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Tuesday, September 28, 2021
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पौधों में पोषक तत्वो के कार्य व कमी के लक्षण व निदान

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जिस तरह से हर जीवित प्राणी को जीवित रहने तथा स्वस्थ रहने के लिए पोषक तत्वों की जरूरत होती है । उसी तरह से पौधों को भी अपनी वृद्धि, प्रजनन, तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए कुछ पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इन पोषक तत्वों के न मिल पाने से पौधों की वृद्धि रूक जाती है यदि ये पोषक तत्व एक निश्चित समय तक न मिलें तो पौधा सूख जाता है।

फसलोत्पादन मे पोषक तत्वो के कार्य व कमी के लक्षण – Plant Nutrient Functions and Deficiency and Toxicity Symptoms

फसल की अधिकतम पैदावार के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व –

वैज्ञानिक परीक्षणो के आधार पर 17 तत्वों को पौधो के लिए जरूरी बताया गया है, जिनके बिना पौधे की वृद्धि-विकास तथा प्रजनन आदि क्रियाएं सम्भव नहीं हैं। इनमें से मुख्य तत्व कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश है। नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश को पौधे अधिक मात्रा में लेते हैं, इन्हें खाद-उर्वरक के रूप में देना जरूरी है। इसके अलावा कैल्सियम, मैग्नीशियम और सल्फर की आवश्यकता कम होती है अतः इन्हें गौण पोषक तत्व के रूप मे जाना जाता है इसके अलावा लोहा, तांबा, जस्ता, मैंग्नीज, बोरान, मालिब्डेनम, क्लोरीन व निकिल की पौधो को कम मात्रा में जरूरत होती है।

फसलोत्पादन मे पोषक तत्वो के कार्य व कमी के लक्षण - Plant Nutrient Functions and Deficiency and Toxicity Symptoms
फसलोत्पादन मे पोषक तत्वो के कार्य व कमी के लक्षण – Plant Nutrient Functions and Deficiency and Toxicity Symptoms

जीवन निर्वाह करने के लिए जीवित सभी प्राणियों को वृद्धि व विकास के लिए कुछ पोषक तत्वों की आवश्कता होती है । पौधों को अपनी वृद्धि, प्रजनन, तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए कुछ पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है । इन पोषक तत्वों के उपलब्ध न होने पर पौधों की वृद्धि रूक जाती है यदि ये पोषक तत्व एक निश्चित समय तक न मिलें तो पौधों की मृत्यु आवश्यम्भावी हो जाती है । खेती किसानी में फसल ख़राब होने से बड़ा नुक़सान उठाना पड़ता है। इस सबसे बचने के लिए समय पर पोषक तत्व खाद व उर्वरक के रूप में खेतों में डालना चाहिए।
इसे भी पढ़ें – पौधों में पोषक तत्वों की कमी के लक्षण ऐसे करें पहचान
पौधे भूमि से जल तथा खनिज-लवण शोषित करके वायु से कार्बन डाई-आक्साइड प्राप्त करके सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपने लिए भोजन का निर्माण करते हैं । फसलों के पौधों को प्राप्त होने वावली कार्बन-डाई-आक्साइड तथा सूर्य के प्रकाश पर किसान या अन्य किसी का नियन्त्रण सम्भव नहीं हैं लेकिन कृषक फसल को प्राप्त होने वाले जल तथा खनिज-लवणों को नियन्त्रित कर सकता है । वैज्ञानिक परीक्षणो के आधार पर 17 तत्वों को पौधो के लिए आवश्यक निरूपित किया गया है, जिनके बिना पौधे की वृद्धि-विकास तथा प्रजनन आदि क्रियाएं सम्भव नहीं हैं। इनमें से मुख्य तत्व कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन , नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश है। इनमें से प्रथम तीन तत्व पौधे वायुमंडल से ग्रहण कर लेते हैं। नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश को पौधे अधिक मात्रा में ग्रहण करते हैं अतः इन्हें खाद-उर्वरक के रूप में प्रदाय करना आवश्यक है। इसके अलावा कैल्सियम, मैग्नीशियम और सल्फर की आवश्यकता कम होती है अतः इन्हें गौण पोषक तत्व के रूप मे जाना जाता है इसके अलावा लोहा, तांबा, जस्ता, मैंग्नीज, बोरान, मालिब्डेनम, क्लोरीन व निकिल की पौधो को अल्प मात्रा में आवश्यकता होती है।

पोषक तत्वों की कमी की पहचान – Nutrition deficiency symptoms in plants

क्र.सं0 पोषक तत्व पोषक तत्व की कमी के लक्षण
1. नाइट्रोजन
N
इसकी कमी के लक्षण प्रारंभिक पत्तियों पर दिखना शुरू हो जाते हैं | पत्ती पीली पड़ने लगती हैं , उसकी लचक कम होने लगती हैं और वह कड़ी व छोटी रहती हैं | तनाव के कारण वह तने की ओर खिचनें लगती हैं तथा आसानी से टूट कर गिर जाती हैं , पौधे की वृद्दि रुक जाती हैं |
2. फास्फोरस
P
इसकी कमी के लक्षण भी प्रारंभिक निचली पत्तियों पर दिखतें हैं | पत्ती गहरे हरे रंग की सकरी तथा कड़ी पड़ जाती हैं , शिरायें बैंगनी सी दिखती हैं प्रकाश संश्लेषण की क्रिया धीमी पड़ने से पौधा छोटा व कमजोर पड़ जाता हैं | तना में पर्याप्त कड़ापन नही होता और रस संचार अवरुद्ध होने से पौधे का विकास रुक जाता हैं |
3. पोटाश
K
इसकी कमी के लक्षण भी प्रारंभिक पत्तियों पर दिखाई पड़ते हैं | पत्ती का रंग उतरने लगता हैं , उसके सिरे से लेकर कोरो तक भूरा कत्थई रंग बढने लगता हैं | पत्तियां रस संवहन की कमी से अंदर को मुड़ने लगती हैं और धीरे – धीरे सूख जाती हैं |
पौधे सभी प्रकार के संतुलन जैसे जल संतुलन, रस संतुलन, तापमान संतुलन, तत्व संतुलन, गुरुत्व संतुलन बनाये रखते हैं, जिससे पौधा जड़ तना व पत्तियों के माध्यम से सभी तत्वों को ग्रहण करता हैं |
4. मैग्नीशियम
Mg
इसकी कमी के लक्षण प्रारंभिक पत्तियों के साथ – साथ द्वितीयक पत्तियों पर भी दिखाई देना शुरू होते हैं | पत्तियां शिरे से और कोरों से पीली पड़ती हुई पुरे पत्ते को पीली कर देती हैं | पत्तियों की शिरायें (Veins) फूल जाती हैं तथा रंग उतर जाता हैं | पत्ती का अग्रभाग नीचे को झुक या लटक जाता हैं,पत्ती आसानी से गिर जाती हैं |
5. जिंक
Zn
इसकी कमी के लक्षण द्वितीयक पत्तियों पर दिखते हैं | पत्ती पीली पड़ने लगती हैं, उसकी शिरायें (Veins) हरी दिखती हैं और उन पर भूरे रंग के धब्बे पड़ने लगते हैं, पत्ती शीघ्रता से सूखने लगती हैं |
6. मालिब्डेमन
Mo
इसकी कमी के लक्षण द्वितीयक पत्तियों पर दिखना शुरू होते हैं | पूरी पत्ती रंग उड़े पीले रंग के समान हो जाती हैं, शिराओं (Veins) का हरापन उड़ जाता हैं, केवल उनकी धारी दिखती हैं | शिराओं को छोड़कर पूरी पत्ती पर सुनहला भूरा धब्बा पड़ जाता हैं, जिससे पत्ती के नीचे ऊँगली लगाने पर चिपचिपा पदार्थ सा लग जाता हैं, और पत्ती सूख जाती है |
7. तांबा
(कापर)
Cu
इसकी कमी के लक्षण द्वितीयक पत्तियों के साथ तृतीयक पत्तियों पर दिखता है | पत्ती की शिरायें पूर्णताः गायब हो जाती हैं , पत्ती का रंग नीलाभ पीला हो जाता हैं, और वह तने से नीचे को लटक कर टूट जाती हैं |
8. मैंगनीज
Mn
इसकी कमी के लक्षण द्वितीयक एवं तृतीयक पत्तियों पर दिखाई पड़ते हैं | पत्ती हरिताभ पीली हो जाती हैं और शिराओं (Veins) का पूरा तंत्र – जाल दिखाई देने लगता हैं जो हरे रंग की आभा लिये होती हैं |
9. सल्फर
S
इसकी कमी के लक्षण तृतीयक या ऊपर की नई पत्तियों पर दिखाई देना शुरू होते हैं | पत्ती गंधक का पीलापन लिये पीली हो जाती है, शिरायें (Veins) हल्की हरी पीली आभा लिये होता हैं | गंधक के रंग से मेल खाने के कारण इसकी पहचान आसानी से हो जाती हैं |
10. लोहा
(आयरन)
Fe
इसकी कमी के लक्षण ऊपर की पत्तियों पर दिखाई देना शुरू हो जाते हैं | नई पत्ती हरिताभ पीली (लोहे के हरे रंग) दिखने लगती हैं, शिरायें (Veins) गहरी हरी साफ दिखाई देती हैं, पत्ती कड़ी पड़कर टूट जाती हैं |
11. कैल्शियम
Ca
इसकी कमी के लक्षण कली के नीचे की पत्ती पर दिखाई पड़ते हैं जो कली को संभालती हैं, कली पत्र पीले पड़ने लगते हैं और झुलसकर या सूखकर मुड़ने लगते हैं और कली का अग्रभाग – सूखने लगता है , धीरे – धीरे पूरी कली सूख जाती हैं |
12. बोरान
B
इसकी कमी के लक्षण सीधे पुष्प पर दिखाई पड़ते हैं | मुख्य कलिका का रंग भूरा कत्था पड़ने लगता है, वह शीर्ष से सूखते हुए नीचे की ओर सूखती जाती है और वह मर जाती है |
13. क्लोरीन
Cl
इसकी कमी के लक्षण नई पत्तियों पर आते हैं , पत्ती शीघ्रता से पीली पड़ती जाती है और वह मुरझा कर गिर जाती हैं |
प्राकृतिक तत्व
14. कार्बन
C
यह जीवांश में पाया जाता हैं, इसकी कमी से पूरा पौधा प्रभावित होता हैं मिट्टी कड़ी होने से जड़ो का संचार मिट्टी में पूरी तरह से नही होने से पौधा कमजोर ,पीला व छोटा होता हैं | जैविक खाद से पूर्ति होती हैं |
15. हाइड्रोजन
H
इसकी कमी से नमी का संवहन प्रभावित होता है, पौधे की ऊर्जा कम हो जाती है और तापमान अनियंत्रित हो जाता हैं | पूरा पौधा खिला हुआ नही दिखता | पौधों के बीच उचित अंतर रखना चहिये |
16. आक्सीजन इसकी कमी से पौधे का पूरा जीवन चक्र प्रभावित होता हैं, पौधे का स्वरूप प्रभावित होता हैं,पौधा अच्छा नही दिखता, वातावरण परिवर्तन से जल्दी प्रभावित होकर कमजोर हो जाता है | पुरे खेत में वायु का सही संचार हो पुरे पौधे को तने से पत्ती तक पूरी हवा मिले, पौधों के बीच उचित अंतर रखें |
किसान भाइयो को काफी बारीकी से पौधों की पत्तियों का निरीक्षण कर उचित तत्व की कमी को परख कर उसकी प्रतिपूर्ति मृदा वैज्ञानिक की सलाह से करना चहिये | अपने खेतों पर सतत भ्रमण कर तत्वों की कमी के लक्षणों को चिन्हित करें ताकि मिट्टी में उस तत्व को संतुलित मात्रा में डालकर मृदा को स्वस्थ बनाये रखें

पौधों के लिए आवश्यक महत्पूर्ण पोषक तत्वो के कार्य व कमी के लक्षण प्रस्तुत हैं।

(1) Functions of Nitrogen – नाइट्रोजन (नत्रजन) के प्रमुख कार्य –

नाइट्रोजन (Nitrogen), एक रासायनिक तत्व है । नाइट्रोजन का प्रतीक चिन्ह N है। नाइट्रोजन का परमाणु क्रमांक 7 है। पृथ्वी के वायुमण्डल का लगभग 78% नाइट्रोजन ही है। यह सर्वाधिक मात्रा में तत्व के रूप में उपलब्ध पदार्थ भी है। यह एक रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन और प्रायः अक्रिय गैस है। इसकी खोज 1773 में स्कॉटलैण्ड के वैज्ञनिक डेनियल रदरफोर्ड ने की थी। नाइट्रोजन से प्रोटीन बनती है जो जीव द्रव्य का अभिन्न अंग है तथा पर्ण हरित के निर्माण में भी भाग लेती है । नाइट्रोजन का पौधों की वृद्धि एवं विकास में योगदान इस तरह से है-
यह पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करता है । वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है । अनाज तथा चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है । यह दानो के बनने में मदद करता है ।
इसे भी पढ़ें – पौधों में आवश्यक पोषक तत्व एवं उनके कार्य

पौधों मे – नाइट्रोजन नत्रजन-कमी के लक्षण -nitrogen deficiency symptoms in plants

पौधों मे प्रोटीन की कमी होना व हल्के रंग का दिखाई पड़ना । निचली पत्तियाँ पड़ने लगती है, जिसे क्लोरोसिस कहते हैं। पौधे की बढ़वार का रूकना, कल्ले कम बनना, फूलों का कम आना। फल वाले वृक्षों का गिरना। पौधों का बौना दिखाई पड़ना। फसल का जल्दी पक जाना, आदि लक्षण पौधे में दिखने लगते हैं।

(2) Functions of phosphorus in plants – फॉस्फोरस के कार्य –

फॉस्फोरस की उपस्थिति में कोशा विभाजन शीघ्र होता है। यह न्यूक्लिक अम्ल, फास्फोलिपिड्स व फाइटीन के निर्माण में सहायक है। प्रकाश संश्लेषण में सहायक है। यह कोशा की झिल्ली, क्लोरोप्लास्ट तथा माइटोकान्ड्रिया का मुख्य अवयव है। फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदा होता है तथा बीजों का भार बढ़ना, पौधों में रोग व कीटरोधकता बढती है । फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा सुद्दढ़ होती हैं । पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है । इससे फल शीघ्र आते हैं, फल जल्दीबनते है व दाने शीघ्र पकते हैं। यह नत्रजन के उपयोग में सहायक है तथा फलीदार पौधों में इसकी उपस्थिति से जड़ों की ग्रंथियों का विकास अच्छा होता है ।

phosphorus deficiency symptoms in plants – फॉस्फोरस-कमी के लक्षण –

इसकी कमी से पौधे छोटे रह जाते हैं, पत्तियों का रंग हल्का बैगनी या भूरा हो जाता है।फास्फोरस गतिशील होने के कारण पहले ये लक्षण पुरानी (निचली) पत्तियों पर दिखते हैं । दाल वाली फसलों में पत्तियां नीले हरे रंग की हो जाती हैं । पौधो की जड़ों की वृद्धि व विकास बहुत कम होता है कभी-कभी जड़े सूख भी जाती हैं । अधिक कमी में तने का गहरा पीला पड़ना, फल व बीज का निर्माण सही न होना। इसकी कमी से आलू की पत्तियाँ प्याले के आकार की, दलहनी फसलों की पत्तियाँ नीले रंग की तथा चौड़ी पत्ती वाले पौधे में पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है।
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Functions of potassium in plants – पोटैशियम के कार्य –

1. जड़ों को मजबूत बनाता है एवं सूखने से बचाता है। फसल में कीट व रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता है। पौधे को गिरने से बचाता है।
2. स्टार्च व शक्कर के संचरण में मदद करता है। पौधों में प्रोटीन के निर्माण में सहायक है।
3. अनाज के दानों में चमक पैदा करता है। फसलो की गुणवत्ता में वृद्धि करता है । आलू व अन्य सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करता है । सब्जियों के पकने के गुण को सुधारता है । मृदा में नत्रजन के कुप्रभाव को दूर करता है।

potassium deficiency symptoms in plants – पोटैशियम-कमी के लक्षण –

पत्तियाँ भूरी व धब्बेदार हो जाती हैं तथा समय से पहले गिर जाती हैं। पत्तियों के किनारे व सिरे झुलसे दिखाई पड़ते हैं। इसी कमी से मक्का के भुट्टे छोटे, नुकीले तथा किनारोंपर दाने कम पड़ते हैं। आलू में कन्द छोटे तथा जड़ों का विकास कम हो जाता है पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया कम तथा श्वसन की क्रिया अधिक होती है।

Functions of calcium in plants – कैल्सियम के कार्य

यह गुणसूत्र का संरचनात्मक अवयव है। दलहनी फसलों में प्रोटीन निर्माण के लिए आवश्यक है। यह तत्व तम्बाकू, आलू व मूँगफली के लिए अधिक लाभकारी है। यह पौधों में कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है।

calcium deficiency symptoms in plants – कैल्सियम-कमी के लक्षण

नई पत्तियों के किनारों का मुड़ व सिकुड़ जाना। अग्रिम कलिका का सूख जाना। जड़ों का विकास कम तथा जड़ों पर ग्रन्थियों की संख्या में काफी कमी होना। फल व कलियों का अपरिपक्व दशा में मुरझाना।
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Functions of Magnesium in plants – मैग्नीशियम के कार्य-

क्रोमोसोम, पोलीराइबोसोम तथा क्लोरोफिल का अनिवार्य अंग है। पौधों के अन्दर कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है। पौधों में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा के निर्माण मे सहायक है। चारे की फसलों के लिए महत्वपूर्ण है।

Magnesium deficiency symptoms in plants – मैग्नीशियम-कमी के लक्षण

पत्तियाँ आकार में छोटी तथा ऊपर की ओर मुड़ी हुई दिखाई पड़ती हैं। दलहनी फसलों में पत्तियो की मुख्य नसों के बीच की जगह का पीला पड़ना।
(6) गन्धक (सल्फर) के कार्य
1. यह अमीनो अम्ल, प्रोटीन (सिसटीन व मैथिओनिन), वसा, तेल एव विटामिन्स के निर्माण में सहायक है।
2. विटामिन्स (थाइमीन व बायोटिन), ग्लूटेथियान एवं एन्जाइम 3ए22 के निर्माण में भी सहायक है। तिलहनी फसलों में तेल की प्रतिशत मात्रा बढ़ाता है।
3. यह सरसों, प्याज व लहसुन की फसल के लिये आवश्यक है। तम्बाकू की पैदावार 15-30प्रतिशत तक बढ़ती है।
गन्धक-कमी के लक्षण
1. नई पत्तियों का पीला पड़ना व बाद में सफेद होना तने छोटे एवं पीले पड़ना।
2. मक्का, कपास, तोरिया, टमाटर व रिजका में तनों का लाल हो जाना।
3. ब्रेसिका जाति (सरसों) की पत्तियों का प्यालेनुमा हो जाना।
(7) लोहा (आयरन) के कार्य
1. लोहा साइटोक्रोम्स, फैरीडोक्सीन व हीमोग्लोबिन का मुख्य अवयव है।
2. क्लोरोफिल एवं प्रोटीन निर्माण में सहायक है।
3. यह पौधों की कोशिकाओं में विभिन्न ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं मे उत्प्रेरक का कार्य करता है। श्वसन क्रिया में आक्सीजन का वाहक है।
लोहा-कमी के लक्षण
1. पत्तियों के किनारों व नसों का अधिक समय तक हरा बना रहना।
2. नई कलिकाओं की मृत्यु को जाना तथा तनों का छोटा रह जाना।
3. धान में कमी से क्लोरोफिल रहित पौधा होना, पैधे की वृद्धि का रूकना।
(8) जस्ता (जिंक) के कार्य
1. कैरोटीन व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है।
2. हार्मोन्स के जैविक संश्लेषण में सहायक है।
3. यह एन्जाइम (जैसे-सिस्टीन, लेसीथिनेज, इनोलेज, डाइसल्फाइडेज आदि) की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक है। क्लोरोफिल निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
जस्ता-कमी के लक्षण
1. पत्तियों का आकार छोटा, मुड़ी हुई, नसों मे निक्रोसिस व नसों के बीच पीली धारियों का दिखाई पड़ना।
2. गेहूँ में ऊपरी 3-4 पत्तियों का पीला पड़ना।
3. फलों का आकार छोटा व बीज कीपैदावार का कम होना।
4. मक्का एवं ज्वार के पौधों में बिलकुल ऊपरी पत्तियाँ सफेद हो जाती हैं।
5. धान में जिंक की कमी से खैरा रोग हो जाता है। लाल, भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं।
(9) ताँबा (कॉपर ) के कार्य
1. यह इंडोल एसीटिक अम्ल वृद्धिकारक हार्मोन के संश्लेषण में सहायक है।
2. ऑक्सीकरण-अवकरण क्रिया को नियमितता प्रदान करता है।
3. अनेक एन्जाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कवक रोगो के नियंत्रण में सहायक है।
ताँबा-कमी के लक्षण
1. फलों के अंदर रस का निर्माण कम होना। नीबू जाति के फलों में लाल-भूरे धब्बे अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।
2. अधिक कमी के कारण अनाज एवं दाल वाली फसलों में रिक्लेमेशन नामक बीमारी होना।
(10) बोरान के कार्य
1. पौधों में शर्करा के संचालन मे सहायक है। परागण एवं प्रजनन क्रियाओ में सहायक है।
2. दलहनी फसलों की जड़ ग्रन्थियों के विकास में सहायक है।
3. यह पौधों में कैल्शियम एवं पोटैशियम के अनुपात को नियंत्रित करता है।
4. यह डी.एन.ए., आर.एन.ए., ए.टी.पी. पेक्टिन व प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक है
बोरान-कमी के लक्षण
1. पौधे की ऊपरी बढ़वार का रूकना, इन्टरनोड की लम्बाई का कम होना।
2. पौधों मे बौनापन होना। जड़ का विकास रूकना।
3. बोरान की कमी से चुकन्दर में हर्टराट, फूल गोभी मे ब्राउनिंग या खोखला तना एवं तम्बाखू में टाप- सिकनेस नामक बीमारी का लगना।
(11) मैंगनीज के कार्य
1. क्लोरोफिल, कार्बोहाइड्रेट व मैंगनीज नाइट्रेट के स्वागीकरण में सहायक है।
2. पौधों में आॅक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
3. प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।
मैंगनीज-कमी के लक्षण
1. पौधों की पत्तियों पर मृत उतको के धब्बे दिखाई पड़ते हैं।
2. अनाज की फसलों में पत्तियाँ भूरे रग की व पारदर्शी होती है तथा बाद मे उसमे ऊतक गलन रोग पैदा होता है। जई में भूरी चित्ती रोग, गन्ने का अगमारी रोग तथा मटर का पैंक चित्ती रोग उत्पन्न होते हैं।
(12) क्लोरीन के कार्य
1. यह पर्णहरिम के निर्माण में सहायक है। पोधो में रसाकर्षण दाब को बढ़ाता है।
2. पौधों की पंक्तियों में पानी रोकने की क्षमता को बढ़ाता है।
क्लोरीन-कमी के लक्षण
1. गमलों में क्लोरीन की कमी से पत्तियों में विल्ट के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
2. कुछ पौधों की पत्तियों में ब्रोन्जिंग तथा नेक्रोसिस रचनायें पाई जाती हैं।
3. पत्ता गोभी के पत्ते मुड़ जाते हैं तथा बरसीम की पत्तियाँ मोटी व छोटी दिखाई पड़ती हैं।
(13) मालिब्डेनम के कार्य
1. यह पौधों में एन्जाइम नाइट्रेट रिडक्टेज एवंनाइट्रोजिनेज का मुख्य भाग है।
2. यह दलहनी फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण, नाइट्रेट एसीमिलेशन व कार्बोहाइड्रेट मेटाबालिज्म क्रियाओ में सहायक है।
3. पौधों में विटामिन-सी व शर्करा के संश्लेषण में सहायक है।
मालिब्डेनम-कमी के लक्षण
1. सरसों जाति के पौधो व दलहनी फसलों में मालिब्डेनम की कमी के लक्षण जल्दी दिखाई देते हैं।
2. पत्तियों का रंग पीला हरा या पीला हो जाता है तथा इसपर नारंगी रंग का चितकबरापन दिखाई पड़ता है।
3. टमाटर की निचली पत्तियों के किनारे मुड़ जाते हैं तथा बाद में मोल्टिंग व नेक्रोसिस रचनायें बन जाती हैं।
4. इसकी कमी से फूल गोभी में व्हिपटेल एवं मूली मे प्याले की तरह रचनायें बन जाती हैं।
5. नीबू जाति के पौधो में माॅलिब्डेनम की कमी से पत्तियों मे पीला धब्बा रोग लगता है।

FAQ – अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न –

– फसलों में पोषक तत्वों की कमी की पहचान कैसे करें
– धान की खेती में नाइट्रोजन की कमी को कैसे पहचाने?
– गेहूँ की खेती में नाइट्रोजन की कमी कैसे पहचाने ?
– मुख्य पोषक तत्व और गौड़ पोषक तत्व क्या क्या है?
– सरसों की खेती में मालिब्डेनम-कमी के लक्षण कैसे पहचाने?
– गोभी की खेती में क्लोरीन-कमी के लक्षण की पहचान कैसे करें?
– अनाज की खेती में मैंगनीज-कमी के लक्षण किस प्रकार कैसे पहचाने ?
– फसलों में बोरान तत्व कैसे कार्य करता है?
– जस्ता पोषक तत्व के कार्य क्या है?
– पौधों में फास्फोरस का क्या कार्य है?
– मोलिब्डेनम की कमी के लक्षण कैसे होते हैं?
– पोषक तत्वों की कमी से क्या होता है?
– धान में जिंक की कमी से कौन सा रोग होता है?
– पोषक तत्वों की कमी के लक्षण
– पौधों में नाइट्रोजन की कमी के लक्षण
– चावल में पोषक तत्वों की कमी के लक्षणों का वर्णन करें
– पौधों का मुख्य पोषक तत्व क्या है
– धान में जिंक की कमी के लक्षण
– पौधों में सल्फर की कमी के लक्षण
– पोषक तत्वों की कमी से होने वाले रोग
– पोषक तत्वों के वर्गीकरण
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– 17 essential plant nutrients and their functions
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उपरोक्त सभी प्रश्नों के उत्तर आपको इस पोस्ट में ज़रूर मिल जाएँगे।

काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

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Cashew farming – काजू का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है । काजू को ड्राईफ़्रूट का राजा कहा जा सकता है। काजू की उत्पत्ति ब्राज़ील से हुई थी। हालाँकि अब यह पूरे विश्व उगाया जाता है। काजू का वैज्ञानिक नाम Anacardium occidentale है। काजू की व्यावसायिक खेती दिनों-दिन लगातार बढ़ती जा रही है क्योंकि काजू सभी अहम कार्यक्रमों या उत्सवों में अल्पाहार या नाश्ता का जरूरी हिस्सा बन गया है। देश – विदेश में काजू की बड़ी माँग है। काजू की खेती से हम विदेशी मुद्रा भी कमा सकते हैं ।

कहाँ होती है काजू की खेती | where to cashew cultivation in in india – Cashew agriculture in hindi – Cashew farming in hindi

Cashew farming | काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी
Cashew farming | काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

भारत देश मे काजू के कुल उत्पादन का 25% पैदा करता है । काजू की खेती केरल, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा एवं पं. बंगाल में बड़े पैमाने में की जाती है परन्तु झारखंड राज्य के कुछ जिले जो बंगाल और उड़ीसा से सटे हुए है वहाँ पर भी इसकी खेती की काफ़ी सम्भावनाएँ हैं। उत्तर प्रदेश में कुल 20 कृषि प्रशिक्षण केंद्र हैं। जिसमें मुरादाबाद ज़िले में स्थित मनोहरपुर कृषि प्रशिक्षण संस्थान में उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से काजू और जम्मू स्थित सरकारी नर्सरी से बादाम का एक-एक पौधा लाकर कृषि प्रशिक्षण केंद्र में लगाया गया था, जिस पर अब फल आ गए हैं। अब उत्तर प्रदेश में भी काजू की खेती की उम्मीद बढ़ गयी है।
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काजू का पेड़ एक उष्णकटिबंधीय सदाबहार वृक्ष है । काजू बहुत तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है इसमे पौधारोपन के तीन साल बाद फूल आने लगते हैं और उसके दो महीने के भीतर पककर तैयार हो जाता है । सामान्य तौर पर काजू का पेड़ 13 से 14 मीटर तक बढ़ता है. हालांकि काजू की बौना कल्टीवर प्रजाति जो 6 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है । जल्दी तैयार होने और ज्यादा उपज देने की वजह से बहुत फायदेमंद व्यावसायिक उत्पादकों के लिए साबित हो सकती है ।

काजू खेती के लिए उन्नत किस्में-

काजू की कई उन्नत और हाइब्रिड या वर्णसंकर किस्मे उपलब्ध हैं । अपने क्षेत्र के स्थानीय कृषि, बागबानी या वन विभाग से काजू की उपयुक्त किस्मों का चुनाव करें । विभिन्न राज्यों के लिए काजू की उन्नत किस्मों की संस्तुति राष्ट्रीय काजू अनुसंधान केंद्र (पुत्तूर) द्वारा की गई है। इसके अनुसार वैसे तो झारखंड राज्य के लिए किस्मों की संस्तुति नहीं है परन्तु जो किस्में उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बंगाल एवं कर्नाटक के लिए उपयुक्त है उनकी खेती झारखंड राज्य में भी की जा सकती है। क्षेत्र के लिए काजू की प्रमुख किस्में वेगुरला-4, उल्लाल-2, उल्लाल-4, बी.पी.पी.-1, बी.पी.पी.-2, टी.-40 आदि है।
Kaju वेनगुर्ला- 1
एम वेनगुर्ला- 2
वेनगुर्ला-3
वेनगुर्ला-4
वेनगुर्ला-5
वृर्धाचलम-1
वृर्धाचलम-2
चिंतामणि-1
एनआरसीसी-1
एनआरसीसी-2
उलाल-1
उलाल-2
उलाल-3
उलाल-4
यूएन-50
वृद्धाचलम-3
वीआआई(सीडब्लू)एचवन
बीपीपी-1
अक्षय(एच-7-6)
अमृता(एच-1597)
अन्घा(एच-8-1)
अनाक्कयाम-1 (बीएलए-139)
धना(एच 1608)
धाराश्री(एच-3-17)
बीपीपी-2
बीपीपी-3
बीपीपीपी-4
बीपीपीपी-5
बीपीपीपी-6
बीपीपीपी-8(एच2/16)

खेती के लिए आवश्यक जलवायु- Suitable Climate and temperature for Cashew farming

काजू मुख्यत: उष्णकटिबंधीय फसल है और उच्च तापमान में भी अच्छी तरह बढ़ता है । इसका नया या छोटा पौधा तेज ठंड या पाला के सामने बेहद संवेदनशील होता है. समुद्र तल से 750 मीटर की ऊंचाई तक काजू की खेती जा सकती है । काजू की खेती के लिए आदर्श तापमान 20 से 35 डिग्री के बीच होता है । इसकी वृद्धि के लिए सालाना 1000 से 2000 मिमी की बारिश आदर्श मानी जाती है । अच्छी पैदावार के लिए काजू को तीन से चार महीने तक पूरी तरह शुष्क मौसम चाहिए । फूल आने और फल के विकसित होने के दौरान अगर तापमान 36 डिग्री सेंटीग्रेड के उपर रहा तो इससे पैदावार प्रभावित होती है । काजू की खेती के सर्वोत्तम परिणामों के लिए इसे कम से कम 4 महीनों के लिए एक अच्छा शुष्क मौसम की स्थिति की आवश्यकता पडती है, जबकि अनिश्चित जलवायु के साथ भारी वर्षा इसके लिए अनुकूल नहीं है । 36 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान विशेष रूप से फूल और फलने की अवधि के दौरान फलों के मानक को बनाए रखने के लिए प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है ।
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Suitable soil selection for Cashew farming – काजू की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

काजू की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है क्योंकि यह अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में खुद को समायोजित कर लेती है और वो भी बिना पैदावार को प्रभावित किये. हालांकि काजू की खेती के लिए लाल बलुई दोमट (चिकनी बलुई मिट्टी) मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है । मैदानी इलाके के साथ-साथ600 से 750 मीटर ऊंचाई वाले ढलवां पहाड़ी इलाके भी इसकी खेती के लिए अनुकूल है.काजू की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थ से भरपूर गहरी और अच्छी सूखी हुई मिट्टी चाहिए ।व्यावसायिक उत्पादकों को काजू की खेती के लिए उर्वरता का पता लगाने के लिए मिट्टी की जांच करानी चाहिए. मिट्टी में किसी पोषक अथवा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर की जानी चाहिए । 5.0 से 6.5 तक के पीएच वाली बलुई मिट्टी काजू की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है । इसके अलावा, काजू की खेती के लिए रेतीली लाल मिट्टी, तटीय रेतीली मिट्टी और लेटराइट मिट्टी भी अच्छी होती है । काजू की खेती के लिए खेत में बाढ़ या पानी के ठहराव को लेकर खेती करने वाले किसानों को सावधान रहना चाहिए. क्योंकि, इससे पौधों की वृद्धि को नुकसान पहुंचता है ।

Soil preparation for modern casheww farming – काजू की खेती के लिए खेत की तैयारी कैसे करें

काजू की खेती के लिए सर्वप्रथम खेत की झाड़ियों तथा घासों को साफ़ करके खेत की 2-3 बार जुताई कर दें। झाड़ियों की जड़ों को निकाल कर खेत को बराबर कर दें। जिससे नये पौधों को प्रारम्भिक अवस्था में पनपने में कोई कठिनाई न हो। काजू के पौधों को 7-8 मी. की दूरी पर वर्गाकार विधि में लगाते हैं। अत: खेत की तैयारी के बाद अप्रैल-मई के महीने में निश्चित दूरी पर 60x 60 x 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार कर लेते हैं। अगर जमीन में कड़ी परत है तो गड्ढे के आकार को आवश्यकताअनुसार बढ़ाया जा सकता है। गड्ढों की 15-20 दिन तक खुला छोड़ने के बाद 5 कि.ग्रा. गोबर की खाद या कम्पोस्ट, 2 कि.ग्रा. रॉक फ़ॉस्फेट या डीएपी के मिश्रण को गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में मिलाकर भर देते हैं। गड्ढों के आसपास ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि वहाँ पानी न रुके। अधिक सघनता से बाग़ लगाने के पौधों की दूरी 5x 5 या 4 x 4 मी. रखते हैं। शेष प्रक्रियाएं सामान्य ही रहती है।

पौधारोपन-

जमीन की अच्छी तरह जुताई कर उसे बराबर कर देना चाहिए और समान ऊंचाई में क्यारियां खोदनी चाहिए। मृत पेड़, घास-फूस और सूखी टहनियों को हटा दें । सामान्य पौधारोपन पद्धति में प्रति हेक्टेयर 200 पौधे और सघन घनत्व में प्रति हेक्टेयर 500 पौधे (5मीटर गुना 4 मीटर की दूरी) लगाए जाने चाहिए । एक ही क्षेत्र में उच्च घनत्व पौधारोपन में ज्यादा पौधे की वजह से ज्यादा पैदावार होती है ।

पौध प्रसारण –

काजू के पौधों को साफ्ट वुड ग्राफ्टिंग विधि से तैयार किया जा सकता है। भेंट कलम द्वारा भी पौधों को तैयार कर सकते हैं। पौधा तैयार करने का उपयुक्त समय मई-जुलाई का महीना होता है।

काजू के पौधों के बीच दूरी कितनी होनी चाहिए –

सबसे पहले 45 सेमी गुना 45 सेमी गुना 45 सेमी की ऊंचाई, लंबाई और गहराई वाले गड्ढे खोदें और इन गड्ढों को 8 से 10 किलो के अपघटित (अच्छी तरह से घुला हुआ) फार्म यार्ड खाद और एक किलो नीम केक से मिली मिट्टी के मिश्रण से भर दें. यहां 7 से 8 मीटर की दूरी भी अपनाई जाती है.

How to irrigate in Cashew farming – काजू की खेती में सिंचाई कैसे करें

आमतौर पर काजू की फसल वर्षा आधारित मजबूत फसल है. हालांकि, किसी भी फसल में वक्त पर सिंचाई से अच्छा उत्पादन होता है. पौधारोपन के शुरुआती एक दो साल में मिट्टी में अच्छी तरह से जड़ जमाने तक सिंचाई की जरूरत पड़ती है. फल के गिरने को रोकने के लिए सिंचाई का अगला चरण पल्लवन और फल लगने के दौरान चलाया जाता है ।
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काजू की खेती में अंतर फसल उगाना – intercropping in cashew cultivation

काजू की खेती में अंतर फसल के द्वारा किसान अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं. अंतर फसल मिट्टी की ऊर्वरता को भी बढ़ाता है. ऐसा शुरुआती सालों में ही संभव है जब तक कि काजू के पौधे का छत्र कोने तक न पहुंच जाए और पूरी तरह छा न जाए. बरसात के मौसम में अंदर की जगह की अच्छी तरह जुताई कर देनी चाहिए और मूंगफली, दाल या फलियां या जौ-बाजरा या सामान्य रक्ताम्र (कोकुम) जैसी अंतर फसलों को लगाना चाहिए.

Cashew plants pruning – प्रशिक्षण और कटाई-छंटाई-

काजू के पेड़ को अच्छी तरह से लगाने या स्थापित करने के लिए लिए ट्रेनिंग के साथ-साथ पेड़ की कटाई-छंटाई की जरूरत होती है. पेड़ के तने को एक मीटर तक विकसित करने के लिए नीचे वाली शाखाओं या टहनियों को हटा दें । जरूरत के हिसाब से सूखी और मृत टहनियों और शाखाओं को हटा देना चाहिए ।

काजू की खेती में उगने वाले जंगली घास-फूस पर निंयत्रण का तरीका- weed control in cashew cultivation

काजू के पौधे की अच्छी बढ़त और अच्छी फसल के लिए घास-फूस पर नियंत्रण करना बागबानी प्रबंधन के कार्य का ही एक हिस्सा है. ऊर्वरक और खाद की पहली मात्रा डालने से पहले घास-फूस को निकालने की पहली प्रक्रिया जरूर पूरी कर लें. घास-फूस निकालने की दूसरी प्रक्रिया मॉनसून के मौसम के बाद की जानी चाहिए । दूसरे तृणनाशक तरीकों में मल्चिंग यानी पलवार घास-फूस पर नियंत्रण करने का अगला तरीका है ।

Cashew farming | काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी
Cashew farming | काजू की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

Prodution/Yield – काजू की खेती से प्राप्त उपज

फसल की पैदावार कई तत्वों, जैसे कि बीज के प्रकार, पेड़ की उम्र, बागबानी प्रबंध के तौर-तरीके, पौधारोपन के तरीके, मिट्टी के प्रकार और जलवायु की स्थिति पर निर्भर करता है । हालांकि कोई भी एक पेड़ से औसतन 8 से 10 किलो काजू के पैदावार की उम्मीद कर सकता है.हाइब्रिड या संकर और उच्च घनत्व वाले पौधारोपन की स्थिति में और भी ज्यादा पैदावार की संभावना होती है.एक पौधे से 10 किल्लो की फसल होती है तो 1000-1200 रु किल्लो के हिसाब से एक पौधे से एक बार में 12000 रुपये की फसल होगी

इलायची की खेती | Cardamom farming

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इलायची की खेती | Cardamom farming – इलाइची (cardamom) का एक अपना ही महत्व है भारतीय रसोई में इलाइची को मसालों की रानी के नाम से भी जाना जाता है । इसका उपयोग कई कार्यों में किया जाता है । खाने की वस्तुवों से लेकर चाय बनाने तक इसकी एक अहम् भूमिका है| इलाइची का प्रयोग फ्लेवर्ड के रूप में किया जाता है | इलाइची का प्रयोग हम सब अपने मुख की शुद्धी के लिए तथा मसाले के रूप में करते हैं । यह अपनी खुशबु के लिए भी बहुत मशहूर है । आयुर्वेद में इसको एक अहम् स्थान मिलता है । इलायची को CARDAMON के नाम से भी जाना जाता है । छोटी इलायची का उपयोग पुराने समय से मसाले के तौर पर किया जाता रहा है । इलायची एक बहुत महंगा मसाला है । यह दिखने में बहुत छोटा होता है । लेकिन इसमें खुशबु अधिक होती है । इलायची के उपर एक छिलका होता है जिसके अंदर इलायची के बीज उपस्थित होते है । इसका उपयोग मसाले के रूप में ही नही बल्कि एक औषधि के रूप में भी किया जाता है।

इलायची की खेती | Cardamom farming
इलायची की खेती | Cardamom farming

कहाँ होती है इलायची कि खेती – where to grow cardamom farming in india-

वैसे तो पूरे भारत में इसकी खेती की जाती है कुछ राज्य जहाँ इसकी खेती की प्रसिधी है उनमें से कुछ कर्नाटक, केरल और तमिलनाडू हैं।

इलाइची के फायदे – cardamom health benefits in hindi

आयुर्वेद के अनुसार इलाचयी शीतल, तीक्ष्ण, मुख को शुद्ध करनेवाली, पित्तजनक तथा वात, श्वास, खाँसी, बवासीर, क्षय, वस्तिरोग, सुजाक, पथरी, खुजली, मूत्रकृच्छ तथा हृदयरोग में लाभदायक है। वैसे तो इलाइची खाने के कई फायदे हैं पर हम कुछ ख़ास के बारे में बात करते हैं –

इलायची से मुँह की बदबू से राहत मिलती है –

इलाइची खाने से होने वाला सबसे पहला फायदा यह है की मुह की बदबू से निजात पाया जा सकता है|

कब्ज की बीमारी में असरदार –

इलाइची खाने से होने वाले फायदे में ये भी एक सच है की ये कब्ज में काफी कारगार साबित होता है| छोटी इलाइची को पकाकर अगर आप पानी में डालकर उसे भी गर्म करके पिये तो इससे निश्चित लाभ मिलता है|

मानसिक तनाव को दूर करती है इलायची –

छोटी इलाइची को चबाने से हार्मोन में तुरंत बदलाव हो जाता है और आप तनाव से मुक्त हो जाते हैं|

एसिडिटी/क़ब्ज़ की बीमारी दूर करे इलायची –

इलायची में मौजूद इसेंशियल ऑयल पेट की अंदरुनी लाइनिंग को मजबूत करता है| एसिडिटी की समस्या में पेट में एसिड जमा हो जाते हैं| इसके सेवन से वो धीरे-धीरे हट जाते हैं|

इलायची मर्दानी ताक़त बढ़ाए व नपुंसकता दूर करती है –

वैवाहिक जीवन में भी इसका बहुत लाभ मिलता है|कई सेक्स सम्बंधित समस्याओं को दूर करने में इसकी अहम् भूमिका होती है|

उल्टी/मिचली में राहत –

उल्टी आने पर भी कारगार साबित होती है|बहुत से लोग यात्रा के दौरान इसे अपने साथ में रखते हैं|

अन्य भाषाओं में इलाइची के विभिन्न नाम – Cardamom name in other languages –

भारत देश में कई भाषा बोली जाती है उसी तरह भारत में इलाइची भी अलग भाषा में अलग नाम से बोली जाती है|कुछ भारतीय राज्य जहाँ इलायची को अलग नाम से बोला जाता है । छोटी इलायची बंगाला, छोटी इलाची गुजराती,इलायची कन्नड,येलक्की कश्मीरी, ऑ-अल बुदुआ, अल मलयालम, एलत्तरी मराठी , वेलची उडिया, अलायची पंजाबी ,एलायची संस्कृत एला, तमिल येलक्काय या एलक्काय तेलुगु, येलाक कायलु या एलक्काय उर्दू इलायची विदेशों में भी इसकी ताजगी कम नहीं होती वह भी इसका उपयोग हर घर में किया जाता है|

इलायची के विदेशी नाम –

इलायची को विदेशी भाषा में क्या कहते हैं आइए जानते हैं –
स्पेन – Cardamom
फ्रेंच – Cardamom
जेर्मनी – Cardamom
स्वीडिश – Cardamom
अरब – Cardamom
इटली – Cardamom
पुर्तगाल – Cardamom
रूस – Cardamom
जापान – Cardamom
चीन – Cardamom

इलाइची की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु –

इलायची की खेती उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में की जाती है । इसकी खेती के लिए छाया और समुद्री हवा में नमी का होना जरूरी होता है । गर्मी और नमी दोनो सही होने पर इलायची उगा सकते है। इलायची को बीज से उगाने के लिये आद्रतायुक्त वातावरण चाहिये जो कि समुद्रतटीय इलाको में होता है। इलायची का पौधा केले के पौधे की तरह ज्यादा पानी और गर्म मौसम पसंद करता है । तापमान 10 डिग्री से 35 डिग्री सेल्सियस और 1500 मिमी से 4000 मिमी की वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रो में इसकी खेती की जाती है जो की समुद्री स्तर से 600 मीटर से 1500 मीटर की ऊचाई पर हो|

इलायची की खेती के लिए उपयुक्त भूमि का चुनाव –

इलायची को लाल और काली मिट्टी पसंद है । अगर आपके यहां बलुई चिकने काली मिट्टी है तो आप इलायची के पौधे को बड़ी आसानी से उगा सकते हैं। सबसे पहले आप अपने खेती के स्थान की जांच करा लें| इलायची की खेती के लिए मिट्टी का PH मान 4.5 से 7.0 तक ऐसी काली गहरी अम्लीय दोमट मिट्टी को इलायची की खेतो के लिए उपयुक्त माना जाता है| रेतीली भूमि में इलायची की खेती करना संभव नहीं है ।

उन्नतशील इलायची की खेती के लिए खेत की तैयारी –

इलायची की खेती के लिए पहले से की हुई फसल के अवशेष हटाकर और पलाऊ लगाकर गहरी जुताई करें । जुताई करने के बाद खेत में जल संरक्षण के लिए खेत में मेड बना दें । ताकि बारिश के पानी के कारण पौधों की सिंचाई की जरूरत कम हो । जल संरक्षण की जरूरत ढाल वाली भूमि और कम वर्षा वाले भागों में ज्यादा होती है । उसके बाद खेत में फिर से गहरी जुताई कर रोटावेटर चला दें । इससे खेत की मिट्टी समतल हो जायेगी । मिट्टी के समतल हो जाने के बाद उसमें अगर पौधे मेड पर लगाना चाहते हैं तो लगभग डेढ़ से दो फिट की दूरी पर मेड बना दे । और समतल में लगाने के लिए खेत में दो से ढाई फिट की दूरी रखते हुए गड्डे तैयार कर लें । इन गड्डों और मेड पर गोबर की खाद और रासायनिक खाद डालकर मिट्टी में मिला दें । खेत की तैयारी पौधे के लगाने के लगभग एक 15 दिन पहले की जाती है ।

इलाइची की किस्में – Cardamom improved varieties

90 के दशक में एक नयी किस्म की खोज की गयी जो की नजल्लानी नाम की है|इसका मुख्यत रूप से मसाले के लिए उपयोग किया जाता है |

हरी इलायची –

हरी इलायची को छोटी इलायची के नाम से जाना जाता है । इसका इस्तेमाल कई तरह से खाने में किया जाता है । इसका इस्तेमाल मुखशुद्धि, औषधि, मिठाई और पूजा पाठ में किया जाता है । इसके पौधे 10 से 12 साल तक पैदावार देते हैं ।

काली इलायची – बड़ी इलायची –

काली इलायची को बड़ी इलायची के नाम से भी जाना जाता है । बड़ी इलायची का इस्तेमाल मसाले के रूप में किया जाता है । इसका आकार छोटी इलायची से काफी बड़ा होता है । इसका रंग हल्का लाल काला होता है । काली इलायची में कपूर के जैसी खुशबू पाई जाती है । बड़ी इलायची में भी दो श्रेणियां पाई जाती है । जिनके बारें में पूरी जानकारी काली इलायची वाले आर्टिकल में हम आपको बताने वाले हैं ।
Mudigere-1
CCS-1,
PV-1,
ICRI-1
ICRI-2
SKP-14

इलायची खेती के लिए रोपण सामग्री –

किसी भी अभिजात वर्ग के बागान से एकत्र किया जा सकता है। हालांकि, तरीकों कार्बनिक मानकों के अनुरूप होना चाहिए अंकुरों को ऊपर उठाने के लिए पीछा किया। Rhizomes सामग्री रोपण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहे हैं, वृक्षारोपण कम से कम एक वर्ष पूर्व संग्रह करने के लिए उत्पादन की जैविक विधियों का पालन किया जाना चाहिए था। टिशू कल्चर पौधे प्रचार के प्राकृतिक तरीकों के साथ निष्ठा रखने के क्रम में रोपण सामग्री के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। बीज के एसिड उपचार ट्राइकोडर्मा संस्कृति (बीज के 100 ग्राम के लिए 50 मिलीलीटर बीजाणु निलंबन) के साथ बीज का उपचार नर्सरी सड़ांध रोगों के प्रबंधन के लिए एक रोगनिरोधी उपाय के रूप में वांछनीय है, बचा जाना चाहिए। बेड की तैयारी के समय, VAM का समावेश किया जा सकता है । कार्बनिक पदार्थ में समृद्ध मिट्टी, अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर या वर्मीकम्पोस्ट और रेत polybag के अंकुर (अधिमानतः जैव degradable polybags) जुटाने के लिए, potting मिश्रण का उपयोग करके तैयार किया जा सकता है। इस VAM करने के लिए और ट्राइकोडर्मा भी जोड़ा (अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की 25 किलो के साथ मिश्रित बड़े पैमाने पर कई मीडिया के 250 ग्राम) किया जा सकता है। पौध की वृद्धि नहीं पर्याप्त है, तो एक महीने में एक बार vermiwash छिड़काव वांछनीय (संयंत्र प्रति 20 मिलीग्राम) है। नर्सरी में रोगों नियमित निगरानी और पादप उपायों को गोद लेने के द्वारा प्रबंधित किया जा सकता है। बोर्डो मिश्रण के प्रतिबंधित आवेदन 1% प्रारंभिक चरण में ही सड़ांध रोग को नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है। नर्सरी साइट बदलने से कीट और रोगों और पौध की जोरदार वृद्धि के लिए चौकसी करने के लिए लाभ हुआ है।

इलायची उगाने के तरीके-

इलायची का पौधा दो तरीके से उगाया जा सकता है।
1- इलायची के बीज से
2- इलायची के पौधे से निकलने वाले पौधे से

बीज से इलायची को उगाना-

इलायची को बीज सा उगाना आसान काम नही है। क्योकि सबसे जरूरी चीज बीज है जो कि अच्छी क्वालटी का होना चाहिये ज्यादा पुराना बीज उगने में परेशान करता है। ताजा इलायची का बीज होने पर यह आसानी से उगाया जा सकता है।

इलायची की खेती में रोपण का समय और तरीका –

इलायची की पौध – इलायची की खेती के लिए पौध रोपण का काम एक से दो महीने पहले किया जाता है । उसके बाद इन पौधों को बारिश के मौसम में जुलाई माह के दौरान खेतों में उगाना चाहिए, जिससे पौधों को सिंचाई की भी जरूरत नही होती । और पौधा अच्छे से विकास भी करता है । इलायची के पौधे को छायादार जगह की ज्यादा आवश्यकता होती है । इसके लिए पौधे को छायादार जगह पर ही लगाना चाहिए । इलायची के पौधे को खेत में लगाते वक्त उन्हें तैयार किये गए गड्डों या मेड पर लगभग 60 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए. मेड पर जिगजैग तरीके से पौधे की रोपाई करनी चाहिए । इलायची के पौधे पर फरवरी-मार्च के बाद अप्रैल में बहुत सुंदर सुंदर फूल आते हैं। बरसात के समय इस पर फल लगते हैं जो कि गुच्छों के रूप में होते हैं। छोटी छोटी इलायची देखने में बड़ी सुंदर दिखती है।

इलायची की खेती में खाद एवं पोषण प्रबंधन – nutrition management in Cardamom farming-

इलायची के पौधे के लिए गोबर खाद सबसे बेहतर खाद होती है ऑर्गेनिक खाद से उगाया गया पौधा काफी अच्छा मजबूत और तेजी से विकास करता है इसके अलावा इससे जो इलायची हमें मिलती है वह पूर्ण रूप से शुद्ध होती है उसके अंदर कोई भी जहरीले तत्व या कीटनाशक नहीं होते।

Cardamom crop protection management : इलायची की फसल में कीट नियंत्रण – फसल सुरक्षा प्रबंधन

Drooping सूखे पत्ते, सूखी पत्ती म्यान, पुराने panicles और अन्य शुष्क संयंत्र भागों का हटाया बागान में कीट inoculum को कम करने के लिए सिफारिश की एक महत्वपूर्ण स्वच्छता विधि है। मैकेनिकल संग्रह और कीट के अंडे की जनता का विनाश, बालों कमला (Eupterote सपा) और जड़ GRUB (Balepta fuliscorna) की भृंग के लार्वा कीट क्षति को कम करने में अन्य दृष्टिकोण हैं। बाद के पुनरुत्थान कम किया जा सकता है, ताकि जैसे ही स्टेम बोरर (Conogethes punctiferalis) के बोर होल गौर कर रहे हैं, के रूप में बोर होल में बेसिलस thuringiensis तैयारी (10 मिलीलीटर पानी में 0.5 मिलीग्राम) के इंजेक्शन के लार्वा को मार देंगे। खेती की जैविक विधियों सफेद मक्खियों के प्रकोप को अपनाया जहाँ भी रहे हैं (Dialeurodes cardamomi) शायद ही कभी मनाया जाता है। हालांकि इस तरह के प्रकोप, न्यूनतम कास्टिक सोडा (500 मिलीलीटर नीम और पानी की 100 लीटर में 500 ग्राम नरम साबुन) से बाहर कर दिया नरम साबुन के साथ नीम का तेल छिड़काव द्वारा पीला चिपचिपा जाल और nymphs के नियंत्रण का प्रयोग वयस्कों के संग्रह की स्थिति में होना करने के लिए है पीछा किया। नेमाटोड, के लिए प्रवण क्षेत्रों में (Meloidogine सपा।) को कुचल दिया नीम के बीज के आवेदन की समस्याओं की देखभाल कर सकते हैं। मछली के तेल राल साबुन के अनुप्रयोग के प्रबंध कीटों (Sciothrips cardamomi) के लिए किया जा सकता है। मालाबार किस्मों एक निश्चित सीमा तक कीटों के प्रति सहनशील होना पाया जाता है। नियमित निगरानी समय पर पता लगाने और इलायची को प्रभावित करने वाले कीटों के खिलाफ उपचारात्मक उपायों को अपनाने के लिए बिल्कुल जरूरी है ।

एलोवेरा की खेती की जानकारी | Aloe vera ki kheti

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एलोवेरा की खेती से आज किसान भाई लाखों रुपए कमा रहे है। एलोवेरा को घृत कुमारी या अलो वेरा/एलोवेरा,क्वारगंदल, या ग्वारपाठा के नाम से भी जाना जाता है। इसकी औषधीय पौधा में गिनती होती है । एक औषधीय पौधे के रूप में विख्यात है। एलोवेरा जिसे घृतकुमारी या ग्वारपाठा कहा जाता है. यह पौधा साल भर हरा भरा रहता है । इसकी उत्पति दक्षिणी यूरोप एशिया या अफ्रीका के सूखे क्षेत्रों में मानी जाती है । भारत में एलोवेरा का व्यासायिक उत्पादन सौन्दर्य प्रसाधन के साथ दवा निर्माण के लिए किया जाता है । एलोवेरा की पट्टी ही व्यवसायिक इस्तेमाल में आती है । एलोवेरा का पौधा बिना तने का या बहुत ही छोटे तने का एक गूदेदार और रसीला पौधा होता है जिसकी लम्बाई 60-100 सेंटीमीटर तक होती है। पत्ते चारो तरफ लगे होते हैं। एलोवेरा (Aloe Vera) के पत्‍ते के आगे का भाग नुकीला होता है। इसके किनारों पर हल्‍के कांटे होते हैं। पत्‍तों के बीज से फूल का दंड निकलता है जिस पर पीले रंग के फूल लगे होते हैं।इसका फैलाव नीचे से निकलती शाखाओं द्वारा होता है। इसकी पत्तियां भालाकार,मोटी और मांसल होती हैं जिनका रंग, हरा, हरा-स्लेटी होने के साथ कुछ किस्मों में पत्ती के ऊपरी और निचली सतह पर सफेद धब्बे होते हैं। पत्ती के किनारों पर की सफेद छोटे दांतों की एक पंक्ति होती है। गर्मी के मौसम में पीले रंग के फूल उत्पन्न होते हैं।
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एलोवेरा का वानस्पतिक परिचय | एलोवेरा क्‍या है? What is Aloe Vera in Hindi

यह लिलीएसी कुल का बहुवर्षीय मांसल पौधा है । एलोवेरा का वानस्‍पतिक नाम Aloe vera (Linn.) Burm.f. (एलोवेरा) । एलोवेरा को घृत कुमारी या अलो वेरा/एलोवेरा,क्वारगंदल, या ग्वारपाठाजिसकी ऊंचाई 2-3 फीट तक होती है। इसका तना बहुत छोटा तथा जड़े भी धृतकुमारी झकड़ा होती है। जो कि जमीन के अन्दर कुछ ही गहराई तक रहती है। मूल के ऊपर से काण्ड से पत्ते निकलते है। पत्ते मांसल, फलदार, हरे तथा एक से डेढ़ फुट तक लम्बे होते है। पत्तों की चौड़ाई 1 से 3 इंच तक मोटाई आधी इंच तक होती है। पत्तों के अन्दर घृत के समान चमकदार गुदा होती है। जिसमें कुछ हल्की गंध आती है तथा स्वाद में कड़वा होता है। पत्तों को काटने पर एक पीले रंग का द्रव्य निकलता है जो ठण्डा होने पर जम जाता है जिसे कुमारी सार कहते है।
आयुर्वेद में इसे घृतकुमारी के नाम से पहचानते है। ग्वारपाठा मुख्यतः फलोरिडा, वेस्टइंडीज, मध्य अमेरिका तथा एशिया महाद्वीप में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। भारत में पूर्व में विदेशों से लाया गया था लेकिन अब पूरे देश में खास कर शुष्क इलाको में जंगली पौधों के रूप में मिलता है।

एलोवेरा के अन्य भाषाओं में नाम (Name of Aloe Vera in Different Languages)-

एलोवेरा का वानस्‍पतिक नाम Aloe vera (Linn.) Burm.f. (एलोवेरा) Syn-Aloe barbadensis Mill है, और इसके अन्य ये भी नाम हैं
Aloe Vera name in Hindi Language – घीकुआँर, ग्वारपाठा, घीग्वार
Aloe Vera name in English Language – एलो वेरा (Aloe vera), कॉमन एलो (Common aloe), बारबडोस एलो (Barbados aloe), मुसब्बार (Musabbar), कॉमन इण्डियन एलो (Common Indian aloe)
Aloe Vera name in Sanskrit Language – कुमारी, गृहकन्या, कन्या, घृतकुमारी
Aloe Vera name in Kannada Language – लोलिसर (Lolisar)
Aloe Vera name in Gujarati Language – कुंवार (Kunwar), कड़वी कुंवर (Kadvi kunvar)
Aloe Vera name in Tamil Language – कत्तालै (Kattale), अंगनी (Angani), अंगिनी (Angini)
Aloe Vera name in Telugu Language – कलबन्द (Kalband), एट्टाकलाबन्द (Ettakalaband)
Aloe Vera name in Bengali Language – घृतकुमारी (Ghritkumari)
Aloe Vera name in Nepali Language – घ्यूकुमारी (Giukumari)
Aloe Vera name in Punjabi Language Language – कोगर (Kogar), कोरवा (Korwa)
Aloe Vera name in Malayalam Language – छोट्ठ कथलाइ (Chotthu kathalai)
Aloe Vera name in Marathi Language – कोरफड (Korphad), कोराफण्टा (Koraphanta)
Aloe Vera name in Arabic Language Language– तसाबार अलसी (Tasabrar alsi), मुसब्बर (Musabbar)
Aloe Vera name in Persian Language – दरखते सिब्र (Darkhate sibre), दरख्तेसिन (arkhteesinn)

कहाँ होती है एलोवेरा की खेती – where to grow aloe vera in india –

भारत में इसकी खेती राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र तथा हरियाणा के शुष्क इलाकों में की जाती है।

एलोवेरा के फायदे- health benefits of What is Aloe Vera in Hindi

आयुर्वेद के अनुसार एलावेरा अथवा ग्वारपाठा कडुवा, शीतल, रेचक, धातु परिवर्तक, मज्जावर्धक, कामोद्दीपक, कृमिनाशक और विषनाशक होता है। नेत्र रोग, अवूर्द, तिल्ली की वृद्धि, यकृत रोग, वमन, ज्वर, खासी, विसर्ग, चर्म रोग, पित्त, श्वास, कुष्ठ पीलियां, पथरी और व्रण में लाभदायक होता है। आयुर्वेद की प्रमुख दवायें जैसे घृतकारी अचार, कुमारी आसव, कुवारी पाक, चातुवर्गभस्म, मंजी स्याडी तेल आदि इसके मुख्य उत्पाद है। प्रसाधन सामग्री के निर्माण में भी उपयोग मुख्य प्रमुख रूप में किया जाता है। त्वचा में नयापन लाने के लिए इसके उत्पादों का उपयोग पौराणिक काल से ही हो रहा है। उत्पादों का विश्व बाजार में काफी माँग के चलते ग्वारमाठा के खेती की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

औषधीय पौधे एलोवेरा की उन्नत खेती की जानकारी | Aloe vera farming in hindi । Aloe vera ki kheti

एलोवेरा की उन्नत शील खेती की जानकारी | Aloe vera ki kheti
एलोवेरा की उन्नत शील खेती की जानकारी | Aloe vera ki kheti

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तापमान –

एलोवेरा की बेहतर खेती के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 20 से 22 डिग्री सेंटीग्रेड होता है । परंतु यह पौधा किसी भी तापमान पर अपने को बचाए रख सकता है ।

मिट्टी का चुनाव –

एलोवेरा की खेती के लिए उष्ण जलवायु अच्छी रहती है। इसकी खेती आमतौर पर शुष्क क्षेत्र में न्यूनतम वर्षा और गर्म आर्द्र क्षेत्र में सफलतापूर्वक की जाती है। यह पौधा अत्यधिक ठंड की स्थिति के प्रति बहुत संवेदनशील है। बात करें इसके लिए मिट्टी या भूमि की तो इसकी खेती रेतीली से लेकर दोमट मिट्टी तक विभिन्न प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। रेतीली मिट्टी इसके लिए सबसे अच्छी होती है। इसके अलावा अच्छी काली मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है। भूमि चयन करते समय हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि इसकी खेती के लिए भूमि ऐसी हो जो जमीनी स्तर थोड़ी ऊंचाई पर हो और खेत में जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए क्योंकि इसमें पानी ठहरना नहीं चाहिए। इसकी मिट्टी का पीएच मान 8.5 होना चाहिए।

भूमि तैयारी व खाद –

वर्षा ऋतु से पहले खेत में एक दो जुताई 20-30 से०मी० की गहराई तक पर्याप्त है जुताई के समय 10-15 टन गोबर की खाद एकसार भूमि में अंतिम जुताई के साथ मिला देनी चाहिये।

एलोवेरा की उन्नत क़िस्में – अलोइवेरा

भारत के अलग-अलग देशों में एलोवेरा की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। मुख्यतया दो प्रजातियों का चिकित्सा में विशेष तौर पर प्रयोग किया जाता है जो ये हैं-
Aloe vera (Linn.) f.-
Aloe abyssinica (पीतपुष्पा कुमारी)
वर्षों के शोध के बाद पता चला कि एलोवेरा 300 प्रकार के होते हैं। इसमें 284 किस्म के एलो वेरा में 0 से 15 प्रतिशत औषधीय गुण होते हैं। 11 प्रकार के पौधे जहरीले होते हैं बाकी बचे पांच विशेष प्रकार में से एक पौधा है जिसका नाम एलो बारबाडेन्सिस मिलर है जिसमें 100 प्रतिशत औषधि व दवाई दोनों के गुण पाए गए हैं। वहीं इसकी मुसब्बर Arborescens प्रजाति जिसमें लाभकारी औषधीय और उपचार गुण होते हैं और विशेष रूप से जलने को शांत करने के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा इसकी एक ओर प्रजाति जिसे मुसब्बर Saponaria कहते हैं इसे इसे असली चिता या मुसब्बर मैकुलता के रूप में जाना जाता है। इसका प्रयोग सभी प्रकार की त्वचा की स्थिति के इलाज के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा इसमें होने वाले उच्च स्तर के रस के कारण इसे सौंदर्य प्रसाधनों में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता है। वर्तमान में आईसी111271, आईसी111269 और एएल-1 हाईब्रिड प्रजाति के एलोवेरा को देश के हर क्षेत्र में उगाया जा सकता है।
आई. सी. – 111271, आई.सी. – 111280, आई. सी. – 111269 और आई. सी.- 111273 का कमर्शियल उत्पादन किया जा सकता है. इन किस्मों में पाई जाने वाली एलोडीन की मात्रा 20 से 23 प्रतिशत तक होती है । केन्द्रीय औषधीय संघ पौधा संस्थान के द्वारा सिम-सीतल, एल- 1,2,5 और 49 एवं को खेतों में परीक्षण के उपरान्त इन जातियों से अधिक मात्रा में जैल की प्राप्ति हुई है । इनका प्रयोग खेती (व्यवसायिक) के लिए किया जा सकता है । अगर आप एलोवेरा की खेती बड़े पैमाने पर करना चाहते है, वो इसकी चार पत्ती वाली चार पत्तों वाली लगभग चार महीना पुरानी 20-25 सेंटीमीटर लंबाई वाले पौधे का चयन करना सही होता है. एलोवेरा के पौधे की यह खासियत होती है कि इसे उखाड़ने के महीनों बाद भी लगया जा सकता है ।
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बुवाई का समय –

इसकी बिजाई सिंचित क्षेत्रों में सर्दी को छोड़कर पूरे वर्ष में की जा सकती है लेकिन उपयुक्त समय जुलाई-अगस्त है।

बीज की मात्रा –

इसकी बिजाई 6-8′ के पौध द्वारा किया जाना चाहिए। इसकी बिजाई 3-4 महीने पुराने चार-पांच पत्तों वाले कंदो के द्वारा की जाती है। एक एकड़ भूमि के लिए करीब 5000 से 10000 कदों/सकर्स की जरूरत होती है। पौध की संख्या भूमि की उर्वरता तथा पौध से पौध की दूरी एवं कतार से कतार की दूरी पर निर्भर करता है।

एलोवेरा के बीज कहाँ से प्राप्त करें –

एलोईन तथा जेल उत्पादन की दृष्टि से नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लान्ट जेनेटिक सोर्सेस द्वारा एलोवेरा की कई किस्में विकसित की गई है। सीमैप, लखनऊ ने भी उन्नत प्रजाति (अंकचा/ए.एल.-1) विकसित की है। वाणिज्यिक खेती के लिए जिन किसानों ने पूर्व में एलोवेरा की खेती की हो तथा जूस/जेल आदि का उत्पादन में पत्तियों का व्यवहार कर रहे हों,तो वे नई किस्म के लिए संपर्क कर सकते हैं।

रोपण विधि –

इसके रोपण के लिए खेत में खूड़ (रिजेज एण्ड फरोज) बनाये जाते है। एक मीटर में इसकी दो लाईंने लगेगी तथा फिर एक मीटर जगह खाली छोड़ कर पुनः एक मीटर में दो लाईने लगेंगी। यह एक मीटर की दूरी ग्वारपाठे काटने, निकाई गुड़ाई करने में सुविधाजनक रहता है। पुराने पौधे के पास से छोटे पौधे निकालने के बाद पौधे के चारो तरफ जमीन की अच्छी तरह दबा देना चाहिये। खेत में पुराने पौधों से वर्षा ऋतु में कुछ छोटे पौधे निकलने लगते है इनकों जड़ सहित निकालकर खेत में पौधारोपण के लिये काम में लिया जा सकता है। नये फल बाग में अन्तरवर्ती फसल के लिए ग्वारपाठा की खेती उपयुक्त है।

खाद एवं उर्रवरक –

एलोवेरा की खेती कम उपजाऊ जमीन पर होती हैं, साथ ही कम खाद में भी बेहतर उत्पादन पा सकते हैं. लेकिन अच्छी उपज के लिए खेत को तैयार करते समय 10-15 टन सड़ी हूए गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए इससे उत्पादन में गुणात्मक रूप से वृद्धि होती है ।

सिंचाई और कीट नियंत्रण –

पौधों की रोपाई के बाद पानी दिया जाता है । ड्रिप इरिगेशन या संप्रिंक्लर से इसकी सिंचाई की जाती है । इसे एक साल में तीन से चार सिंचाई की जरूरत होती है. कीट नियंत्रण के लिए समय समय खेत से खर पतवार निकालते रहना चाहिए. पौधों के आसपास पानी नहीं रुकने देना चाहिए ।

एलोवेरा के फायदे- health benefits of What is Aloe Vera in Hindi

सिर दर्द में एलोवेरा के फायदे (Benefits of Aloe Vera in Relief from Headache in Hindi)

एलोवेरा के फायदे (aloe vera ke fayde) लेकर सिर दर्द से आराम पा सकते हैं। इसके लिए एलोवेरा जेल लें, और इसमें थोड़ी मात्रा में दारु हल्‍दी (दारुहरिद्रा) का चूर्ण मिला लें। इसे गर्म करके दर्द वाले स्‍थान पर बांधें। इससे वात और कफ दोष के कारण होने वाले सिरदर्द से आराम मिलता है।

आंखों की बीमारी में एलोवेरा (ग्वारपाठा) के फायदे (Aloe Vera Benefits to Treat Eye Disease in Hindi)

आप एलोवेरा के औषधीय गुण से आंखों की बीमारी का इलाज कर सकते हैं। एलोवेरा जेल को आंखों पर लगाएंगे तो आंखों की लालिमा खत्म होती है। यह विषाणु से होने वाले आखों के सूजन (वायरल कंजक्टीवाइटिस) में लाभदायक होता है। एलोवेरा का औषधीय गुण आँखों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। आप एलोवेरा के गूदे पर हल्दी डालकर थोड़ा गर्म कर लें। इसे आंखों पर बांधने से आंखों के दर्द का इलाज होता है।

कान दर्द में एलोवरा के औषधीय गुण फायदेमंद (Aloe Vera Benefits for Ear Pain in Hindi)

कान दर्द में भी एलोवेरा से लाभ मिलता है। एलोवेरा के रस को हल्का गर्म कर लें। जिस कान में दर्द हो रहा है, उसके दूसरी तरफ के कान में दो-दो बूंद टपकाने से कान के दर्द में आराम (aloe vera ke fayde) मिलता है।

एलोवेरा के सेवन से खूनी बवासीर का इलाज (Aloe Vera Benefits for Piles Treatment in Hindi)

आप बवासीर में एलोवेरा के प्रयोग से फायदा ले सकते हैं। एलोवेरा जेल (aloe vera ke fayde) के 50 ग्राम गूदे में 2 ग्राम पिसा हुआ गेरू मिलाएं। अब इसकी टिकिया बना लें। इसे रूई के फाहे पर फैलाकर गुदा स्‍थान पर लंगोट की तरह पट्टी बांधें। इससे मस्‍सों में होने वाली जलन और दर्द में आराम मिलता है। इससे मस्‍से सिकुड़कर दब जाते हैं। यह प्रयोग खूनी बवासीर में भी लाभदायक है।

एलोवेरा के सेवन से पीलिया का इलाज (Aloe Vera Uses in Fighting with Jaundice in Hindi)

पीलिया का इलाज करने के लिए भी एलोवेरा का सेवन करना फायदेमंद होता है। इसके लिए 10-20 मिलीग्राम एलोवेरा के रस को दिन में दो तीन बार पिलाने से पीलिया रोग में लाभ होता है। इस प्रयोग से कब्‍ज से मुक्ति पाने में भी मदद मिलती है। एलोवेरा रस की 1-2 बूंद नाक में डालने से भी लाभ होता है। कुमारी लवण को 3-6 ग्राम तक की मात्रा में छाछ के साथ सेवन करें। इससे लीवर, तिल्‍ली के बढ़ाना, पेट की गैस, पेट में दर्द और पाचनतंत्र से जुड़ी अन्य समस्‍याओं में लाभ होता है।

लीवर विकार में एलोवेरा (ग्वारपाठा) के फायदे (Aloe Vera Uses for Liver Disorder in Hindi)

दो भाग एलोवेरा के पत्तों का रस और 1 भाग शहद लेकर उसे चीनी मिट्टी के बर्तन में रखें। इस बर्तन का मुंह बन्द कर 1 सप्ताह तक धूप में रख दें। एक सप्ताह बाद इसे छान लें। इस औषधि को 10-20 मिलीग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से लीवर से संबंधित बीमारियों में लाभ होता है।अधिक मात्रा में इसका सेवन करने से पेट साफ होता है। उचित मात्रा में सेवन करने से मल एवं वात से जुड़ी समस्‍याएं ठीक होने लगती हैं। इससे लीवर स्वस्थ हो जाता है।

मूत्र रोग में एलोवेरा के औषधीय गुण से लाभ (Uses of Aloe Vera for Urinary Disease in Hindi)

एलोवेरा के औषधीय गुण से मूत्र संबंधी अनेक रोग में फायदा होता है। इसके लिए 5-10 ग्राम एलोवेरा जेल में चीनी मिलाकर खाएं। इससे पेशाब में दर्द और जलन से आराम मिलता है।

एलोवेरा के औषधीय गुण से खांसी-जुकाम का इलाज (Benefits of Aloe Vera in Fighting with Cough and Cold in Hindi)

खांसी-जुकाम में एलोवेरा के फायदे (aloe vera ke fayde) लेने के लिए इसका गूदा निकालें। गूदा और सेंधा नमक लेकर भस्म तैयार कर लें। इस भस्‍म को 5 ग्राम की मात्रा में मुनक्का के साथ सुबह-शाम सेवन करें। इससे पुरानी खांसी और जुकाम में लाभ होता है।

पेट की बीमारी में एलोवेरा का सेवन फायदेमंद (Aloe Vera Uses for Abdominal Disease in Hindi)

घृतकुमारी (aloe vera ke fayde) के औषधीय गुण से पेट के रोग में भी लाभ होता है। गूदे को पेट के ऊपर बांधने से पेट की गांठ बैठ जाती है। इस उपचार से आंतों में जमा हुआ मल भी आराम से बाहर निकल जाता है।
एलोवेरा की 10-20 ग्राम जड़ को उबाल लें। इसे छानकर भुनी हुई हींग मिला लें। इसे पीने से पेट दर्द में आराम मिलता है। एलोवेरा के 6 ग्राम गूदा और 6 ग्राम गाय का घी, 1 ग्राम हरड़ चूर्ण और 1 ग्राम सेंधा नमक लें। इसे मिलाकर सुबह-शाम खाने से वात विकार से होने वाले गैस की समस्या ठीक होती है। गाय के घी में 5-6 ग्राम घृतकुमारी के गूदे में त्रिकटु सोंठ, मरिच पिप्‍प्‍ली, हरड़ और सेंधा नमक मिला लें। इसका सेवन करने से गैस की समस्या में लाभ होता है।
60 ग्राम घृतकुमारी के गूदे में 60 ग्राम घी, 10 ग्राम हरड़ चूर्ण तथा 10 ग्राम सेंधा नमक मिला लें। इसे अच्छी तरह मिला लें।इसको 10-15 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से वात दोष से होने वाले पेट की गैस की समस्या से निजात मिलता है। इस पेस्‍ट का सेवन पेट से जुड़ी बीमारियों व वात दोष से होने दूसरे रोगों में भी फायदेमंद होता है।

एलोवेरा के पत्ते के दोनों ओर के कांटों को अच्छे से साफ कर लें। इसके छोटे-छोटे टुकड़े काटकर मिट्टी के एक बर्तन में रख लें। इसके 5 किलो के टुकड़े में आधा किलो नमक डालकर बर्तन का मुंह बंद कर दें। इसे 2-3 दिन धूप में रखें। इसे बीच-बीच में हिलाते रहें। तीन दिन बाद इसमें 100 ग्राम हल्दी, 100 ग्राम धनिया, 100 ग्राम सफेद जीरा, 50 ग्राम लाल मिर्च, 6 ग्राम भुनी हुई हींग डाल लें। इसी में 30 ग्राम अजवायन, 100 ग्राम सोंठ, 6 ग्राम काली मिर्च, 6 ग्राम पीपल, 5 ग्राम लौंग भी डाल लें। इसके साथ ही 5 ग्राम दाल चीनी, 50 ग्राम सुहागा, 50 ग्राम अकरकरा, 100 ग्राम कालाजीरा, 50 ग्राम बड़ी इलायची और 300 ग्राम राई डालकर महीन पीस लें। रोगी की क्षमता के अनुसार 3-6 ग्राम तक की मात्रा में सुबह-शाम देने से पेट के वात-कफ संबंधी सभी विकार खत्म होते हैं। सूखने पर अचार, दाल, सब्जी आदि में डालकर प्रयोग करें।

तिल्‍ली (प्लीहा) विकार एलोवेरा के औषधीय गुण से लाभ (Benefits of Aloe Vera to Treat Spleen Disorder in Hindi)

तिल्ली बढ़ गई हो तो एलोवेरा के इस्तेमाल से फायदा होता है। 10-20 मिलीग्राम एलोवेरा के रस में 2-3 ग्राम हल्दी चूर्ण मिलाकर सेवन करें। इससे तिल्‍ली के बढ़ने के साथ-साथ अपच में लाभ होता है।

डायबिटीज (मधुमेह) में एलोवेरा के सेवन से फायदा (Uses of Aloe Vera to Controlling Diabetes in Hindi)

250-500 मिलीग्राम गुडूची सत् (पानी को गर्म कर सुखा कर नीचे बचा हुआ पदार्थ) में 5 ग्राम घृतकुमारी (Aloe Vera) का गूदा मिलाकर लेने से मधुमेह में लाभ होता है। डायबिटीज को नियंत्रित करने में एलोवेरा के औषधीय गुण बहुत फायदेमंद होते हैं।

मासिक धर्म विकार में एलोवेरा के सेवन से लाभ (Aloe Vera Helps to get Relief from Menstrual Disorders in Hindi)

एलोवेरा के 10 ग्राम गूदे पर 500 मिलीग्राम पलाश का क्षार बुरककर दिन में दो बार सेवन करें। इससे मासिक धर्म की परेशानियां दूर होती हैं।
मासिक धर्म के 4 दिन पहले से दिन में तीन बार कुमारिका वटी की 1-2 गोली का सेवन करें। इसे मासिक धर्म खत्म होने तक सेवा करना है। इससे मासिक धर्म के समय होने वाला दर्द, गर्भाशय का दर्द और योनि से जुड़ी अनेक बीमारी से आराम मिलता है।

चेचक के घावों में एलोवेरा के फायदे (Aloe Vera Benefits to Treat Chicken Pox in Hindi)
एलोवेरा जेल के फायदे (aloe vera gel ke fayde) से चेचक में भी लाभ होता है। चेचक होने पर दर्द, जलन और सूजन से राहत पाने के लिए आप एलोवेरा का इस्तेमाल कर सकते हैं। चेचक के घावों पर एलोवेरा के गूदे का लेप करने से लाभ होता है।
चर्म रोग में एलोवेरा के फायदे (Aloe Vera Uses for Skin Disease in Hindi)

कई तरह के चर्म रोग में एलोवेरा का प्रयोग करने पर फायदा होता है। अगर आपकी त्वचा पर मस्से निकल आए हैं तो एलोवेरा के पत्‍ते को एक तरफ से छीलकर मस्सों पर बांधें। इससे मस्से खत्म हो जाते हैं।

बुखार में एलोवेरा के औषधीय गुण से फायदा (Aloe Vera Benefits in Fighting with Fever in Hindi)

एलोवेरा के सेवन से बुखार का इलाज किया जा सकता है। एलोवेरा की जड़ से काढ़ा बना लें। 10-20 मिलीग्राम काढ़ा को दिन में तीन बार पिलाने से बुखार ठीक होता है।

कुमारी लवण कैसे बनाएं?

एलोवेरा (घृतकुमारी) के पत्तों का गूदा निकाल लें। बाकी के छिलकों को मटकी में रख लें। इसमें इतनी ही मात्रा में नमक मिलाकर मुंह बंद कर दें। अब इसे गोबर के कंडों की आग पर रख दें। भीतर का पानी जब जलकर काला हो जाए तो इसे महीन पीसकर शीशी में भर लें। इसी को कुमारी लवण कहते हैं।

लिंग में छाले होने पर एलोवारा के फायदे (Aloe Vera Helps in Getting Relief from Penis Ulcers in Hindi)

पुरूषों के यौन संबंधी समस्याओं में एलोवेरा जूस से फायदा होता है। एलोवेरा के साथ जीरा को पीसकर लिंग पर लेप करने से लिंग की जलन और छाले दूर होते हैं। यह प्रयोग करने से पहले किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से जरूर परामर्श लें।

गठिया के इलाज की आयुर्वेदिक दवा है एलोवेरा (Benefits of Aloe Vera to Treat Arthritis in Hindi)

जोड़ो के दर्द में भी एलोवेरा के इस्तेमाल से फायदे मिलते हैं। 10 ग्राम एलोवेरा जेल नियमित रूप से सुबह-शाम सेवन करें। इससे गठिया में लाभ होता है।

एलोवेरा के सेवन से कमर दर्द का इलाज (Uses of Aloe Vera in Reducing Backache in Hindi)

कमर दर्द से परेशान रहते हैं तो एलोवेरा के इस्तेमाल से फायदा ले सकते हैं। गेंहू का आटा, घी और एलोवेरा जेल (एलोवेरा का गूदा इतना हो जिससे आटा गूंथा जाए) लेकर आटा गूंथ लें। इससे रोटी बनाएं। रोटी का चूर्ण बनाकर लड्डू बना लें। रोज 1-2 लड्डू को खाने से कमर दर्द ठीक होता है। एलोवेरा जेल कमर दर्द में दर्दनिवारक दवा की तरह काम करता है।

घाव और चोट में एलोवेरा के गुण से फायदा (Aloe Vera Helps for Healing Wound and Injury in Hindi)

फोड़ा ठीक से पक न रहा हो तो एलोवेरा के गूदे में थोड़ा सज्जीक्षार और हरड़ चूर्ण मिलाकर घाव पर बांधें। इससे फोड़ा जल्दी पक कर फूट जाता है।
घृतकुमारी के पत्ते को एक ओर से छील लें। इस पर थोड़ा हरड़ का चूर्ण बुरक कर हल्‍का गर्म कर लें। इसे गांठ पर बांधें। इससे गांठों की सूजन दूर होगी। स्त्रियों के स्तन में गांठ पड़ गई हो या सूजन हो गई हो तो एलोवेरा की जड़ का पेस्‍ट बना लें। इसमें थोड़ा हरड़ चूर्ण मिलाकर गर्म करके बांधने से लाभ होता है। इसे दिन में 2-3 बार बदलना चाहिए। घृतकुमारी का गूदा घावों को भरने के लिए सबसे उपयुक्त औषधि है। रेडिएशन के कारण हुए गंभीर घावों पर इसके प्रयोग से बहुत ही अच्छा फायदा मिलता है। आग से जले हुए अंग पर एलोवेरा के गूदे को लगाने से जलन शांत हो जाती है। इससे फफोले नहीं होते हैं। एलोवेरा और कत्‍था को समान मात्रा में पीसकर लेप करने से नासूर में फायदा होता है। एलोवेरा के रस को तिल और कांजी के साथ पका लें। इसका लेप करने पर घाव में लाभ होता है। केवल एलोवेरा के रस को पकाकर घाव पर लेप करने से भी लाभ होता है।

अश्वगंधा की खेती की जानकारी | Ashwagandha ki kheti in hindi

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औषधीय गुणों से भरपूर अश्वगंधा की खेती कर किसान आज के समय में मोटी कमाई कर रहे हैं । लागत से कई गुना अधिक कमाई होने के चलते ही इसे कैश कॉर्प भी कहा जाता है । पूरे भारत में और खासकर सूखे प्रदेशों में अश्‍वगंधा का पौधा पाए जाते हैं। ये अपने आप उगते हैं। इसकी खेती भी की जाती है। ये वनों में मिल जाते हैं। अश्‍वगंघा के पौधे 2000-2500 मीटर की ऊंचाई तक पाए जाते हैं। अश्वगंधा एक अद्वितीय गंध और ताकत बढ़ाने की क्षमता रखने वाला पौधा है । इसका वानस्पतिक नाम विथानिया सोम्निफेरा है. अश्वगंधा महिलाओं के लिए काफी लाभकारी होता है । साथ ही इससे कई औषधी और दवाइयां बनाई जाती हैं । यहीं कारण है कि इसकी मांग हमेशा बनी रहती है । अश्वगंधा के फल के बीज, पत्ते, छाल, डंठल और जड़ों की बिक्री होती है और अच्छी कीमत मिलती है ।

अश्वगंधा की उन्नतशील खेती वैज्ञानिक विधि से करने की जानकारी | Ashwagandha ki kheti in hindi

अश्वगंधा की उन्नतशील खेती वैज्ञानिक विधि से करने की जानकारी | Ashwagandha ki kheti in hindi
अश्वगंधा की उन्नतशील खेती वैज्ञानिक विधि से करने की जानकारी | Ashwagandha ki kheti in hindi

अश्वगंधा की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार योजनाएं भी चला रही है । भारत देश मे अश्वगंधा की खेती अन्य प्रदेशों जैसे महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, केरल, जम्मु कश्मीर एवं पंजाब में हो रही है | इसकी बुआई से लेकर कटाई तक बहुत सावधानियाँ बरतनी पड़ती है |किसान समाधान आप सभी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी लेकर आया है।

अश्वगंधा क्या है या अश्वगंधा के गुण क्या है? – What is Ashwagandha

आप सोचते होंगे कि अश्वगंधा क्या है या अश्वगंधा के गुण क्या है? दरअसल अश्वगंधा एक जड़ी-बूटी है। अश्वगंधा का प्रयोग कई रोगों में किया जाता है। क्‍या आप जानते हैं कि मोटापा घटाने, बल और वीर्य विकार को ठीक करने के लिए अश्वगंधा का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा अश्वगंधा के फायदे और भी हैं। अश्वगंधा के अनगिनत फ़ायदे हैं। अश्वगंधा की पत्तियाँ और जड़ो को अलग अलग तरह से औषधि के रूप में उपयोग में लिया जाता है
कई तरह के औषधिय गुणों के कारण इसकी मांग हमेशा बनी रहती है जो की औषधिय पौधो की खेती अश्वगंधा की खेती करना अच्छी आमदनी करने वाली खेती के रूप में एक अच्छा विकल्प है । और अश्वगंधा का नियमित सेवन शारीरिक रूप से दुर्बलता को कम करने और शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढाता है इसके अलावा इसका नियमित सेवन शरीर की थकान को कम कर नीद के लिए एक अचूक औषधि है।

अश्वगंधा का पेड़ –

अश्वगंधा का पेड़ दिखने में झाड़ीनुमा होता है जो की लम्बाई में करींब 65 से 90 सेंटीमीटर तक होता है।

अश्वगंधा की जड़ –

अश्वगंधा की जड़ का चूर्ण बना कर ओषधीय उपयोग में लिया जाता है इसकी जड़ो की लम्बाई 10 से 15 सेंटीमीटर तक की होती है।

अश्वगंधा के पत्ते –

अश्वगंधा की पत्तियाँ रोमयुक्त, अण्डाकार आकार की होती हैं। जिनका उपयोग भी कई तरह की ओषधियो में किया जाता है।

अश्वगंधा का वानस्पतिक व वैज्ञानिक परिचय –

अलग-अलग देशों में अश्‍वगंधा कई प्रकार की होती है, लेकिन असली अश्वगंधा की पहचान करने के लिए इसके पौधों को मसलने पर घोड़े के पेशाब जैसी गंध आती है। अश्वगंधा की ताजी जड़ में यह गंध अधिक तेज होती है। वन में पाए जाने वाले पौधों की तुलना में खेती के माध्‍यम से उगाए जाने वाले अश्‍वगंधा की गुणवत्‍ता अच्‍छी होती है। तेल निकालने के लिए वनों में पाया जाने वाला अश्‍वगंधा का पौधा ही अच्‍छा माना जाता है।
इसके दो प्रकार हैं-

छोटी असगंध (अश्वगंधा)

इसकी झाड़ी छोटी होने से यह छोटी असगंध कहलाती है, लेकिन इसकी जड़ बड़ी होती है। राजस्‍थान के नागौर में यह बहुत अधिक पाई जाती है और वहां के जलवायु के प्रभाव से यह विशेष प्रभावशाली होती है। इसीलिए इसको नागौरी असगंध भी कहते हैं।

बड़ी या देशी असगंध (अश्वगंधा)

इसकी झाड़ी बड़ी होती है, लेकिन जड़ें छोटी और पतली होती हैं। यह बाग-बगीचों, खेतों और पहाड़ी स्थानों में सामान्य रूप में पाई जाती है। असगंध में कब्‍ज गुणों की प्रधानता होने से और उसकी गंध कुछ घोड़े के पेशाब जैसी होने से संस्कृत में इसकी बाजी या घोड़े से संबंधित नाम रखे गए हैं।

बाहरी आकृति के अनुसार अश्वगंधा की प्रजातियाँ –

बाजार में अश्‍वगंधा की दो प्रजातियां मिलती हैं-
– पहली मूल अश्‍वगंधा Withania somnifera (Linn.) Dunal, जो 0.3-2 मीटर ऊंचा, सीधा, धूसर रंग का घनरोमश तना वाला होता है।
– दूसरी काकनज Withania coagulans (Stocks) Duanl, जो लगभग 1.2 मीटर तक ऊंचा, झाड़ीदार तना वाला होता है।

असली अश्वगंधा की पहचान कैसे करें –

अश्व + गंधा जैसे की नाम से ही स्पष्ट होता है अश्व =घोडा एवंम गंधा = गंध अर्थात घोड़े की गंध वाला अश्वगंधा की पहचान के लिए जब इसके पोधे को हाथ से मसलकर सुगंध लेते है तो इसकी गंध घोडे की तरह आती है ये ही अश्वगंधा की पहचान है ।

अश्‍वगंधा के अन्य भाषाओं में नाम (Ashwagandha Called in Different Languages)

यह एक झाड़ीदार पौधा है । अश्वगंधा को बहुवर्षीय पौधा भी कहते हैं. इसके फल, बीज और छाल का उपोयग विभिन्न दवाइयों को बनाने में किया जाता है । अश्वगंधा की जड़ से अश्व जैसी गंध आती है । इसीलिए इसे अश्वगंधा कहा जाता है. सभी जड़ी-बूटियों में सबसे अधिक प्रसिद्ध है. तनाव और चिंता को दूर करने में अश्वगंधा को सबसे फायदेमंद माना जाता है । बाजार में आसानी से चूर्ण वगैरह मिल जाते हैं । अश्‍वगंधा को लोग आम बोलचाल में असगंध के तौर पर जानते हैं, लेकिन देश-विदेश में इसको कई नाम से जाना जाता है। अश्‍वगंधा का का वानस्पतिक नाम (Botanical name) Withania somnifera (L.) Dunal (विथेनिआ सॉम्नीफेरा) Syn-Physalis somnifera Linn. है और इसके अन्य नाम ये हैं –

Hindi – अश्व गंधा का हिंदी भाषा में नाम – (ashwagandha in hindi language) – असगन्ध, अश्वगन्धा, पुनीर, नागोरी असगन्ध
English – अश्व गंधा का अंग्रेज़ी भाषा में नाम – (ashwagandha in english language) – Winter cherry (विंटर चेरी), पॉयजनस गूज्बेर्री (Poisonous gooseberry)
Sanskrit – अश्व गंधा का संस्कृत भाषा में नाम – (ashwagandha in sanskrit language) वराहकर्णी, वरदा, बलदा, कुष्ठगन्धिनी, अश्वगंधा
Oriya – अश्व गंधा का उड़िया भाषा में नाम – (ashwagandha in oriya language) – असुंध (Asugandha)
Urdu – अश्व गंधा का उर्दू भाषा में नाम – (ashwagandha in urdu language)- असगंधनागोरी (Asgandanagori)
Kannada – अश्व गंधा का कन्नड़ भाषा में नाम – (ashwagandha in kannad language)- अमनगुरा (Amangura), विरेमङड्लनागड्डी (Viremaddlnagaddi)
Gujarati – अश्व गंधा का गुजराती भाषा में नाम – (ashwagandha in gujrati language)- आसन्ध (Aasandh), घोडासोडा (Ghodasoda), असोड़ा (Asoda)
Tamil – अश्व गंधा का तमिल भाषा में नाम – (ashwagandha in tamil language)- चुवदिग (Chuvdig), अमुक्किरा (Amukkira), अम्कुंग (Amkulang)
Telugu – अश्व गंधा का तेलगू भाषा में नाम – (ashwagandha in telgu language) पैन्नेरुगड्डु (Panerugaddu), आंड्रा (Andra), अश्वगन्धी (Ashwagandhi)
Bengali – अश्व गंधा का बंगाली भाषा में नाम – (ashwagandha in bengali language) अश्वगन्धा (Ashwagandha)
Nepali – अश्व गंधा का नेपाली भाषा में नाम – (ashwagandha in nepali language)- अश्वगन्धा (Ashwagandha)
Punjabi – अश्व गंधा का पंजाबी भाषा में नाम – (ashwagandha in punjabi language)- असगंद (Asgand)
Malyalam – अश्व गंधा का हिंदी मलयालम में नाम – (ashwagandha in malyalam language)- अमुक्कुरम (Amukkuram)
Marathi – अश्व गंधा का मराठी भाषा में नाम – (ashwagandha in marathi language)- (ashwagandha in marathi) – असकन्धा (Askandha), टिल्लि (Tilli)
Arabic – अश्व गंधा का अरबी भाषा में नाम – (ashwagandha in arbi language)- तुख्मे हयात (Tukhme hayat), काकनजे हिन्दी (Kaknaje hindi)
Farasi – अश्व गंधा का फ़ारसी भाषा में नाम – (ashwagandha in farsi language)- मेहरनानबरारी (Mehernanbarari), असगंध-ए-नागौरी (Ashgandh-e-nagori)

उन्नतशील अश्वगंधा की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु व तापमान की जानकारी होना बहुत ज़रूरी –

अश्वगंधा की खेती के लिए 25 से 30 डिग्री तापमान और 500-750 मिली मीटर वर्षा जरूरी होती है । पौधे की बढ़वार के लिए खेत में नमी होनी चाहिए । शरद ऋतु में एक से दो वर्षा में जड़ों का अच्छा विकास होता है । अश्वगंधा का पेड़ 20 से 38 डिग्री तक का तापमान में अच्छी तरह से फल फूल सकता है एवंम ठन्डे क्षेत्रो में ये 10 डिग्री तक में ये अच्छी तरह से बढ़ सकता है जलवायु की बात की जाये तो ये उष्णकटिबंधी और समशीतोष्ण दोनों जलवायु में अच्छी तरह से परिणाम देता है।

अश्वगंधा की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी का चुनाव व खेत की तैयारी कैसे करें –

अश्वगंधा की खेती के लिए बलुई दोमट और लाल मिट्टी काफी उपयुक्त होती है । जिसका पीएच मान 7.5 से 8 के बीच रहे तो पैदावार अच्छी होगी. गर्म प्रदेशों में इसकी बुआई होती है। पर्वतीय क्षेत्र की कम उपजाऊ भूमि में भी इसकी खेती को सफलतापूर्वक किया जाता है । इसकी खेती करने के लिए एक से दो बारिश अच्छी बारिश के बाद खेत की दो जुताई के बाद पाटा चलाकर समतल कर दिया जाता है । जुताई के समय ही खेत में जैविक खाद डाल देते हैं ।

कब करें अश्वगंधा की बुवाई –

अश्वगंधा की बुआई के लिए सबसे उपयुक्त समय अगस्त का महीना होता है ।

उन्नतशील अश्वगंधा की खेती के लिए बीज का चुनाव व बीज की मात्रा व बीज उपचार –

बुआई के लिए 10 से 12 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है । सामान्यत: बीज का अंकुरण 7 से 8 दिन में हो जाता है । 8-12 महीने पुराने बीज का जमाव 70-80 प्रतिशत तक होता है । किसी भी फसल के अच्छे परिणाम के लिए हमेशा अच्छे बीजो का चयन करना एक सबसे जरुरी कदम है ठीक उसी तरह अश्वगंधा की खेती में भी हमे अश्वगंधा के बीज को उपचारित करने के बाद ही बुवाई में लेना चाहिए जिसमे हमे बीज को डायथेन एम-45 से उपचारित करना होता हैं। इस तरह एक किलोग्राम बीज को शोधित करने के लिए हमे करीब 3 ग्राम डायथेन एम. की आवश्यकता होती है।

अश्वगंधा की उन्नतशील प्रजातियाँ –

डब्लू.एस-20 (जवाहर), डब्लूएसआर, पोषिता ,असगंध-20,डब्यलू एस0-20,डब्यलू एस0-134 मुख्य है।

बीज प्रवर्धन-

अश्वगंधा की पौधा जुलाई-सितम्बर में फूल आता ह और नवम्बर-दिसम्बर में फल लगता है। अश्वगंधा की पौधे के फल से बीज निकालकर उसे सूर्य के रोषनी में सुखने दिया जाता है। बुवाई के पहले बीजों को 24 घण्टे के लिये ठण्डे पानी में भिगो दिया जाता है तथा उसे छिड़काव विधि द्वारा तैयार बीजों को सीधे खेत में बो दिया जाता है और हल्के मिट्टी से ढक दिया जाता है। अश्वगंधा को संकन क्यारी में भी बोया जाता है और दूरी 5 सेन्टीमीटर रखा जाता है। अश्वगंधा की बुवाई खरीफ में जुलाई से सितम्बर तथा रबी में अक्टूबर से जनवरी में बोया जाता है। अश्वगंधा का अंकुरण 6 से 7 दिनों में 80 प्रतिशत होताहै।

अश्वगंधा की अधिकतम उपज हेतु बुवाई की वैज्ञानिक विधि –

वर्षा होने से पहले खेत की 2-3 बार जुताई कर लें। बुआई के समय मिट्‌टी को भुरभुरी बना दें। बुआई के समय वर्षा न हो रही हो तथा बीजों में अकुंरण के लिए पर्याप्त नमी हो। वर्षा पर आधारित फसल को छिटकवां विधि से भी बोया जा सकता है। अगर सिचिंत फसल ली जाए तो बीज पंक्ति से पंक्ति 30 से. मी. व पौधे से पौधे की दूरी 5-10 से. मी. रखने पर अच्छी उपज मिलती है तथा उसकी निराई-गुडाई भी आसानी से की जा सकती है। बुआई के बाद बीज को मिट्‌टी से ढक देना चाहिए। अश्वगंधा की फसल को सीधे खेत में बीज द्वारा अथवा नर्सरी द्वारा रोपण करके उगाया जा सकता है। नर्सरी तैयार करने के लिए जून-जुलाई में बिजाई करनी चाहिए। वर्षा से पहले खेत को 2-3 बार जुताई करके मिट्‌टी को अच्छी तरह भुरभुरी बना देना चाहिए। बुआई के तुरन्त बाद फुआरे से हल्का पानी लगा दें। एक हेक्टेयर के लिए 5 किलो बीज की नर्सरी उपयुक्त होगी। बोने से पहले बीजों को थीरम या डाइथेन एम-45 से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए। ऐसा करने से अकुंर बीज जनित रोगों से सुरक्षित रहते है। बीज 8-10 दिन में अंकुरित हो जाते है। अकुंरण के बाद उनकी छटाई कर लें। पौधों की ऊंचाई 4 से 6 सें. मी. होने पर पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से. मी. व पौधे से पौधे की दूरी 5-10 सें. मी. की कर देनी चाहिए।

उर्वरक व निराई गुडाई –

अश्वगंधा की फसल में किसी प्रकार की रासायनिक खाद नही डालनी चाहिए क्योंकि इसका प्रयोग औषधि निर्माण में किया जाता है लेकिन बुआई से पहले 15 किलो नाईट्रोजन प्रति हैक्टर डालने से अधिक ऊपज मिलती है। बुआई के 20-25 दिन पश्चात्‌ पौधों की दूरी ठीक कर देनी चाहिए। खेत में समय-समय पर खरपतवार निकालते रहना चाहिए। अश्वगंधा जड़ वाली फसल है इसलिए समय-समय पर निराई-गुडाई करते रहने से जड़ को हवा मिलती रहती है जिसका उपज पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

सिंचाई –

सिंचित अवस्था में खेती करने पर पहली सिंचाई करने के 15-20 दिन बाद दूसरी सिंचाई करनी चाहिए। उसके बाद अगर नियमित वर्षा होती रहे तो पानी देने की आवश्यकता नही रहती। बाद में महीने में एक बार सिंचाई करते रहना चाहिए। अगर बीच में वर्षा हो जाए तो सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती। वर्षा न होने पर जीवन रक्षक सिंचाई करनी चाहिए। अधिक वर्षा या सिंचाई से फसल को हानि हो सकती है। 4 ई.सी. से 12 ई.सी. तक वाले खारे पानी से सिंचाई करने से इसकी पैदावार पर कोई असर नही पड़ता परन्तु गुणवत्ता 2 से 2.5 गुणा बढ़ जाती है।

अश्वगंधा की खेती में फसल सुरक्षा प्रबंधन –

जड़ों को निमेटोड के प्रकोप से बचाने के लिए 5-6 कि.ग्रा ग्राम फ्यूराडान प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय खेत में मिला देना चाहिए। पत्ती की सड़न (सीडलीग ब्लास्ट) व लीफ स्पाट सामान्य बीमारियां हैं। जो खेत में पौधों की संखया कम कर देती हैं। अतः बीज को डायथीन एम-45 से उपचारित करके बोना चाहिए। एक माह पुरानी फसल को 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में डायथीन एम-45 मिलाकर 7-10 दिन के अंतर पर छिड़काव करते रहना चाहिए जब तक बीमारी नियंत्रित न हो जाए। पत्ती भक्षक कीटों से फसल को सुरक्षित रखने के लिए रोगर या नुआन 0.6 प्रतिशत का छिड़काव 2-3 बार करना चाहिए।

अश्वगंधा की कीमत –

अश्वगंधा की कीमत की बात की जाये तो ये 70 से 90 रूपये किलो तक ये बिकता है जो की अश्वगंधा के बीज और जड़ो के रूप में मिलता है
अश्वगंधा चूर्ण पतंजलि मूल्य:- पतंजलि अश्वगंधा चूर्ण बाजार में 100 gm की पैकिंग में करीब 60 रूपये तक मिलता है। जुलाई से सितम्बर तक की जाने वाली अश्वगंधा की खेती 5 से 6 महीने में पक कर हमे लागत से करीब तीन गुणा (जिसमे हमे प्रति हेक्टेअर में करीब 3 से 4 कुंतल जड़ और 50 किग्रा तक बीज ) तक लाभ देती है । मार्च तक अश्वगंधा के पौधे को उखाड़ कर खेत से अलग कर लिया जाता है जड़ों को 8 सेन्टीमीटर लंबाई में टुकड़े कर उन्हें सुखाया जाता है । इसके अलावा पौधे के पके फल से बीज और सुखे पतियॉ प्राप्त होती हैं। अन्य फसलो की तरह इसमें भी खाद उर्वरक की बात करे तो मिट्टी में बुवाई से पहले गोबर की खाद , एवंम बोआई के समय नत्रजन व फास्फोरस का 15 -15 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिये ।

Safflower Farming : कुसुम अथवा करडी की खेती की जानकारी

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कुसुम का वैज्ञानिक नाम कार्थैमस टिन्क्टोरियस है। इसे अंग्रेज़ी में safflower, तथा अलाज़ोर, अमेरिकन सैफ्रन, बेनीबाना, बेनिबाना ऑयल, बेनिबाना फ्लावर के नामों से जाना जाता है। एस्टेरैसिया फैमिली के इस पौधे बीज और पत्ते उपयोग में लाए जाते हैं। कुसुम की खेती तेल तथा रंग प्राप्त करने के लिए की जाती है । देश के शुष्क भागों,बारानी क्षेत्रों, (असिंचित क्षेत्रो) में उगाई जाने वाली कुसुम प्रमुख तिलहनी फसल है जिसमें सूखा सहने की क्षमता अन्य फसलों से ज्यादा होती है। कुसुम फूलों में मुख्यतः रंगो के दो पदार्थ कार्थामिन व पीली रंग पाया जाता है। भारत वर्ष से कार्थामिन का निर्यात करके विदेशी पूँजी अर्जित की जा सकती है कपड़े व खाने के रंगो में कुसुम का प्रयोग किया जाता है।

Safflower Farming : कुसुम अथवा करडी की उन्नतशील खेती की जानकारी –

Safflower Farming : कुसुम अथवा करडी की उन्नतशील खेती की जानकारी
Safflower Farming : कुसुम अथवा करडी की उन्नतशील खेती की जानकारी

कुसुम का पौधा लंबा होता है। इसके पत्ते और फूल दोनों ही नुकीले होते हैं और इस पौधे के फूल का रंग पीला और नारंगी होता है। मिस्र में पुराने समय में इन फूलों का उपयोग कपड़ों में रंग भरने के लिए डाई के रूप में किया जाता था। मौजूदा समय में कई स्थानों पर कुसुम की पंखुड़ियों को केसर के विकल्प के रूप में उपयोग किया जाता है। कुसुम के बीज से तेल निकाला जाता है जो कई प्रकार से हमारे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है।

कुसुम तेल की दो किस्में उपलब्ध हैं: हाई-लिनोलिक और हाई-ओलिक। हाई-लिनोलिक कुसुम का तेल पॉलीअनसैचुरेटेड फैट से समृद्ध होता है है, जबकि हाई-ओलिक में मोनोअनसैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक होती है। पॉलीअनसेचुरेटेड कुसुम का तेल उन चीजों के लिए अच्छा माना जाता है जिन्हें गर्म करने की जरूरत नहीं होती जैसे- विनिग्रेट (सलाद का स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होने वाला तेल, सिरका और जड़ी बूटियों का मिश्रण) और मोनोअनसैचुरेटेड कुसुम का तेल उच्च तापमान पर पकाए जाने वाले खाद्य पदार्थों के लिए अच्छा है।

कुसुम में पाए जाने वाले पोषक तत्व –

इसके दाने में तेल की मात्रा 30 – 35 प्रतिशत होती है। तेल खाने-पकाने व प्रकाश के लिए जलाने के काम आता है।इसके हरे पत्तों में लोहा व केरोटीन (विटामिन ए) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। अतः इसके हरे व कोमल भाग स्वादिष्ट व पौष्टिक सब्जी बनाने के लिए सर्वोत्तम है। इसके फूल की पंखुड़ियों की चाय स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद रहती है। इसके तेल में उपस्थित पोली अनसैचूरेटेड वसा अम्ल अर्थात लिनोलिक अम्ल (78%) खून में कोलेस्ट्राल स्तर को नियंत्रित करता है जिससे हृदय रोगियो के लिए विशेष उपयुक्त रहता है।

कुसुम के उपयोग –

– यह साबुन, पेंट, वार्निश, लिनोलियम तथा इनसे सम्बन्धित पदार्थों को तैयार करने के काम मे भी लिया जाता है।
– इसके तेल से तैयार पेंट व वार्निश स्थाई चमक व सफेदी होती है जो कि अलसी के तेल से बेहतर होती है।
– इसका तेल सफोला ब्रांड के नाम से बेचा जाता है। इसके तेल वाटर प्रूफ कपड़ा भी तैयार किया जाता है।
– इसके तेल से रोगन तैयार किया जाता है जो शीशे जोड़ने के काम आता है।
– कुसुम के छिले दानों से प्राप्त खली पशुओं को खिलाने बिना दानों से प्राप्त खली, खाद के रूप में प्रयोग की जाती है। दानों से प्राप्त छिलका सैल्यूलोज आदि के बनाने में प्रयोग में लिया जा सकता है। तेल के अतिरिक्त इसके दानों को भूनकर खाया भी जाता है।

कुसुम की उन्नतशील खेती के लिए उपयुक्त जलवायु –

कुसुम की खेती सूखे तथा ठण्डे मौसम में की जाती है। इसकी जड़ें काफी गहराई से मृदा नमी का अवशोषण कर सकती है, इससे यह फसल सूखे को सहन कर सकती है। इसकी खेती 60 – 90 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलता पूर्वक की जा सकती है। बीज अंकुरण के लिए 15-16 डि से तथा फूल आने के समय तापक्रम 24 से 32 डि से के मध्य होने से उपज अच्छी प्राप्त होती है। कुसुम एक अप्रदीप्तकाल फसल है परन्तु लम्बे प्रकाशकाल में अधिक उपज देती है। पाले से कुसुम की फसल को क्षति होती है।

आधुनिक तरीके से कुसुम की खेती के लिए भूमि का चुनाव कैसे करें –

रेतीली भूमि को छोड़कर कुसुम उत्तम जल निकास वाली सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती हैं। उत्तर भारत में कुसुम क¨ सामान्यतः बलुई दोमट या दोमट भूमि में ही बोया जाता है परन्तु दक्षिण भारत में इसकी खेती प्रायः भारी कपास की काली मिट्टी में की जाती है ।मध्यम भारी किस्म की भूमि इसके लिये अधिक उपयुक्त हैं। हल्की एल्यूवियल मृदाओं में कुसुम की अच्छी उपज आती है। लवणीय मृदा में कुसुम को उगाया जा सकता है परन्तु अम्लीय भूमि में इसकी खेती नहीं की जा सकती है। बहुत अधिक उपजाऊँ भूमि में पौध वृद्धि अधिक होती है तथा बीज कम बनते है ।

कुसुम की अधिक पैदावार के लिए कैसे करें भूमि की तैयारी –

कुसुम की खेती के लिए अधिक भूपरिष्करण की आवश्यकता नहीं रहती । खरीफ की फसल काटने के पश्चात् 2 – 3 बार हल या बखर से जुताई करके पाटा चलाकर खेत को ढेले रहित भुरभुरा एवं समतल कर लेना चाहिए।

कुसुम की फसल से अधिकतम पैदावार लेने के लिए उन्नत क़िस्मों का चयन करें –

उन्नत किस्मों का स्वस्थ बीज बोआई हेतु प्रयोग करना चाहिये। कुसुम की किस्मों को उसकी पत्तियों में पाए जाने वाले काँटों के आधार पर काँटेदार व काँटेरहित वर्ग में वर्गीकृत किया गया है। काँटे दार किस्मों में सस्य क्रियाएँ व कटाई-मड़ाई संपन्न करने में कठिनाई होती है। परन्तु अब बिना काँटे वाली उन्नत किस्में भी विकसित हो चुकी हैं। आमतौर पर काँटेदार किस्में तेल के उद्देश्य से व काँटेरहित किस्में रंग, चारे व सब्जी के उद्देश्य से उगाई जाती है। काँटेरहित अर्थात् रंग के लिए उगाई गई किस्मों में नारंगी या पीले स्कारलैट रंग के आते हैं। काँटेदार अर्थात् तेल के लिए उगाई गई किस्मों में पीले रंग के फूल ही अक्सर आते हैं।

कुसमु की प्रमुख संकर एवं उन्नत किस्मों की विशेषताएँ –

के 65:

यह कुसुम की अच्छी प्रजाति है, जो 180 से 190 दिन में पकती है| इसमें तेल की मात्रा 30 से 35 प्रतिशत होती है और औसत उपज 14 से 15 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है|

मालवीय कुसुम 305:

यह भी कुसुम की अच्छी किस्म है जो 160 दिन में पकती है| इस किस्म में तेल की मात्रा 36 प्रतिशत तक पाई जाती है|

ए 300:
यह किस्म 160 से 170 दिनों में पककर 8 से 9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की औसत पैदावार देती है| इस किस्म के पुष्प पीले रंग के होते हैं तथा बीज मध्यम आकार एवं सफेद रंग के होते हैं| बीजों में 31.9 प्रतिशत तेल पाया जाता है|
ए 1- यह किस्म भी ए:

300 के समान 160 दिनों में पककर 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की औसत पैदावार देती है| इसके बीज सफेद रंग के होते हैं तथा इसके बीजों में 30.8 प्रतिशत तेल पाया जाता है|

अक्षागिरी 59-2:

इस किस्म की औसत पैदावार 4 से 5 क्विंटल प्रति हेक्टर है| यह किस्म 155 दिनों में पककर तैयार हो जाती है| इसके पुष्प पीले रंग और बीज सफेद रंग के होते हैं| इसके दानों में 31 प्रतिशत तेल पाया जाता है|

जेएसएफ-1(श्वेता):

यह किस्म 135-145 दिन में तैयार होती है जिसकी उत्पादन क्षमता16-20 क्विंटल प्रति हैक्टर आंकी गई है । भुनगा (एफिड) की प्रतिरोधी किस्म है ।

जेएसएफ-5 (जवाहर कुसुम 5):

यह देरी से पकने वाली किस्म हैं जो लगभग 145 से 150 दिनो में पक जाती है। इसका दाना सफेेद, ठोस तथा लम्बा एवं छोटा होता है। औसत पैदावार लगभग 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा बीज में तेल कर मात्रा 35 से 36 प्रतिशत होती हैं। यह बिना काँटों वाली किस्म है। यह संपूर्ण मालवा क्षेत्र के लिये उपयुक्त है तथा इस पर एफिड का प्रकोप कम होता है।

जेएसआई-7:

यह देरी से पकने वाली किस्म है जो लगभग 130 दिनों में पक जाती है। औसत पैदावार लगभग यह 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा इसके बीज में तेल की मात्रा 30 प्रतिशत होती है। यह बिना काँटों वाली किस्म है।

एनएआरआई – 6:

यह 117-137 दिन में तैयार होती है। इसका दाना सफेद चमकीला होता है। औसतन पैदावार लगभग 10-11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा तेल की मात्रा 35 प्रतिशत होती है। यह एक काँटेरहित किस्म है जो उकठा व पत्ती वाले रोगों के प्रति सहनशील पाई गई है ।

डीएसएच-129:

कुसुम की यह संकर 129 दिन में तैयार ह¨कर लगभग 19.89 क्विंटल उपज देती है । आल्टरनेरिया, लीफ ब्लाइट रोग तथा एफिड कीट रोधी है । इसके 100 दानो का भार 7 ग्रा तथा तेल की मात्र्ाा 31 प्रतिशत ह¨ती है ।

एनएआरआईएनएच-1:

यह 130 दिन में तैयार होने वाली विश्व की प्रथम कांटो रहित संकर कुसुम है । इसकी दानो की उपज 19.36 क्विंटल के अलावा 2.15 क्विंटल प्रति हैक्टर उपय¨गी फूल भी प्राप्त ह¨ते है । इसके 100 दानो का भार 3.8 ग्राम तथा इनमें 35 प्रतिशत तेल पाया जाता है । उकठा रोग प्रतिरोधी है ।

जे.एस.आई. – 73:

यह देरी से पकने वाली किस्म है जो कि लगभग 147 दिन में पक जाती है। औसत पैदावार लगभग यह 14.50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा इसके बीज में तेल की मात्रा 31 प्रतिशत होती है। यह बिना काँटो वाली किस्म है।

जे.एस.एफ.-97:

यह 132 दिन में पकने वाली काँटेरहित किस्म है जो कि लगभग 15 – 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है तथा इसके बीज में तेल की मात्रा 30 प्रतिशत होती है। पौधों की लम्बाई 90 सेमी., पुष्प प्रारम्भ में पीले तथा बाद में मौसमी लाल रग के हो जाते हैं।

जे.एल.एस.एफ.-414 (फुले कुसुम):

यह सूखा सहनशील किस्म है जो 125 – 140 दिनों में पक जाती है। असिंचित अवस्था में औसतन 12 – 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है तथा इसके बीज में तेल की मात्रा 28 – 29 प्रतिशत होती है।

एमकेएच-11:

यह संकर 130 दिन में तैयार होती है जिसकी उपज क्षमता 19 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है । दानो में तेल की मात्रा 31 प्रतिशत होती है ।

कुसुम की अन्य क़िस्में –

कुसुम की एनएआरआई-एनएच 1, एनएआरआई-एच 15, ए 1, एनएआरआई 6, परभणी कुसुम (पीबीएनएस 12), फुले कुसुम, पीबीएनएस 40, एसएसएफ 658, एसएसएफ 648, फुले एसएसएफ 733, एनएआरआई एनएच 1, एनएआरआई-एच 15 संकर किस्में हैं, वहीं एनएआरआई 6, परभणी कुसुम (पीबीएनएस 12), फुले कुसुम, पीबीएनएस 40, एसएसएफ 658, एसएसएफ 648, फुले एसएसएफ 733, जेएसएफ 1, जेएसआई 7, और जेएसआई 73 आदि उन्नत किस्में हैं।

वैज्ञानिक विधि से कुसुम की खेती में बुआई का समय एक महत्वपूर्ण फ़ैक्टर –

वर्षा समाप्त होते ही सितम्बर माह के अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक इसकी बोनी करनी चाहिये। बरानी क्षेत्रों में अक्टूबर माह के बाद इसकी बोनी करना लाभप्रद नहीं हैं क्योंकि देरी से बोनी करने से फसल पर न केवल एफिड का प्रकोप अधिक हैं, वरन् प्रति हेक्टेयर पैदावार भी कम प्राप्त होती है। सिंचित क्षेत्रों में अक्टूबर के अंत तक इसकी बोनी की जा सकती है।

कुसुम की खेती से अधिक पैदावार हेतु बीज दर व बीजोपचार बहुत ज़रूरी –

बीज दर बोने की विधि, खेत में नमी की मात्रा , बोई जाने वाली किस्म तथा बीज की अंकुरण क्षमता पर निर्भर करती है । कुसुम की बुआई के लिए सिंचित दशा में 10 – 15 किग्रा. असिंचित दशा के लिए 15-20 किग्रा. तथा मिश्रित फसल के लिए 4 – 5 किग्रा. प्रति हे. बीज की आवश्यकता पड़ती है। बोनी के पूर्व बीज को कार्बे्न्डाजिम (2 ग्राम प्रति किग्रा. बीज) से बीजोपचार करना चाहिये। इससे जड़ सड़न रोग नही लगता। कुसुम के बीज का बाहरी खोल बहुत अधिक सख्त रहता है। अतः बीज को करीब 24 घंटे तक पानी में भिगोकर बाद में बोना चाहिये। इससे बीज का खोल मुलायम पड़ जाता है और अंकुरण जल्दी हो जाता है।
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कुसुम की खेती के लिए बोआई की विधियाँ –

कुसम की बुआई छिंटकवाँ विधि, हल के पीछे कूँड़ में तथा सीड ड्रिल से कतारो में की जाती है । यह बहुत आवश्यक है कि कुसुम का बीज भूमि में नमी वाली तह पर पहुँचे अन्यथा अंकुरण कम होगा । छिटकवाँ विधि की अपेक्षा बुआई हल के पीछे पंक्तियों में या सीड ड्रिल से करना उचित रहता है । कुसुम की सिंचित शुद्ध फसल 40-50 से.मी तथा वर्षा पोषित फसल 60 से.मी. की दूरी पर बोना चाहिए। दोनों ही परिस्थितियो में पौधे-से-पौधे की दूरी 20-25 से.मी. रखना चाहिए । बारानी या असिंचित अवस्था में 111,000 पौधे तथा सिंचित दशा में 75000-80,000 पौध संख्या प्रति हैक्टर अच्छी उपज के लिए आवश्यक रहती है । बुआई 3-5 सेमी. गहराई पर करना चाहिये। खाद बीज से 2 से 4 से.मी. नीचे तथा नमी में पड़ना चाहिये।

पोषण प्रबंधन – कुसुम की फसल से अधिकतम लाभ हेतु खाद एवं उर्वरक का ज्ञान होना ज़रूरी –
बारानी अथवा असिंचित परिस्थितियो में भी खाद एवं उर्वरक देने से कुसुम की उपज में आशातीत वृद्धि होती है । कुसुम की फसल प्रति हैक्टर भूमि से ओसतन 60-65 किग्रा. नत्रजन, 27-30 किग्रा. फॉस्फ़ोरस और 40-50 किग्रा. पोटाष ग्रहण करती है । अतः उर्वरको की सही और संतुलित मात्रा में देने से ही अपेक्षित उत्पादन प्रप्त किया जा सकता है । खेत की अंतिम जुताई के समय 2 या 3 वर्ष में एक बार 10-12 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मिलाना चाहिये। असिंचित क्षेत्रों तथा हल्की जमीनों में 30 किलो नत्रजन एवं 30 किलो स्फुर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से तथा भारी काली जमीन में 40 किलो नत्रजन तथा 40 किलो स्फर प्रति हेक्टेयर देना चाहिये। इनके अलावा 10-20 किग्रा. प्रति हैक्टर पोटाश देना लाभकारी पाया गया है। उर्वरक की मात्रा मृदा परीक्षण के आधार पर कम या अधिक की जा सकती है। उर्वरकों को बोनी के समय कूड़ों में ही डालना चाहिये। नत्रजतन, फास्फोरस व पोटाश को क्रमशः अमोनियम सल्फेट, सिंगल सुपर फास्फेट व पोटेशियम सल्फेट उर्वरक से देना चाहिए। इन उर्वरकों से फसल को गन्धक भी प्राप्त हो जाता है जिससे तेल की मात्रा व गुणों में सुधार होता है।

सिंचाई एवं जल माँग प्रबंधन –

कुसुम की खेती प्रायः बारानी दशा में की जाती है और कुसुम को सूखा सहने वाली फसल माना जाता है । फिर भी फसल की क्रांतिक अवस्थाओ पर सिंचाई करने पर अधिक उपज प्राप्त होती है। सिंचाई की सुविधा होने पर दो सिंचाई, पहली बुआई के 30 दिन बाद व दूसरी सिंचाई फूल आते समय देने पर अधिक उपज प्राप्त होती है। कुसमु की पुष्पावस्था व दाना भरने की अवस्था पर नमी की कमी से उपज में गिरावट आती है। खेत में जल निकास अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि थोड़े जल भराव से ही फसल को क्षति होती है।
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कुसुम फसल में खरपतवार नियंत्रण –

कुसुम के बीज बोने के 4-6 दिन में अंकुरित हो जाते है । फसल की प्रारंभिक अवस्था में दो बार खुरपी या कुदाल से द्वारा निराई-गुड़ाई की जाती है । पहली निराई-गुड़ाई बुआई के 20 दिन बाद तथा दूसरी बुआई के 40 दिन बाद करने से खरपतवार नियंत्रण में रहते है और पौध वृद्धि अच्छी ह¨ती है। बोने के 10-15 दिन बाद कुसुम के घने पौधों को उखाड़कर पौधों के बीच आवश्यक अंतरण स्थापित कर लेना चाहिये। उखाड़े गये पौधों का उपयोग भाजी के रूप में किया जा सकता है। फसल के जीवन काल में एक बार पौधो पर मिट्टी चढ़ाना भी लाभदायक पाया गया है, परन्तु यह क्रिया प्रचलन में नहीं है । खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण हेतु फ्लूक्लोरालिन 1.5 किग्रा. प्रति हे. को 800 लीटर पानी में घोलकर अंकुरण पूर्व खेत में छिड़कना चाहिये। अधिकतम पैदावार के लिये पौधे जब डेढ़ या दो माह के हो जावें तब उनकी ऊपरी शाखा (फुनगी) को तोड़ देना चाहिये । सर्वप्रथम पौधो की मध्य शाखा पर फूल आता है जिसे तोड़ देने से अन्य फूल वाली शाखाएँ बगल से फूट पड़ती है जिससे उपज बढ़ती है । तोड़ी गई कोमल शाखाओं एवं पत्तियो को हरे चारे एवं हरी सब्जी के लिये उपयोग में लाया जाता है। जानवरों के लिये भी यह एक पौष्टिक आहार है।
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कुसुम की खेती फसल पद्धति –

कुसुम की खेती ज्वार, बाजरा, धान सोयाबीन आदि खरीफ फसलों के पश्चात् रबी फसल के रूप में की जाती है। कुसुम गेहूँ, जौ, चना के साथ मिलाकर मिश्रित फसल के रूप में भी उगाया जाता है। चना व कुसुम (3.1), धनियाँ व कुसुम (3.1) तथा अलसी व कुसुम (2.1) की सह फसली पद्धतियाँ लाभदायक पायी गई है। शरदकालीन गन्ने के साथ भी कुसुम की बुआई की जा सकती है। रबी की फसलों के खेत के चारों और काँटेदार किस्मों को रक्षा पंक्ति के रूप में इसकी फसल उगाते हैं।

कुसुम की फसल की पक्षियो से सुरक्षा –

कुसुम की फसल की पक्षियो विशेषकर तोतों से बहुत नुकसान होता है । नये क्षेत्रो जहां कुसुम नही लगाई जाती वहां पक्षियो से अधिक हांनि होती है । जब दाने पड़ने एवं पकने की अवस्था पर फसल की पक्षियो से सुरक्षा करना आवश्यक रहता है । कांटे वाली किस्मो में पक्षियो से क्षति कम होती है ।

Safflower Farming : कुसुम अथवा करडी की उन्नतशील खेती की जानकारी
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समय से कटाई एवं गहाई करें –

कुसुम की फसल लगभग 115 से 140 दिन मे पककर तैयार हो जाती है। फसल पकने पर पत्तियाँ व कैपसूल पीले पड़ जाते है व सूखने लगते है। दाने सफेद चमकीले दिखाई देने लगते है। पकने पर दानो में 12-14 प्रतिशत नमी रह जाती है । देर से कटाई करने पर दाने खेत मे ही झड़ने लगते है। समय से पूर्व कटाई करने पर उपज कम प्राप्त होती है साथ ही तेल के गुणों में भी गिरावट आती है। जब फसल पूरी तरह से पक जावे तब हँसिया या दराते से कटाई कर लेना चाहिये। सुबह के समय कटाई करने से पौधे टूटने से बच जाते है और काँटों का प्रभाव भी कम होता है। काँटों से बचाव के लिये हाथों में दास्ताने पहन कर या दो नाली लकड़ी के पौधों को फँसाकर करना चाहिये। कटाई के बाद फसल के छोटे-छोटे गट्ठर बना कर खलिहान में रखकर धूप मे सुखा लेना चाहिये। फसल की गहाई, लकड़ी से पीटकर या गेहूँ गहाई की मशीन (थ्रेशर) से कर लेना चाहिये। साफ दानो को 3 – 4 दिन धूप में सुखाकर (नमी का स्तर 8 प्रतिशत रहने पर) भण्डारण करना चाहिए।

रंग प्राप्त करने फूलो की चुनाई कुसुम की फसल से बीज व रंग दोनों प्राप्त करने के लिए फूल में निषेचन की क्रिया के बाद पुष्पदल एकत्रित कर लिए जाते है तथा बीज पकने के लिए छोड़ देते है। गर्भाधान के पश्चात फूलो की पंखुड़ियो का रंग गहरा और चमकीला हो जाता है । इसी समय इन्हे रंग प्राप्त करने के लिए तोड़ लेना चाहिए । पंखुड़ियाँ तोड़ने का कार्य 2-3 दिनो के अन्तर पर कई बार करना पड़ता है । उचित समय पर इन्हे न तोड़ने से कम मात्रा में और घटिया किस्म का रंग निकलता है । गर्भाधान समाप्त होने के कारण इन पंखुड़ियो के तोड़ लेने से बीज की उपज पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता ।फूलने के समय वर्षा हो जाने से रंग धुल जाता है जिससे व्यापक हांनि होती है ।

फूलों से रंग प्राप्त करने के लिए इनकी पंखुड़ियो को छाया में सुखाया जाता है। सूखे फूलों को हल्के अम्लीय पानी में लगातार 3 – 4 दिन तक धोते है। इससे पानी में घुलनशील पीला रंग पानी में घुल जाता है। शेष पदार्थ को सुखाकर टिक्की के रूप में बिक्री के लिए तैयार करते है। व्यापारिक दृष्टिकोण से उपयोगी कार्थामिन धुले हुए पुष्प के भाग से निकाला जाता है। इसे सोडियम बाइकार्बोनेट से उपचारित किया जाता है तथा हल्के अम्लों से इसका प्रैसिपिटेट प्राप्त किया जाता है।कुसुम का कार्थामिन लुगदी के रूप में बाजार में बेचा जाता है। यह पदार्थ रंगाई के काम में आता है।

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सोयाबीन की खेती की जानकारी | Soyabean Ki Kheti

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सोयाबीन को गोल्डन बीन्स भी कहा जाता हैं । सोयाबीन अर्थात ग्लाइसिन मैक्स दलहनी कुल की तिलहनी फसल है। इसे एक चमत्कारी फसल की संज्ञा दी गई है । सोयाबीन को पिला सोना कहा जाता है । किसानों का मानना है कि सोयाबीन की खेती से निश्चित रूप से लाभ मिलता है इसमें नुक़सान की गुंजाइश कम होता है । भारत का मध्य प्रदेश राज्य काला सोना (अफ़ीम) और पीला सोना (सोयाबीन) के लिए जाना जाता है ।

सोयाबीन में पाए जाने वाले पोषक तत्व –

सोयाबीन के दाने में 40-42 प्रतिशत उच्च गुणवत्ता वाली प्रोटीन और 18-20 प्रतिशत तेल के अलावा 20.9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 0.24 प्रतिशत कैल्शियम, 11.5 प्रतिशत फास्फोरस व 11.5 प्रतिशत लोहा पाया जाता है। सोयाबीन में 5 प्रतिशत लाइसिन नामक अमीनो अम्ल पाया जाता है ।

सोयबीन का महत्व –

सोयबीन में मात्रा में विटामिन पाये जाने के कारण एन्टीबायटिक दवा बनाने के लिए यह विशेष उपयुक्त है । प्रोटीन व तेल की अधिकता के कारण इसका उपयोग घरेलू एंव औद्योगिक स्तर पर किया जाता है। सोयाबीन ऐसा खाद्य पदार्थ है जो लगभग गाय के दूध के समान पूर्ण आहार माना जाता है । इससे दूध, दही तथा अन्य खाद्य साम्रगी तैयार की जाती है। बीज में स्टार्च की कम मात्रा तथा प्रोटीन की अधिकता होने के कारण मधुमेह रोगियों के लिए यह अत्यंत लाभप्रद खाद्य पदार्थ हैं। इसके अलावा वनस्पति तेल-घी, साबुन, छपाई की स्याही, प्रसाधन सामग्री, ग्लिसरीन, औषधियाँ आदि बनाई जाती हैं। सोयाबीन की खली और भूसा मूर्गियों एंव जानवरों के लिए सर्वोत्तम भोजन है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में ग्रंथियाँ पाई जाती हैं जो जिनमे वायुमंडलीय नत्रजन संस्थापित करने की क्षमता होती हैं जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है। सोयाबीन का विविध प्रयोग एवं अनेक विशेषताएँ होने के कारण इसे मिरेकल क्राप और चमत्कारी फली कहा जाता हैं।सोयाबीन की दाल की उपयोगिता अधिक है । इससे तरह-तरह के व्यंजन बनते है । परन्तु अभी भी भारतीय घरो में सोयाबीन के उत्पाद अधिक प्रचलित नहीं हुए है ।

कहाँ होती है सोयबीन की खेती – where to soyabean cultivation in india

सम्पूर्ण भारत के कुल उत्पादन का 59.06 प्रतिशत सोयाबीन उत्पादन कर मध्यप्रदेश प्रथम स्थान पर है , इसलिए इसे सोयाबीन राज्य के नाम से जाना जाता है। प्रदेश में वर्ष 2008-09 में सोयाबीन 5.12 मिलियन हैक्टर क्षेत्र में उगाया गया जिससे 5.85 मिलियन टन उत्पादन प्राप्त किया गया । प्रदेश में सोयाबीन की औसत उपज 1142 किग्रा, प्रति हैक्टर रही । छत्तीसगढ़ राज्य में 133.06 हजार हेक्टेयर में सोयाबीन की खेती होती है जिससे 1114 किग्रा. प्रति हेक्टेयर औसत उपज प्राप्त होती है ।

सोयाबीन की खेती उन्नत खेती की जानकारी | Soyabean modern cultivation information in hindi

सोयाबीन की खेती उन्नत खेती की जानकारी | Soyabean modern cultivation information in hindi
सोयाबीन की खेती उन्नत खेती की जानकारी | Soyabean modern cultivation information in hindi

सोयाबीन को प्रोटीन का सबसे अच्छा स्रोत माना जाता है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान के अनुसार 100 gm सोयाबीन में लगभग 36.9 gm प्रोटीन पाया जाता है। जिससे रोजाना के लिए ज़रुरी प्रोटीन का एक बड़ा हिस्सा आप हासिल कर सकते हैं । इस लेख में हम सोयाबीन की खेती की जानकारी देने जा रहे हैं।

सोयबीन की खेती के उपयुक्त जलवायु –

साधारण शीत से लेकर साधारण उष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में सोयाबीन की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। सोयाबीन के बीजो का अंकुरण 20-32 डि से तापक्रम पर 3-4 दिन में हो जाता है। फसल वृद्धि के लिए 24-28 डिग्री से तापमान उचित रहता है। बहुत कम (10 डि से से कम) या अधिक होने पर सोयाबीन की वृद्धि, विकास एंव बीज की गुणता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सोयाबीन एक अल्प प्रकाशापेक्षी पौधा है जिससे इसकी अधिकांश किस्मों में दिन छोटे व रातें लम्बी होने पर ही फूल आता है। इसकी अधिकांश किस्मों में दिन की अवधि 14 घंटे से कम होने पर ही फूल आता है। भारत में खरीफ में उगाई जाने वाली किस्में प्रकाशावधि के लिए अधिक संवेदनशील होती हैं। अच्छी फसल के लिए 62-75 सेमी. वार्षिक वर्षा होना आवश्यक हैं। शाखाएँ व फूल बनते समय खेत में नमी रहना आवश्यक है । पुष्पीय कलियो के विकसित होने के 2-4 सप्ताह पूर्व पानी की कमी होने से पौधो की शाकीय वृद्धि घट जाती है जिसके फलस्वरूप अधिक संख्या में फूल व फलियाँ गिर जाती है । फल्लियाँ पकते समय वर्षा होने से फलियो पर अनेक रोग लग जाते है जिससे वे सड़ जाती है साथ ही बीज गुणता में भी कमी आ जाती है । यदि कुछ समय तक पौधे सूखे की अवस्था में रहे और इसके बाद अचानक बहुत वर्षा हो जाए या सिंचाई कर दी जाए, तो फल्लियाँ गिर जाती है।

सोयाबीन की खेती के लिए उपयुक्त भूमि का का चुनाव –

सोयाबीन की खेती के लिए उचित जल निकास वाली हल्की मृदायें अच्छी रहती हैं। दोमट, मटियार दोमट व अधिक उर्वरता वाली कपास की काली मिट्टियों में सोयाबीन फसल का उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा सकता है। भूमि का पी. एच. मान 6.5 से 7.5 सर्वोत्तम पाया गया है। छत्तीसगढ़ की डोरसा एंव कन्हार जमीन सोयाबीन की खेती के लिए अच्छी होती है। अम्लीय मृदाओं में चूना तथा क्षारीय मृदाओंमें जिप्सम मिलाकर खेती करने से इसकी जड़ों में गाँठों का विकास अच्छे से होता है।

सोयाबीन की उन्नत खेती के लिए खेत की तैयारी कैसे करें -field preparation for soyabean farming

खेत की मिट्टी महीन, भुरभुरी तथा ढेले रहित होनी चाहिए। पिछली फसल की कटाई के तुरंत बाद खेत में गहरी जुताई करने से भूमि में वायु संचार और जल सग्रहण क्षमता बढ़ती है और विभिन्न खरपतवार, रोगाणु व कीट आदि धूप से नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद दो या तीन बार देशी हल से खेत की जुताई कर पाटा चलाकर खेत को समतल व भुरभुरा कर लेना चाहिए। खेत में हल्का ढलान देकर जल निकास का समुचित प्रबंध भी कर लेना चाहिए। समयानुसार वर्षा न होने की स्थिति में सिंचाई उपलब्ध हो तो पलेवा देकर बुवाई की जा सकती है। ऐसा करने पर अंकुरण अच्छा होता है।

आधुनिक सोयाबीन की खेती के लिए उन्नत क़िस्मों की जानकारी –

सोयाबीन की सफल खेती, साथ ही साथ अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने का प्रमुख आधार, उपयुक्त किस्म का चयन व उत्तम बीज का चुनाव ही है। उत्तम किस्म का सोयाबीन का स्वस्थ बीज बोने से उपज में लगभग 20-25 प्रतिशत की वृद्धि की जा सकती है। उन्नत किस्म का बीज राज्य कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विभाग या अन्य विश्वसनीय प्रतिष्ठानो से क्रय किया जाना चाहिए।

सोयाबीन की प्रमुख उन्नत किस्मो की विशेषताएँ –

1.जेएस. 93-05 –

सोयाबीन की यह शीघ्र पकने (90-95 दिन) वाली किस्म है । इसके फूल बैंगनी रंग के ह¨ते है तथा फली में चार दाने होते है । इस किस्म की उपज क्षमता 200-2500 किग्रा.प्रति हैक्टर आंकी गई है ।

2.जेएस. 72-44-

सोयाबीन की यह भी अगेती (95-105 दिन) किस्म है । इसका पौधा सीधा, 70 सेमी. लम्बा। होता है । इसकी उपज क्षमता 2500-3000 किग्रा. प्रति हैक्टर है ।

3.जे. एस.-335-

यह 115-120 दिन में पकने वाली किस्म है जिसका दाना पीला तथा फल्लियाँ चटकने वाली होती है । इसकी ओसत उपज 2000-2200 किग्रा. प्रति हैक्टर होती है ।

4.जेएस. 90-41-

सोयाबीन की यह किस्म 90-100 दिन में तैयार होती है । इसके फूल बैंगनी रंग के ह¨ते है तथा प्रति फली 4 दाने पाये जाते है । इसकी अ©सत उपज क्षमता 2500-3000 किग्रा. प्रति हैक्टर मानी जाती है ।

5.समृद्धि

यह शीघ्र तैयार होने (93-100 दिन) वाली किस्म है । इसके फूल बैगनी, दाना पीला दाना और नाभि काल ह¨ती है । ओसत उपज क्षमता 2000-2500 किग्रा. प्रति हैक्टर आती है ।

6.अहिल्या-3

यह किस्म 90-99 दिन में पककर तैयार ह¨ती है तथा ओसतन 2500-3500 किग्रा. उपज क्षमता रखती है । इसके फूल बैगनी तथा दाने पीले ¨ रंग के होते है । विभिन्न कीट-रोग प्रतिरोधी किस्म है ।

7.अहिल्या-4

यह किस्म 99-105 दिन में पककर तैयार होती है । इसके फूल सफेद तथा दाना पीला और नाभि भूरी होती है । इसकी उपज क्षमता 2000-2500 किग्रा. प्रति हैक्टर होती है ।

8.पीके-472

यह किस्म 100-105 दिन में तैयार होती है । इसके फूल सफेद तथा पीला दाना होता है । ओसत उपज क्षमता 3000-3500 किग्रा. प्रति हैक्टर होती है ।

9.जेएस. 75-46

बोआई से 115-120 दिन में तैयार होने वाली इस किस्म के फूल गहरे बैंगनी रंग तथा दाना पीला होता है । ओसतन 2000-2200 किग्रा. उपज देने में सक्षम पाई गई है ।

10.जेएस 72-280(दुर्गा)

सोयाबीन की यह किस्म 102-105 दिन में पकती है । सफेद फूल, पीला दाना तथा काली नाभि वाली यह किस्म 2000-2200 किग्रा. उपज देने में सक्षम पाई गी है ।

11.एमएसीएस-58

शीघ्र तैयार (90-95 दिन) होने वाली इस किस्म के फूल बैंगनी, पीला दाना और भूरी नाभि पाई जाती है । ओसत उपज क्षमता 2500-4000 किग्रा. प्रति हैक्टर आती है ।

12.जेएस. 76-205(श्यामा)

यह किस्म 105-110 दिन में तैयार ह¨ती है । इसके फूल बैगनी तथा दाना काल्¨ रंग का होता है । ओसतन 2000-2500 किग्रा. उपज क्षमता पाई गई है ।

13. इंदिरा सोया-9

यह किस्म 110-115 दिन में पकती है । इसके फूल बैंगनी तथा दाना पीले रंग का होता है । ओसत उपज क्षमता 2200-2500 किग्रा. प्रति हैक्टर पाई गई है ।

14. परभनी सोना

सोयबीन की यह शीघ्र तैयार होने वाली (85-90 दिन) बहु-रोग प्रतिरोधी किस्म है ।इसके 100 दानो का भार 11-12 ग्राम तथा उपज क्षमता 2500-3000 किग्रा. दर्ज की गई है ।

15.प्रतीक्षा (एमएयूएस-61-2)

यह मध्यम अवधि में तैयार होने वाली किस्म है जो जेएस-335 से 10 प्रतिशत अधिक उपज देती है । मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश (बुन्देलखण्ड) तथा महाराष्ट्र राज्य में खेती हेतु संस्तुत की गई है ।

सोयाबीन की अन्य उन्नत क़िस्में –

उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र के लिए सोयाबीन की उन्नत किस्में –

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए –

वी एल सोया- 2, वी एल सोया- 47, पूसा- 16, हरा सोया, पालम सोया, पंजाब- 1, पी एस- 1241, पी एस- 1092, पी एस- 1347, शिलाजीत, वी एल एस- 59 और वी एल एस 63 आदि है.

उत्तर मैदानी क्षेत्र की उन्नत किस्में –

पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए –

पूसा- 16, पी एस- 564, एस एल- 295, एस एल- 525, पंजाब- 1, पी एस- 1042, डी एस- 9712, पी एस- 1024, डी एस- 9814, पी एस- 1024,पी के- 416, पी एस- 1241, और पी एस 1347 आदि है.

मध्य भारत क्षेत्र की उन्नत किस्में –

मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तरी महाराष्ट्र और गुजरात के लिए –

एन आर सी- 7, एन आर सी- 37, जे एस- 93-05, जे एस- 95-60, जे एस- 335, जे एस- 80-21, समृद्धि, और एम ए यू एस 81 आदि है.

दक्षिणी क्षेत्र की उन्नत किस्में –

दक्षिणी महाराष्ट्र, कर्नाटक, तामिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश के लिए –

एम ए सी एस- 24, पूजा, पी एस- 1029, CO- 1, CO- 2, के एच एस बी- 2, एल एस बी- 1, प्रतिकार, फूले कल्याणी, और प्रसाद आदि है.

उत्तर पूर्वी क्षेत्र की उन्नत किस्में –

बंगाल, छत्तीसगढ़, उतराखंड, उड़ीसा, आसाम और मेघालय के लिए –

एम ए यू एस- 71, बिरसा सोयाबीन- 1, इंदिरा सोया- 9, प्रताप सोया- 9, और जे एस- 80-21 आदि है ।

वैज्ञानिक विधि से सोयाबीन की खेती हेतु बोआई का समय –

सोयाबीन की अतिशीघ्र बोआई से पौधों की वृद्धि अधिक होकर उपज सीमित हो जाती है, जबकि देर से बोने पर तापमान कम हो जाने के कारण पौधों की वृद्धि कम हो जाती है और उपज कम आती है। अतः उपयुक्त समय पर बोआई करना चाहिए। इसका बुवाई का समय इस प्रकार निश्चित करना चाहिए कि पौधों को वानस्पतिक बढ़वार के लिए उचित प्रकाशवधि मिले। खरीफ में बुवाई के लिये जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के द्वितीय सप्ताह तक का समय उपयुक्त पाया गया है। रबी , बसन्त और गर्मी के मौसम में भी कुछ क्षेत्रों मे सोयाबीन उगाई जा सकती है।

बीज दर एंव पौध अन्तरण –

बीज का आकार, किस्म, बीज की अंकुरण क्षमता, बोने की विधि व समय के आधार पर बीज की मात्रा निर्भर करती है। सोयाबीन बीज जिसकी अंकुरण क्षमता 85 प्रतिशत हो और 1000 दानों का वजन 125-140 ग्राम हो, चयन करना चाहिए। बुवाई से पूर्व बीज अंकुरण क्षमता ज्ञात कर लें और 60-70 प्रतिशत अंकुरण क्षमता हो तो बीज दर सवा गुना कर बोयें। सामान्य तौर पर बड़े दाने वाली सोयाबीन की किस्मो के लिए 80-90 कि.ग्रा., मध्यम दाने वाली किस्मो के लिए 70-75 किग्रा. तथा छोटे दानो वाली किस्मो हेतु 55-60 किग्रा, बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करना चाहिए। उत्तम उपज के लिए खेत में वांछित पौध संख्या (3-4 लाख पौधे/हे. ) कायम रखना आवश्यक पाया गया है । खरीफ में सोयाबीन 30-45 सेमी. पंक्ति से पंक्ति के फासले पर तथा बसंन्तकालीन फसल में 30 सेमी. की दूरी पर बोना चाहिए। पौधे से पौधे का अन्तर 5 से 8 से. मी. रखना उचित होता है। बसंत ऋतु में 100 किग्रा. प्रति हे. बीज की आवश्यकता होती है। सोयाबीन की खेती में बीज बोने की गहराई का भी विशेष महत्व है। बीज बोने की गहराई मृदा की किस्म व उसमें नमी की मात्रा और बीज के आकार पर निर्भर करती है। सोयाबीन बीज की बुवाई हल्की मिटटी में 3-5 से.मी. तथा चिकनी व इष्टतम नमी युक्त चिकनी व भारी मिट्टी में 2-3 सेमी. की गहराई पर ही करनी चाहिए अन्यथा बीज को चींटियाँ क्षति पहुंचा सकते हैं। बोने के बाद बीज को लगभग 8-10 दिन तक पक्षियों से बचाए रखें ताकि नवजात पौधों को क्षति न पहुँचे।

सोयाबीन की खेती हेतु बुवाई हेतु बीजों का उपचार कैसे करें –

प्रारंभिक अवस्था में पौधों को फफूँदजनक रोगोंसे बचाने के लिए 1.5 ग्राम थायरम व 1.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम (बाविस्टिन) प्रति कि.ग्रा. बीज से बीजोपचार करें। बीजोपचार के समय हाथों में दस्ताने पहनें और मुँह पर कपड़ा लपेटें या फेसमास्क लगाएँ। वायुमंडल की नाइट्रोजन पौधे को उपलब्ध होती रहे व भूमि की उर्वरा शक्ति भी अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने के लिए उपरोक्त उपचारित बीज को पुनः सोयाबीन के राइजोबियम कल्चर 25 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। बीज के साथ कल्चर को अच्छी प्रकार से मिलाने के लिए 10 प्रतिशत गुड़ का घोल (100 ग्राम गुड़ एक लीटर पानी) बनाकर 15 मिनट उबालकर, कमरे के तापक्रम पर ठण्डा कर लेते हैं। इसमें कल्चर का एक पैकेट (250 ग्राम) डालकर अच्छी तरह से मिलाते हैं। कल्चर के इस मिश्रण को 10 किग्रा. बीज पर डालकर एक समान मात्रा में मिलाकर छाया में सुखाया जाता है। जिस ख्¨त में पहली बार स¨याबीन ली जा रही है उसमें कल्चर की दुगनी या तीन गुनी मात्रा का प्रयोग करना चाहिए । कल्चर को अधिक गर्म या ठंडे स्थानो पर रखने से इसके जीवाणु मर जाते है तथा यह प्रभावी नहीं रह पाता है । राइजोबियम कल्चर से बीजोपचार करने से पौधों की जड़ों में ग्रंथियाँ अधिक संख्या में बनती हैं, जिनसे वायुमंडली नाइट्रोजन पौधे को प्राप्त होती है। ध्यान रखें कि फफूँदनाशक दवा एंव राइजोबियम कल्चर को एक साथ मिलाकर कभी भी बीजोपचार नहीं करना चाहिए। उपचारित बीज को ठंडे व छायादार जगह पर रखें तथा यथाशीघ्र बुवाई करना चाहिए। राइजोबियम कल्चर न मिलने पर किसी भी खेत की मिट्टी, (जहां पूर्व में 2-3 वर्ष से सोयाबीन लगाई जा रही ह¨) 15 सेमी. की गहराई से खोदकर 10-12 क्विंटल की दर से मिटटी में मिलाना चाहिए ।

सोयाबीन की खेती से अधिक पैदावार लेने के लिए सोयाबीन की बुवाई की ये विधियाँ अपनाएँ –

सोयाबीन की बुवाई छिंटकवां विधि, सीड ड्रिल से या देशी हल के पीछे कूँड़ो में की जाती है । आमतौर पर सोयाबीन छिटकवाँ विधि से बोया जाता है। यह वैज्ञानिक विधि नहीं हैं क्योंकि इस विधि में पौधे असमान दूरी पर स्थापित होते हैं, बीज अधिक लगता है और फसल की निराई-गुडाई व कटाई में असुविधा होती है। देशी हल के पीछे अथवा सीड ड्रिल से कतार में बोआई करने पर बीज कम लगता है और पौधे समान दूरी पर स्थापित होते है। हल के पीछे कूडो़ में सोयाबीन की बुआई करने पर देशी हल से संस्तुत दूरी पर कूँड बना लिये जाते हैं जिनमें बीज को डालकर हल्की मिट्टी से ढँक दिया जाता है। अधिक क्षेत्र में बोनी हेतु ट्रैक्टर या पशु चलित बुवाई मशीन (सीड ड्रिल) का प्रयोग किया जाता है। फसल बोने के एक सप्ताह बाद यदि कूँड़ में किसी स्थान पर अंकुरण न हुआ हो तथा मृदा में नमी हो तो खुरपी की सहायता से रिक्त स्थानो में बीज की बुवाई कर देने से अच्छी उपज हेतु खेत में बांछित पौध संख्या स्थापित हो जाती है।

अधिक पैदावार हेतु सोयाबीन की फसल में खाद एवं पोषण – प्रबंधन खाद एंव उर्वरक

सोयाबीन के पौधों को अच्छी वृद्धि, समुचित विकास, भरपूर उपज और बढ़िया गुणों के लिए समुचित पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। मृदा परीक्षण के बाद पोषक तत्वों की आपूर्ति जैविक खाद और रासायनिक उर्वरक देकर करनी चाहिए। सोयाबीन की 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देने वाली फसल की कायिक वृद्धि और बीज निमार्ण के लिए लगभग 325 किग्रा. नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। परन्तु दलहनी फसल होने के कारण अपनी जड़ ग्रंथिकाओं द्वारा वायुमंडल से नाइड्रोजन ग्रहण करके पौधों को उपलब्ध कराती है। पौधों में ये ग्रंथिकाएँ अधिक हों और वे प्रभावकारी ढ़ग से कार्य करें, तो फसल के लिए आवश्यक नाइट्रोजन संस्थापित हो जाती हैं। इसके लिए राइजोबियम कल्चर से बीज निवेशन करना आवश्यक है। राइजोबियम कल्चर उपलब्घ न होने पर नाइट्रोजन धारी खाद अधिक मात्रा में उपयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन युक्त खाद अधिक मात्रा में देने की अपेक्षा जीवाणु संवर्ध देना अधिक उत्तम रहता है। फसल की प्रारंभिक बढ़वार के लिए नाइट्रोजन देना लाभकारी रहता है। प्रति हेक्टेयर 10-12 टन गोबर की खाद के साथ 20 किग्रा. नत्रजन बोआई के समय देने से उपज में वृद्धि होती है, साथ ही भूमि की उर्वरता भी बनी रहती है। फूल आने से तुरन्त पहले की अवस्था सोयाबीन के लिए नाइट्रोजन आवश्यकता का क्रान्तिक समय है। जहाँ जीवाणु संवर्ध का प्रयोग नहीं किया गया है, वहाँ फसल की कायिक वृद्धि और अधिक उपज के लिए 120-150 किग्रा. नाइट्रोजन देना चाहिए।

पौधों की वृद्धि व जड़ों के विकास के लिए फास्फोरस भी उपयोगी तत्व है। फास्फोरस 60-70 किग्रा./हे. देने से उपज व दानों के भार में वृद्धि होती है। इस खाद का 5-25 प्रतिशत भाग ही प्रथम वर्ष में पौधों को प्राप्त हो पाता है। जड़ ग्रंथियों व फल्लियों का विकास, दाने भरने तथा फसल की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए पोटाश का उपयोग करना आवयक है। सामान्य तौर पर भारतीय मृदाओं में पोटाश की आवयकता नहीं होती है। मृदा परीक्षण के आधार पर पोटाश की कमी वाली मृदाओं में पोटाश देना आवश्यक होता है। मृदा परीक्षण की सुविधा न हो , तो 30-40 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर डालना चाहिए। तीनों उर्वरकों को बोआई के समय कूँड में बीच के नीचे प्रयोग करना चाहिए। फास्फोरस को सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में डालने से सल्फर और कैल्सियम तत्वों की आपूर्ति भी हो जाती है।जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में बुआई के समय 25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट देना लाभकारी पाया गया है। खडी फसल में 5 किग्रा. जिंक सल्फेट तथा 2.5 किग्रा. बुझा हुआ चूना 1000 लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टेयर में छिड़काव करने से उपज में वृद्धि होती है।
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सोयाबीन की खेती में खरपतवार प्रबन्धन की विधियाँ – weed control methods in soyabean farming

सोयाबीन के उत्पादन में खरपतवार प्रकोप की विशेष समस्या आती है और खेत में उपलब्ध नमी एंव पोषक तत्वों का अधिकांश भाग ये खरपतवार ही ग्रहण कर लेते हैं।फलस्वरूप उपज में 50-60 प्रतिशत तक हांनि हो सकती है। सोयाबीन फसल के प्रारंभिक 45 दिन तक खरपतवार नियंत्रण पर ध्यान देना आवश्यक है ताकि उपज पर विपरीत प्रभाव न पड़े। खरपतवार नियंत्रण निम्नानुसार किया जा सकता है-

1. यांत्रिक विधि:

सोयाबीन फसल की दो बार निराई-गुड़ाई (पहली 15-20 दिन के अन्दर व दूसरी 30-35 दिन पर) करने की सिफारिश की जाती है। यह कार्य खुरपी, हैण्ड हो, डोरा आदि यंत्रों से किया जाता सकता है ।

2. रासायनिक विधि –

खरीफ में प्रायः वर्षा के कारण समय पर प्रभावशाली ढंग से निराई या गुडा़ई कर पाना संभव नहीं हो पाता है । अतः ऐसी परिस्थितियों में नींदानाशक रसायन का प्रयोग सुविधाजनक व लाभप्रद होता है।फसल बोने से पूर्व फ्लूक्लोरालिन 45 ई.सी.(बासालिन) या ट्राइफलूरालिन 48 ईसी (तुफान, त्रिनेम) की 2.5 लीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हे. छिड़काव करके कल्टीवेटर या हल आदि से मिट्टी में मिला देना चाहिए। बुआई पूर्व क्लोरिम्यूरान इथाइल 25 डब्लूपी (क्लोबेन) 40 ग्राम प्रति हे. को 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से भी खरपतवार नियंत्रित हो जाते है। बोने के तुरंत बाद एलाक्लोर 50 ईसी. (लासो) सोयाबीन बोने के तुरंत बाद 2 कि.ग्रा. दवा 800 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हे. छिड़काव करें । फसल अंकुरण पश्चात् खरपतवार नियंत्रण हेतु फयूजीफाप 25 ई.सी. (फयूजीलेड) 0.25 कि.ग्रा. प्रति हे. की दर से प्रयोग करते है। आजकल घास कुल के खरपतवारो पर नियंत्रण पाने के लिए अंकुरण पश्चात क्वीजालफॉप-इथाइल 50 ग्राम प्रति हैक्टर क¨ 750-800 लीटर पानी में घ¨लकर ब¨ने के 25 दिन बाद छिड़काव करने की सलाह दी जाती है ।

सोयाबीन की उन्नतशील खेती में सिंचाई की विधि – irrigation methods in soyabean cultivation

सोयाबीन साधारणतः वर्षाधारित फसल है परन्तु लम्बे समय तक वर्षा न हो, तो सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है। सोयाबीन की अच्छी फसल को 45-50 सेमी. पानी की आवश्यकता होती है। सोयाबीन में फूलने, फलने, दाना बनने तथा दानों के विकास का समय पानी के लिए बहुत ही क्रांतिक होता है। इन अवस्थाओं में पानी की कमी होने से फूल गिर जाते हैं, फल्लियाँ कम लगती हैं, दाने का आकार छोटा हो जाता है, फलस्वरूप उपज घट जाती है। लम्बे समय तक सूखे की अवस्था में एक सिंचाई फल्लियों में दाना भरते समय अवश्य देना चाहिए। बलुई मृदा में भारी मिट्टियो की अपेक्षा सिंचाई अधिक बार करनी पड़ती है। फसल की प्रारम्भिक अवस्था में अधिक सिंचाई से पौधों की वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है जिससे पौधे जमीन पर गिर जाते हैं जिससे उपज कम हो जाती है। लगातार या भारी वर्षा होने पर ख्¨त में जल निकास की उचित व्यवस्था करना आवश्यक रहता है।

सोयाबीन की फसल की कटाई एंव गहाई – harvesting methods in soyabean farming

सोयाबीन फसल तैयार होने में किस्म के अनुसार 90-140 दिन लगते है। पकने पर पत्तियाँ पीली होकर गिरने लगती है। जब फल्लियाँ (90 से 95 प्रतिशत) भूरे या गाढ़े भूरे रंग की हो जाये तब कटाई करनी चाहिए। इस समय बीज में 15-18 प्रतिशत नमी होती है। देर से कटाई करने पर फल्लियाँ चटकने लगती हैं व उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। फसल की कटाई हँसिया या कम्बाइन हारवेस्टर द्वारा की जाती हैं। कटी हुई फसल को खलियान में रखकर 8-10 दिन तक सुखाया जाता है। इसके पश्चात् डंडो से पीटकर या बैलों से दाय चलाकर या ट्रैक्टर से मड़ाई करते हैं।मड़ाई सावधानी से करें जिससे बीजो को क्षति न पहुँचे क्योंकि सोयाबीन के बीज मुलायम होते है। सोयाबीन के दाने में हरापन क्लोरोफिल तथा पीलापन एन्थोसायनिन पिगमेंट के कारण होता है।

सोयाबीन की फसल से प्राप्त उपज एंव उसका भंडारण –

सोयाबीन की फसल पर जलवायु तथा मृदा कारकों का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। साधारण दशा में इसकी उपज 20-25 क्विंटल प्रति हे. तक ली जा सकती है। सोयाबीन का भूसा पशुओं के लिए पौष्टिक चारा है। बीज को साफ कर, अच्छी तरह सुखाना चाहिए और जब बीज में नमी का अंश 10 प्रतिशत या इससे कम हो जाए तभी हवादार स्थान में भंडारण करना चाहिए। सोयाबीन के बीज को एक साल से अधिक भण्डारित नही करना चाहिए। क्योंकि इसमें तेल की मात्रा अधिक होने के कारण खटास उत्पन्न हो जाती है।

धनिया की खेती की जानकारी | Coriander Cultivation Information Guide

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प्राचीन काल से ही विश्व में भारत देश को ‘मसालों की भूमि‘ के नाम से जाना जाता है। धनिया के बीज एवं पत्तियां भोजन को सुगंधित एवं स्वादिष्ट बनाने के काम आते है। धनिया बीज में बहुत अधिक औषधीय गुण होने के कारण कुलिनरी के रूप में, कार्मिनेटीव और डायरेटिक के रूप में उपयोग में आते है । धनिया अम्बेली फेरी या गाजर कुल का एक वर्षीय मसाला फसल है । इसका हरा धनिया सिलेन्ट्रो या चाइनीज पर्सले कहलाता है ।
धनिया की उन्नतशील खेती की जानकारी | Dhaniya ki kheti in khetikisani| Coriander Agriculture in india | coriander farming in india |

धनिया की उन्नतशील खेती की जानकारी | Dhaniya ki kheti in khetikisani| Coriander Agriculture in india | coriander farming in india |
धनिया की उन्नतशील खेती की जानकारी | Dhaniya ki kheti in khetikisani| Coriander Agriculture in india | coriander farming in india |

धनिया एक बहुमूल्य बहुउपयोगी मसाले वाली आर्थिक दृष्टि से भी लाभकारी फसल है। धनिया के बीज एवं पत्तियां भोजन को सुगंधित एवं स्वादिष्ट बनाने के काम आते है। धनिया बीज में बहुत अधिक औषधीय गुण होने के कारण कुलिनरी के रूप में, कार्मिनेटीव और डायरेटिक के रूप में उपयोग में आते है भारत धनिया का प्रमुख निर्यातक देश है । धनिया के निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है ।

धनिया की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु – Coriander Cultivation Information Guide

शुष्क व ठंडा मौसम अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिये अनुकूल होता है । बीजों के अंकुरण के लिय 25 से 26 से.ग्रे. तापमान अच्छा होता है । धनिया शीतोष्ण जलवायु की फसल होने के कारण फूल एवं दाना बनने की अवस्था पर पाला रहित मौसम की आवश्यकता होती है । धनिया को पाले से बहुत नुकसान होता है । धनिया बीज की उच्च गुणवत्ता एवं अधिक वाष्पशील तेल के लिये ठंडी जलवायु, अधिक समय के लिये तेज धूप, समुद्र से अधिक ऊंचाई एवं ऊंचहन भूमि की आवश्यकता होती है ।
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भूमि का चुनाव एवं उसकी तैयारी

धनिया की सिंचित फसल के लिये अच्छा जल निकास वाली अच्छी दोमट भूमि सबसे अधिक उपयुक्त होती है और असिंचित फसल के लिये काली भारी भूमि अच्छी होती है । धनिया क्षारीय एवं लवणीय भूमि को सहन नही करता है । अच्छे जल निकास एवं उर्वरा शक्ति वाली दोमट या मटियार दोमट भूमि उपयुक्त होती है । मिट्टी का पी.एच. 6.5 से 7.5 होना चाहिए । सिंचित क्षेत्र में अगर जुताई के समय भूमि में पर्याप्त जल न हो तो भूमि की तैयारी पलेवा देकर करनी चाहिए । जिससे जमीन में जुताई के समय ढेले भी नही बनेगें तथा खरपतवार के बीज अंकुरित होने के बाद जुताई के समय नष्ट हो जाऐगे । बारानी फसल के लिये खरीफ फसल की कटाई के बाद दो बार आड़ी-खड़ी जुताई करके तुरन्त पाटा लगा देना चाहिए ।

धनिया की उन्नतशील लेटेस्ट किस्में –

उपयुक्त उन्नत किस्में
धनिया का अधिकतम उत्पादन लेने हेतु उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिये।
किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म
हिसार सुगंध 120-125 19-20 दाना मध्यम आकार का,अच्छी सुगंध, पौधे मध्यम ऊंचाई , उकठा, स्टेमगाल प्रतिरोधक
आर सी आर 41 130-140 9-10 दाने छोटे,टाल वैरायटी, गुलाबी फूल,उकठा एवं स्टेमगाल प्रतिरोधक,भभूतिया सहनशील, पत्तियों के लिए उपयुक्त, 0.25 प्रतिशत तेल
कुंभराज 115-120 14-15 दाने छोटे सफेद फूल, उकठा ,स्अेमगाल, भभूतिया सहनशील, पौधे मध्यम ऊंचाई
किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म
आर सी आर 435 110-130 11-12 दाने बड़े, जल्दी पकने वाली किस्म, पौधों की झाड़ीनुमा वृद्धि, उकठा, स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील
आर सी आर 436 90-100 11-12 दाने बड़े, शीघ्र पकने वाली किस्म, उकठा, स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील
आर सी आर 446 110-130 12-13 दाने मध्यम आकार के , शाखायें सीधी, पौधें मध्यम ऊंचाई के, अधिक पत्ती वाले , हरी पत्तियों के लिए उपयुक्त, उकठा, स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील, असिंचित के लिए उपयुक्त
किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म
जी सी 2 (गुजरात धनिया 2) 110-115 15-16 दाने मध्यम आकार के, मध्यम ऊंचाई के पौधें, अध्र्दसीमित शाखायें, गहरी हरी पत्तियां, उकठा स्टेमगाल ,भभूतिया सहनशील, हरी पत्तियों के लिये उपयुक्त
आरसीआर 684 110-120 13-14 दाने बड़े, अण्डाकार, भूसा कलर, बोनी किस्म, उकठा स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील, माहू प्रतिरोधक
पंत हरितमा 120-125 15-20 दाने गोल, मध्यम आकार के, पौधे मध्यम ऊंचाई के , उकठा, स्टेमगाल,भभूतिया प्रतिरोधक, बीज एवं पत्तियों के लिए उपयुक्त
किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म
सिम्पो एस 33 140-150 18-20 दाने बड़े, अण्डाकार, पौधे मध्यम ऊंचाई के, उकठा, स्टेमगाल प्रतिरोधक, भभूतिया सहनशील, बीज के लिये उपयुक्त
जे डी-1 120-125 15-16 दाने गोल,मध्यम आकार के, पौधे मध्यम ऊंचाई के,उकठा निरोधक, स्टेमगाल,भभूतिया सहनशील, सिंचित एवं असिंचित के लिए उपयुक्तढ
ए सी आर 1 110-115 13-14 ददाने छोटे,गोल,पौधे मध्यम ऊंचाई के, उकठा, स्टेमगाल प्रतिरोधक, भभूतिया सहनशील, पत्तियों के लिये उपयुक्त
किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म
सी एस 6 115-120 12-14 दाने गोल, मध्यम आकार के, पौधे मध्यम
ऊंचाई के, उकठा, स्टेमगाल प्रतिरोधक, भभूतिया सहनशील
जे डी-1 120-125 15-16 दाने गोल, मध्यम आकार के पौधे मध्यम ऊंचाई के, उकठा निरोधक, स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील, सिंचित एवं असिंचित के लिए उपयुक्त
आर सी आर 480 120-125 13-14 दाने मध्यम आकार के, पौधे मध्यम ऊंचाई के उकठा, स्टेमगाल, भभूतिया निरोधक, सिंचित के लिये उपयुक्त
आर सी आर 728 125-130 14-15 दाने छोटे,गोल, सफेद फूल, भभूतिया सहनशील, उकठा, स्टेमगाल निरोधक, सिंचित, असिंचित एवं हरी पत्तियों के लिये उपयुक्त

बोनी का समय-

धनिया की फसल रबी मौसम में बोई जाती है । धनिया बोने का सबसे उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर है । धनिया की सामयिक बोनी लाभदायक है। दानों के लिये धनिया की बुआई का उपयुक्त समय नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा हैं । हरे पत्तों की फसल के लिये अक्टूबर से दिसम्बर का समय बिजाई के लिये उपयुक्त हंै। पाले से बचाव के लिये धनिया को नवम्बर के द्वितीय सप्ताह मे बोना उपयुक्त होता है। बीज दर: सिंचित अवस्था में 15-20 कि.ग्रा./हे. बीज तथा असिंचित में 25-30 कि.ग्रा./हे. बीज की आवश्यकता होती है।
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बीजोपचार –

भूमि एवं बीज जनित रोगो से बचाव के लिये बीज को कार्बंेन्डाजिम$थाइरम (2:1) 3 ग्रा./कि.ग्रा. या कार्बोक्जिन 37.5 प्रतिशत + थाइरम 37.5 प्रतिशत 3 ग्रा./कि.ग्रा. + ट्राइकोडर्मा विरिडी 5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें । बीज जनित रोगों से बचाव के लिये बीज को स्टेªप्टोमाईसिन 500 पीपीएम से उपचारित करना लाभदायक है ।

खाद एवं उर्वरक –

असिंचित धनिया की अच्छी पैदावार लेने के लिए गोबर खाद 20 टन/हे. के साथ 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 30 कि.ग्रा. स्फुर, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से तथा 60 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. स्फुर, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचित फसल के लिये उपयोग करें ।

उर्वरक देने की विधि एवं समय –

असिंचित अवस्था में उर्वरको की संपूर्ण मात्रा आधार रूप में देना चाहिए। सिंचित अवस्था में नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस, पोटाश एवं जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा बोने के पहले अंतिम जुताई के समय देना चाहिए । नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा खड़ी फसल में टाप ड्रेसिंग के रूप में प्रथम सिंचाई के बाद देना चाहिए । खाद हमेशा बीज के नीचे देवें । खाद और बीज को मिलाकर नही देवें। धनिया की फसल में एजेटोबेक्टर एवं पीएसबी कल्चर का उपयोग 5 कि.ग्रा./हे. केहिसाब से 50 कि.ग्रा. गोबर खाद मे मिलाकर बोने के पहले डालना लाभदायक है ।

बोने की विधि-

बोने के पहले धनिया बीज को सावधानीपूर्वक हल्का रगड़कर बीजो को दो भागो में तोड़ कर दाल बनावें । धनिया की बोनी सीड ड्रील से कतारों में करें । कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 10-15 से. मी. रखें । भारी भूमि या अधिक उर्वरा भूमि में कतारों की दूरी 40 से.मी. रखना चाहिए । धनिया की बुवाई पंक्तियों मे करना अधिक लाभदायक है । कूड में बीज की गहराई 2-4 से.मी. तक होना चाहिए । बीज को अधिक गहराई पर बोने से अंकुरण कम प्राप्त होता है ।

अंतर्वर्तीय फसलें –

चना + धनिया, (10:2), अलसी$धनिया (6:2), कुसुम$धनिया (6:2), धनिया + गेहूँ (8:3) आदि अंतर्वर्तीय फसल पद्धतियां उपयुक्त पाई गई है । गन्ना + धनिया (1:3) अंतर्वर्तीय फसल पद्धति भी लाभदायक पाई गई है ।

फसल चक्र –

धनिया-मूंग ,धनिया-भिण्डी, धनिया-सोयाबीन , धनिया-मक्का आदि फसल चक्र लाभ दायक पाये गये है ।

सिंचाई प्रबंधन-

धनिया में पहली सिंचाई 30-35 दिन बाद (पत्ति बनने की अवस्था), दूसरी सिंचाई 50-60 दिन बाद (शाखा निकलने की अवस्था), तीसरी सिंचाई 70-80 दिन बाद (फूल आने की अवस्था) तथा चैथी सिंचाई 90-100 दिन बाद (बीज बनने की अवस्था ) करना चाहिऐ। हल्की जमीन में पांचवी सिंचाई 105-110 दिन बाद (दाना पकने की अवस्था) करना लाभदायक है ।

खरपतवार प्रबंधन-

धनिया में फसल-खरपतवार प्रतिस्पर्धा की क्रांतिक अवधि 35-40 दिन है । इस अवधि में खरपतवारों की निंदाई नहीं करते है तो धनिया की उपज 40-45 प्रतिशत कम हो जाती है । धनिया में खरपतवरों की अधिकता या सघनता व आवश्यकता पड़ने पर निम्न में से किसी एक खरपतवानाशी दवा का प्रयोग कर सकते है ।

खरपतवार प्रबंधन –
धनिया में फसल-खरपतवार प्रतिस्पर्धा की क्रांतिक अवधि 35-40 दिन है । इस अवधि में खरपतवारों की निंदाई नहीं करते है तो धनिया की उपज 40-45 प्रतिशत कम हो जाती है । धनिया में खरपतवरों की अधिकता या सघनता व आवश्यकता पड़ने पर निम्न में से किसी एक खरपतवानाशी दवा का प्रयोग कर सकते है ।
खरपतवार नाशी का तकनीकी नाम खरपतवार नाशी का व्यपारिक नाम दर सक्रिय तत्व (ग्राम/हे.) खरपतवार नाशी की कुल मात्रा मि.ली /हे. पानी मात्रा ली/ ह. उपयोग का समय (दिन)
पेडिमिथलीन स्टाम्प 30 ई.सी 1000 3000 600-700 0-2
पेडिमिथलीन स्टाम्प एक्स्ट्रा 38.7 सी.एस. 900 2000 600-700 0-2
क्विजोलोफॉप इथाईल टरगासुपर 5 ई.सी. 50 100 600-700 15-20

रोग प्रबंधन

उकठा उगरा विल्ट/रोग-

उकठा रोग फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम एवं फ्यूजेरियम कोरिएनड्री कवक के द्वारा फैलता है । इस रोग के कारण पौधे मुरझा जाते है और पौधे सूख जाते है
– ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं उचित फसल चक्र अपनाएं ।
– बीज की बुवाई नवम्बर के प्रथम से द्वितीय सप्ताह में करें ।
– बुवाई के पूर्व बीजों को कार्बेन्डिजम 50 डब्ल्यू पी 3 ग्रा./कि.ग्रा. या ट्रायकोडरमा विरडी 5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें ।
– उकठा के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी 2.0 ग्रा./ली. या
उकठा के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी 2.0 ग्रा./ली. या हेक्जाकोनोजाॅल 5 ईसी 2 एमएल/ली. या मेटालेक्जिल 35 प्रतिशत 1 ग्रा./ली या मेटालेक्जिल$मेंकोजेब 72 एम जेड 2 ग्रा./ली. दवा का छिड़काव कर जमीन को तर करें ।

तनाव्रण/तना सूजन/तना पिटिका (स्टेमगाॅल) –

यह रोग प्रोटामाइसेस मेक्रोस्पोरस कवक के द्वारा फैलता है । रोग के कारण फसल को अत्यधिक क्षति होती है । पौधो के तनों पर सूजन हो जाती है । तनों, फूल वाली टहनियों एवं अन्य भागों पर गांठें बन जाती है । बीजों में भी विकृतिया आ जाती है इस रोग का प्रबंधन के निम्न उपाय है ।
– ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं उचित फसल चक्र अपनाएं ।
– बीज की बुवाई नवम्बर के प्रथम से द्वितीय सप्ताह में करें ।
बुवाई के पूर्व बीजों को कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी 3 ग्रा./कि.ग्रा. या ट्रायकोडरमा विरडी 5 ग्रा./कि. ग्रा.बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें ।
रोग के लक्षण दिखाई देने पर स्टेªप्टोमाइसिन 0.04 प्रतिशत (0.4 ग्रा./ली.) का 20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें ।

चूर्णिलआसिता /भभूतिया/धौरिया (पावडरी मिल्ड्यु)-

यह रोग इरीसिफी पॉलीगॉन कवक के द्वारा फैलत रोग की प्रारंभिक अवस्था में पत्तियों एवं शाखा सफेद चूर्ण की परत जम जाती है। अधिक पत्तियों पीली पड़कर सूख जाती है । इस रोग का प्रबंधन निम्न प्रकार से करें
– ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं उचित फसल चक्र अपनाएं ।
– बीज की बुवाई नवम्बर के प्रथम से द्वितीय सप्ताह में करें ।
– बुवाई के पूर्व बीजों को कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी 3 ग्रा./कि.ग्रा. या ट्रायकोडरमा विरडी 5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें ।
– कार्बेन्डाजिम 2.0 एमएल/ली. या एजाॅक्सिस्ट्रोबिन 23 एस सी 1.0 ग्रा./ली. या हेक्जाकोनोजाॅल 5 ईसी 2.0एम एल/ ली. या मेटालेक्जिल$मेंकोजेब 72 एम जेड 2.0 ग्रा./ली. की दर से घोल बनाकर 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें ।

पाले (तुषार) से बचाव के उपाय –

सर्दी के मौसम में जब ताममान शून्य डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे गिर जाता है तो हवा मे उपस्थित नमी ओस की छोटी-छोटी बूंदें बर्फ के छोटे-छोटे कणों में बदल जाती है और ये कण पौधों पर जम जाते है । इसे ही पाला या तुषार कहते है । पाला ज्यादातर दिसम्बर या जनवरी माह में पड़ता है । पाले से बचाव के निम्न उपाय अपनायें । पाला अधिकतर दिसम्बर-जनवरी माह में पड़ता हइसलिये फसल की बुवाई में 10-20 नवंबर के बीच में करें
– यदि पाला पड़ने की संभावना हो तो फसल की सिंचाई तुरंत कर देना चाहिए ।
– जब भी पाला पड़ने की संभावना दिखाई दे, तो आधी रात के बाद खेत के चारो ओर कूड़ा-करकट जलाकर धुआॅ कर देना चाहिए।
– पाला पड़ने की संभावना होने पर फसल पर गंधक अम्ल 0.1 प्रतिशत (1.0 एम एल/ली.) का छिड़काव शाम को करें ।
जब पाला पड़ने की पूरी संभावना दिखाई दे तो डाइमिथाइल सल्फोआक्साईड (डीएमएसओ) नामक रसायन 75ग्रा./1000ली. का 50 प्रतिशत फूल आने की अवस्था में 10-15 दिन कें अंतराल पर करने से फसल पर पाले का प्रभाव नही पड़ता है । व्यापारिक गंधक 15 ग्राम$ बोरेक्स 10 ग्राम प्रति पम्प का छिड़काव करें ।
इसे भी पढ़ें – अदरक की खेती : Adrak ki kheti, Ginger farming

कटाई –

फसल की कटाई उपयुक्त समय पर करनी चाहिए । धनिया दाना दबाने पर मध्यम कठोर तथा पत्तिया पीली पड़ने लगे, धनिया डोड़ी का रंग हरे से चमकीला भूरा/पीला होने पर तथा दानों मंे 18 प्रतिशत नमी रहने पर कटाई करना चाहिए । कटाई में देरी करने से दानों का रंग खराब हो जाता है । जिससे बाजार में उचित कीमत नही मिल पाती है । अच्छी गुणवत्तायुक्त उपज प्राप्त करने के लिए 50 प्रतिशत धनिया डोड़ी का हरा से चमकीला भूरा कलर होने पर कटाई करना चाहिए ।

गहाई –

धनिया का हरा-पीला कलर एवं सुगंध प्राप्त करने के लिए धनिया की कटाई के बाद छोटे-छोटे बण्डल बनाकर 1-2 दिन तक खेत में खुली धूप में सूखाना चाहिए । बण्डलों को 3-4 दिन तक छाया में सूखाये या खेत मे सूखाने के लिए सीधे खड़े बण्डलों के ऊपर उल्टे बण्डल रख कर ढेरी बनावें । ढेरी को 4-5 दिन तक खेत में सूखने दे । सीधे-उल्टे बण्डलों की ढेरी बनाकर सूखाने से धनिया बीजों पर तेज धूप नही लगने के कारण वाष्पशील तेल उड़ता नही है ।

उपज –

सिंचित फसल की वैज्ञानिक तकनीकि से खेती करने पर 15-18 क्विंटल बीज एवं 100-125 क्विंटल पत्तियों की उपज तथा असिंचित फसल की 5-7 क्विंटल/हे. उपज प्राप्त होती है ।

भण्डारण-

भण्डारण के समय धनिया बीज में 9-10 प्रतिशत नमी रहना चाहिए । धनिया बीज का भण्डारण पतले जूट के बोरों में करना चाहिए । बोरांे को जमीन पर तथा दिवार से सटे हुए नही रखना चाहिए । जमीन पर लकड़ी के गट्टों पर बोरांे को रखना चाहिए। बीज के 4-5 बोरों से ज्याद एक के ऊपर नही रखना चाहिए । बीज के बोरों को ऊंचाई से नही फटकना चाहिए । बीज के बोरें न सीधे जमीन पर रखंे और न ही दीवार पर सटाकर रखें । बोरियों मे भरकर रखा जा सकता है । बोरियों को ठण्डे किन्तु सूखे स्थानो पर भण्डारित करना चाहिए । भण्डारण में 6 माह बाद धनिया की सुगन्ध में कमी आने लगती है ।

प्रसंस्करण –

धनिया प्रसंस्करण द्वारा 97 प्रतिशत धनिया बीजों की पिसाई कर पावडर बनाया जाता है । जो मसाले के रूप में भोजन को स्वादिष्ट,सुगंधित एवं महकदार बनाने के उपयोग में आता है । शेष तीन प्रतिशत धनिया बीज, धनिया दाल एवं वाष्पशील तेल बनाने में उपयोग होता है । धनिया की ग्रेडिंग कर पूरा बीज,दाल एवं टूटा-फूटा, कीट-व्याधि ग्रसित बीज अलग किये जाते है । धनिया की ग्रेडिंग करने से 15-16 रू. प्रति किलो का खर्च आता है ।ग्रेडेड धनिया बैग या बंद कंटेनर में रखा जाता है । धनिया ग्रेडिंग की स्पेशिफिकेशंस (मापदण्ड)निम्न है ।

धनिया की खेती से अधिक पैदावार/उत्पादकता बढाने हेतु खेती किसानी टिप्स –

– पाले से बचाव के लिए बुआई नवम्बर के द्वितीय सप्ताह में करें तथा गंधक अम्ल 0.1 प्रतिशत का छिड़काव शाम को करें।
– धनिया की खेती उपजाऊ भूमि में करे।
– तनाव्रण एवं चूर्णिलआसिता प्रतिरोधी उन्नत किस्मों का उपयोग करें।
– उकठा, तनाव्रण, चूर्णिलआसिता जैसे रोगों का समेकित नियंत्रण करें।
– खरपतवार का प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रण करें।
– भूमि में आवश्यक एवं सूक्ष्म तत्वो की पूर्ति करें ।
– चार सिंचाई क्रांतिक अवस्थाओं पर करे।
– कटाई उपयुक्त अवस्था पर करे एवं छाया में सुखाये। इस हेतु कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी को अपनावे ।

हल्दी की खेती की जानकारी – Haldi ki kheti

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हल्दी जिंजिवरेंसी कुल का पौधा हैं। इसकी उत्पत्ति दक्षिण पूर्व एशिया में हुई हैं। इसका उपयोग औषधीय रूप में होने के साथ-साथ समाज में सभी शुभ कार्यों में इसका उपयोग बहुत प्राचीनकाल से हो रहा है।क्योंकि इसमें रंग महक एवं औषधीय गुण पाये जाते हैं। हल्दी में जैव संरक्षण एवं जैव विनाश दोनों ही गुण विद्यमान हैं, क्योंकि यह तंतुओं की सुरक्षा एवं जीवाणु (वैक्टीरिया) को मारता है। वर्तमान समय में प्रसाधन के सर्वोत्तम उत्पाद हल्दी से ही बनाये जा रहे हैं। हल्दी में कुर्कमिन पाया जाता हैं तथा इससे एलियोरोजिन भी निकाला जाता हैं। हल्दी में स्टार्च की मात्रा सर्वाधिक होती हैं। इसके अतिरिक्त इसमें 13.1 प्रतिशत पानी, 6.3 प्रतिशत प्रोटीन, 5.1 प्रतिशत वसा, 69.4 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 2.6 प्रतिशत रेशा एवं 3.5 प्रतिशत खनिज लवण पोषक तत्व पाये जाते हैं। इसमें वोनाटाइन ऑरेंज लाल तेल 1.3 से 5.5 प्रतिशत पाया जाता हैं।

हल्दी की आधुनिक व वैज्ञानिक खेती की जानकारी व हल्दी के औषधीय फायदे | Scientific cultivation of Turmeric | Turmeric agriculture

हल्दी की खेती की जानकारी व हल्दी के औषधीय फायदे | Scientific cultivation of Turmeric
हल्दी की खेती की जानकारी व हल्दी के औषधीय फायदे | Scientific cultivation of Turmeric

Whrere to turmeric farming in india –

India is a leading producer and exporter of turmeric in the world. Andhra Pradesh, Tamil Nadu, Orissa, Karnataka, West Bengal, Gujarat, Meghalaya, Maharashtra, Assam are some of the important states cultivating turmeric, of which, Andhra Pradesh alone occupies 38.0% of area and 58.5% of production.

हल्दी की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित चार प्रजातियों का प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है।

Curcuma longa :

हल्दी की इस प्रजाति का उपयोग मुख्य रुप से मसालों और औषधियों के रूप में किया जाता है। इसके पौधे 60-90 सेमी तक ऊँचें होते हैं। इस हल्दी का रंग अंदर से लाल या पीला होता है। यही वह हल्दी है जिसका उपयोग हम अपने घरों में सब्जी बनाने में करते हैं।

Curcuma aromatica:

इसे जंगली हल्दी कहते हैं।

Curcuma amada:

इस हल्दी के कन्द और पत्तों में कपूर और आम जैसी महक होती है। इसी वजह से इसे आमाहल्दी (Mango ginger) कहा जाता है।

Curcuma caesia:

-इसे काली हल्दी कहते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस हल्दी में चमत्कारिक गुण होते हैं। इस हल्दी का उपयोग ज्योतिष और तंत्र विद्या में ज्यादा होता है।

अन्य भाषाओं में हल्दी के नाम (Name of Haldi in Different languages)

हल्दी का वानस्पतिक नाम Curcuma longa Linn. (कुरकुमा लौंगा) Syn-Curcuma domesticaValeton । कुल का नाम Zingiberaceae (जिन्जिबेरेसी) है। अन्य भाषाओं में इसे निम्न नामों से पुकारा जाता है।

Names of Turmeric in different languages –

Name of Haldi in English : Turmeric (टर्मेरिक्)
Name of Haldi in Sanskrit : हरिद्रा, काञ्चनी, पीता, निशाख्या, वरवर्णिनी, रजनी, रंजनी, कृमिघ्नी, योषित्प्रिया, हट्टविलासिनी, हलदी, गौरी, अनेष्टा, हरती
Name of Haldi in Hindi : हलदी, हर्दी, हल्दी;
Name of Haldi in Urdu : हलदी (Haladi)
Name of Haldi in Asam : हलादी (haladhi);
Name of Haldi in Konkani : हलद (Halad);
Name of Haldi in Kannada : अरसिन (Arsina), अरिसिन (Arisin)
Name of Haldi in Gujrati : हलदा (Halada);
Name of Haldi in Tamil : मंजल (Manjal)
Name of Haldi in Telgu : पसुपु (Pasupu), पाम्पी (Pampi)
Name of Haldi in Bengali : हलुद (Halud), पितरस (Pitras);
Name of Haldi in Punjabi : हलदी (Haldi), हलदर (Haldar);
Name of Haldi in Marathi : हलद (Halade), हलदर (Haldar);
Name of Haldi in Malyalam : मन्जल (Manjal), मन्नाल (Mannal), पच्चामन्नाल ( pacchamannal)
Name of Haldi in English : कॉमन टर्मेरिक (Commonturmeric), इण्डियन सैफरन (Indian saffron),
Name of Haldi in Arabi : उरुकेस्सुफ (Urukessuf), कुरकुम (Kurkum);
Name of Haldi in Persian : जर्द चोब (Zard chob), दारजरदी (Darjardi)

हल्दी का उपयोग और औषधीय फायदे – Haldi benefits in Hindi

भोजन में सुगन्ध एवं रंग लाने में, बटर, चीज, अचार आदि भोज्य पदार्थों में इसका उपयोग करते हैं। यह भूख बढ़ाने तथा उत्तम पाचक में सहायक होता हैं।

हल्दी के फायदे और सेवन का तरीका (Haldi benefits in Hindi and uses)

हल्दी हमारे शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाती है जिस वजह से तमाम तरह की संक्रामक बीमारियों से बचाव होता है। हल्दी में वात कफ दोषों को कम करने वाले गुण होते हैं और यह शरीर में खून बढ़ाने में मदद करती है। डायबिटीज में हल्दी का सेवन बहुत ही उपयोगी माना जाता है।
आइये जानते हैं कि हल्दी के सेवन से किन रोगों में आराम मिलता है और इसका सेवन किस तरह करना चाहिए।

जुकाम में हल्दी के फायदे ( Haldi benefits in Hindi for cold) –

हल्दी की तासीर गर्म होने की वजह से जुकाम में इसका सेवन करना फायदेमंद रहता है। हल्दी के धुंए को रात के समय सूंघने से जुकाम जल्दी ठीक होता है। हल्दी सूंघने के कुछ देर बाद तक पानी नहीं पीना चाहिए।

सिर की फुंसियों से आराम दिलाती है हल्दी (Haldi Benefits in Hindi for Seborrheic Dermatitis) | Turmeric Juice benefits

गर्मी के मौसम में सिर में फुंसियां निकलना एक आम समस्या है। फुंसियों के कारण सिर में तेज खुजली और जलन होती है। इस समस्या से आराम पाने के लिए हल्दी और दारूहरिद्रा, भूनिम्ब, त्रिफला, नीम और चन्दन को पीसकर रोजाना सिर पर मालिश करें।

हल्दी के फायदे – आंखों के दर्द से आराम दिलाती है हल्दी ( Haldi helps to reduce Eye pain in Hindi)-

आंखों में दर्द होने पर या किसी तरह का संक्रमण होने पर हल्दी (turmeric in Hindi) का प्रयोग करना फायदेमंद रहता है। 1 ग्राम हल्दी को 25 मिली पानी में उबालकर छान लें। छानने के बाद इसे आंखों में बार बार डालने से आंखों के दर्द से आराम मिलता है। कंजक्टीवाइटिस होने पर भी आप इसी घरेलू उपाय की मदद से आराम (haldi ke fayde)पा सकते हैं। हल्दी का गुण आँखों के लिए बहुत ही उपयोगी (haldi uses in hindi) होता है।

हल्दी के फायदे – कान बहने की समस्या से आराम (Benefits of Haldi in ear discharge in Hindi)

कान से गाढ़ा तरल निकलना एक समस्या है जिसे आम भाषा में लोग कान बहना कहते हैं। इससे आराम पाने के लिए हल्दी को पानी में उबालकर, छान लें और उसे कान में डालें।

पायरिया में हल्दी के फायदे (Haldi Beneficial in Pyorrhea in Hindi)-

सरसों का तेल, हल्दी मिलाकर सुबह-शाम मसूड़ों पर लगाकर अच्छी प्रकार मालिश करने तथा बाद में गर्म पानी से कुल्ले करने पर मसूड़ों के सब प्रकार के रोग दूर (haldi ke fayde) हो जाते हैं। हल्दी का गुण पायरिया के लिए फायदेमंद होता है।

हल्दी के फायदे –

गले की खराश से आराम (Haldi benefits for throat irritation in Hindi) :

Haldi Dhoodh benefits

गले की खराश होने पर अजमोदा, हल्दी, यवक्षार और चित्रक इन सबके 2-5 ग्राम चूर्ण को एक चम्मच शहद के साथ सेवन करने से गले की खराश दूर होती है।

हल्दी के फायदे – खांसी से आराम (Haldi Helps in reducing cough)

हल्दी (haldi in hindi) को भूनकर चूर्ण बना लें। 1-2 ग्राम हल्दी चूर्ण (Turmeric powder in Hindi) के शहद या घी के साथ मिलाकर खाने से खांसी में आराम मिलता है।

हल्दी के फायदे – पेट दर्द से आराम (Haldi beneficial in Stomach pain in Hindi) :

पेट दर्द होने पर भी हल्दी का सेवन करने से दर्द से जल्दी आराम मिलता है। 10 ग्राम हल्दी (haldi in hindi)को 250 ml पानी में उबाल लें। पेट दर्द होने पर इसमें गुड़ मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पियें।

बवासीर में हल्दी के फायदे (Turmeric benefits for Piles in Hindi) –

खराब जीवनशैली और खराब खानपान की वजह से अधिकांश लोग कब्ज़ के मरीज हो जाते हैं। कब्ज़ के कारण ही आगे चलकर बवासीर की समस्या होने लगती है। बवासीर से आराम पाने के लिए सेहुंड के दूध में 10 ग्राम हल्दी मिलाकर मस्सों में लगाएं। । इसके अलावा सरसों के तेल में हल्दी चूर्ण (Turmeric powder in Hindi) को मिलाकर मस्सों पर लगाने से बवासीर में आराम मिलता है।

पीलिया से आराम दिलाती है हल्दी (Turmeric benefits for Jaundice in Hindi) :

पीलिया एक ऐसी समस्या है जिसका सही इलाज ना करवाने पर आगे चलकर यह बहुत गंभीर समस्या में बदल जाती है। छोटे बच्चों में यह समस्या ज्यादा होती है। पीलिया होने पर 6 ग्राम हल्दी चूर्ण को मठ्ठे में मिलाकर दिन में दो बार सेवन करने पर 4-5 दिन में ही पीलिया से आराम मिल जाता है। इसके अलावा 5-10 ग्राम हल्दी चूर्ण में 50 ग्राम दही मिलाकर खाने से भी पीलिया में फायदा (haldi ke fayde) होता है।

लौह भस्म, हरड़ और हल्दी इन तीनों को एक बराबर मात्रा में मिलाकर इसकी 375mg मात्रा में घी और शहद मिलाकर सेवन करने से पीलिया में लाभ होता है।

डायबिटीज में हल्दी के फायदे (Benefits of Turmeric in Diabetets in Hindi) –

2 से 5 ग्राम हल्दी चूर्ण में आंवला रस और शहद मिलाकर सुबह और शाम को खाना, डायबिटीज के मरीजों के लिए फायदेमंद होता है। इसके अलावा हल्दी, दारुहल्दी, तगर और वायविडंग का क्वाथ बनाकर उसकी 20-40 ml की मात्रा में 5-10 ग्राम शहद मिलाकर सुबह- शाम सेवन करने से डायबिटीज में फायदा (haldi ke fayde) होता है।

स्तन संबंधी रोगों से आराम

हल्दी के फायदे (Haldi beneficial in Breast diseases in Hindi) –

स्तन से जुड़ी समस्याओं में भी हल्दी का उपयोग करना फायदेमंद रहता है। हल्दी और लोध्र को पानी में घिसकर स्तनों पर लेप करने से स्तन से जुड़े रोगों में लाभ (haldi ke fayde) होता है।

प्रदर या ल्यूकोरिया में हल्दी के फायदे (Benefits of Haldi for Leukorrhea in Hindi) – Raw Turmeric Health Benefits

हल्दी चूर्ण (Turmeric powder in Hindi) और गुग्गुल चूर्ण को एक बराबर मात्रा में मिलाकर इसकी 2-5 ग्राम मात्रा का सुबह-शाम सेवन करने ल्यूकोरिया में फायदा मिलता है। इसके अलावा 1-2 ग्राम हल्दी चूर्ण को 100 ml दूध में उबालकर उसमें गुड़ मिलाकर खाने से भी ल्यूकोरिया में फायदा पहुँचता है।

कुष्ठ रोग में हल्दी के फायदे (Benefits of Turmeric in Leprosy in hindi)

हल्दी के प्रयोग से कुष्ठ रोग के प्रभाव को भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए 1-2 ग्राम हल्दी चूर्ण में गोमूत्र मिलाकर पिएं। इसके अलावा हरिद्राचूर्ण में बराबर मात्रा में गुड़ मिलाकर गोमूत्र के साथ सेवन करने से दाद और कुष्ठ रोग में फायदा होता है।

दाद खुजली में हल्दी के फायदे (Haldi helps to reduce Itching in Hindi)

अगर आपकी त्वचा पर कहीं दाद खुजली हो गयी है तो हल्दी के इस्तेमाल से आप इन समस्याओं को जल्दी ठीक कर सकते हैं। इसके लिए खुजली (seborrheic dermatitis in hindi) वाली जगह पर हल्दी का लेप या हल्दी के साथ नीम की पत्तियों का लेप लगाएं।

चर्म रोग में हल्दी के फायदे (Turmeric benefits for skin diseases in Hindi) –

खुजली, दाद के अलावा चर्म रोग में भी हल्दी का प्रयोग करने से फायदा होता है। इसके लिए 2-5 ग्राम हल्दी चूर्ण (Turmeric powder in Hindi) को गोमूत्र में मिलाकर दिन में दो तीन बार सेवन करें। इसके अलावा हल्दी के चूर्ण में मक्खन मिलाकर चर्म रोग (seborrheic dermatitis in hindi) वाली जगह पर लगाने से भी फायदा होता है।

सूजन से आराम दिलाती है हल्दी (Haldi helps to reduce swelling in Hindi) –

शरीर के किसी हिस्से में अगर सूजन हो रही है तो हल्दी के उपयोग से आप सूजन कम कर सकते हैं। इसके लिए हल्दी, पिप्पली, पाठा, छोटी कटेरी, चित्रकमूल, सोंठ, पिप्पली, जीरा और मोथा को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। इसे कपड़े से छान कर अलग रख लें। इस चूर्ण का 2-2 ग्राम की मात्रा गुनगुने जल के साथ मिलाकर खाने से सूजन में कमी आती है।

बालों का झड़ना करे कम हल्दी के फायदे (Haldi Beneficial in Hair Loss in Hindi)

बालों का झड़ने रोकने में हल्दी बहुत उपयोगी माना गया है। बालों के झड़ने का कारण पाचन का ख़राब होना होता है, क्योंकि पाचन खराब होने से बालों की जड़ों तक उचित मात्रा में पोषण नहीं पहुँच पाता जिसकी वजह से बाल झड़ने लगते हैं। इसके अलावा कफ दोष की वृद्धि के कारण भी बालों का झड़ना देखा गया है। ऐसे में हल्दी में उष्ण और कफ का शमन करने का गुण होने के कारण यह आपके पाचन को स्वस्थ कर बालों के झड़ने से रोकती है।

मुहांसों से राहत दिलाने में हल्दी फायदेमंद (Benefits of Turmeric to Get Rid from Pimples in Hindi)

मुँहासों से छुटकारा पाने में भी हल्दी के फायदे देखे गए है। त्वचा में अधिक तेल की उत्पत्ति होने के कारण मुँहासे निकलने लगते हैं। ऐसे में हल्दी के रूक्ष गुण के कारण यह इस तेल को सोक कर मुँहासों को छुटकारा दिलाने में लाभ पहुंचाती है साथ ही त्वगदोषहर गुण होने के कारण त्वचा के रोगों को दूर रखने में भी उपयोगी होती है।

घाव को ठीक करने में हल्दी के फायदे (Haldi Beneficial to Treat Wounds in Hindi)

हल्दी में रोपण एवं शोथहर गुण होने के कारण यह हर प्रकार के घाव को भरने एवं उसकी सूजन आदि को भी ठीक करने में सहयोगी होती है।
मुँह के छालों को ठीक करने में लाभकारी हल्दी (Benefits of Haldi to Get Relief from Mouth Ulcer in Hindi)
मुँह के छालों का होना पाचन क्रिया के खराब होने के कारण होता है। हल्दी में उष्ण गुण होने के कारण यह पाचकाग्नि को ठीक कर पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मदद करती है, जिससे मुँह के छालों में आराम मिलता है साथ हि इसमें रोपण (हीलिंग) का भी गुण पाया जाता है जो की मुँह के छालों को जल्द भरने में सहायक होती है।

सूखी खांसी में फायदेमंद हल्दी (Benefits of Turmeric to Get Relief from Dry Cough in Hindi)

खांसी चाहे सूखी हो या बलगम वाली दोनों ही कफ दोष प्रकुपित होने के कारण होती है। हल्दी में कफ को संतुलित करने का गुण होता है जिसके कारण यह हर प्रकार की खांसी में लाभदायक होती है।

जोड़ों के दर्द से दिलाये राहत हल्दी (Benefit of Turmeric to Get Relief from Joint Pain Gout or arthritis in Hindi)

जोड़ो में होने वाले दर्द एवं सूजन में भी हल्दी बहुत फायदेमंद हो सकती है क्योंकि इसमें उष्ण एवं शोथहर गुण होते है। इसके सेवन से ये अपनी गर्माहट के कारण दर्द से जल्दी आराम दिलाने में मदद करती है।

पेट के कीड़े से राहत दिलाने में फायदेमंद हल्दी (Benefit of Haldi to Get Rid from Worm in Hindi)

पेट के कीड़े भी पाचन तंत्र के खराब होने के कारण होती है। हल्दी पाचक एवं कृमिघ्न गुण होने के कारण यह पेट के कीड़ों से भी राहत दिलाती है।

पेट में गैस के लिए हल्दी के फायदे ( Haldi Beneficial in Acidity in Hindi)

पेट में गैस आदि परेशानियाँ भी पाचकाग्नि के मंद पड़ जाने के कारण होती है जो पाचन तंत्र को भी बिगाड़ देती है। हल्दी में उष्ण गुण होने के कारण यह पाचकाग्नि को बढ़ा कर पाचन तंत्र को स्वस्थ करने में मदद करती है, जिससे गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है।

खून की कमी के लिए हल्दी के फायदे (Turmeric Beneficial in Anemia in Hindi)

खून की कमी ये एनीमिया की स्थिति में भी हल्दी के फायदे देखे गए है। एक रिसर्च के अनुसार हल्दी एंटी ऑक्सीडेंट और हिपेटो प्रोटेक्टिव होने के कारण यह एनीमिया में लाभदायक होती है साथ ही आयुर्वेद के अनुसार हल्दी में पाण्डुहर गुण होने के कारण यह पाण्डु यानि एनीमिया की स्थिति में लाभदायक होती है एवं खून बढ़ाने में मदद करती है।

पेट के अल्सर के लिए हल्दी के फायदे (Benefit of Haldi to Get Relief from Peptic Ulcer in Hindi)

पेट में अल्सर जैसी समस्या भी कहीं न कहीं पाचन का खराब होना ही माना गया है। हल्दी में पाचक और शोथहर होने के साथ इसमें रोपण (हीलिंग) का भी गुण होने के कारण ये पेट के अल्सर से छुटकारा दिलाती है।

कैंसर के लिए हल्दी के फायदे (Turmeric Beneficial in Cancer in Hindi)

एक रिसर्च के अनुसार हल्दी में एंटीकैंसर गुण पाए जाने कारण यह कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं में भी लाभदायक साबित हो सकती है।
खून में शुगर की मात्रा करे कम (Turmeric Beneficial in Diabetes in Hindi)
खून में शुगर की मात्रा का बढ़ना यानी डायबिटीज का होना। इस अवस्था में भी हल्दी लाभदायक होती है क्योंकि डायबिटीज होने का एक कारण पाचन का खराब होना माना गया है, जिससे मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है साथ ही इस स्थिति में कफ दोष भी बढ़ जाता है। हल्दी में पाचक गुण होने के कारण यह पाचन को स्वस्थ बनाती है और मेटाबोलिज्म ठीक करती है। साथ ही कफ शामक होने के कारण यह डायबिटीज के लक्षणों को कम करने में मदद करती है।

Summary of Haldi ke fayde by http://www.kheti kisani.org

हल्दी की सामान्य ख़ुराक (Dosages of Haldi in Hindi) –

आमतौर पर 1-2 ग्राम हल्दी का रोजाना सेवन करना सेहत के लिए उपयुक्त है। अगर आप किसी ख़ास बीमारी के लिए हल्दी का उपयोग करना चाहते हैं तो आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह के अनुसार करें।

1- क्या हल्दी के सेवन से इम्यूनिटी बढ़ती है?

हाँ, विशेषज्ञों के अनुसार हल्दी का सेवन इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करता है। सर्दियों के मौसम में या फिर मौसम में बदलाव के दौरान अक्सर हम लोग जल्दी -जल्दी बीमार पड़ जाते है और हमें ठीक होने में भी समय लगता है। वास्तव में इम्यूनिटी का कमजोर होना ही इसका मुख्य कारण है। इसलिए सर्दियों के मौसम में या मौसम में बदलाव के दौरान अपने खानपान में हल्दी ज़रूर शामिल करें।

2- क्या हल्दी दूध पीना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है?

हल्दी अपने आप में कई गुणों से भरपूर है और जब आप इसका सेवन दूध में मिलाकर करते हैं तो इसके फायदे कई गुना बढ़ जाते हैं. हल्दी वाला दूध बनाना भी बहुत आसान है. एक गिलास दूध में एक चुटकी हल्दी डालकर अच्छे से उबाल लें और फिर गुनगुना होने पर इसका सेवन करें. इसे ही हल्दी दूध या गोल्डन मिल्क (Golden Milk) कहा जाता है. सर्दी-जुकाम से आराम पाने का यह अचूक उपाय है इसके अलावा शरीर में दर्द होने पर या ठंड लगने पर इसका सेवन करना बहुत उपयोगी होता है.

3- सर्दी-जुकाम से जल्दी आराम पाने के लिए हल्दी का इस्तेमाल कैसे करें?

जुकाम होना एक आम समस्या है और अधिकांश लोग जुकाम से राहत पाने के लिए घरेलु उपायों का ही प्रयोग करते हैं. हल्दी का सेवन जुकाम से राहत दिलाने में बहुत उपयोगी माना जाता है. आयुर्वेदिक विशेषज्ञों का मानना है कि जुकाम से जल्दी राहत पाने के लिए रात में सोते समय हल्दी दूध का सेवन करना चाहिए .

4- क्या सर्दियों के मौसम में हल्दी का सेवन करना चाहिए?सर्दी का मौसम आते है कई प्रकार के रोग होना शुरू हो जाते है चाहे वो सर्दी-जुकाम हो या फिर जोड़ों का दर्द। ये सभी समस्यायें सर्दी के मौसम को कई लोगों के लिए दुखदायी बना देती हैं. आयुर्वेद के अनुसार हल्दी के सेवन से आप इन रोगों को कुछ हद तक घर पर ही ठीक कर सकते है। इसलिए सर्दियों के मौसम में आयुर्वेदिक चिकित्सक भी हल्दी के सेवन की सलाह देते हैं. इस बात का ध्यान रखें कि जरूरत से ज्यादा मात्रा में हल्दी का सेवन करना नुकसानदायक भी हो सकता है इसलिए सर्दी या गर्मी कोई भी मौसम हो हल्दी का सेवन हमेशा सीमित मात्रा में ही करें।
5- क्या अस्थमा के मरीजों के लिए हल्दी का सेवन फायदेमंद होता है?

फेफड़ों के रोगों में हल्दी का सेवन फायदेमंद होता है जैसे अस्थमा की समस्या। हल्दी, अस्थमा में जमे हुए कफ को दूर करने में मदद करती है जिससे अस्थमा के लक्षणों में कमी होने लगती है। इसीलिए अस्थमा के मरीजों को हल्दी के सेवन की सलाह दी जाती है. अगर आप अस्थमा के मरीज हैं तो आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह के अनुसार हल्दी का नियमित सेवन करें।

हल्दी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु का चुनाव करना –

हल्दी एक मसाला फसल है, जिस क्षेत्र में 1200 से 1400 मि.मी. वर्षा, 100 से 120 वर्षा दिनों में प्राप्त होती
है, वहां पर इसकी अति उत्तम खेती होती है। समुद्र सतह से 1200 मीटर ऊंचाई तक के क्षेत्रों में यह पैदा की जाती है, परंतु हल्दी की खेती के लिए 450 से 900 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्र उत्तम होते हैं। हल्दी एक उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की फसल हैं। हल्दी के लिए 30 से 35 डिग्री से.मी. अंकुरण के समय, 25 से 30 डिग्री से.मी. कल्ले निकलने 20 से 30 डिग्री से.मी. प्रकंद बनने तथा 18 से 20 डिग्री से.मी. हल्दी की मोटाई हेतु उत्तम है।

हल्दी की खेती के लिए मिट्टी का चुनाव –

हल्दी के रोपण का उचित समय अप्रैल एवं मई का होता है। हल्दी का उत्पादन सभी प्रकार की मिट्टी में किया जा सकता हैं, परंतु जल निकास उत्तम होना चाहिए। इसका पीएच 5 से 7.5 होना चाहिए। हल्दी की खेती करने के लिए दोमट, जलोढ़, लैटेराइट मिट्टी, जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो, वह इसके लिए अति उत्तम है। पानी भरी मिट्टी इसके लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त होती है।

हल्दी की खेती के लिए उन्नत प्रजातियाँ –

सी.एल. 326 माइडुकुर

लीफ स्पाॅट बीमारी की अवरोधक प्रजाति है, लम्बे पंजे वाली, चिकनी, नौ माह में तैयार होती है। उत्पादन क्षमता 200-300 क्विं./हेक्टेयर तथा सूखने पर 19.3 प्रतिशत हल्दी मिलती हैं।

सी.एल. 327 ठेकुरपेन्ट

इसके पंजे लम्बे, चिकने एवं चपटे होते हैं। परिपक्वता अवधि 5 माह तथा उत्पादन क्षमता 200-250 क्विं./हेक्टर सूखने पर 21.8 प्रतिशत हल्दी प्राप्त होती हैं।

कस्तूरी

यह शीघ्र (7 माह) में तैयार होती हैं। इसके पंजे पतले एवं सुगन्धित होते हैं। उत्पादन 150-200 क्विं./हेक्टेयर 25 प्रतिशत सूखी हल्दी मिलती हैं।गांठां के रंग और आकार के अनुसार हल्दी की कई किस्में पाई जाती है। मालाबार की हल्दी औषधीय महत्व की होती है तथा यह जुकाम और कफ के उपचार के लिए उपयुक्त है। पूना एवं बंगलौर की हल्दी रंग के लिए अच्छी है। जंगली हल्दी अपनी सुगंधित गांठों के कारण भिन्न है तथा इसे ‘कुरकुमा एरोमेटिका’ (सुगंधित हल्दी) कहते हैं। हिमाचल प्रदेश में आमतौर पर स्थानीय किस्में ही प्रचलन में है। हल्दी की कुछ उत्कृष्ट किस्मों का विवरण निम्नानुसार है –

पालम पिताम्बर haldi Palam Pitamber turmeric –

यह किस्म हरे पत्तों के साथ मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह अधिक आय देती है और औसतन वार्षिक उपज 332 क्विंटल प्रति हैक्टेयर (25-26 क्विंटल प्रति बीघा) तक प्राप्त हो सकती है। इस किस्म में स्थानीय किस्मों से अधिक उपज देने की क्षमता है और इसकी गठ्ठियां उंगलियों की तरह लम्बी वरंग गहरा पीला होता है।

पालम लालिमा हल्दी Palam Lalima turmeric –

इसकी गठ्ठियों का रंग नारंगी होती है और स्थानीय किस्मों की अपेक्षा इसकी औसत वार्षिक उपज अधिक होती है। इस किस्म की औसतन वार्षिक उपज 250-300 क्विंटल प्रति हैक्टेयर (20-24 किवंटल प्रति बीघा) तक ली जा सकती है।

कोयम्बटूर हल्दी Coimbatore turmeric

यह बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है। इसके कंद बड़े, चमकीले एवं नारंगी रंग के होते हैं। यह 285 दिन में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है।

कृष्णा haldi Krishna turmeric-

यह लम्बे प्रकंदों तथा अधिक उपज देने वाली किस्म है। यह कंद गलन के प्रति रोगरोधी है और 255 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

बी.एस.आर.-1 हल्दी (BRS-1)-

जिन क्षेत्रों में पानी खड़ा रहता हो वहाँ के लिए अधिक उपज देने वाली उपयुक्त किस्म है। इसके कंद लम्बे तथा चमकीले पीले रंग के होते हैं। यह किस्म 285 दिनों में तैयार हो जाती है।

सवर्णा हल्दी Swarana turmeric-

यह अधिक उपज देने वाली, गहरे नारंगी रंग कंद युक्त अधिक उपज देने वाली किस्म है।

सुगुना haldi Suguna turmeric –

छोटे कंद और 190 दिनों में तैयार होने वाली यह किस्म कंद गलन रोग के लिए प्रतिरोधी है।

सुदर्शन haldi Sudarshan turmeric –

इसके कन्द घने, छोटे आकार के तथा देखने में काफी खूबसूरत होते हैं। यह किस्म 190 दिन में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है।
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हल्‍दी में बीज की मात्रा –

बीज की मात्रा प्रकन्दों के आकार व बोने की विधि पर निर्भर करता है। शुद्ध फसल बोये जाने के लिये 20-25 क्विंटल जबकि मिश्रित फसल हेतु 12-15 क्विंटल प्रकन्द की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। प्रकन्द 7-8 सेमी लम्बे तथा कम से कम दो आंखों वाले होने चाहिये। यदि कन्द बड़े हो तो उन्हे काटकर बुवाई की जा सकती है।

हल्‍दी में बीजोपचार

बुवाई के पूर्व प्रकन्दों को थिरम या मैंकोजेब नामक किसी एक दवा की 2.5 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर बीज को 30-50 मिनट तक उपचारित करके छाया में सुखाकर बुवाई करनी चाहिये। भूमि में यदि दीमक लगने की सम्भावना हो तो उपरोक्त रसायनों में क्लोरोपाईरीफॉस की 2 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से मिलाकर उपचारित करना चाहिये।

खेत की तैयारी एवं बोने की विधि

खेत की बुआई करने से पहले उसकी 4-5 जुताई कर, उसे पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरा एवं समतल कर लिया जाना चाहिए। पूर्व फसल के अवशेषों को अलग कर दिया जाना चाहिए। हल्दी रोपण हेतु 15 से.मी. ऊंची, एक मीटर चैड़ी तथा सुविधानुसार लम्बी (3-4 मीटर) क्यारियां, 30 से.मी. की दूरी पर क्यारी से क्यारी रख कर बना लेना चाहिए। यदि खेत में नेमोटोड की समस्या हो तो प्लास्टिक सोलेराइजेशन अप्रैल के महीने में ही कर लें, तभी क्यारियां बनाएं। हल्दी का रोपण प्रकन्द (राइजोम) से होता है, जिसमें 20 से 25 क्विंटल प्रकन्द प्रति हेक्टर लगता है। प्रत्येक प्रकन्द में कम से कम 2-3 आॅंखे होना चाहिए। प्रकन्दों को 0.25 प्रतिशत इण्डोफिल, एम-45 घोल में कम से कम 30 मिनिट तक डुबोकर उपचारित करें, कटे-सड़े एवं सूखे तथा अन्य रोग से ग्रसित प्रकन्दों को छांटकर पृथक कर लेना चाहिए। ध्यान रखें कि एक वजन, आकार के कंद एक कतार में लगाएं अन्यथा छोटा-बड़ा प्रकन्द लगाने पर पौधे की बढ़वार समान नहीं हो पाती है। 5 से.मी. गहरी नाली में 30 से.मी. कतार से कतार तथा 20 से.मी. प्रकंद की दूरी रखकर रोपण करें। मदर राइजोम को ही बीज के रूप में उपयोग करना चाहिए। रोपण के बाद मिट्टी से नाली को ढक दें।
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सिंचाई एवं जल माँग प्रबंधन –

हल्दी की फसल में 20-25 हल्की सिंचाई की जरूरत पड़ती हैं। गर्मी में 7 दिन के अन्तर पर तथा शीतकाल में 15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए।

खाद, उर्वरक मल्चिंग एवं अन्तः कर्षण क्रियाएं

हल्दी की फसल को जीवांश खाद की काफी आवश्यकता रहती है। 25 टन कम्पोस्ट या गोबर की खूब सड़ी हुई खाद प्रति हेक्टर की दर से जमीन में मिला देना चाहिए। रासायनिक उर्वरक नत्रजन-60 किग्रा., स्फुर 30 किग्रा. एवं पोटाश 90 किग्रा. प्रति हेक्टर आवश्यक हैं। स्फुर की पूरी मात्रा एवं पोटाश आधी मात्रा रोपण के समय जमीन में मिला लें। नत्रजन की आधी मात्रा 45 दिन रोपण के बाद और शेष आधी नत्रजन एवं पोटाश की मात्रा 90 दिन बाद मिट्टी चढ़ाते समय डालें। हल्दी रोपण के बाद 12.5 टन/हेक्टर की दर से हरी पत्ती, सूखी घास या अन्य जैविक अवरोध परत क्यारियों के ऊपर फैला देना चाहिए। दूसरी एवं तीसरी अन्य 5 टन प्रति हेक्टर की दर से छिड़काव कर देने के बाद किसी भी अवरोध परत पदार्थ को बिछा दें। तीन-चार बार निंदाई करें, क्योंकि इसको ग्रीष्मकाल में लगाते हैं, जिससे पानी काफी देना पड़ता हैं, जिससे खरपतवार काफी उग आते हैं । अक्टूबर के बाद भी सिंचाई करते हैं, जिससे उत्पादन अच्छा होता हैं।

हल्दी की मिश्रित खेती या अन्तरवर्ती फसल

मैदानी क्षेत्र में मिर्च एवं अन्य फसलों के साथ मुख्यतया सब्जी वाली फसलों में इसे मिश्रित फसल के रूप में लगाया जाता हैं। इसे अरहर, सोयाबीन, मूंग, उड़द की फसल के साथ भी लगाया जा सकता है। अन्तरवर्ती फसल के रूप में बगीचों में जैसे आम, कटहल, अमरूद, चीकू, केला फसल के लाभ का अतिरिक्त आय प्राप्त की जाती है।

हल्दी फसल के प्रमुख कीट एवं रोग/व्याधियां–

शूटबोरर

– यह कीट हल्दी के स्युडोस्टेम (तना) एवं प्रकंद में छेद कर देता हैं। इससे पौधों में भोज्य सामग्री आदि तंतुओं के नष्ट होने से सुचारू रूप से प्रवाह नहीं कर पाती है तथा कमजोर होकर झुक जाता है। इसका नियंत्रण 0.05 प्रतिशत डाइमिथोएट या फास्फोमिडान का छिड़काव करने से किया जावे।

साॅफ्टराट

हल्दी की यह काफी क्षति पहंुचाने वाली बीमारी है। यह बीमारी पीथियमस्पेसीन के प्रकोप से होती है। इसके
प्रकोप से प्रकन्द सड़ जाता है। नियंत्रण के लिए 0.25 प्रतिशत इण्डोफिल एम-45 से मिट्टी की ड्रेंचिंग करें। रोपण के पहले प्रकन्द का उपचार करके ही लगायें।

लीफ स्पाट

यह बीमारी कोलिटोट्राइकम स्पेसीज फफूंद के कारण होती हैं। इसमें छोटे अण्डाकार अनियमित या नियमित भूरे रंग के धब्बे पत्तियों पर दोनों तरफ पड़ जाते हैं, जो बाद में धूमिल पीली या गहरे भूरे रंग के हो तो सावधानी बतौर बीमारी के प्रकोप के पूर्व ही 1 प्रतिशत बोर्डाे मिश्रण का छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर सितंबर के प्रथम सप्ताह में करें।

हल्दी की खेती की जानकारी व हल्दी के औषधीय फायदे | Scientific cultivation of Turmeric
हल्दी की खेती की जानकारी व हल्दी के औषधीय फायदे | Scientific cultivation of Turmeric
फसल की खुदाई

हल्दी फसल की खुदाई 7 से 10 माह में की जाती है। यह बोई गयी प्रजाति पर निर्भर करता है। प्रायः जनवरी से मार्च के मध्य खुदाई की जाती है। जब पत्तियां पीली पड़ जाये तथा ऊपर से सूखना प्रारंभ कर दे। खुदाई के पूर्व खेत में घूमकर परीक्षण कर ले कि कौन-कौन से पौधे बीमारी युक्त है, उन्हें चिंहित कर अलग से खुदाई कर अलग कर दें तथा शेष को अलग वर्ष के बीज हेतु रखें।

हल्दी की उपज Yield of turmeric

अच्छी फसल होने पर 18-20 क्विंटल ताजी हल्दी प्रति बीघा प्राप्त होती है, जो प्रोसैसिंग (सुखाने) के बाद 4.5 – 5.0 क्विंटल प्रति बीघा रह जाती है।

बीज सामग्री का भंडारण

खुदाई कर उसे छाया में सुखा कर मिट्टी आदि साफ करें। प्रकंदों को 0.25 प्रतिशत इण्डोफिल एम-45 या 0.15 प्रतिशत बाविस्टीन एवं 0.05 प्रतिशत मैलाथियान के घोल में 30 मिनिट तक उपचारित करें। इसे छाया में सुखाकर रखें। हल्दी भंडारण के लिए छायादार जगह पर एक मीटर चैड़ा, 2 मीटर लम्बा तथा 30 से.मी. गहरा गड्ढा खोदें। जमीन की सतह पर धान का पुआल या रेत 5 से.मी. नीचे डाल दें। फिर उस पर हल्दी के प्रकन्द रखें इसी प्रकार रेत की दूसरी सतह बिछा कर हल्दी की तह मोड़ाई करें। गड्ढा भर जाने पर मिट्टी से ढॅंककर गोबर से लीप दें।

हल्दी की क्योरिंग

हल्दी के प्रकन्दों को सूखा लेना चाहिए तथा उसके ऊपर की गंदगी साफ करके कड़ाहे में उबलने के लिए डालंे। फिर उसे कड़ाहे में चूने के पानी या सोडियम बाई कार्बनेट के पानी में घोल लें। पानी की मात्रा उतनी ही डालें जिससे पानी ढॅंक जावे। उसे 45 से 60 मिनट तक उबाले जब सफेद झाग आने लगे तथा उसमें से जब विचित्र महक आने लगती है, तब उसे अलग से पृथक करें। आजकल सोलर ड्रायर भी हल्दी के लिए बनाये गये हैं। उसे पानी से निकाल कर अलग करें। हल्दी जो कि उबल कर मुलायम हो गयी है या नहीं। खुदाई के 2 दिन बाद ही उबालना चाहिए। फिर उसे 10-15 दिन सुखाएं।

हल्दी का सुखाना

उबली हुई हल्दी को बांस की चटाई पर रोशनी में 5-7 से.मी. मोटी तह पर सुखायें। शाम को ढॅंककर रख दें। 10-15 दिन पूर्णतया सूख जाने से ड्रायर के 60 डिग्री से. पर सुखाते हैं। सूखने के बाद तक उत्पाद प्राप्त होता हैं।

पालिशिंग –

हल्दी का बाहरी भाग खुरदरा तथा छिलके वाला दिखाई देता है। इसीलिए उसे चिकना तथा एक समान
बनाने के लिए हाथ से आदमियों द्वारा पालिश करते है। बोरियों में भरकर उसे रगड़ा जाता है। आजकल पालिशिंग
ड्रम बनाये गये हैं, उसमें भी पालिश करते हैं। हल्दी को रंगने के लिए 1 किलोग्राम हल्दी को पीस कर उससे एक क्विंटल हल्दी को रंगा जा सकता है, जिससे यह ऊपर से एक समान पीले रंग की दिखाई देती है।

हल्दी से बनने वाले उत्पाद

1.हल्दी का पाउडर जो मसाले के काम आता हैं।
2. हल्दी का आयल -हल्दी में 3 से 5 प्रतिशत बोलाटाइल आयल (तेल) निकलता हैं जो स्टीम डिस्टीलेशन द्वारा निकाला जाता हैं। यह हल्दी पाउडर से निकाला जाता हैं। तेल 8 से 10 घंटे में धीरे-धीेरे निकलता हैं।
3. टर्मकेरिक ओलियोरोजिन:- यह साल्वेन्टर एक्सट्रेक्शन विधि से निकाला जाता है। इसकी कीमत कर्कुमिन की मात्रा के ऊपर निर्भर करती हैं।

सरसों एवं राई की खेती की जानकारी

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शीत ऋतु की तिलहनी फसलों मे राई – सरसों का एक प्रमुख स्थान है। सरसों के हरे पौधे से लेकर सूखे तने, शाखायें और बीज आदि सभी भाग उपयोग में आते है। सरसों की कोमल पत्तियाँ तथा कोमल शाखायें सब्जी के रूप में (सरसों का साग) प्रयोग की जाती है। सरसों का साग और मक्के दी रोटी उत्तर भारत में चाव से खाई जाती है । सरसों राई के बीज में 37 – 49 प्रतिशत तेल पाया जाता है। राई – सरसों के तेल में पाये जाने वाले असंतृप्त वसा अम्ल लिनोलिक एवं लिनालेनिक अम्ल अत्यावश्यक वसा अम्ल है। राई – सरसों का तेल खाने, सब्जी पकाने, शरीर तथा सिर मे लगाने के अलावा वनस्पति घी बनाने में भी लाया जाता है। अचार बनाने, सब्जियाँ बनाने व दाल में तड़का लगानें मे सरसों के तेल का प्रयोग बखूबी से किया जाता है। सरसो और तोरिया के तेल का उपयोग साबुन, रबर तथा प्लास्टिक आदि के निर्माण में किया जाता है । इस्पात उद्योग में इस्पात प्लेटों में शीघ्र शीतलन और चमड़े को मुलायम करने में भी तेल का प्रयोग किया जाता ह। सरसों की खली के लगभग 25 – 30 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, 5 प्रतिशत नाईट्रोजन, 1.8 – 2.0 प्रतिशत फाॅस्फोरस तथा 1 – 1.2 प्रतिशत पोटेशियम पाया जाता है। इसका प्रयोग पशुओ को खिलाने तथा खाद के रूप मे किया जाता है। सरसों – राई को भूमि संरक्षक फसल के रूप में भी उगाया जाता है। सरसों के हरे पौधे, सूखी पत्तियों को जानवरो को चारे के रूप मे खिलाया जाता है।

सरसों एवं राई की खेती की जानकारी | Mustard Cultivation Information

सरसों एवं राई की खेती की जानकारी | Mustard Cultivation Information
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कहाँ कहाँ होती है राई – सरसों की खेती – where to Mustard Cultivation in india

भारत में उगाई जाने वाली तिलहनी फसलों मे सरसों – राई का मूँगफली के बाद दूसरा स्थान है जो कि कुल तिलहन उत्पादन का 22.9 प्रतिशत है तथा तिलहनी फसलो के कुल क्षेत्रफल का 24.7 प्रतिशत क्षेत्रफल राई – सरसों के अन्तर्गत आता है। भारत मे राई – सरसों वर्ग के अन्तर्गत तोरिया, भूरी सरसों, तारामिरा, करन राई तथा काली सरसों का उत्पादन किया जाता है परन्तु राई – सरसों वर्ग की फसलों के कुल क्षेत्रफल का 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा भूरी सरसों (राई या लाहा) के अन्तर्गत आता है, जिसका अधिकांश क्षेत्रफल राजस्थान, उ. प्र., पंजाब, हरियाणा, म. प्र., बिहार, पं. बंगाल, गुजरात तथा असम में है। राई-सरसों के अन्तर्गत सर्वाधिक क्षेत्रफल वाले प्रथम तीन राज्यों में राजस्थान,उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश जबकि उत्पादन में राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं हरियाना अग्रणीय राज्य है । इन फसलों की औसत उपज में पहले स्थान पर हरियाणा (1738 किग्रा. प्रति हैक्टर), दूसरे पर राजस्थान(1234 किग्रा.) एवं तीसरे स्थान पर गुजरात (1136 किग्रा.) कायम रहे । मध्य प्रदेश में सरसों – राई की खेती 0.71 मिलियन हेक्टेयर मे की गई जिससे 074 मिलियन टन उत्पादन दर्ज किया गया तथा औसत उपज 1034 किग्रा. प्रति हेक्टेयर रही है। छत्तीसगढ़ में राई-सरसो की खेती 160.03 हजार हैक्टर में की गई जिससे 525 किग्रा. अ©सत उपज प्राप्त हुई (वर्ष 2009-10)। प्रदेश के प्रमुख राई-सरसो उगाने वाल्¨ जिलो में सरगुजा, जगदलपुर, कोरिया, जशपुर, कांकेर, जांजगीर, धमतरी एवं दंतेबाड़ा जिले आते है । सरसों की खेती प्रदेश में अगेती फसल के रूप में की जाती है। आदिवासी अंचल में सरसों की फसल बाड़ी में मक्का फसल लेने के बाद की जाती है। सिंचित दशा में धान के बाद भी सरसों की फसल ली जा रही है। जाडे की अवधि कम होने तथा सिंचाई के पर्याप्त साधन न होने के कारण प्रदेश मे सरसों की औसत उपज कम ही आती है। इन फसलों की खेती शुद्ध एवं मिश्रित फसल के रूप मे होती है।
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उपयुक्त जलवायु –

राई तथा सरसों रबी मौसम की फसल है जिसे शुष्क एवं ठण्डी जलवायु तथा चटक धूप की आवश्यकता होती है। इसकी खेती 30 से 40 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र में सफलतापूर्वक की जा सकती है। बीज अंकुरण बुआई के समय वातावरण का तापमान तथा फसल बढ़वार के लिए तापक्रम आदर्श माना गया है। वातावरण का तापक्रम से कम या 35 -40 डि सेग़्रे से अधिक होने पर फसल वृद्धि रूक जाती है। बीज में तेल की अधिकतम मात्रा के लिए 10-15 डि सेग़्रे तापक्रम उपयुक्त रहता है। पौधों में फूल आने और बीज पड़ने के समय बादल और कोहरे से भरा मौसम हानिकारक होता है क्योंकि ऐसे मौसम में कीट और रोगों का प्रकोप की अधिक सम्भावना होती है। पौध वृद्धि व विकास के लिए कम से कम 10 घंटे की धूप आवश्यक है।

भूमि का चयन एवं खेत की तैयारी –

सभी प्रकार के सरसों के लिए दोमट जलोढ़ भूमि सर्वोत्तम है। वैसे तो उत्तम जल निकास एवं भू-प्रबन्ध के साथ सरसों एवं राई सभी प्रकार की जमीन में उगाई जा सकती है। परन्तु बुलई दोमट और दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त हैं। उदासीन से हल्की क्षारीय भूमि (पीएच मान 7-8) इन फसलों की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है। शुद्ध फसल के लिये प्रायः एक जुताई मिट्टी पलट हल से करनी चाहिए तथा 3 – 4 जुताइयाँ देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए। पाटा चलाकर खेत की मिट्टी को महीन, भुरभुरी तथा समतल कर लेते हैं। इससे जमीन में आर्द्रता अधिक लम्बे समय तक के लिये संचित रहती है, जो कि सरसों व राई के उत्तम अंकुरण एवं पौध बढ़वार के लिये आवश्यक है। मिश्रित रूप में बोई जाने वाली सरसों के खेत की तैयारी प्रधान फसल की आवश्यकतानुसार ही की जाती है।

राई-सरसों की खेती के लिए प्रमुख उन्नत क़िस्मों का चुनाव –

प्रयोगों से सिद्ध हो चुका है कि अकेले उन्नत किस्मों के प्रयोग से पुरानी प्रचलित किस्मों की अपेक्षा 20-25 प्रतिशत अधिक उपज ली जा सकती है। छत्तीसगढ़ के लिए उपयुक्त उन्नत किस्मो में छत्तीसगढ़ सरसों, वरदान, रोहिनी, एनडीटी-8501, कृष्ना, जवाहर-1(जेएमडब्लूआर 93-39), माया, स्वर्ना, ज्योति, वशुंधरा, जवाहर मस्टर्ड, झुमका । भूरी सरसों में पूसा कल्यानी

टाइप-151-

यह किस्म यह किस्म पीली सरसों सिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 46% तेल होता है। 120 – 125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 14 – 15 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

क्रांति –

पीली सरसों की यह किस्म सिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 46% तेल होता है। 125 – 135 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 25 – 28 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

वरदान –

यह किस्म देर बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 46% तेल होता है। 120 – 125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 13 – 18 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

वैभव –

यह किस्म देर बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल की मात्रा 38 प्रतिशत होता है। 120 – 125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 13 – 18 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

कृष्णा –

किस्म सिंचित क्षेत्र में बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल की मात्रा 40 प्रतिशत होता है। 125 – 130 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 25 – 30 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

आरएलएम-

यह किस्म असिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 46% तेल होता है। 150 – 155 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 15 – 20 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

आरएलएम-198 –

यह किस्म असिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 38% तेल होता है। 152 – 166 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 17 – 18 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

वरूणा (टी-59) –

सरसों की यह बड़े दाने वाली किस्म है। इसमें तेल दर 42% तेल होता है। 125 – 130 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 20- 25 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

पूसा बोल्ड –

सरसों की यह बड़े दाने वाली किस्म है। इसमें तेल दर 40% तेल होता है। 130 – 140 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 18 – 26 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

वसुन्धरा –

इस किस्म में तेल दर 38-40 फीसदी होता है। 130 – 135 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 20 – 21 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

जेएम-1 –

काला कत्थई बीज वाली यह किस्म सिंचित क्षेत्र में बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल की मात्रा 40 प्रतिशत होता है। 120 – 128 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 20 – 21 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

जेएम-2 –

काला कत्थई गोल बीज वाली यह किस्म सिंचित क्षेत्र में बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल की मात्रा 40 प्रतिशत होता है। 135 – 138 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 15 – 20 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

छत्तीसगढ़ सरसों-

इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय द्वारा विकसित यह किस्म 99 – 115 दिन में पक कर तैयार होती है। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ की सिंचित व अर्द्ध सिंचित परिस्थितियों के लिए उपयुक्त किस्म है। इसके दाने कत्थई रंग व मध्यम आकर के होते हैं। उपज क्षमता औसतन 11.80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसमें सफेद किट्ट (रस्ट), चूर्णिल आसिता आल्टरनेरिया झुलसा रोग तथा एफिड कीट का प्रकोप कम होता है।

सरसों की खेती के लिए बोआई उचित समय पर करें –

राई – सरसों की शुद्ध फसल खरीफ में खेत पड़ती छोड़ने के बाद या खरीफ में ज्वार, बाजरा लेने के पश्चात् बोई जाती है। सरसों मुख्यतः गेहूँ, जौ, चना, मसूर व शरदकालीन गन्ना के साथ मिलाकर बोयी जाती है। आलू व सरसों की सह फसली खेती 3:1 अनुपात में की जाती है । शरदकालीन गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य एक पंक्ति सरसो की बोई जा सकती है। गेहूँ और सरसों (9: 1), चना और सरसों (3: 1), तथा तोरिया और मसूर (1: 1) की अन्तः फसली खेती भी लाभप्रद पाई गई है।

समय पर बुआई करना खेती में सफलता की प्रथम सीढ़ी है। सरसों की बुआई का समय मुख्यतः तापक्रम पर निर्भर करता है। बुआई के समय वातावरण का तापमान 26 – 30 डि.से. होना आवश्यक है। सरसों और राई की बुआई अक्टूबर के प्रथम पखवारे में करना चाहिए। अधिक तापमान होने की दशा में बुआई में देरी कर देनी चाहिए। तोरिया की बोनी सितम्बर के दूसरे पखवारे में करना चाहिए। तोरिया की बुआई देरी से करने पर फसल पर एफिड कीट का प्रकोप अधिक होता है।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार –

अच्छी उपज लेने के लिए यह आवश्यक है कि प्रति हेक्टेयर खेत में उचित पौध संख्या स्थापित हो। सरसों की शुद्ध फसल हेतु 5 – 6 किलो प्रति हेक्टेयर तथा मिश्रित फसल उगाने के लिए 1.5-2 किलो प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता पड़ती है। तोरिया की बीज दर 4 किग्रा. प्रति हे. रखना चाहिए। बोने के पूर्व सरसों के बीज को फफूंदीनाशक रसायन जैसे कार्बेन्डिजिम (वाविस्टिन) 2 ग्राम प्रति किग्रा. बीज या थीरम (2.5 ग्राम दवा प्रति किलो बीज के हिसाब से) उचारित करना चाहिए जिससे फसल को मृदा जनित रोगों से बचाया जा सके।

बोआई की विधियाँ –

सरसों फसल की बुवाई पंक्तियों में 45 सेमी. और पौधों में 15 – 20 सेमी. के अन्तर से करना चाहिये। तोरिया की बुआई पंक्तियों में 30 सेमी. और पौधों में 10 – 15 सेमी. के अन्तर पर करना उचित रहता है। बुआई के समय यह ध्यान रखना चाहिये कि बीज उर्वरक के सम्पर्क में न आये अन्यथा अंकुरण प्रभावित होगा। अतः बीज 3 – 4 सेमी. गहरा तथा उर्वरक को 7 – 8 सेमी. गहराई पर देना चाहिए। अच्छे अंकुरण एवं उचित पौध संख्या के लिए बुआई से पूर्व बीजों को पानी में भिगोकर बोया जाना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक की सही खुराक –

सरसों भारी मात्रा में और शीघ्रता से भूमि से पोषक तत्व ग्रहण करती है। अतः खाद और उर्वरकों के माध्यम से फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की प्रतिपूर्ति आवश्यक है। बुआई के 15 – 20 दिन पूर्व 10 – 15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद खेत मे मिलाने से प©ध वृद्धि और उपज में बढ़ोत्तरी होती है। राई व सरसों की सिंचित फसल में 100 – 120 किग्रा. नत्रजन, 40 किग्रा. स्फुर व 40 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए। असिंचित अवस्था में 40 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा. स्फुर व 20 किग्रा. पोटाश प्रति हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए। पोषक तत्वो की वास्तविक मात्रा का निर्धारण मृदा परीक्षण के आधार पर किया जाता है। मृदा परीक्षण नहीं किया गया है तो तोरिया की सिंचित फसल के लिए 90 किग्रा. नत्रजन 30 किग्रा. स्फुर तथा 20 किग्रा. पोटाॅश प्रति हे. तथा असिंचित दशाओं में इसकी आधी मात्रा प्रयोग करनी चाहिए। सिंचित अवस्था में नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय कूड़ो में बीज के नीचे देना चाहिए। शेष नत्रजन पहली सिंचाई के बाद देना चाहिए। भूमि मे जिंक की कमी होने पर 5 – 10 किग्रा. जिंक (जिंक सल्फेट के माध्यम से) बुआई के समय देना लाभप्रद पाया गया है। नत्रजन को अमोनियम सल्फेट तथा फास्फोरस सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में देने से फसल को आवश्यक सल्फर तत्व भी मिल जाता है जिससे उपज और बीज के तेल की मात्रा बढ़ती है।

राई – सरसों की खेती में सिंचाई व जल प्रबंधन –

सरसो में सिंचाई देने से उपज मे वृद्धि होती है। अच्छे अंकुरण के लिए भूमि मे 10 – 12 प्रतिशत नमी होना आवश्यक रहता है। कम नमी होने पर एक हल्की सिंचाई देकर बुआई करना लाभप्रद रहता है। सरसों फसल में 2 – 3 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। इस फसल को औसतन 40 सेमी. जल की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बुआई के 25 – 30 दिन बाद (4 – 6 पत्ती अवस्था) और दूसरी सिंचाई फूल आते समय (बुआई के 70 – 75 दिन बाद) करनी चाहिए। प्रथम सिंचाई देर से करने पर पौधों में शाखायें, फूल व कलियां अधिक बनती है। सरसों में पुष्पागम और शिम्बी लगने का समय सिंचाई की दृष्टि से क्रांतिक होता है। इन अवस्थाओं पर भूमि में नमी की कमी होने से दानें अस्वस्थ तथा उपज और दाने में तेल की मात्रा में कमी होती है।

राई – सरसों की खेती में खरपतवार नियंत्रण –

राई एवं सरसों में खरपतवारों के कारण 20 – 30 प्रतिशत तक उपज मे कमी आ सकती है। फसल में बथुआ, चटरी – मटरी, सैंजी, सत्यानाशी, मौथा, हिरनखुरी आदि खरपतवारों का प्रकोप होता है। पौधों की संख्या इष्टतम होने से प्रत्येक पौधों का विकास अच्छा होता है, शाखायें अधिक निकलती है जिससे पौधों पर फलियाँ अधिक बनती है क्योंकि पौधो को उचित प्रकाश, जल और पोषक तत्व समान रूप से उपलब्ध होते है। बुआई के 15 – 20 दिन बाद एक निंदाई – गुड़ाई करें तथा पौधों – से – पौंधें की दूरी छँटाई करके 15 – 20 सेमी. कर देना चाहिए। पंक्ति में घने पौधो को उखाड़कर पौध से पौध की उचित दूरी रखने को विरलन कहते है । जब फसल में पहली फूल की शाखा निकल आये तब ऊपरी हिस्सा तोड़ देने मे शाखाये, फूल व फलियाँ अधिक बनती है जिससे उपज मे वृद्धि होती है। पौधों के इस कोमल भाग को सब्जी के रूप में बाजार में बेचा जा सकता है या पशुओं को खिलाने के लिए प्रयोग मे लाना चाहिए। खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथालिन (स्टाम्प) 0.5 – 1.5 किग्रा. या आइसोप्रोट्यूरान 1 – 1.3 किग्रा. प्रति हे. को 800 – 100 लीटर पानी में घोलकर अंकुरण से पहले छिड़काव करना चाहिए। यदि सरसों को चने क साथ लगाया गया है तब खरपतवार नियंत्रण के लिए फ्लूक्लोरालिन (बेसालिन) 0.75 – 1 किग्रा. प्रति हेक्टेयर को बुआई के पूर्व खेत मे छिड़कना चाहिए।

राई – सरसों की कटाई एवं गहाई-

तोरिया की फसल 90 – 100 दिन तथा राई की फसल 120 – 150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। पकने पर पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और बीजों का प्राकृतिक रंग आ जाता है। अपरिपक्व अवस्था में कटाई करने पर उपज में कमीं आ जाती है और तेल की मात्रा भी घट जाती है। फलियों के अधिक पक जाने पर वे चटख जाती हैं और बीज झड़ने लगते है। फल्लियों एवं पत्तियो के पील पड़ने के साथ ही फसल की कटाई हँसिये से या फिर पौधों को हाथ से उखाड़ लेना चाहिये। कटाई उपरान्त फसल को 2 – 3 सप्ताह तक खलिहाँन में सुखाया जाता है, फिर डंडो से पीटकर या बैलो की दाय चलाकर या ट्रेक्टर से मड़ाई की जाती है। आज कल मड़ाई के लिए थ्रेसर का भी प्रयोग किया जाता है। मड़ाई के बाद बीजों को भूसे से अलग करने के लिए पंखे का प्रयोग करते है या हवा में ओसाई करते है।

राई – सरसों की उपज व पैदावार की जानकारी –

सरसों एवं तोरिया की मिश्रित फसल से 3 – 5 क्विंटल तथा शुद्ध असिंचित फसल से 10 – 12 क्विंटल तथा सिंचिंत फसल से 12 – 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। उन्नत सस्य तकनीक अपनाकर असिंचित राई से 15 – 20 क्विंटल तथा सिंचित राई से 20 – 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है। भूसा भी लगभग 15 – 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है।बीज को अच्छी तरह धूप में सूखाना चाहिए। सरसों के दानों में भण्डारण के समय नमी की मात्रा 7 – 10 प्रतिशत होना चाहिए। सरसों – राई के बीज में 38 – 40 प्रतिशत , तोरिया में 42 – 44 प्रतिशत तथा भूरी व पीली सरसो में 43 – 48 प्रतिशत तेल पाया जाता है ।