काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

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Cashew farming – काजू का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है । काजू को ड्राईफ़्रूट का राजा कहा जा सकता है। काजू की उत्पत्ति ब्राज़ील से हुई थी। हालाँकि अब यह पूरे विश्व उगाया जाता है। काजू का वैज्ञानिक नाम Anacardium occidentale है। काजू की व्यावसायिक खेती दिनों-दिन लगातार बढ़ती जा रही है क्योंकि काजू सभी अहम कार्यक्रमों या उत्सवों में अल्पाहार या नाश्ता का जरूरी हिस्सा बन गया है। देश – विदेश में काजू की बड़ी माँग है। काजू की खेती से हम विदेशी मुद्रा भी कमा सकते हैं ।

कहाँ होती है काजू की खेती | where to cashew cultivation in in india – Cashew agriculture in hindi – Cashew farming in hindi

Cashew farming | काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी
Cashew farming | काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

भारत देश मे काजू के कुल उत्पादन का 25% पैदा करता है । काजू की खेती केरल, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा एवं पं. बंगाल में बड़े पैमाने में की जाती है परन्तु झारखंड राज्य के कुछ जिले जो बंगाल और उड़ीसा से सटे हुए है वहाँ पर भी इसकी खेती की काफ़ी सम्भावनाएँ हैं। उत्तर प्रदेश में कुल 20 कृषि प्रशिक्षण केंद्र हैं। जिसमें मुरादाबाद ज़िले में स्थित मनोहरपुर कृषि प्रशिक्षण संस्थान में उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से काजू और जम्मू स्थित सरकारी नर्सरी से बादाम का एक-एक पौधा लाकर कृषि प्रशिक्षण केंद्र में लगाया गया था, जिस पर अब फल आ गए हैं। अब उत्तर प्रदेश में भी काजू की खेती की उम्मीद बढ़ गयी है।
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काजू का पेड़ एक उष्णकटिबंधीय सदाबहार वृक्ष है । काजू बहुत तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है इसमे पौधारोपन के तीन साल बाद फूल आने लगते हैं और उसके दो महीने के भीतर पककर तैयार हो जाता है । सामान्य तौर पर काजू का पेड़ 13 से 14 मीटर तक बढ़ता है. हालांकि काजू की बौना कल्टीवर प्रजाति जो 6 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है । जल्दी तैयार होने और ज्यादा उपज देने की वजह से बहुत फायदेमंद व्यावसायिक उत्पादकों के लिए साबित हो सकती है ।

काजू खेती के लिए उन्नत किस्में-

काजू की कई उन्नत और हाइब्रिड या वर्णसंकर किस्मे उपलब्ध हैं । अपने क्षेत्र के स्थानीय कृषि, बागबानी या वन विभाग से काजू की उपयुक्त किस्मों का चुनाव करें । विभिन्न राज्यों के लिए काजू की उन्नत किस्मों की संस्तुति राष्ट्रीय काजू अनुसंधान केंद्र (पुत्तूर) द्वारा की गई है। इसके अनुसार वैसे तो झारखंड राज्य के लिए किस्मों की संस्तुति नहीं है परन्तु जो किस्में उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बंगाल एवं कर्नाटक के लिए उपयुक्त है उनकी खेती झारखंड राज्य में भी की जा सकती है। क्षेत्र के लिए काजू की प्रमुख किस्में वेगुरला-4, उल्लाल-2, उल्लाल-4, बी.पी.पी.-1, बी.पी.पी.-2, टी.-40 आदि है।
Kaju वेनगुर्ला- 1
एम वेनगुर्ला- 2
वेनगुर्ला-3
वेनगुर्ला-4
वेनगुर्ला-5
वृर्धाचलम-1
वृर्धाचलम-2
चिंतामणि-1
एनआरसीसी-1
एनआरसीसी-2
उलाल-1
उलाल-2
उलाल-3
उलाल-4
यूएन-50
वृद्धाचलम-3
वीआआई(सीडब्लू)एचवन
बीपीपी-1
अक्षय(एच-7-6)
अमृता(एच-1597)
अन्घा(एच-8-1)
अनाक्कयाम-1 (बीएलए-139)
धना(एच 1608)
धाराश्री(एच-3-17)
बीपीपी-2
बीपीपी-3
बीपीपीपी-4
बीपीपीपी-5
बीपीपीपी-6
बीपीपीपी-8(एच2/16)

खेती के लिए आवश्यक जलवायु- Suitable Climate and temperature for Cashew farming

काजू मुख्यत: उष्णकटिबंधीय फसल है और उच्च तापमान में भी अच्छी तरह बढ़ता है । इसका नया या छोटा पौधा तेज ठंड या पाला के सामने बेहद संवेदनशील होता है. समुद्र तल से 750 मीटर की ऊंचाई तक काजू की खेती जा सकती है । काजू की खेती के लिए आदर्श तापमान 20 से 35 डिग्री के बीच होता है । इसकी वृद्धि के लिए सालाना 1000 से 2000 मिमी की बारिश आदर्श मानी जाती है । अच्छी पैदावार के लिए काजू को तीन से चार महीने तक पूरी तरह शुष्क मौसम चाहिए । फूल आने और फल के विकसित होने के दौरान अगर तापमान 36 डिग्री सेंटीग्रेड के उपर रहा तो इससे पैदावार प्रभावित होती है । काजू की खेती के सर्वोत्तम परिणामों के लिए इसे कम से कम 4 महीनों के लिए एक अच्छा शुष्क मौसम की स्थिति की आवश्यकता पडती है, जबकि अनिश्चित जलवायु के साथ भारी वर्षा इसके लिए अनुकूल नहीं है । 36 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान विशेष रूप से फूल और फलने की अवधि के दौरान फलों के मानक को बनाए रखने के लिए प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है ।
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Suitable soil selection for Cashew farming – काजू की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

काजू की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है क्योंकि यह अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में खुद को समायोजित कर लेती है और वो भी बिना पैदावार को प्रभावित किये. हालांकि काजू की खेती के लिए लाल बलुई दोमट (चिकनी बलुई मिट्टी) मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है । मैदानी इलाके के साथ-साथ600 से 750 मीटर ऊंचाई वाले ढलवां पहाड़ी इलाके भी इसकी खेती के लिए अनुकूल है.काजू की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थ से भरपूर गहरी और अच्छी सूखी हुई मिट्टी चाहिए ।व्यावसायिक उत्पादकों को काजू की खेती के लिए उर्वरता का पता लगाने के लिए मिट्टी की जांच करानी चाहिए. मिट्टी में किसी पोषक अथवा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर की जानी चाहिए । 5.0 से 6.5 तक के पीएच वाली बलुई मिट्टी काजू की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है । इसके अलावा, काजू की खेती के लिए रेतीली लाल मिट्टी, तटीय रेतीली मिट्टी और लेटराइट मिट्टी भी अच्छी होती है । काजू की खेती के लिए खेत में बाढ़ या पानी के ठहराव को लेकर खेती करने वाले किसानों को सावधान रहना चाहिए. क्योंकि, इससे पौधों की वृद्धि को नुकसान पहुंचता है ।

Soil preparation for modern casheww farming – काजू की खेती के लिए खेत की तैयारी कैसे करें

काजू की खेती के लिए सर्वप्रथम खेत की झाड़ियों तथा घासों को साफ़ करके खेत की 2-3 बार जुताई कर दें। झाड़ियों की जड़ों को निकाल कर खेत को बराबर कर दें। जिससे नये पौधों को प्रारम्भिक अवस्था में पनपने में कोई कठिनाई न हो। काजू के पौधों को 7-8 मी. की दूरी पर वर्गाकार विधि में लगाते हैं। अत: खेत की तैयारी के बाद अप्रैल-मई के महीने में निश्चित दूरी पर 60x 60 x 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार कर लेते हैं। अगर जमीन में कड़ी परत है तो गड्ढे के आकार को आवश्यकताअनुसार बढ़ाया जा सकता है। गड्ढों की 15-20 दिन तक खुला छोड़ने के बाद 5 कि.ग्रा. गोबर की खाद या कम्पोस्ट, 2 कि.ग्रा. रॉक फ़ॉस्फेट या डीएपी के मिश्रण को गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में मिलाकर भर देते हैं। गड्ढों के आसपास ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि वहाँ पानी न रुके। अधिक सघनता से बाग़ लगाने के पौधों की दूरी 5x 5 या 4 x 4 मी. रखते हैं। शेष प्रक्रियाएं सामान्य ही रहती है।

पौधारोपन-

जमीन की अच्छी तरह जुताई कर उसे बराबर कर देना चाहिए और समान ऊंचाई में क्यारियां खोदनी चाहिए। मृत पेड़, घास-फूस और सूखी टहनियों को हटा दें । सामान्य पौधारोपन पद्धति में प्रति हेक्टेयर 200 पौधे और सघन घनत्व में प्रति हेक्टेयर 500 पौधे (5मीटर गुना 4 मीटर की दूरी) लगाए जाने चाहिए । एक ही क्षेत्र में उच्च घनत्व पौधारोपन में ज्यादा पौधे की वजह से ज्यादा पैदावार होती है ।

पौध प्रसारण –

काजू के पौधों को साफ्ट वुड ग्राफ्टिंग विधि से तैयार किया जा सकता है। भेंट कलम द्वारा भी पौधों को तैयार कर सकते हैं। पौधा तैयार करने का उपयुक्त समय मई-जुलाई का महीना होता है।

काजू के पौधों के बीच दूरी कितनी होनी चाहिए –

सबसे पहले 45 सेमी गुना 45 सेमी गुना 45 सेमी की ऊंचाई, लंबाई और गहराई वाले गड्ढे खोदें और इन गड्ढों को 8 से 10 किलो के अपघटित (अच्छी तरह से घुला हुआ) फार्म यार्ड खाद और एक किलो नीम केक से मिली मिट्टी के मिश्रण से भर दें. यहां 7 से 8 मीटर की दूरी भी अपनाई जाती है.

How to irrigate in Cashew farming – काजू की खेती में सिंचाई कैसे करें

आमतौर पर काजू की फसल वर्षा आधारित मजबूत फसल है. हालांकि, किसी भी फसल में वक्त पर सिंचाई से अच्छा उत्पादन होता है. पौधारोपन के शुरुआती एक दो साल में मिट्टी में अच्छी तरह से जड़ जमाने तक सिंचाई की जरूरत पड़ती है. फल के गिरने को रोकने के लिए सिंचाई का अगला चरण पल्लवन और फल लगने के दौरान चलाया जाता है ।
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काजू की खेती में अंतर फसल उगाना – intercropping in cashew cultivation

काजू की खेती में अंतर फसल के द्वारा किसान अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं. अंतर फसल मिट्टी की ऊर्वरता को भी बढ़ाता है. ऐसा शुरुआती सालों में ही संभव है जब तक कि काजू के पौधे का छत्र कोने तक न पहुंच जाए और पूरी तरह छा न जाए. बरसात के मौसम में अंदर की जगह की अच्छी तरह जुताई कर देनी चाहिए और मूंगफली, दाल या फलियां या जौ-बाजरा या सामान्य रक्ताम्र (कोकुम) जैसी अंतर फसलों को लगाना चाहिए.

Cashew plants pruning – प्रशिक्षण और कटाई-छंटाई-

काजू के पेड़ को अच्छी तरह से लगाने या स्थापित करने के लिए लिए ट्रेनिंग के साथ-साथ पेड़ की कटाई-छंटाई की जरूरत होती है. पेड़ के तने को एक मीटर तक विकसित करने के लिए नीचे वाली शाखाओं या टहनियों को हटा दें । जरूरत के हिसाब से सूखी और मृत टहनियों और शाखाओं को हटा देना चाहिए ।

काजू की खेती में उगने वाले जंगली घास-फूस पर निंयत्रण का तरीका- weed control in cashew cultivation

काजू के पौधे की अच्छी बढ़त और अच्छी फसल के लिए घास-फूस पर नियंत्रण करना बागबानी प्रबंधन के कार्य का ही एक हिस्सा है. ऊर्वरक और खाद की पहली मात्रा डालने से पहले घास-फूस को निकालने की पहली प्रक्रिया जरूर पूरी कर लें. घास-फूस निकालने की दूसरी प्रक्रिया मॉनसून के मौसम के बाद की जानी चाहिए । दूसरे तृणनाशक तरीकों में मल्चिंग यानी पलवार घास-फूस पर नियंत्रण करने का अगला तरीका है ।

Cashew farming | काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी
Cashew farming | काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

Prodution/Yield – काजू की खेती से प्राप्त उपज

फसल की पैदावार कई तत्वों, जैसे कि बीज के प्रकार, पेड़ की उम्र, बागबानी प्रबंध के तौर-तरीके, पौधारोपन के तरीके, मिट्टी के प्रकार और जलवायु की स्थिति पर निर्भर करता है । हालांकि कोई भी एक पेड़ से औसतन 8 से 10 किलो काजू के पैदावार की उम्मीद कर सकता है.हाइब्रिड या संकर और उच्च घनत्व वाले पौधारोपन की स्थिति में और भी ज्यादा पैदावार की संभावना होती है.एक पौधे से 10 किल्लो की फसल होती है तो 1000-1200 रु किल्लो के हिसाब से एक पौधे से एक बार में 12000 रुपये की फसल होगी

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