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Saturday, December 5, 2020
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धान की की उन्नत खेती कैसे करें

धान से हमारे देश का मुख्य भोजन है । धान की गणना गेंहू , मक्का , चना, आदि मुख्य खाद्यान्न में की जाती है । धान से तैयार चावल, कई वैरायटी – बासमती, व सुगंधित चावल बहुत पसंद किया जाता है । चावल से बने चिप्स, पापड़, मुरमुरे, कचरी , आदि तमाम प्रकार के व्यंजन भी बनाए जाते हैं ।

dhan ki kheti india me sabse adhik hoti hai. chawal india me sabse adhik khaya jane wala food grains hai. dhan ka botanical name Oryza sativa hai. dhan me number of chromosomes 24 hai. yah Poceae family ka plant hai. dhan ka origin place Vevilov mana jata hai.

धान की की उन्नत खेती कैसे करें dhan ki kheti in hindi
धान की की उन्नत खेती कैसे करें dhan ki kheti in hindi

हमारे देश के अलावा paddy crop विश्व में चाइना,इंडोनेशिया, थाईलैंड,अफगानिस्तान, म्यामार,जापान व ब्राजील आदि राष्ट्रों में किम जाती है | हमारे देश में धान की खेती पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार,उड़ीसा,आन्ध्रप्रदेश,और मध्य प्रदेश में की जाती है |

Nutritional value
पोषक मूल्य –

चावल में प्रोटीन 7.7,कार्बोहाइड्रेट 72.5,वसा-5.9,सेलूलोज 11.8 प्रतिशत पाया जाता है |

Climate and temperature –

जलवायु व तापमान –

धान का पौधा एक गर्म व नम जलवायु का पौधा है | dhan ki kheti में paddy plant वृद्धि व विकास के लिए 21 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है | इसकी फसल 50 से 500 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जाती है |

Soil selection

भूमि का चयन –

उचित जल निकासी वाली दोमट मिटटी उपयुक्त होती है | भारी व नदी झील के किनारे की मिटटी में dhan ki kheti से किसान भाई पैदावार प्राप्त कर रहे हैं |

Land Preparation

भूमि की तैयारी –

dhan ki kheti हेतु गर्मी में खेत की जुताई करने के बाद 2-3 जुताइयां करनी चाहिए। खेत की मजबूत मेड़बन्दी भी कर देनी चाहिए । जिससे खेत में वर्षा का पानी अधिक समय तक संचित किया जा सके। अगर हरी खाद के रूप में ढैंचा/सनई ली जा रही हैतो इसकी बुवाई के साथ ही फास्फोरस का प्रयोग भी कर लिया जाय। kheti kisani के अनुसार धान की बुवाई/रोपाई के लिए एक सप्ताह पूर्व खेत की सिंचाई कर दें । जिससे कि खरपतवार उग आवे,इसके पश्चात् बुवाई/रोपाई के समय खेत में पानी भरकर जुताई कर दें।

Advanced varieties for paddy cultivation-

धान की खेती हेतु उन्नत किस्में –

प्रदेश में dhan kheti के लिए असिंचित व सिंचित दशाओं में सीधी बुवाई एवं रोपाई द्वारा की जाती है। धान की क़िस्में तालिकावार दी जा रही है –

सीधी बुवाई की क़िस्में-
असींचित दशा में- गोविन्द‚नरेन्द्र-118 नरेन्द्र-97 नरेन्द्र-97 गोविन्द‚ शुष्क सम्राट,वारानी दीप,नरेन्द्र लालमती,नरेन्द्र लालमती
सिंचित दशा में रोपाई वाली क़िस्में – गोविन्द‚नरेन्द्र-80,मालवीय धान-2 (एच०यू०आर०-3022) गोविन्द‚ नरेन्द्र-80,शुष्क सम्राट
माध्यम अवधि में पकने वाली क़िस्में-120-140 दिन में- पन्त धान-4, क्रान्ति,सरजू-52, पन्त धान-10,पन्त धान-4,सीता,नरेन्द्र-359,पूसा-44,नरेन्द्र धान-2064
देर से पकने वाली क़िस्में- (140 से अधिक दिन में पकने वाली)- एनडीआर-8002,नरेन्द्र धान-2026,नरेन्द्र धान-2065,

सुगन्धित धान की क़िस्में –

टा-3,बासमती-370, पूसा-44,टा-23,महसूरी,एनडीआर-8002,पूसा बासमती-1,सांभा मंसूरी,टा-23,हरियाणा-बासमती-1, एम०टी०यू०-1001,तारावडी बासमती, स्वर्णा, नरेन्द्र मयंक,पूसा सुगन्ध-4 एवं 5 बल्लभ बासमती 22, मालवीय सुगंध 105, मालवीय सुगंध 4-3, मालवीय बासमती 10-9 मालवीय सुगन्ध-1,बल्लभ बासमती 22,नरेन्द्र नारायणी,नरेन्द्र, बासमती-370,मयंक,एच०यू०बी०आर० 2-1,नरेन्द्र जलपुष्प

निचले व जल भराव वाली क़िस्में-
महसूरी,जल लहरी, एन०डी०आर०-8002,सोना
30 सेमीo  में – महसूरी,जल लहरी, एन०डी०आर० 8002,नरेन्द्र नारायणी,नरेन्द्र जलपुष्प, नरेन्द्र मयंक,
30-50 से०मी० में – स्वर्णा सब-1,स्वर्णा सब-1
50-100 से०मी० में – चकिया-59,जलप्रिया
एक मीटर से अधिक के लिए (गहरा पानी) – जल निधि,जल मग्न
बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों के लिए- मधुकर,बाढ़ अवरोधी,स्वर्णा सब-1

Balanced quantities of fertilizers and fertilizers and method of use

खाद एवं उर्वरकों की संतुलित मात्रा एवं प्रयोग की विधि –

उर्वरकोंका प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना उपयुक्त है। यदि किसी कारणवशमृदा का परीक्षण न हुआ तो उर्वरकों का प्रयोग निम्न प्रकार किया जायः

Amount of fertilizers

उर्वरकों की मात्रा

धान की खेती से अच्छी पैदावार लेने के लिए जैविक खादों का प्रयोग करना चाहिए । रासायनिक उर्वरकों का कम से कम प्रयोग करना चाहिए । bio farming से उगाए गये अनाज का बाज़ार में अच्छा मूल्य मिलता है । कृषि वैज्ञानिक धान की खेती में  रासायनिक खादों के उपयोग की संतति इस प्रकार करते हैं –

माध्यम समय में पकने वाली क़िस्मों में – नाइट्रोजन – 150 kg, फ़ोस्फोरस – 60 kg, पोटाश – 60kg,

सुगंधित धान वाली क़िस्मों में – नाइट्रोजन – 120 kg, फ़ोस्फोरस – 60 kg, पोटाश – 60kg,

नत्रजन की एक चौथाई भाग तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूर्ण मात्रा कूंड में बीज के नीचे डालें, शेष नत्रजन का दो चौथाई भाग कल्ले फूटते समयतथा शेष एक चौथाई भाग बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था पर प्रयोग करें।

Amount of fertilizer and fertilizer for indigenous species –

dhan ki kheti में देशी प्रजातियों हेतु खाद व उर्वरक की मात्रा –

शीघ्र पकने वाली, माध्यम समय में पकने वाली व सुगंधित धान वाली क़िस्मों हेतु – नाइट्रोजन – 60 kg, फ़ोस्फोरस – 30 kg, पोटाश – 30kg

Method of use of chemical fertilizers in paddy cultivation –

धान की खेती में रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग विधि –

रोपाई के सप्ताह बाद एक तिहाई नत्रजन तथा फास्फोरस एवं पोटाश कीपूरी मात्रा रोपाई के पूर्व तथा नत्रजन की शेष मात्रा को बराबर-बराबर दोबार में कल्ले फूटते समय तथा बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था पर प्रयोगकरें। दाना बनने के बाद उर्वरक का प्रयोग न करें ।फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पूर्व तथा नत्रजन की एकतिहाई मात्रा रोपाई के 7 दिनों के बाद, एक तिहाई मात्रा कल्ले फूटते समयतथा एक तिहाई मात्रा बाली बनने की अवस्था पर टापड्रेसिंग द्वारा प्रयोग करें।
सम्पूर्ण उर्वरक बुवाई के समय बीज के नीचे कूंडों में प्रयोग करें।
– गेहूँ वाले क्षेत्रों में गेहूँ धान की फसल के बीच हरी खाद का प्रयोग करें अथवा धान की फसल में 10-12 टन/हे० गोबर की खाद का प्रयोग करें।
– जायद में मूँग की खेती करने से धान की फसल में 15 किग्रा० नत्रजन की बचत होता है। इसी प्रकार हरी खाद (सनई अथवा ढैंचा) सेलगभग 40-60 किग्रा० नत्रजन की बचत होती है। अतः इस दिशा में नत्रजन आवश्यकता के अनुसार प्रयोग करें। यदि कम्पोस्ट 10-12 टन का प्रयोग किया जाये तो उसमेंभी तत्व प्राप्त होते हैं तथा मृदा का भौतिक सुधार होता है।

– ऊसरीली क्षेत्र में हरी खाद के लिए ढैंचे की बुवाई करना विशेष रूप से लाभ प्रदहोता है। 2 कुन्तल प्रति हेक्टर जिप्सम का प्रयोग बेसल के रूप में किया जासकता है। इससे धान की फसल को गन्धक की आवश्यकता पूरी हो जायेगी। सिंगल सुपरफास्फेट के प्रयोग से भी गन्धक की कमी दूर की जा सकती है। पोटाश का प्रयोगबेसल ड्रेसिंग में किया जाय किन्तु हल्की दोमट भूमि में पोटाश उर्वरक कोयूरिया के साथ टापड्रेसिंग में प्रयोग किया जाना उचित रहता है।

– अतः ऐसी भूमि में रोपाई के समय पोटाश की आधी मात्रा का प्रयोग करना चाहिए औरशेष आधी मात्रा को दो बार में नत्रजन के साथ टाप-ड्रेसिंग करना चाहिए। जिनस्थानों में धान के खेतों में पानी रूकता हो और उसके निकास की सुविधा न होरोपाई के समय ही सारा उर्वरक देना उचित होगा। यदि किसी कारण वश यह सम्भव नहो तो ऐसे क्षेत्रों में यूरिया के 2-3 प्रतिशत घोल का छिड़काव दो बारकल्ला निकलते समय तथा बाली निकलने की प्रारम्भिक अवस्था पर करना लाभदायक होगा। यूरिया की टाप-ड्रेसिंग के पूर्व खेत से पानी निकाल देना चाहिए औरयदि किसी क्षेत्र में ये सम्भव न हो तो यूरिया को उसकी दुगुनी मिट्टी मेंएक चौथाई गोबर की खाद मिलाकर 24 घन्टे तक रख देना चाहिए। ऐसा करने सेयूरिया अमोनियम कार्बोनेट के रूप में बदल जाती है और रिसाव द्वारा नष्ट नहीं होता है।

Irrigation and water management in paddy crop

धान की फसल में सिंचाई व जल प्रबन्धन-

प्रदेश में सिंचन क्षमता के उपलब्ध होते हुए भी धान का लगभग 60-62 प्रतिशत क्षेत्र ही सिचिंत है, जबकि धान की फसल को खाद्यान फसलों में सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है। फसल को कुछ विशेष अवस्थाओं में रोपाई के बाद एक सप्ताह तक कल्लेफूटने, बाली निकलने फूल, खिलने तथा दाना भरते समय खेत में पानी बना रहनाचाहिए। फूल खिलने की अवस्था पानी के लिए अति संवेदनशील हैं। परीक्षणों केआधार पर यह पाया गया है कि धान की अधिक उपज लेने के लिए लगातार पानी भरारहना आवश्यक नहीं है इसके लिए खेत की सतह से पानी अदृश्य होने के एक दिनबाद 5-7 सेमी० सिंचाई करना उपयुक्त होता है। यदि वर्षा के अभाव के कारणपानी की कमी दिखाई दे तो सिंचाई अवश्य करें। खेत में पानी रहने सेफास्फोरस, लोहा तथा मैंगनीज तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है और खरपतवार भीकम उगते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि कल्ले निकलते समय 5 सेमी० सेअधिक पानी अधिक समय तक धान के खेत में भरा रहना भी हानिकारक होता है। अतःजिन क्षेत्रों में पानी भरा रहता हो वहॉ जल निकासी का प्रबन्ध करना बहुतआवश्यक है, अन्यथा उत्पादन पर कुप्रभाव पडेगा। सिंचित दशा में खेत में निरन्तर पानी भरा रहने की दशा में खेत से पानी अदृश्य होने की स्थिति में एक दिन बाद 5 से 7 सेमी० तक पानी भर दिया जाय इससे सिंचाई के जल में भी बचत होगी।

How to Seed treatment for paddy nursery-

धान की नर्सरी हेतु बीज उपचारित करना-

नर्सरी डालने से पूर्व बीज शोधन अवश्य कर लें। इसके लिए जहां पर जीवाणु झुलसा या जीवाणु धारी रोग की समस्या हो वहां पर 25 किग्रा० बीज के लिए 4 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसीन सल्फेटया 40 ग्राम प्लान्टोमाइसीन को मिलाकर पानी में रात भर भिगो दें। दूसरे दिनछाया में सुखाकर नर्सरी डालें। यदि शाकाणु झुलसा की समस्या क्षेत्रों मेंनहीं है तो 25 किग्रा० बीज को रातभर पानी में भिगोने के बाद दूसरे दिननिकाल कर अतिरिक्त पानी निकल जाने के बाद 75 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बेन्डाजिम को 8-10 लीटर पानी में घोलकर बीज में मिला दिया जाये इसके बाद छाया में अंकुरित करके नर्सरी में डाली जाये। बीज शोधन हेतु 5 ग्रामप्रति किग्रा० बीज ट्राइकोडरमा का प्रयोग किया जाये।

Paddy nursery preparation –

धान की नर्सरी तैयार करना –

एकहेक्टर क्षेत्रफल की रोपाई के लिए 800-1000 वर्ग मी० क्षेत्रफल में महीन धान का 30 किग्रा० मध्यम धान का 35 किग्रा० और मोटे धान का 40 किग्रा० बीज पौध तैयार करने हेतु पर्याप्त होता है। ऊसर भूमि में यह मात्रा सवा गुनी कर दी जाय। एक हेक्टर नर्सरी से लगभग 15 हेक्टर क्षेत्रफल की रोपाई होती है।समय से नर्सरी में बीज डालें और नर्सरी में 100 किग्रा० नत्रजन तथा 50 किग्रा० फास्फोरस प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें। ट्राइकोडर्मा का एक छिड़काव नर्सरी लगने के 10 दिन के अन्दर कर देना चाहिए। बुवाई के 10-14 दिनबाद एक सुरक्षात्मक छिड़काव रोगों तथा कीटों के बचाव हेतु करें खैरा रोगके लिए एक सुरक्षात्मक छिड़काव 5 किग्रा० जिंक सल्फेट का 20 किलो यूरिया या 2.5 किग्रा० बुझे हुए चूने के साथ 1000 लीटर पानी के साथ प्रति हेक्टर कीदर से पहला छिड़काव बुवाई के 10 दिन बाद एवं दूसरा 20 दिन बाद करना चाहिए।सफेदा रोग के नियंत्रण हेतु 4 किलो फेरस सल्फेट का 20 किलो यूरिया के घोलके साथ मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। झोंका रोग की रोकथाम के लिए 500 ग्रामकार्बेन्डाजिम  50 प्रतिशत डब्लू०पी० का प्रति हे० छिड़काव करें तथा भूरेधब्बे के रोग से बचने के लिए 2 किलोग्राम मैंकोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यू०पी०का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें नर्सरी में लगने वाले कीटों सेबचाव हेतु 1.25 लीटर क्लोरोपाइरोफास 20 ई०सी० प्रति हेक्टेयर का छिड़कावकरें। नर्सरी में पानी का तापक्रम बढ़ने पर उसे निकाल कर पुनः पानी देना सुनिश्चित करें।

Sowing of paddy directly by seed

धान की सीधी बुवाई बीज द्वारा करना

मैदानी क्षेत्रों में सीधी बुवाई की दशा में 90 से 110 दिन में पकने वाली प्रजातियों को चुनना चाहिए। बुवाई मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक समाप्त कर देना चाहिए। 40 से 50 किग्रा० बीज प्रति हेक्टर की दर से 20 सेमी० की दूरी परलाइनों में बोना चाहिए।पंक्तियों में बुवाई करने से यांत्रिक विधि से खरपतवार नियंत्रण में सुविधा होती है । तथा पौध सुरक्षा उपचार भीसुगमतापूर्वक किये जा सकते हैं। इस विधि से बुवाई करने पर पौधों की संख्याभी सुनिश्चित की जा सकती है।

Paddy Nursery Preparation by Lev method

dhan ki kheti के लिए लेव विधि द्वारा नर्सरी तैयार करना –

यदि लेव लगाकर धान की बुवाई करनी हो तो 100 से 110 किग्रा० बीज प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें। बीजको 24 घण्टे पानी में भिगोकर 36-48 घण्टे तक ढेर बनाकर रखना चाहिए जिससे बीज में अंकुरण प्रारम्भ हो जाय। इस अंकुरित बीज को खेत में लेव लगाकर दोसेमी० खड़े पानी में छिड़कवां बोया जाना चाहिए। आगरा मण्डल में, जहां कुओं का पानी खारा है और धान की पौध अच्छी प्रकार तैयार नहीं हो सकती । इस विधि को अपनाना ज्यादा अच्छा है।

Preparation of paddy plants by mat type nursery

मैट टाइप नर्सरी द्वारा धान की पौध तैयार करना-

dhan ki kheti में धान की नर्सरी उगाने के लिए 5-6 सेमी० गहराई तक की खेत की ऊपरी सतह की मिट्टी एकत्र कर लेते हैं। इसे बारीक कूटकर छलने से छान लेते हैं। जिस क्षेत्र में नर्सरीडालनी है। उसमें अच्छी प्रकार पडलिंग करके पाटा कर दें। तत्पश्चात् खेत कापानी निकाल दें और एक या दो दिन तक ऐसे ही रहने दें जिससे सतह पर पतली पर्तें बन जायें। अब इस क्षेत्र पर एक मीटर चौड़ाई में आवश्यकतानुसार लम्बाई तक लकड़ी की पटि्टयॉ लगाकर मिट्टी की दो से तीन सेमी० ऊँची मेड़ बनायें और इस क्षेत्र में नर्सरी हेतु तैयार की गयी छनी हुई मिट्टी के एक सेमी० ऊँचाई तक बिछाकर समतल कर दें तथा इसके ऊपर अंकुरित बीज 800 से 1000 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से छिड़क दें। अब इसके ऊपर थोड़ी छनी हुई मिट्टी इस प्रकार डालें कि बीज ढ़क जाये। तत्पश्चात् नर्सरी को पुआल घास से ढ़क दें। 4-5 दिन तक पानी का छिड़काव करते रहें नर्सरी में किसी प्रकार के उर्वरक का प्रयोग न करें।

Transplanting of paddy seedlings by mat type nursery

मैट टाइप नर्सरी द्वारा धान की पौध तैयार की रोपाई करना –

15 दिन की पौध रोपाई करने हेतु स्क्रेपर की सहायता से (20-50 सेमी० के टुकड़ों में)पौध इस प्रकार निकाली जाए ताकि छनी हुई मिट्टी की मोटाई तक का हिस्सा उठकर आये। इन टुकड़ों को पैडी ट्रान्सप्लान्टर की ट्रे में रख दें। मशीन में लगेहत्थे को जमीन की ओर हल्के झटके के साथ दबायें। ऐसा करने से ट्रे में रखीपौध की स्लाइस 6 पिकर काटकर 6 स्थानों पर खेत में लगा दें। फिर हत्थे कोअपनी ओर खींच कर पीछे की ओर कदम बढ़ाकर मशीन को उतना खींचे जितना पौध से पौध की (सामान्यतः 10 सेमी०) रखना चाहते हैं। पुनः हत्थे को जमीन की आरेहल्के झटके से दबायें। इस प्रकार की पुनरावृत्ति करते जायें। इससे पौध की रोपाई का कार्य पूर्ण होता जायेगा।

Planting time for paddy cultivation –

धान की खेती हेतु पौध रोपाई का समय –

130-140 दिन में पकने वाली धान की प्रजातियों जैसे पन्त 12, पन्त धान-4 और सरजू-52 आदि की रोपाई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के मध्य तक अवश्य कर लेनीचाहिए, अन्यथा उसके बाद उपज में निरन्तर कमी होने लगती है। यह कमी 30-40 किग्रा० प्रतिदिन प्रति हेक्टर होती है। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों जैसेसाकेत-4,प्रसाद, गोविन्द, मनहर पंत-10, आई०आर-36 आदि की रोपाई जून केतीसरे सप्ताह से जुलाई के अन्तिम सप्ताह तक की जा सकती है। देर से पकनेवाली प्रजातियां जैसे क्रांस-116, टा-100,टा-22, तथा सुगन्धित धान जैसेटा-3, एन-12 आदि की रोपाई जुलाई के अन्तिम सप्ताह तक की जानी चाहिए। अधिक उपज देने वाली सुगन्धित किस्में जैसे पूसा बासमती-1 की रोपाई 15 जुलाई तककर देनी चाहिए। क्वारी और कार्तिकी धान की बौनी प्रजातियों को 21-25 दिन की पौध की रोपाई के लिए उपयुक्त होती है। देशी तथा देर से पकने वालीप्रजातियों को 30-35 दिन की पौध रोपाई के लिए उपयुक्त होती है। ऊसर में रोपाई हेतु 35 दिन की पौध का प्रयोग करें तथा एक स्थान पर 2 से 3 पौधेलगायें तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 15 सेमी० रखी जाय। शीघ्र मध्यम एवंविलम्ब से पकने वाली प्रजातियों की नर्सरी की रोपाई विषम परिस्थितियों में क्रमशः 30-35, 40-45 एवं 50-55 दिनों में की जा सकती है। स्वर्णा, सोनामहसूरी व महसूरी की मई के अन्त से 15 जून तक रोपाई कर देनी चाहिए। विलम्बसे रोपाई करने से फूल आने में कठिनाई होती है।

Spacing and transplanting of paddy farming

धान का अंतरण व धान की रोपाई

dhan ki kheti में बौनी प्रजातियों की पौध की रोपाई 3-4 सेमी० से अधिक गहराई पर नहीं करना चाहिए।अन्यथा कल्ले कम निकलते है और उपज कम हो जाती है। साधारण उर्वरा भूमि मेंपंक्तियों व पौधों की दूरी 20×10 सेमी० उर्वरा भूमि में 20×15 सेमी० रखें।एक स्थान पर 2-3 पौध लगाने चाहिए। यदि रोपाई में देर हो जाय तो एक स्थान पर 3-4 पौध लगाना उचित होगा। साथ ही पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 5 सेमी०कम कर देनी चाहिए। इस बात पर विशेष ध्यान दें कि प्रति वर्ग मीटर क्षेत्रफल में सामान्य स्थिति में 50 हिल अवश्य होना चाहिए ऊसर तथा देर से रोपाई कीस्थिति में 65-70 हिल होनी चाहिए।

Transplanting of Paddy by Paddy Transplanter –

पैडी ट्रान्सप्लान्टर द्वारा धान की रोपाई करना –

पैडीट्रान्स प्लान्टर छः लाइन वाली हस्तचलित तथा शक्ति चलित आठ लाइन वाली बटनकी रोपाई की मशीन है। इस यन्त्र से रोपाई हेतु मैट टाइप नर्सरी की आवश्यकताहोती है। इस नर्सरी में धान का अंकुरित बीज उपयोग किया जाता है। इस मशीनद्वारा कतार से कतार की दूरी 20 सेमी० निश्चित है अतः 20-10 सेमी० की दूरीपर रोपाई हेतु 50 किग्रा० प्रति हेक्टर बीज की आवश्यकता होती है। अच्छाअनुकरण 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापक्रम पर प्राप्त होता है। धान को पानी में 24 घण्टे भिगोने के पश्चात् छाया में या बोरे में दो या तीन दिन अथवा ठीकसे अंकुरण होने तक ढक कर रखना चाहिए। बोरे पर अंकुर निकलने के समय तक पानीछिड़कते रहें। अंकुर फूटने पर बीज नर्सरी में बोने के लिए तैयार समझना चाहिए।

Gap filling in paddy farming –

धान की फसल में गैप फिलिंग करना –

रोपाई के बाद जो पौधे मर जायें उनके स्थान पर दूसरे पौधों को तुरन्त लगा दें, ताकि प्रति इकाई पौधों की संख्या कम न होने पाये। अच्छी उपज के लिए प्रति वर्ग मीटर 250 से 300 बालियाँ अवश्य होनी चाहिए।

Crop Safety Management in Paddy –

फसल सुरक्षा प्रबन्धन –

धान की खेती में लगने वाले कीट व उनकी रोकथाम जानने के लिए क्लिक करें – Click to know pests and their prevention in paddy cultivation
धान की खेती की लगने वाले रोग व उनकी रोकथाम जानने के लिए क्लिक करें – Click to know the diseases and prevention of paddy cultivation

Paddy harvesting –

धान की कटाई –

धान के पौधें में बालियाँ निकलने के करीब 30-40 दिन बाद बालियाँ पूरी तरह पक जाती हैं | धान के दानों को मुंह में रखकर काटने से कट की आवाज आती है तो समझ लेना चाहिए कि धान की फसल कटाई योग्य हो गयी है | धान के दानों में जब 20 प्रतिशत नमी रह जाए तब धान की कटाई करनी चाहिए | धान की छोटे क्षेत्रों में हसिया,दराती से तथा बड़े उत्पादक क्षेत्रों में कम्बाइन मशीन से कटाई करानी लेनी चाहिए |धान की फसल सूख जाने पर परम्परागत अथवा किसी भी शक्तिचालित गहाई यंत्र से धान की गहाई करना चाहिए | कम्बाइन मशीन से फसल की कटाई करने पर कटाई के समय ही गहाई साथ में हो जाती है किन्तु इससे जानवरों के लिए पुवाल नही मिल पाता |

Yields from Paddy Cultivation –
धान की खेती से पैदावार –

– नवीन बौनी किस्मों से प्राप्त उपज- 40-60 कुंतल प्रति हेक्टेयर
– देशी किस्मों से प्राप्त उपज – 25-35 कुंतल प्रति हेक्टेयर

The Top Secret to get high yield in paddy cultivation –

धान की खेती में अधिक पैदावार पाने के मूल मंत्र –

KhetiKisaniOrg के विशेषज्ञ धान की खेती में अधिक उपज व कवलिटी अनाज कैसे उगाएँ । इस सम्बंध में उनके कुछ सुझाव हैं जिसको फ़ॉलो कर आप अधिक लाभ पा सकते हैं –
– स्थानीय परिस्थितियों जैसे क्षेत्रीय जलवायु,मिट्टी, सिंचाई साधन, जलभराव तथा बुवाई एवं रोपाई की अनुकूलता के अनुसार ही धान की संस्तुतप्रजातियों का चयन करें।
– शुद्ध प्रमाणित एवं शोधित बीज बोयें।
– मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरकों,हरी खाद एवं जैविक खाद का समय से एवं संस्तुत मात्रा में प्रयोग करें।
– उपलब्ध सिंचन क्षमता का पूरा उपयोग कर समय से बुवाई/रोपाई करायें।
– पौधों की संख्या प्रति इकाई क्षेत्र सुनिश्चित की जाय।
– कीट रोग एवं खरपतवार नियंत्रण किया जाये।कम उर्वरक दे पाने की स्थिति में भी उर्वरकों का अनुपात 2:1:1 ही रखा जाय।

आशा है kheti kisani में आपको dhan ki kheti से जुड़ी जानकारी पसंद आयी होगी । हमें कमेंट कर ज़रूर बताएँ । साथ ही गेंहू की खेती, सहित अनाजों की खेती कैसे करें ? ये जानने के लिए खेती किसानी डॉट ओर्ग पढ़ते रहें ।

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