भेड़ पालन व्यवसाय कैसे शुरू करें | How to Start Sheep Farming Business

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खेती के साथ साथ कई तरह के काम हैं जिन्हें मनुष्य सामान्य तौर पर कई सालों से करता आ रहा है.भेड़ का मनुष्य से सम्बन्ध आदि काल से है तथा भेड़ पालन एक प्राचीन व्यवसाय है। भेड़ पालक भेड़ से ऊन तथा मांस तो प्राप्त करता ही है, भेड़ की खाद भूमि को भी अधिक ऊपजाऊ बनाती है। भेड़ कृषि-अयोग्य भूमि में चरती है, कई खरपतवार आदि अनावश्यक घासों का उपयोग करती है तथा उंचाई पर स्थित चरागाह जोकि अन्य पशुओं के अयोग्य है, उसका उपयोग करती है। भेड़ पालक भेड़ों से प्रति वर्ष मेमने प्राप्त करते हैं। आज पशु पालन के रूप में लोग गाय, भैंस, बकरी जैसे जीवों का पालन कर अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं। इसके अलावा मुर्गी पालन का काम भी काफी तेज़ी से बढ़ रहा हैं । इन सभी के अलावा भेड़ पालन का काम भी एक बहुत ही तेज़ी से विकास करने वाला व्यवसाय बन चुका है । आज भेद पालन से भारत से भारत की काफी जनता जुड़ी हुई है । आज हम आपको भेड़ पालन से संबंधित हर प्रकार की जानकारी देने वाले हैं ।

भेड़ पालन व्यवसाय तकनीक से कमाएँ लाखों रुपए | How to Start Sheep Farming Business

भेड़ पालन व्यवसाय क्या है – what is Sheep Farming

भेड़ पालन का काम काफी पुराना है । दुनियाभर के लगभग सभी देशों में भेड़ पालन का काम किया जाता हैं । जिनमें से भारत तीसरे नंबर पर सबसे ज्यादा भेड़ों का पालन करने वाला देश हैं । भारत के कई राज्यों में भेड़ों के पालन का काम किया जाता है । भेड़ हर तरह से उपयोगी होती हैं । भेड़ का पालन मुख्य रूप से माँस और उन के लिए किया जाता हैं । भेड़ हर परिस्थिति में रह सकती हैं । यही वजह है की भेड़ पालन का काम भारत में तेज़ सर्दी पड़ने वाले जम्मू कश्मीर से लेकर तेज़ चिलचिलाती धूप वाली तेज़ गर्मी के प्रदेश राजस्थान में आसानी से किया जाता है । लेकिन अधिक गर्मी और सर्दी में इनकी मृत्यु दर बढ़ जाती है ।

भेड़ पालन का व्यवसाय दिनों दिन बढ़ता जा रहा है । आज उन्नत तरीकों को अपना कर भेड़ पालन किया जा रहा हैं. जिससे लोगों की कमाई अच्छी हो रही हैं । आज किसान भाई भी भेड़ पालन का काम खेती के साथ साथ कर सकता हैं । क्योंकि भेड़ ज्यादातर जंगली घास या खरपतवार खाकर ही अपना विकास करती हैं । जिस कारण इनके पालन और देखभाल के लिए अधिक खर्च की जरूरत नही होती । लेकिन भेड़ पालन के लिए कई तरह की सावधानियां रखनी पड़ती हैं । जिससे भेड़ पालन का कारोबार सुचारू रूप से चल पाता है ।

भेड़ पालन कैसे शुरू करें – How to Start Sheep Farming Business

भेड़ पालन शुरू करने से पहले कई तरह की सावधानियां रखनी जरूरी होती हैं. भेड़ पालन शुरू करने के लिए पहले भेड़ पालन संबंधित हर प्रकार की जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए. ताकि व्यवसाय को शुरू करने में किसी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े. भेड़ पालन शुरू करने से पहले सरकारी योजनाओं के बारें में भी पता कर लें क्यों आज काफी ऐसे व्यवसाय है जिनको शुरू करने के लिए सरकार की तरफ से कई सारी मूलभूत सुविधा दी जाती हैं. ऐसे में अगर आप इस व्यवसाय को शुरू करना चाहते हैं तो आपको व्यवसाय को शुरू करने में सहायता मिल जाती है.

भेड़ पालन का व्यवसाय दो या तीन जानवरों के साथ भी किया जा सकता हैं. लेकिन अधिक मुनाफा कमाने के लिए भेड़ पालन का व्यवसाय बड़े पैमाने पर करना चाहिए. जिसमें लगभग 50 से 60 भेड़ें शामिल होनी चाहिए. लेकिन इससे भी बड़े पैमाने पर करने के लिए भेड़ों को संख्या का निर्धारण नही किया जा सकता. इन्हें आप अपनी राशि और क्षमता के आधार पर रख सकते हैं.

भेड़ पालन हेतु आवश्यक चीजें – things needed for sheep farming

किसी भी व्यवसाय की शुरुआत के लिए कई चीजों की जरूरत होती है. जिनके बिना व्यवसाय को शुरू नही किया जा सकता. उसी तरह भेड़ पालन के लिए भी कुछ मूलभूत चीजों की जरूरत होती हैं –

जमीन-

किसी भी व्यवसाय को शुरू करने के लिए जमीन की जरूरत सबसे पहले होती है. भेड़ पालन के दौरान छोटे स्तर पर किसान भाई इसे अपने घर पर ही आसानी से कर सकते हैं. लेकिन बड़े पैमाने पर करने के लिए अलग से जमीन की जरूरत होती है. बड़े पैमाने पर करने के लिए पशुओं के रहने, खाने और पानी जैसे सभी मूलभूत सुविधाओं की जरूरत होती है. बड़े स्तर पर भेड़ पालन के दौरान पशुओं को खुले स्थान की भी जरूरत होती है. भेड़ पालन के दौरान एक भेड़ के विकास के लिए अधिकतम दस वर्ग फिट की आवश्यकता होती है. इसलिए भेड़ों की संख्या के आधार पर जमीन का चयन करना चाहिए.

चारागाहों का विकास करना

अगर आप पूर्ण रूप से एक स्थान पर जीवों को रखकर उनका पालन करना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पशुओं के खाने के लिए चरागाहों की स्थापना करनी चाहिए. जिसमें जिसमे हरे चारे के रूप में कई तरह की फसलों को उगाया जाता है. जिससे पशुओं को चारा आसानी से मिल जाता है. चारागाहों के निर्माण के दौरान उनके चारों तरफ कंटीले तारों को लगा देना चाहिए. ताकि पशु चारागाह से बाहर ना जा सके और बाहर का जीव अंदर ना आ सके.

पशुओं के रहने का स्थान –

भेड़ पालन के दौरान सभी पशुओं को एक साथ रखा जा सकता हैं. क्योंकि इन जीवों में आपस में लड़ने की प्रवृति नही पाई जाती है. ये सभी जीव आपस में मिलकर रह सकते हैं. इनके रहने के लिए लिए एक बाड़े की जरूरत होती हैं. लेकिन नर पशु और गर्भित भेड़ को अलग से रखने की व्यवस्था की जाती हैं. सामान्य रूप से बाड़े का निर्माण करने के दौरान उसका निर्माण मौसम के आधार पर किया जाता है.

गर्मियों के मौसम बाड़ा चारों तरह से खुला होना चाहिए. इसके बाड़े का निर्माण करते वक्त गर्मियों में बाड़े की छत कच्ची घासफूस और कागज के गत्तों से बनी होनी चाहिए. क्योंकि कच्ची छत के नीचे पशुओं को गर्मियों में तेज़ धूप का अनुभव नही होता. और पशु आसानी से रहा सकते हैं. जबकि सर्दी के मौसम में पशुओं को रात्रि में रहने के लिए बंद कमरे की आवश्यकता होती है. सर्दी के मौसम में भेड़ों में मृत्यु दर ज्यादा पाई जाती है. इसके लिए सर्दियों में भेड़ों को बंद कमरे में उचित तापमान पर रखना चाहिए. तापमान नियंत्रित करने के लिए बिजली चालित हीटर को अलग से से लगा दें.

नर पशु के रहने का स्थान

भेड़ के नर पशु को अलग से रखा जाता हैं. ताकि उसे उचित मात्रा में खाना दिया जा सके इसके अलावा उसकी अच्छे से देखभाल की जा सके. क्योंकि 30 मादा पशु पर केवल एक ही नर पशु रखा जाता हैं. जिसको पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व दिया जाना जरूरी होता हैं. इसके अलावा नर पशु में हल्की हिंसक प्रवर्ती भी पाई जाती है. नर पशु के रहने के लिए अधिकतम 15 वर्गफीट की जगह काफी होती हैं.

गर्भित पशु के लिए

गर्भित पशु के अलग से रहने की जगह का होना जरूरी होता है. क्योंकि गर्भावस्था में पशु को किसी भी कारण चोट लगने की वजह से नुक्सान उठाना पड़ सकता है. एक जगह पर तीन से चार गर्भित भेड़ों को आसानी से रखा जा सकता हैं. जिनके लिए अधिकतम 25 से 30 वर्गफीट की दूरी की जरूरत होती हैं. जिसमें गर्भित अवस्था में भेड़ अच्छे से घूम सके. भेड़ों में गर्भधारण की समयावधि 5 महीने के आसपास पाई जाती है. इसलिए उन गर्भित भेड़ों को ही अलग से रखना चाहिए, जो तीन या चार महीने से ज्यादा वक्त की हो जाती हैं.

पशुओं के लिए खाना-

पशुओं के उचित विकास के लिए उन्हें खाने की उचित मात्रा की जरूरत होती है. वैसे तो भेड़ों को सामान्य रूप से चराहों में या खुले स्थान पर चराया जाता है. जिसके लिए पशुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लेकर घूमना होता है. भेड़ों को चराहों में सुबह और शाम के वक्त ही चराना चाहिए. और दोपहर के वक्त आराम करना चाहिए. गर्मियों के मौसम में पशुओं को चराने के वक्त सुबह सात से दस बजे तक खुले में चराना चाहिए. उसके बाद शाम के वक्त तीन बजे के बाद चराना चाहिए.

वहीं बात करें सर्दियों के मौसम की तो सर्दियों के मौसम में पशुओं को खुले में चराने के दौरान मौसम में अधिक ठंड नही होना चाहिए. सर्दियों के मौसम में पशुओं को धूप के मौसम में ही खुलें के चराना चाहिए. जबकि जिन पशुओं को बाहर खुलें में नही चराया जाता उन्हें घर पर रखकर ही उचित भोजन दिया जाना चाहिए. जिसमें चारे के अलावा पशुओं को उचित मात्रा में दाना भी दिया जाता हैं. जिनमें प्रत्येक गर्भित और नर पशु को रोज़ाना 300 ग्राम से ज्यादा दाना देना चाहिए.

पशु पालन हेतु श्रमिक –

भेड़ों के पालन के दौरान उनकी देखभाल के लिए श्रमिकों की जरूरत होती है. छोटे पैमाने पर इनका पालन करने के दौरान श्रमिकों की आवश्यकता नही होती. लेकिन बड़े पैमाने पर इनका पालन करने के दौरान लगभग 100 पशुओं पर दो श्रमिकों का रहना जरूरी होता है. जो पशुओं को बाहर चराहों में चारा खिलाने और उनकी देखभाल का काम करता है. ग्रामीण एरिया में श्रमिक कम खर्च पर आसानी से मिल जाते हैं. अगर हो सके तो ऐसे श्रमिक का इंतज़ाम करे जो पहले से इस व्यवसाय की जानकारी रखता हो. इससे भेड़ों के पालन में उसके अनुभव की काफी सहायता मिलेगी.

भेड़ पालन हेतु सरकारी सहायता-

भेड़ पालन या किसी व्यवसाय को शुरू करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरत धन राशि की होती हैं. जो बैंक या सरकार द्वारा प्राप्त सहायता के माध्यम से पालक लेता है. भेड़ पालन के लिए सरकार की तरफ से भी सहायता प्रदान की जाती है, जो अधिकतम एक लाख रूपये पर ही दी जाती है. जिसमें 90 प्रतिशत राशि किसान को ऋण के रूप में दी जाती है. जबकि बाकी की 10 प्रतिशत राशि खुद किसान को वहन करनी होती है. ऋण के रूप में दी जाने वाली 90 प्रतिशत राशि में से कुल राशि राशि के 50 प्रतिशत पर किसान को ब्याज नही देना होता है. यह राशि ऋण मुक्त होती है. जबकि बाकी बची 40 प्रतिशत राशि पर पालक को बैंक की तात्कालिक ब्याज दर पर ब्याज भुगतान करना होता है. ऋण मिलने के बाद ऋण की भुगतान की अवधि कुल 9 वर्ष रखी गई है. एक लाख से अधिक ऋण लेने पर 50 हजार राशि पर कृषक को ऋण नही देना होता. जबकि बाकी की राशि पर उसे बैंक की ब्याज दर के आधार पर ब्याज देना होता है.

भेड़ पालन व्यवसाय हेतु भेड़ की उन्नत नस्लें –

भेड़ की नस्लों का निर्धारण भेड़ों से प्राप्त होने वाली उन और माँस के आधार पर किया जाता हैं. जबकि कुछ ऐसे भी नस्लें हैं जो उन और माँस के साथ साथ दूध उत्पादन में भी सहायक होती हैं ।

भेड़ पालन व्यवसाय कैसे शुरू करें | How to Start Sheep Farming Business
भेड़ पालन व्यवसाय कैसे शुरू करें | How to Start Sheep Farming Business
गद्दी –

गद्दी नस्ल की भेड़ का पालन उन की प्राप्ति के लिए किया जाता है. इस नस्ल की भेड़ का पालन ज्यादातर उत्तर भारत के पर्वतीय प्रदेशों में किया जाता है. इस नस्ल के जीव सफ़ेद, भूरे लाल और भूरे काले रूप में पाए जाते हैं. जिनके शरीर से एक बार के एक से डेढ़ किलो तक बाल प्राप्त होते हैं. इस नस्ल के जीवों से साल में तीन बार बाल प्राप्त किये जा सकते हैं. इस नस्ल की मादाओं के सिरों पर सिंग बहुत कम पाए जाते हैं.

भेड़ पालन व्यवसाय कैसे शुरू करें | How to Start Sheep Farming Business
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मगरा

इस नस्ल की भेड़ों का पालन उन और माँस दोनों के लिए किया जाता है. इस नस्ल की भेड़ पूरी तरह सफ़ेद रंग की पाई जाती हैं. जबकि इनकी आँख के चारों और हलके भूरे रंग की पट्टी पाई जाती हैं. यह आँख की पट्टी ही इस नसल की ख़ास पहचान है. इस नस्ल की ज्यादातर भेड़ें राजस्थान में मिलती हैं. इनसे मध्यम गुणवत्ता की सफ़ेद उन का निर्माण होता है. जो बहुत ज्यादा सफ़ेद और चमकीली पाई जाती है ।

पूगल

यह राजस्थान के बीकानेर और जैसलमेर जिलों में पाई जाती है। काले चेहरे पर छोटी हल्के भूरे रंग की पट्टियां होती हैं, जो आंखों के ऊपर किसी एक ओर होती हैं। निचला जबड़ा विशिष्ट रूप से भूरे रंग का होता है। कान छोटे और नलिकादार होते हैं। नर एवं मादा दोनो में सींग नहीं पाये जाते हैं। ऊन का रंग सफेद होता है।

जैसलमेरी –

जैसलमेर में यह नस्लें पाई जाती है। इस नस्ल के भेड़ों के लम्बे लटकते हुये कान होते हैं। ऊन कालीन गुणवत्ता वाली होती है।

नाली –

राजस्थान के गंगानगर एवं झुंझनु जिले, हरियाणा के दक्षिण हिसार और रोहतक जिले में पाई जाती हैं। इस नस्ल के पशु मध्यम आकार के होते हैं। चेहरा हल्का भूरा, चमड़ी गुलाबी होती है। सिर, पेट और टांगे ऊन से ढ़की रहती हैं।

कोयम्बटूर –

तमिलनाडु के कोयम्बटूर और मदुरैइ जिले में यह भेड़ें पाई जाती है। पशु मध्यम आकार का सफेद रंग वाला होता है, लेकिन कभी-कभी काले और भूरे धब्बे भी पाये जाते हैं। इनसे प्राप्त ऊन सफेद मोटी और बालों युक्त होती है।

मद्रास रेड

तमिलनाडु के मद्रास, थीरूवलूर, कांचीपुरम, वेल्लोर और कुद्दालोर जिले में पाई जाती है। इस नस्ल के नर में मजबूत, झुर्रीदार और घुमावदार सींग पाये जाते हैं। मादा के सींग नहीं होते है। शरीर छोटे बालों से ढ़का होता है।

शरीर छोटे बालों से ढ़का होता है।

सोनाडी –

राजस्थान के उदयपुर, डूंगरपुर ओर चित्तौड़गढ़ जिले में पाई जाती है। इन भेड़ों से प्राप्त ऊन सफेद, अत्यधिक मोटी होती है। पेट और टांगे ऊन रहित होती हैं।

दक्कनी –

महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में यह नस्ल पाई जाती है। इनका रंग सफेद होता है और कान मध्यम, सपाट और लटकते हुये होते हैं। पूंछ छोटी और पतली होती है।

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बेल्लारी –

कर्नाटक के बिल्लारी जिले में पाई जाती है। एक तिहाई नर सींग वाले और मादाएं सींग नहीं होती हैं। पूंछ छोटी और पतली होती है। ऊन बहुत मोटी, बालों वाली और खुली होती है।

रामपुर बुशायर

इस नस्ल हिमाचल प्रदेश के शिमला, किन्नौर नाहन, विलासपुर, सोलन, लाहुल और स्पीती जिलों में तथा उत्तराखण्ड के देहरादून, ऋषिकेश, चकराता और नैनीताल जिलों में पाये जाते है। पशु मध्यम आकार वाला होता है। ऊन का रंग मुख्य रूप से सफेद, भूरा, काला होता है। इन भेड़ों के कान लम्बे लटकते हुये होते हैं। नर में सींग होते हैं अधिकांश मादाऐं सींग रहित होती हैं। पैर, उदर(पेट) और चेहरे पर ऊन नहीं पायी जाती है।

पूंछी

यह जम्मू प्रान्त के पुंछ एवं राजौरी जिले के कुछ भागों में पायी जाती हैं। पशु गद्दी नस्ल के समान होते हैं। लेकिन आकार में छोटे और सफेद होते हैं। इनकी पूंछ छोटी और पतली होती है। पैर भी छोटे होते हैं, जिससे आकार छोटा दिखायी पड़ता है।

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मालपुरा

मालपुरा भेड़ों का पालन मोटे रेशों की उन की प्राप्ति के लिए किया जाता हैं. इसके बालों का आकार मोटा पाया जाता हैं. इस नस्ल की भेड़ें राजस्थान के जयपुर, सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा, अजमेर, टोंक और बूंदी जिले में ज्यादा पाली जाती हैं. इस नस्ल के पशु सामान्य ऊंचाई के होते हैं. जिनका चेहरा हल्का भूरा, लम्बी टाँगे और कानों का आकार छोटा दिखाई देता है।

चांगथांगी –

यह नस्ल लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र में पायी जाती है। पशु सुंगठित शरीर वाले होते हैं, जोकि बड़ी संरचना के अच्छे ऊन से ढके हुये होते हैं। इन भेड़ों से प्राप्त ऊन लम्बे आकार का होता है।

बनपाला –

यह प्रजाति दक्षिण सिक्कम में पायी जाती है। पशु लम्बे, बड़ी टांगों वाले होते है। ऊन का रंग सफेद से लेकर काले और अनेक रंगों वाला होता है। इन भेड़ों के कान छोटे होते हैं। नर और मादा सींग नहीं होते है। उदर(पेट) और टागों पर बाल नहीं होते है।

जालौनी –

उत्तर प्रदेश के जालौन, झांसी और ललितपुर जिले में पाई जाती है। पशु मध्यम आकार के होते है। इन नस्ल के नर और मादा सींग होते है। कान बड़े, लम्बे होते हैं। ऊन मोटी, छोटी और खुली हुई होती है।

गुरेज भेड़

यह नस्ल उत्तर पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्र में पायी जाती है। गुरेज भेड़ जम्मू एवं कश्मीर की सबसे बड़ी नस्ल है। यह सफेद रंग की होती है। हालांकि कुछ भूरी काली धब्बे वाली भी होती हैं। कुछ प्रतिशत पशुओं में छोटी एवं पतली नुकीली सींग होती है। कान लम्बे, पतले एवं नुकीले होते है। वार्षिक ऊन का उत्पादन 0.5 से 1 किग्रा तक होता है।

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कश्मीर मेरीनो उन्नत नस्ल

कश्मीर मेरीनो का निर्माण कई देशी प्रजातियों के संकरण से हुआ है. इस नस्ल की भेड़ से उन और माँस दोनों पर्याप्त मात्रा में मिलता हैं. इस नस्ल की एक भेड़ से सालाना तीन किलो या इससे ज्यादा उन प्राप्त की जा सकती है. इस नस्ल के पूर्ण रूप से तैयार एक पशु में 40 किलो के आसपास माँस पाया जाता है ।

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मारवाड़ी –

मारवाड़ी नस्ल की भेड़ों को माँस उत्पादन के लिए अधिक पाला जाता है. इस नस्ल की भेड़ों का पालन ज्यादातर दक्षिण राजस्थान और गुजरात में किया जाता है. इस नस्ल के पशु सामान्य आकार के पाए जाते हैं. जिनका चेहरा काला और बाकी शरीर भूरा दिखाई देता हैं. इस नस्ल के पशुओं से उन कम मात्रा में प्राप्त होती हैं. जबकि मांस के रूप में इसके पशु लगभग एक साल बाद ही तैयार हो जाते हैं.

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तिब्बतन –

तिब्बतन नस्ल की भेड़ों का पालन उन और माँस दोनों के उत्पादन के लिए किया जाता है. इस नस्ल की भेड़ों का पूरा शरीर सफ़ेद पाया जाता है. जबकि कुछ पशुओं का मुख काला, भूरा दिखाई देता है. इस नस्ल के पशुओं का आकार सामान्य पाया जाता हैं. इस नस्ल की भेड़ों के सिर पर सिंग नही पाए जाते. इस नस्ल के पशु के कान छोटे, चौड़े और लटके हुए होते हैं. जिनके पेट पर बाल की मात्रा नही पाई जाती.

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चोकला –

चोकला नस्ल की भेड़ें ज्यादातर उत्तरी राजस्थान के जिलों में पाई जाती हैं. इस नस्ल के पशुओं का आकार छोटा और सामान्य पाया जाता है. इस नस्ल के पशुओं के चेहरे पर उन नही पाई जाती. जबकि शरीर पर उन की मात्रा काफी ज्यादा पाई जाती हैं. इस नस्ल के पशुओं का का मुख गर्दन तक काला पाया जाता हैं. इस नस्ल के पशु के शरीर पर बाल अधिक और पतले पाए जाते है. इसके पशु की पूंछ की लम्बाई सामान्य पाई जाती है, और पशु के सिर पर सिंग नही पाए जाते ।
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मुजफ्फरनगरी –

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, बुलन्दशहर, सहारनपुर, मेरठ, बिजनौर, इसके अलावा दिल्ली और हरियाणा के भाग में यह नस्लें पाई जाती है। इनका चेहरा और शरीर सफेद होता है और कहीं-कहीं पर भूरे और काले चकत्ते पाये जाते हैं। कान लम्बे और नलिकादार होते हैं। ऊन सफेद मोटी और खुली हुई होती है।

नाली शाबाबाद

नाली शाबाबाद नस्ल की भेड़ों का पालन मुख्य रूप से तो माँस के उत्पादन के लिए ही किया जाता हैं. लेकिन इसके पशुओं से उन की मात्रा भी अच्छी खासी प्राप्त होती हैं. इन नस्ल के पशुओ का पालन राजस्थान के साथ साथ हरियाणा के भी कुछ जिलों में होता है. इस नस्ल के पशुओं का आकार सामान्य पाया जाता है. इसके शरीर की चमड़ी गुलाबी रंग की होती है. और पूरा शरीर उन से ढका होता है.

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केंगूरी –

इस नस्ल की भेड़ कर्नाटक के रायचूर जिले में पाई जाती है. इस नस्ल की भेड़ों के शरीर का रंग गहरा भूरा और हलके लाल काले रंग का होता है. इस नस्ल के नर के सिर पर सींग पाए जाते हैं. जबकि मादा के सीर पर सिंग नही पाए जाते. इस नस्ल के पशुओं से उन की मात्रा कम प्राप्त होती हैं .

भेड़ पालन व्यवसाय कैसे शुरू करें | How to Start Sheep Farming Business
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करनाह –

यह नस्ल उत्तरी कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र के करनाह तहसील में पायी जाती है। पशु बड़े होते हैं नरों में बड़ी मुड़ी हुयी सींग पायी जाती है। ऊन का रंग सफेद होता है। इस नस्ल की भेड़ों के ऊन का रंग सफेद होता है।

पशुओं की देखरेख –

पशुओं की देखरेख के अंतर्गत कई तरह के काम किये जाते हैं. जिसमें पशुओं को के लिए खाना पानी और उनके रहने संबंधी सभी तरह की सावधानियां रखनी होती हैं । भेड़ के बच्चे लगभग एक से डेढ़ साल बाद पूर्ण रूप से तैयार हो जाते हैं । इस दौरान मेमनों को प्रजनन के लिए तैयार कर लेना चाहिए. प्रजनन के लिए तैयार करने के दौरान पशुओं को उचित मात्रा में पौष्टिक भोजन देना चाहिए । इस दौरान उचित मात्रा में भोजन देने से मादा में जुड़ाव बच्चे देने की क्षमता बढ़ जाती हैं । मेमनों के जन्म होने के तुरंत बाद उनके मुख में पाए जाने वाले चिकने म्यूक्स को निकाल देना चाहिए । और उसकी नाभि के तन्तुं को धागे से बांधकर काट देना चाहिए. जिसके कुछ देर बाद नवजात को माँ दूध तुरंत पीला देना चाहिए । मेमन के पैदा होने के बाद उसकी देखभाल करना जरूरी है । इसके लिए मेमन को उचित समय पर आवश्यक टीके लगवा देना चाहिए. भेड़ अपने बच्चों को लगभग तीन महीने तक दूध पिलाती है । इस दौरान हर माह मेमन का कृमिनाशन करवाना चाहिए, ताकि बच्चा स्वस्थ रहे ।

जब मेमन की उम्र लगभग एक साल के आसपास हो जाए तब अच्छे से दिखाई देने वाले मादा और नर को अलग लेना चाहिए. और उनकी अच्छे से देखभाल करनी चाहिए । लगभग 30 मादा भेड़ों के बीच एक स्वस्थ्य और मजबूत नर भेड़ को रखना चाहिए. बाकी नर को बधिया करवाकर बड़ा करना चाहिए । नर मेमनों का बधियाकरण लगभग तीन से चार महीने की उम्र में ही करवाना बेहतर होता है । मादा भेड़ लगभग 9 साल तक प्रजनन क्षमता रखती है । इसलिए मादा भेड़ को पोषक उचित मात्रा में देना चाहिए. जिससे पशु अच्छे से विकास कर सके । जब मेंढे को बाड़े में प्रजनन के लिए छोड़ते हैं तब वो स्वस्थ और ताकतवर होना चाहिए. इसके लिए मेंढे को लगभग दो महीने पहले से पोष्टिक भोजन उचित मात्रा में देना चाहिए. और उसकी अच्छी देखभाल करनी चाहिए । मेंढे को प्रजनन के लिए छोड़ने से लगभग दो से तीन सप्ताह पहले उसके बालों की कटाई कर देनी चाहिए. अगर भेड़ों की संख्या अधिक हो और दो या तीन मेढ़ों को एक साथ झुण्ड में छोड़ा जाए तो प्रत्येक मेड़ों पर विशेष निशान लगा दें । ताकि बाद में खराब नस्ल के बच्चे पैदा होने वाले नर हो आसानी से हटाया जा सके । भेड़ों की देखभाल के दौरान हर बार मानसून के शुरू होने से पहले टीकाकरण जरुर करवा लें और बाड़े की साफ़ सफाई रखे. और साथ ही बाड़े के अंदर की मिट्टी सुखी हुई रखनी चाहिए । ताकि पशुओं में किसी तरह का रोग ना लग पाए. क्योंकि भेड़ों में बारिश के मौसम में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं जिनकी वजह से पशुओं की मृत्यु भी हो जाती है । भेड़ों के पालने पर होने वाले खर्च से बचने के लिए हर साल कमजोर पशुओं की छटनी कर देनी चाहिए. छटनी के वक्त भेड़ों की उम्र लगभग डेढ़ वर्ष होनी चाहिए । नए रूप में भेड़ को खरीदने के दौरान हमेशा एक साल की उम्र के मेमने को ही खरीदना चाहिए. क्योंकि एक साल का मेमन लगभग एक साल बाद नए बच्चे को जन्म दे देता है । पशु में किसी भी तरह का संक्रमित रोग दिखाई देने पर उसे बाड़े से अलग कर बाकी पशुओं से दूर रखना चाहिए. और बाड़े की सफाई समय समय पर करते रहना चाहिए ।

भेड़ों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम –

भेड़ पालन के दौरान पशुओं में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं । जिनके लगने पर कई बार पशुओं की मृत्यु तक हो जाती है. जिनकी रोकथाम के लिए पशु में रोग दिखाई देने के तुरंत बाद ही पशु चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए. और पशु के स्वस्थ होने तक उसका अच्छे से ध्यान रखना चाहिए.

भेड़ों के ऊन की कतरान –

भेड़ पालन मुख्य रूप से उन और माँस के लिए ही किया जाता हैं । इसलिए जब पशु पर उन की मात्रा पूर्ण रूप से तैयार हो जाए तो उसे काटकर अलग कर लेना चाहिए. उन को हटाने से पहले भेड़ को डिपिंग विलियन से निल्हाना चाहिए । जिससे उन पर लगी गंदगी और जीवाणु नष्ट हो जाते हैं. उसके बाद जब बाल सुख जाएँ तब उनकी कतरन करनी चाहिए । भेड़ की कतरन हमेशा धूप के मौसम में ही करनी चाहिए. जिसके लिए सबसे उपयुक्त टाइम फरवरी और मार्च का महीना होता है. इस दौरान कतरन करने से पशु को गर्मियों में अधिक धूप नहीं लगती और सर्दियों का मौसम चला जाता है तो सर्दी लगने का भी डर नही होता.उन की कतरन करने के बाद उनकी गाठें बनाकर रख लेनी चाहिए. जिनका भंडारण उचित नमी के तापमान पर करना चाहिए. उन की कतरन के बाद जिन पशुओं को माँस के लिए तैयार किया जाता हैं. उन्हें नज़दीकी मंडी या दुकनों पर बेच देना चाहिए.

आय व्यय का लेखा जोखा

भेड़ पालन के दौरान एक भेड़ साल में दो बार प्रजनन की क्षमता रखती हैं. और अगर अच्छे से देखभाल की जाए तो प्रत्येक मादा भेड़ों से दो बच्चे एक बार में प्राप्त किये जा सकते हैं । अगर किसान भाई एक बार में लगभग 15 मादा भेड़ों के साथ व्यापार शुरू करता है तो उसके पास एक साल में ही 50 के आसपास भेड़ें हो जाती हैं । एक भेड़ की कीमत लगभग 7 हजार भी लगाकर चलें तो सभी भेड़ों की कुल कीमत लगभग साढे तीन लाख हो जाती हैं. जिसमें अगर सभी भेड़ों पर उनकी खरीद से लेकर उनके खाने और सभी तरह का खर्च लगभग ढाई लाख हो तो एक लाख किसान के पास एक साल में आसानी से बचता है । इसके अलावा भेड़ पालन के दौरान उनके अपशिष्ट का इस्तेमाल किसान भाई जैव उर्वरक के रूप में कर सकता हैं. जिससे फसल की पैदावार भी अच्छी मिलती है । साथ ही भेड़ पालन के दौरान भेड़ की उन और उसके दूध की अतिरिक्त कमाई भी किसान भाई के पास पूर्ण रूप से बचती है । जैसे जैसे भेड़ें बढती जाती हैं किसान भाई की कमाई भी बढती जाती हैं. इस तरह भेड़ पालन का व्यवसाय खेती के साथ साथ एक अच्छी कमाई कराने वाला व्यवसाय है ।

भेड़ पालन-कुछ महत्वपूर्ण जानकारी –

भेड़ का मनुष्य से सम्बन्ध आदि काल से है तथा भेड़ पालन हिमाचल के जन-जातीय क्षेत्रों के निवासियों का एक प्राचीन व्यवसाय है| प्राचीन समय से ही किन्नौर, लाहौल-स्पिति, भरमौर, पांगी, कांगडा तथा मण्डी के जन-जातीय क्षेत्र के लोग मुख्यत: भेड़ पालन पर निर्भर रहें है| भेड़ पालक भेड़ से ऊन तथा मांस तो प्राप्त करता ही है, भेड़ की खाद भूमि को भी अधिक ऊपजाऊ बनाती है| भेड़ कृषि अयोग्य भूमि में चरती है, कई खरपतवार आदि अनावश्यक घासों का उपयोग करती है तथा उंचाई पर स्थित चरागाह जोकि अन्य पशुओं के अयोग्य है, उसका उपयोग करती है| भेड़ पालक भेड़ों से प्रति वर्ष मेमने प्राप्त करते है|हिमाचल प्रदेश में लगभग 9 लाख भेड़ों कई आबादी है| प्रदेश में शुद्ध विदेशी नस्लों क्रमश| रैमबुले तथा रशीयन मैरिनो के मेढों द्वारा स्थानीय नस्ल की भेड़ों का प्रजनन करवाया जाता है ताकि स्थानीय नस्ल कई भेड़ों कई ऊन की मात्रा प्रति भेड़ बढाई जा सके| जहाँ सुधारी नस्ल कई भेड़ों से 2.5 किलोग्राम प्रति भेड़ ऊन प्राप्त होती है वहीं दूसरी ओर स्थानीय नस्लों रामपुर बुशहरी व गद्दी से 1 किलोग्राम से भी कम ऊन प्राप्त होती है|

प्रदेश सरकार द्वारा दभेड़ प्रजनन कार्यक्रम के अन्तर्गत चार भेड़ प्रजनन फार्म व एक मेढों केन्द्र निम्न स्थानों पर खोले गये हैं:-
– ज्यूरी ज़िला शिमला (रैमबुले व रामपुर बुशहरी भेडें)
– कडछम, ज़िला किन्नौर (रशीयन मैरिनों भेडें)
– सरोल ज़िला चम्बा (रैमबुले भेड़)
– ताल ज़िला हमीरपुर (रैमबुले, रशियन मैरिनों,गद्दी व गद्दी कास)
– मेंढा केन्द्र नगवाई ज़िला मण्डी

विभाग के 4 भेड़ प्रजनन फार्मों से स्थानीय नस्लें की भेड़ों के नस्ल सुधार हेतु भेड़ पालकों को विदेशी नस्लों के मेढे विक्रय किये जाते है ताकि भेड़ पालकों की स्थानीय भेड़ की नस्ल में सुधार लाकर उनकी आर्थिक स्थिति मज़बूत हो सके| मेंढा केन्द्र नगवाई से प्रजनन ऋतु में विदेशी नस्ल के मेंढे भेड़ पालकों को प्रजनन करवाने हेतु उपलब्ध करवाये जाते है| प्रजनन काल के समाप्त होते ही यह मेढे वापिस मेढा केन्द्र में लाये जाते है ताकि भेड़ पालकों को वर्ष भर मेढे पलने का खर्च न वहन करना पड़े|

भेड प्रजनन नीति –

प्रदेश में भेड़ो से अधिक आय प्राप्त करने व उनकी नस्ल सुधार हेतू विभाग द्वारा भेड़ प्रजनन नीति तैयार की गई है इस नीति के अनुसार स्थानीय गद्दी व रामपुर बुशैहरी नस्ल की भेड़ों का शुद्ध विदेशी रैम्बुले या रशियन मरीनो मैंढों से प्रजनन करवाया जाता है| इस प्रजनन के फलस्वरूप पैदा हुई संतान में 50 प्रतिशत गुण देशी नस्ल के तथा 50 प्रतिशत गुण देशी नस्ल के आते है तथा इसे एफ-1 जनरेशन खा जाता है| इन एफ-1 जनरेशन की भेड़ों का फिर से शुद्ध विदेशी रैम्बुले या रशियन मरीनो मैंढ़ों से प्रजनन करवाया जाता है| इस प्रजनन के फलस्वरूप पैदा हुई संतान में 25 प्रतिशत गुण देशी नस्ल के तथा 75 प्रतिशत गुण विदेशी नस्ल के आते तथा इसे एफ-2 जनरेशन खा जाता है| इस प्रक्रिया से निरंतर पैदा हो रही एफ-2 जनरेशन की भेड़ों का प्रजनन करवाने के लिए ऐसे मेंढे जिनमें 75 प्रतिशत गुण विदेशी नस्ल तथा 25 प्रतिशत गुण देशी नस्ल के हों का ही प्रयोग करना चाहिए ताकि पैदा होने वाली संतान में विदेशी नस्ल के 75 प्रतिशत गुण कायम रह सकें|
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भेड़ पालन व्यवसाय को अधिक लाभदायक बनाने के लिये कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्रजनन सम्बन्धी –

भेड़ आम तौर पर नौ महीने की आयु में पूर्ण वयस्क हो जाती है किन्तु स्वस्थ मेमने लेने के लिये यह आवश्यक है कि उसे एक वर्ष का होने के पश्चात ही गर्भधारण कराया जाए| भेड़ों में प्रजनन आठ वर्ष तक होता है| गर्भवस्था औसतन 147 दिन कि होती है| भेड़ 17 दिन के बाद 30 घण्टे के लिये गर्मी में आती है| गर्मी के अंतिम समय में मेंढे से सम्पर्क करवाने पर गर्भधारन की अच्छी सम्भावनायें होती है|गर्भवस्था तथा उसके पश्चात जब तक मेमने दूध पीते है भेड़ के पालन पोषण पर अधिक ध्यान देना चाहिये| एक मादा भेड़ को गर्भवस्था तथा उसके कुछ समय पश्चात तक संतुलित एवं पोष्टिक आहार अन्य भेड़ों की अपेक्षा अधिक देना चाहिये|भेड़ों को मिलते बार नर या मादा का अनुपात 1:40 से अधिक नहीं होना चाहिये|प्रजनन हेतु छोड़ने के दो माह पूर्व से ही उनके आहार पर विशेष ध्यान दें| इस अवधि में संतुलित आहार तथा दाने की मात्रा भी बढा दें|प्रजनन हेतु छोड़ने से पहले यह बात अवश्य देख लें कि मेंढे के बहय जननेन्द्रियों की ऊन काट ली गई है तथा उसके खुर भी काट क्र ठीक क्र लिये गये है|नर मेमनों कि डेढ़ साल से पहले प्रजनन के लिये उपयोग न् करें| तथा समय समय पर उनकी जननेन्द्रिया की जानच कर लें| यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि वयस्क मेढों को तरुण भेड़ों के साथ प्रजनन के लिये छोड़ना चाहिये|मेढों को प्रजनन के लिये छोड़ने से पहले यह निश्चित क्र लें कि उन्हें उस क्षेत्र में पाई जाने वाली संक्रामक बिमारियों के टीके लगा दिये गये है तथा उनको कृमिनाशक औषधि से नहलाया जा चूका है| मैंढ़े को प्रजनन के लिये अधिक से अधिक आठ सप्ताह तक छोड़ना चाहिये तथा निश्चित अवधि के पश्चात उन्हें रेवड़ से अलग क्र देना चाहिये|यदि एक से अधिक मेंढे प्रजनन हेतु छोडने हैं तो नर मेढों कई कोई निश्चित पहचान (कान पर नम्बर) लगा दें ताकि बाद में यह पता चल सके कि किस नर की प्रजनन शक्ति कमज़ोर है या उससे उत्पादित मेमनें सन्तोषजनक नहीं है ताकि समय अनुसार उस नर को बदला जा सके| मेढों को यदि रात को प्रजनन के लिये छोड़ना है तो उनके पेट पर नाभि के पास कोई गीला रंग लगा दें जिससे यह पता चल सके कि किस मैंढ़े से कितनी भेडों में प्रकृतिक गर्भधान हुआ है| मेंढ़े का नस्ल के अनुसार कद व शारीरिक गठन उत्तम होना चाहिये| टेड़े खुर उठा हुआ कंधा, नीची कमर आदि नहीं होनी चाहिये .पैदा होने के 8-12 सप्ताह के पश्चात मेमनों को माँ से अलग कर लें तथा तत्पश्चात उसको संतुलित आहार देना प्रारम्भ करें| संकर एवं विदेशी नस्ल के मेमनों के पैदा होने के एक से तीन सप्ताह के अन्दर उसकी पूंछ काट लें|समय समय पर यह सुनिश्चित करें कि तरुण भेड़ का वजन कम तो नहीं हो रहा है| इस अवधि में उसको अधिक से अधिक हर घास उपलब्ध करवायें| अनुपयोगी और निम्न स्तर के पशुओं की प्रतिवर्ष छंटनी कर देनी चाहिये अनयथा उनके पालने का खर्च बढ़ेगा| भेड़ों की छंटनी अधिक से अधिक 1.5 वर्ष में करनी चाहिए| ऊन काटने या प्रजनन के समय से इस आयु तक उनका शारीरिक विकास पूर्ण हो जाता है|

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