण | Marigold Ayurveda Benefits

अपनी औषधीय गुणों के कारण गेंदा का एक खास महत्व है। गेंदा के औषधीय गुण निम्नलिखित हैं-
कान दर्द में गेंदा के हरी पत्ती का रस कान में डालने पर दर्द दूर हो जाता है। खुजली, दिनाय तथा फोड़ा में हरी पत्ती का रस लगाने पर रोगाणु रोधी का काम करती है। अपरस की बीमारी में हरी पत्ती का रस लगाने से लाभ होता है।

अन्दरूनी चोट या मोच में गेंदा के हरी पत्ती के रस से मालिश करने पर लाभ होता है।
साधारण कटने पर पत्तियों को मसलकर लगाने से खून का बहना बन्द हो जाता है।
फूलों का अर्क निकाल कर सेवन करने से खून शुद्ध होता है।

ताजे फूलों का रस खूनी बवासीर के लिए भी बहुत उपयोगी होता है।

गेंदा की खेती के लिए भूमि | Marigold Farming Soil Selection

गेंदा की खेती के लिए दोमट, मटियार दोमट एवं बलुआर दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है जिसमें उचित जल निकास की व्यवस्था हो ।

भूमि की तैयारी | Field Preparation For Marigold Cultivation

भूमि को समतल करने के बाद एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई करके एवं पाटा चलाकर, मिट्टी को भुरभुरा बनाने एवं ककर पत्थर आदि को चुनकर बाहर निकाल दें तथा सुविधानुसार उचित आकार की क्यारियाँ बना दें।

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व्यवसायिक किस्में | Advanced Commercial Improved Varieties For Marigold Farming

अधिक ऊपज लेने के लिए परम्परागत किस्मों की जगह केवल सुधरी किस्में ही बोनी चाहिए। गेंदा की कुछ प्रमुख उन्नत किस्में निम्न हैं –

1. अफ्रिकन गेंदा

इसके पौधे अनेक शाखाओं से युक्त लगभग 1 मीटर तक ऊँचे होते हैं, इनके फूल गोलाकार, बहुगुणी पंखुड़ियों वाले तथा पीले व नारंगी रंग का होता है। बड़े आकार के फूलों का व्यास 7-8 सेमी. होता है। इसमें कुछ बौनी किस्में भी होती हैं, जिनकी ऊँचाई सामान्यत: 20 सेमी. तक होती है। अफ्रिकन गेंदा के अन्तर्गत व्यवसायिक दृष्टिकोण से उगाये जाने वाले प्रभेद-पूसा नारंगी, पूसा वसन्तु अफ्रिकन येलो इत्यादि है।

2. फ्रांसीसी गेंदा

इस प्रजाति की ऊँचाई लगभग 25-30 सेमी. तक होती है इसमें अधिक शाखायें नहीं होती हैं किन्तु इसमें इतने अधिक पुष्प आते हैं कि पूरा का पूरा पौधा ही पुष्पों से ढँक जाता है। इस प्रजाति के कुछ उन्नत किस्मों में रेड ब्रोकेट, कपिड येलो, बोलेरो, बटन स्कोच इत्यादि है।

खाद एवं उर्वरक | Nutrition Management For Marigold Cropping

गेंदा की अच्छी ऊपज है तो खेत की तैयारी से पहले 200 क्विंटल कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दें । तत्पश्चात 120-160 किलो नेत्रजन, 60-80 किलो फास्फोरस एवं 60-80 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग प्रति है क्टेयर की दर से करें। नेत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अन्तिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें। नेत्रजन की शेष आधी मात्रा पौधा रोप के 30-40 दिन के अन्दर प्रयोग करें।

गेंदा का प्रसारण

गेंदा का प्रसारण बीज एवं कटिंग दोनों विधि से होता है इसके लिए 300-400 ग्राम बीज प्रति है क्टर की आवश्यकता होती है जो 500 वर्ग मीटर के बीज शैय्या में तैयार किया जाता है, बीज शैय्या में बीज की गहराई 1 सेमी. से अधिक नहीं होना चाहिए। जब कटिंग द्वारा गेंदा का प्रसारण किया जाता है उसमें ध्यान रखना चाहिए कि हमेशा कटिंग नये स्वस्थ पौधे से लें जिसमें मात्र 1-2 फूल खिला हो, कटिंग का आकार 4 इंच (10 सेमी) लम्बा होना चाहिए। इस कटिंग पर रूटेक्स लगाकर बालू से भरे ट्रे में लगाना चाहिए। 20-22 दिन बाद इसे खेत में रोपाई करना चाहिए।

रोपाई | How To Planting Marigold Farming for Commercial Object

गेंदा फूल खरीफ, रबी, जायद तीनों सीजन में बाजार की मांग के अनुसार उगाया जाता है। लेकिन इसके लगाने का उपयुक्त समय सितम्बर-अक्टूबर है। विभिन्न मौसम में अलग-अलग दूरी पर गेंदा लगाया जाता है जो निम्न है

खरीफ (जून से जुलाई) – 60 x 45 सेमी.
रबी (सितम्बर–अक्टूबर) – 45 x 45 सेमी.
जायद (फरवरी-मार्च) – 45 x 30 सेमी.

जल एवं जल निकास प्रबंधन |Water And Water Drainage management

खेत की नमी को देखते हुए 5-10 दिनों के अन्तराल पर गेंदा में सिंचाई करनी चाहिए। यदि वर्षा हो जाय तो सिंचाई नहीं करना चाहिए।

पिंचिंग | Pitching For Marigold Farming

रोपाई के 30-40 दिन के अन्दर पौधे की मुख्य शाकीय कली को तोड़ देना चाहिए। इस क्रिया से यद्यपि फूल थोड़ा देर से आयेंगे, परन्तु प्रति पौधा फूल की संख्या एवं ऊपज में वृद्धि होती है। निकाई-गुड़ाई लगभग 15-20 दिन पर आवश्यकतानुसार निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए। इससे भूमि में हवा का संचार ठीक संग से होता है एवं वांछित खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। रोपाई के 60 से 70 दिन पर गेंदा में फूल आता है जो 90 से 100 दिनों तक आता रहता है। अतः फूल की तोड़ाई साधारणतया सायंकाल में की जाती है। फूल को थोड़ा डंठल के साथ तोड़ना श्रेयस्कर होता है। फूल का कार्टून जिसमें चारों तरफ एवं नीचे में अखबार फैलाकर रखना चाहिए एवं ऊपर से फिर अखबार से ढँक कर कार्टून बन्द करना चाहिए।

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Crop Protection Management For Marigold Cultivation

कीड़े और बीमारी |

लीफ हापर, रेड स्पाइडर, इसे काफी नुकसान पहुँचाते हैं। इसके रोकथाम के लिए मैलाथियान 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करें।

गेंदा में मोजेक, चूर्णी फफूद एवं फूटराट मुख्य रूप से लगता है। मोजेक लगे पौधे को उखाड़कर मिट्टी तले दबा दें एवं गेंदा में कीटनाशक दवा का छिड़काव करें जिससे मोजेक के विषाणु स्थानान्तरित करने वाले कीट का नियंत्रण हो इसका विस्तार एवं दूसरे पौधे में न हो। चूर्णी फफूद के नियंत्रण है तो 0.2 प्रतिशत गंधक का छिड़काव करें एवं फुटराट के नियंत्रण है तो इण्डोफिल एम-45 0.25 प्रतिशत का 2-3 बार छिड़काव करें।

ऊपज

80-100 क्विंटल फूल/हेक्टेयर ।

सूरजमुखी की खेती | Sunflower Farming

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Sunflower Farming ; Planting, Harvesting – A Full Guide | Kheti Kisani Org

भारत देश मे सूरजमुखी की खेती पहली बार सन् 1969 में उत्तराखंड के पंतनगर में प्रारंभ की गयी। यह ऐसी तिलहनी फसल है जिस पर प्रकाश की लंबाई का कोई प्रभाव नही पड़ता है जिससे हम इसे खरीफ , रबी और जायद तीनो सीजन में सरलता से उगा सकते है। इसके बीज में 45-50 फीसदी तक तेल पाया जाता है। साथ ही तेल में एक खास तत्व लिनोलिइक अम्ल पाया जाता है। लिनोलिइक अम्ल शरीर में कोलेस्ट्राल को बढ़ने नही देता है। नतीजतन इसका तेल हृदयरोगियों के लिये रामबाण दवा की तरह काम करता है।

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उपयुक्त जलवायु | Suitable Climate and Temperature For Sunflower Farming

सूरजमुखी की खेती खरीफ रबी जायद तीनो मौसम में की जा सकती है| फसल पकते समय शुष्क जलवायु की अति आवश्यकता पड़ती है|

उपयुक्त भूमि | Suitable Soil Selection For Sunflower Farming

सूरजमुखी की खेती (Farming of sunflower) सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है| परन्तु अधिक जल रोकने वाली भारी भूमि उपयुक्त है| निश्चित सिचाई वाली सभी प्रकार की भूमि में अम्लीय व क्षारीय भूमि को छोडकर इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है| हालाँकि दोमट भूमि सर्वोतम मानी जाती है|

खेत की तैयारी | Sunflower Farming Filed Preparation

खेत में पर्याप्त नमी न होने की दशा में पलेवा लंगाकर जुताई करनी चाहियें| एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा देशी हल से 2 से 3 बार जोतकर मिट्टी भुरभुरी बना लेनी चाहिए| रोटावेटर से खेत की तैयारी जल्दी हो जाती है|

उन्नत किस्में | Advanced Improved Variety For Suraj Mukhi ki Kheti

बी.एस.एच 1-

इस किस्म में तेल की मात्रा 41 प्रतिशत होती है, किट्ट प्रतिरोधक, पौधे की ऊंचाई 130 से 150 सेंटीमीटर रहती है| उपज 10 से 15 क्विंटल है और अवधि 90 से 95 दिन है|

एम.एस.एफ.एस 8-

इस किस्म में तेल की मात्रा 42 से 44 प्रतिशत होती है| पौधे की ऊंचाई 170 से 200 सेंटीमीटर होती है| उपज 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, और अवधि 90 से 100 दिन है|

मार्डन-

पौधे की ऊंचाई लगभग 90 से 100 सेंटीमीटर तक होती है| बहु फसली क्षेत्रों के लिये उपयुक्त|तेल की मात्रा 38 से 40 प्रतिशत होती है| उपज 6 से 8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, और अवधि 80 से 90 दिन है|

एम.एस.एच-

तेल की मात्रा 42 से 44 प्रतिशत होती है| पौधे की ऊंचाई 170 से 200 सेंटीमीटर होती है| उपज 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है| अवधि 90 से 100 दिन है|

एम.एस.एफ.एच 4-

तेल की मात्रा 42 से 44 प्रतिशत होती है| पौधे की ऊंचाई 120 से 150 सेंटीमीटर होती है| रबी एवं जायद के लिए उपयुक्त हैं| उपज 20 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और अवधि 90 से 95 दिन है|

एस.एच.एफ.एच 1-

तेल की मात्रा 40 से 42 प्रतिशत होती है| पौधे की ऊंचाई 120 से 150 सेंटीमीटर होती है| उपज 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है| अवधि 90 से 95 दिन है|

केवी. एस.एच 1-

पौधे की ऊंचाई लगभग 150 से 180 सेंटीमीटर तक होती है| पिछैती बुवाई के लिये उपयुक्त| तेल की मात्रा 43 से 45 प्रतिशत होती है| उपज 30 से 32 क्विंटल है और अवधि 90 से 95 दिन है|

एस.एच 3322-

पौधे की ऊंचाई लगभग 137 से 175 सेंटीमीटर तक होती है| पिछैती बुवाई के लिये उपयुक्त| तेल की मात्रा 40 से 42 प्रतिशत होती है| उपज 28 से 30 क्विंटल है और अवधि 90 से 95 दिन है|

एम एस एफ एच 17-

पौधे की ऊंचाई लगभग 140 से 150 सेंटीमीटर तक होती है| पिछैती बुवाई के लिये उपयुक्त| तेल की मात्रा 35 से 40 प्रतिशत होती है| उपज 27 से 29 क्विंटल है और अवधि 90 से 95 दिन है|

वी एस एफ 1-

पौधे की ऊंचाई लगभग 140 से 150 सेंटीमीटर तक होती है| पिछैती बुवाई के लिये उपयुक्त| तेल की मात्रा 35 से 40 प्रतिशत होती है| उपज 27 से 29 क्विंटल है और अवधि 90 से 95 दिन है|

बुवाई का समय | Sowing Time For sunflower Cultivation

जायद में सूरजमुखी की बुवाई का उपयुक्त समय फरवरी का दूसरा पखवारा है| जिससे फसल मई के अन्त या जून के प्रथम सप्ताह तक पक जायें| बुवाई में देर करने से वर्ष शुरू हो जाने के बाद पैदावार में नुकसान पहुंचता है|

बीज की मात्रा | Seed Rate Quantity In Sunflower Cultivation

बीज की मात्रा अलग अलग पड़ती है, जैसे की सामान्य प्रजातियो में 12 से 15 किलो ग्राम प्रति हैक्टर बीज लगता है, और संकर प्रजातियो में 5 से 6 किलो ग्राम प्रति हैक्टर बीज लगता है| यदि बीज की जमाव गुणवता 70 या 75 प्रतिशत से कम हो तो बीज की मात्रा बढ़ाकर बुवाई करना चाहिए|

बीजोपचार | Seed Treatment in Sunflower Ki Kheti

बीज को बुवाई से पहले 3 ग्राम थीरम या बाविस्टीन प्रति किलो ग्राम बीज को शोधित करना चाहिए| बीज को बुवाई से पहले रात में 12 घंटा भिगोकर सुबह 3 से 4 घंटा छाया में सुखाकर दोपहर के बाद बुवाई करनी चाहिए|

बुवाई की विधि | Sowing Methid of Sunflower Cropping

बुवाई लाइनों में हल के पीछे 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर करनी चाहिए| लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटी मीटर तथा पौध से पौध की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखनी उपयुक्त है|

सिंचाई व जल निकास प्रबंधन | Irrigation And Water Drainage Management

सूरजमुखी की खेती (Farming of sunflower) के लिए हल्की भूमि में जायद मे सूरजमुखी की अच्छी फसल के लिए 4 से 5 सिचांईयो की आवश्यकता पडती है| तथा भारी भूमि में 3 से 4 सिंचाइयां की आवश्यकता होती है| पहली सिंचाई बोने के 20 से 25 दिन बाद आवश्यक है| फूल निकलते समय तथा दाना भरते समय भूमि में पर्याप्त नमी होनी चाहिए|

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सूरजमुखी की खेती कीटों की रोकथाम कैसे करें | Pest Control in Sunflower Farming

सूरजमुखी की खेती में कई प्रकार के कीट लगते है, जैसे की दीमक हरे फुदके डसकी बग आदि है| इनके नियंत्रण के लिए कई प्रकार के रसायनो का भी प्रयोग किया जा सकता है| मिथाइल ओडिमेंटान 1 लीटर 25 ईसी या फेन्बलारेट 750 मिली लीटर प्रति हैक्टर 900 से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए|

कटाई | Harvesting

जब सूरजमुखी के बीज कड़े हो जाए तो फूलो के कटाई करके एकत्र कर लेना चाहिए, तथा इनको छाया में सुख लेना चाहिए| इनको ढेर बनाकर नहीं रखना चाहिए, इसके बाद डंडे से पिटाई करके बीज निकल लेना चाहिए

लौंग की खेती | लौंग उत्पादन की उन्नत तकनीक | Laung Ki Kheti

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भारत देश मे लौंग को मसालों के रूप में प्रयोग की जाती है इसका मसालों के रूप मैं बहुत ज्यादा प्रयोग किया जाता है। इसके अतिकित लोंग को आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी प्रयोग किया जाता है। लोग की परियों का तहसील बहुत गर्म होता है जिस कारण इसको ज्यादातर सर्दियों के मौसम में प्रयोग किया जाता है। सर्दियों के मौसम में लोगों को सर्दी जुखाम लगने पर इसके काढ़े को पीने से आराम मिलता है।

लौंग की उन्नत खेती की जानकारी | Cloves Advanced Farming Technology in Hindi

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 31

लौंग का पौधा एक सदाबहार पौधा है जिसको एक बार लगाने के बाद कई वर्ष तक पैदावार देता रहता है। इसके पौधे को पैदावार करने के लिए उसे कटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता पड़ती है।

लौंग की खेती हेतु मिट्टी का चयन | Soil Selection

भूले दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसकी खेती भूमि में जलभराव रहता है उस स्थान पर नहीं की जा सकती लोंग की खेती करने के लिए सामान्य के ph 5-6 होना चाहिए।

जलवायु और तापमान

लौंग की खेती अधिक तेज गर्मी या अधिक तेज ठंड पड़ने के कारण इसके पौधों का विकास रुक जाता है। झूम की खेती करने के लिए छायादार जगह की आवश्यकता पड़ती है। सामान्य तापमान की जरूरत होती है लेकिन गर्मियों मैं इसकी खेती करने के लिए अधिक तापमान 30 डिग्री सेंटीग्रेड से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तथा सर्दियों में 15 डिग्री सेंटीग्रेड से पौधों का विकास कर सकता है।

खेती की तैयारी

लौंग का पौधा एक ऐसा पौधा है जो एक बार लगाने के बाद लगभग 100 वर्ष से 150 वर्ष तक पैदावार देता रहता है लेकिन उत्तम पैदावार 16 वर्ष की उम्र तक देता है इसको खेत में लगाने से पहले खेत की अच्छे से जुताई कराकर भूमि को समतल कर लेना चाहिए। जिसके कारण भूमि की मिट्टी बारीक एवं भुरभुरी बन जाए और खरपतवार भी नष्ट हो जाएं उसके बाद खेत में लगभग 15 से 20 फिट की दूरी छोड़ते हुए 1 मीटर व्यास डेढ़ से दो फीट की गहराई के गड्ढे तैयार कर देनी चाहिए। जैविक खाद एवं रसायन की उचित मात्रा को मिट्टी में मिला पर गड्ढे में भर देते हैं।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 32

पौध तैयार करना

लौंग की खेती करने से पहले लौंग के बीज से पौधे तैयार से पौधे तैयार किए जाते हैं। जिसके लिए बीज को उपचारित कर लेना चाहिए बीज को नर्सरी में लगाने से पहले एक रात तक पानी में अच्छे से दो देना चाहिए उसके बाद इसके बीज की रोपाई नर्सरी में जैविक खाद के मिश्रण से तैयार की गई भूमि में 10 सेंटीमीटर की दूरी रखते हुए पंक्ति अनुसार करनी चाहिए।

लौंग के पौधे को तैयार होने में लगभग 2 साल के आसपास का समय लगता है लगभग फिर उसके 4 से 5 साल बाद पौधा फल देना शुरू करता है। लेकिन सभी किसान भाइयों को इसकी नर्सरी बाजार से खरीद कर ही खेत में लगानी चाहिए ऐसा करने से समय की बहुत ज्यादा बचत होती है। और पैदावार भी जल्द मिलने शुरू हो जाती है लेकिन इसकी नरसिंहपुर नर्सरी को खरीदते समय ध्यान रखें कि लगभग पौधा 4 फीट आसपास की लंबाई का हो और 2 साल पुराना भी होना चाहिए।

पौधों की रोपाई का समय और तरीका

लौंग के पौधे को तैयार किए गए गड्ढे में लगाया जाता है। पहले घंटे के बीचो-बीच की सहायता से एक छोटा गड्ढा तैयार कर लेना चाहिए, फिर इस गड्ढे में लॉन्ग के फायदे लगाना चाहिए पौधे को लगाने के बाद चारों ओर से मिट्टी से अच्छे से ढक देना चाहिए।

यादी वर्षा का आसार में हो तो रोपाई के तुरंत बाद पौधों की सिंचाई कर देनी चाहिए। गर्मियों के मौसम में लौंग के पौधे को अधिक सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। 1 सप्ताह में एक से दो बार पौधों की सिंचाई आवश्यक पर देनी चाहिए। और सर्दियों के मौसम में 15 से 20 दिन के अंतराल पर सिंचाई आवश्यक कर दें।

खाद एवं उर्वरक

लौंग के पौधे को शुरूवात अवस्था में कम उर्वरक की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन (but) घंटा तैयार करते समय से अच्छे से सड़ी हुई गोबर की खाद किलोग्राम एन पी के डाल दे।

इसके पौधों की वृद्धि के साथ साथ खाद एवं उर्वरक की मात्रा में भी वृद्धि करनी चाहिए। और पौधे को 40 से 50 किलोग्राम गोबर की खाद 1 किलोग्राम रसायन खाद की मात्रा लगभग 1 साल में तीन से चार बार आवश्यक खाद देने के बाद पौधों की सिंचाई कर देनी चाहिए।

फलों की तोड़ाई

लौंग के पौधे रोपाई के 4 से 5 वर्ष बाद पैदावार देना आरंभ करते हैं जिसमें पौधों पर फल घुटनों में लगता है जिसका रंग लाल गुलाबी रंग का होता है जिसको फूल खिलने से पहले ही तोड़ दिया जाता है इसके फल की लंबाई अधिकतम 2 सेंटीमीटर होती है जिस को सुखाने के बाद के रूप में प्रयोग किया जाता है।

पैदावार

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 33एक पौधे से एक बार में 3 किलो के आसपास लॉन्ग प्राप्त की जा सकती है। लोंग का बाजार का भाव ₹700 से ₹1000, 1 किलोग्राम तक पाया जाता है। जिसके हिसाब से एक पौधे से एक बार में ढाई से 3000 तक की कमाई की जा सकती है।

मूँग की खेती | मूंग उत्पादन की उन्नत तकनीक | मूंग की लाभकारी खेती

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भारत देश मे दलहनी फसल में मूंग एक महत्वपूर्ण है जिसकी खेती समस्त राजस्थान में की जाती है।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 34

मिट्टी का चुनाव | Soil सिलेक्शन in Moong ki kheti

 उच्च कार्बनिक पदार्थ वाली तराई क्षेत्रों की मृदा-

बुवाई के पूर्व 3 कि.ग्रा. जिंक (15 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट हेप्टा
हाइड्रेट या 9 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट मोनो हाइड्रेट) प्रति हेक्टर की दर से तीन वर्ष के अन्तराल पर दें।

 कम कार्बनिक पदार्थ वाली पहाड़ी बलुई दोमट मृदा-

2.5 कि.ग्रा. जिंक (12.5 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट हेप्टा हाइड्रेट
या 7.5 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट मोनो हाइड्रेट) प्रति हैक्टर की दर से एक वर्ष के अन्तराल में प्रयोग करें ।

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 35

 बोरॉन – बोरॉन की कमी वाली मृदाओं में उगाई जाने वाली मूँग की फसल में 0.5 कि.ग्रा. बोरॉन (5 कि.
ग्रा. बोरेक्स या 3.6 कि.ग्रा. डाइसोडियम टेट्राबोरेट पेन्टाहाइडेªट) प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें।
 मैंगनीज – मैंगनीज की कमी वाली बलुई दोमट मृदाओं में 2ः मैंगनीज सल्फेट के घोल का बीज उपचार
या मैंगनीज सल्फेट के 1ः घोल का पर्णीय छिड़काव लाभदायक पाया गया है।
 मॉलिब्डेनम – मॉलिब्डेनम की कमी वाली मृदाआंे मंे 0.5 कि.ग्रा. सोडियम मॉलिब्डेट प्रति हैक्टर की दर से
आधार उर्वरक के रूप में या 0.1ः सोडियम मॉलिब्डेट के घोल का दो बार पर्णीय छिड़काव करना
चाहिए अथवा मॉलिब्डेनम के घोल में बीज शोषित करें। ध्यान रहे कि अमोनियम मॉलिब्डेनम का प्रयोग
तभी किया जाना चाहिए जब मृदा में मॉलिब्डेनम तत्व की कमी हो।

जायद मूंग की खेती पेटा कास्त वालेक्षेत्रों,जलग्रहण वाले क्षेत्रों एवं बलुई दोमट, काली तथा पीली मिट्टी जिसमें जल धारण क्षमता अच्छी होती है, में करना लाभप्रद होता है। अंकुरण के लिए मृदा में उचित तापमान होना आवश्यक है। जायद मूंग की बुवाई 15 फरवरी से 15 मार्च के मध्य करना उपर्युक्त रहता है । जायद मूंग की अधिक उपज देने वाली किस्मों का चयन करें।

मूंग की उन्नत किस्मे : Advanced Variety

आई पी एम -2-3 सत्या (एम एच-2-15), के-851,पूसा बैसाखी, एस.एम.एल.-668, एस.-8, एस.-9, आर.एम.जी.-62, आर.एम.जी.-268, आर.एम.जी.-344 (धनू), आर.एम.जी.-492, पी.डी.एम.-11, गंगा-1 (जमनोत्री), गंगा-8 (गंगोत्री) एवं एमयूएम-2, ये किस्में 60-65 दिन में पककर 10-15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उपज देती है।

खेत की तैयारी : Field Preparation

इसकी बुवाई के लिये आवश्यकतानुसार एक या दो बार जुताई कर खेत को तैयार करें।

भूमि उपचार: Soil Treatment

भूमिगत कीटों व दीमक की रोकथाम हेतु बुवाई से पूर्व एण्डोसल्फान 4 प्रतिशत या क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में मिलायें।

बीज की मात्रा एवं बुवाई : Seed Rate

एक हैक्टेयर क्षेत्रफल हेतु 15-20 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। कतार से कतार की दूरी 25-30 सेन्टीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेन्टीमीटर रखें।

फ़सल सुरक्षा प्रबंधन | Crop Protection Management

Poplar Tree Farming | पोपलर की खेती से लाभ ही लाभ 36

थ्रिप्स या रसचूसक कीट नियंत्रण

 बुवाई के पूर्व बीजो को थायोमेथोक्जम 70 डब्ल्यूएस 2 मि.ली./कि.ग्राम बीज के हिसाब से उपचार
करें तथा थायोमेथोक्जम 25 डब्ल्यू जी 2 मि.ली./ली. पानी में घोल बनाकर छिडकाव करनें से
थ्रिप्स का अच्छा नियंत्रण होता है।
 ट्राईजोफॉस 40 ई.सी. 2 मि.ली./ली. या इथियोन 50 ई.सी. 2 मि.ली./ली. का छिडकाव
आवश्यकतानुसार करना चाहिए।

माहू एवं सफेद मक्खी

डायमिथोएट 1000 मि.ली. प्रति 600 लीटर पानी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. प्रति 600 लीटर पानी
में 125 मि.ली. दवा के हिसाब से प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना लाभप्रद रहता है।

पीला चितकबरा रोग

रोगरोधी प्रजातियॉं जैसे नरेन्द्र मूंग-1, पन्त मूंग -3, पी.डी.एम.-139 (समा्रट), पी.डी.एम.-11, एम.यू.
एम.-2, एम.यू.एम.-337, एस.एम.एल. 832, आई.पी.एम. 02-14, एम.एच. 421 इत्यादि का चुनाव करना
चाहिए ; पपद्ध श्वेत मक्खी इस रोग का वाहक है। इससे बचाव करने के लिए श्वेत मक्खी के नियंत्रण हेतु
ट्रायजोफॉस 40 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति लीटर अथवा थायोमेथाक्साम 25 डब्लू. जी. 2 ग्राम/ली. या
डायमिथिेएट 30 ई.सी. 1 मिली./ली. पानी में घोल बनाकर 2 या 3 बार 10 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।

सफेद मक्खी से रासायनिक बचाव रोग से बचाव हेतु बीजोपचार के लिए बीजों को इमिडाक्लोप्रिड या एसिटामिप्रिड घोल में डुबोकर रोपण करें। बीमार पौधों के शीर्ष भाग काट कर जला दें तथा सफेद मक्खी पर नियंत्रण के लिए पौध रोपण के 30 दिन बाद इमिडाक्लोप्रिड या एसिटामिप्रिड की 125 प्रति मिली. हेक्टेयर या मिथाइल डिमेटान या एसिफेट की 300 प्रति मिली हेक्टेयर छिड़काव करें। साथ ही प्रत्येक छिड़काव के समय सल्फेक्स 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर के मान से मिश्रित करें।

खाद एवं उर्वरक | Nutrition Management

मूंग के प्रति बीघा 10 किलो फास्फोरस तथा 5 किलो नाइट्रोजन बुवाई से पूर्व ड्रिल करें। 37.5 किलोग्राम प्रति बीघा जिप्सम का उपयोग बुवाई पूर्व ड्रिल करने पर उपज में वृद्धि होती है।

सिंचाई | Irritation And Water Drainage Management

मूंग की फसल में फूल आने से पूर्व (30-35 दिन पर) तथा फलियों में दाना बनते समय (40-50 दिन पर) सिंचाई अत्यन्त आवश्यक है। तापमान एवं भूमि में नमी के अनुसार आवश्यकता होने पर अतिरिक्त सिंचाई देवें।

कटाई एवं मड़ाई | Crop Harvesting)

जब 70-80 प्रतिशत फलियां पक जाएं, हंसिया से कटाई आरम्भ कर देना चाहिए। तत्पश्चात बण्डल
बनाकर फसल को खलिहान में ले आते हैं। 3-4 दिन सुखाने के पश्चात सुखााने के उपरान्त डडें से पीट कर
या बैलों की दायें चलाकर या थ्रेसर द्वारा भूसा से दाना अलग कर लेते हैं।

उपज Yield in Moong ki kheti

मूंग की खेती उन्नत तरीके से करने पर बर्षाकालीन फसल से 10 क्विंटल/हे. तथा ग्रीष्मकालीन
फसल से 12-15 क्विंटल/हे. औसत उपज प्राप्त की जा सकती है। मिश्रित फसल में 3-5 क्विंटल/हे.
उपज प्राप्त की जा सकती है।

भण्डारण ( Storage )

भण्ड़ारण करने से पूर्व दानों को अच्छी तरह धूप में सुखाने के उपरान्त ही जब उसमें नमी की मात्रा
8-10ः रहे तभी वह भण्डारण के योग्य रहती है।
मूंग का अधिक उत्पादन लेने के लिए आवश्यक बाते
 स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें।
 सही समय पर बुवाई करें, देर से बुवाई करने पर उपज कम हो जाती है।
 किस्मों का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता के अनुसार करें।
 बीजोपचार अवश्य करें जिससे पौधो को बीज एवं मृदा जनित बीमारियों से प्रारंभिक अवस्था में
प्रभावित होने से बचाया जा सके।
 मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग करे जिससे भूमि की उर्वराषक्ति बनी रहती
है जो टिकाऊ उत्पादन के लिए जरूरी है।
 खरीफ मौसम में मेड नाली पद्धति से बुबाई करें।
 समय पर खरपतवारों नियंत्रण एवं पौध संरक्षण करें जिससे रोग एवं बीमारियो का समय पर