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Friday, December 4, 2020
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एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन की सर्वोत्तम विधियाँ

एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन की सर्वोत्तम विधियाँ की सर्वोत्तम विधियाँ –

Integrated Pest Control –  IPC एकीकृत कीट नियंत्रण-

प्रदेश में कृषि के प्रति वांछित आकर्षण पैदा करने एवं उसको कम खर्चीला और अधिक लाभकारी बनाने के लिए जिन उपायों पर विचार किया जा रहा है । उनमें प्रमाणित बीजों की उपलब्धता,उर्वरकों का सही ढंग से उपयोग, अच्छा जल प्रबन्ध एवं इन्टीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेन्ट मुख्य है।

प्रदेश में हर वर्ष अनेक कीट,रोगों,चूहों एवं खरपतवारों से फसलों की उपज पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।चने एवं अरहर की फली बेधक, सरसों का सफेद गेरूई एवं आल्टरनेरिया झुलसा,आलू का पछेता झुलसा,मटर का बुकनी रोग,अरहर का बन्झा रोग और गेहूँ का मामा, (फेलेरिस माइनर) आदि कुछ रबी फसलों की प्रमुख समस्याएं है।

एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन की सर्वोत्तम विधियाँ
एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन की सर्वोत्तम विधियाँ

अभी तक इन समस्याओं से निपटने के लिए खासतौर पर केवल रसायन का ही सहारा लिया जाता रहा है। यह रसायन खर्चीले होने के साथ-2 वातावरण को दूषित करते है । एवं कई प्रकार की दुर्घटनाओं का भय भी बना रहता है। इन रसायनो के अवशेष अक्सर फलों एवं सब्जियों आदि में रह जाते है । तथा उपभोक्ता के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव छोड़ सकते हैं। रसायनों के निरन्तर उपयोग से कई कीटों में उनके विरूद्ध अवरोध पैदा हुआ है । और बहुत से कम महत्वपूर्ण कीट बड़ी समस्यायें बने हैं। साथ ही साथ खेत में या वातावरण में उपस्थित परजीवी कीट समाप्त हो जाते हैं । एवं पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाता है। समस्याओं के प्रभावी निदान एवं उपरोक्त खतरों से बचने के लिए,अब जिस पद्धति से पर जोर दिया जा रहा है । उसको इन्टीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेन्ट या एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धनकहा जाता है।
इस पद्धति से कीटों रोगो और खरपतवारों आदि के उन्मूलन या नियंत्रण के स्थान पर उनके प्रबन्ध की बात की जाती है। वास्तव में हमारा ध्येय किसी जीव को हमेशा के लिए नष्ट करना नहीं,बल्कि ऐसे उपाय करने से है । जिससे उनकी संख्या/घनत्व सीमित रहे और उनसे आर्थिक क्षति न पहुँच सके।

IPC या  एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन (इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट) की मुख्य बातें निम्नलिखित है:-

  • समस्याओं के निदान के लिये केवल एक तरीके को अपनाने के बजाय कई साधनों का समन्वय किया जाये । जैसे अवरोधी किस्मों का प्रयोग एवं अन्य शस्य क्रियाओं,तकनीकी साधन, जैविक साधनो और रसायनों का प्रयोग आदि।
  • रसायनों का इस्तेमाल उसी समय किया जाय जब वास्तव में उनकी आवश्यकता हो । अर्थात् विभिन्न कीटों एवं रोगों के एक निर्धारित संख्या/घनत्व पर पहुँचने पर ही रसायनों का प्रयोग किया जाये।
  • जो साधन अपनाये जाये वह न केवल प्रभावी हो बल्कि कम खर्चीले भी हों।
  • पर्यावरण एवं वातावरण को प्रदूषित होने से बचाया जाय।
किसानो के लिए इन्टीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेन्ट में पहली आवश्यकता यह है । कि फसलों का बराबर सर्वेक्षण किया जाता रहे । ताकि किसानों एवं कार्यकर्ताओं को विभिन्न कीटो और रोगों आदि की स्थिति के बारे में ज्ञान होता रहे। यह भी आवश्यक है, कि कार्यकर्ताओं और किसानों के प्रशिक्षण का उचित प्रबन्ध किया जाये। ताकि वह समस्याओं को पहचानने और उससे सम्बन्धित उस बिन्दु अथवा अवस्था को जानने की समझ पा सकें। जिन पर रसायनों का प्रयोग या दूसरे कार्य करने आवश्यक हो जाते हैं।
जैविक खेती के लिए इन्टीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेन्ट में जैविक साधनों का बहुत महत्व है  ।  जिसमें विभिन्न प्रकार के परजीवी/परभक्षी कीट फफूँदी, बैक्टीरिया, विषाणु और अन्य जीव जन्तु हैं ।  जिनके द्वारा फसलों के हानिकारक कीटों एवं रोगों आदि का निदान किया जाता है। सामान्यता पर्यावरण में यह सारे जीव अपना कार्य करते रहते हैं । और समस्याओं को बड़ी हद तक सीमा में रखते है,। परन्तु आज की सघन खेती में इनकी सामान्य कार्यशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव है । जिसमें रसायनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग सबसे बड़ी बाधा है। प्रदेश में कई कीट एवं अन्य समस्याओं का प्रभावी जैविक नियन्त्रण किया गया है ।
जिसमें गन्ने का पाइरिला कीट, चने का फली बेधक एवं जलकुम्भी का सफल नियन्त्रण कुछ विशेष उदाहरण है। चने की फली बेधक के लिए न्यूकेलियर पाली हाइड्रोसिस वाइरस (एन0 पी0 बी0) 250 (इल्ली सूँडी) समतुल्य (लार्वल इक्वीलेन्ट) की दर से बहुत सफल पाया गया है। जलकुम्भी जो प्रदेश के जलाशयों की बड़ी समस्या है । नियोचैटिना वीविल कीट की दो प्रजातियों के द्वारा प्रभावी ढंग से नियत्रण में आ सकती है।
यह कीट प्रजातियाँ जैविक नियन्त्रण प्रयोगशाला, मोदीपुरम, मेरठ, से उपलब्ध हो सकती है। अनेक प्रमुख फसलों के मुख्य कीट/समस्याओं की उस संख्या/घनत्व का ज्ञान प्राप्त हो चुका है।  जिनपर रसायनों का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसमें धान के सभी कीट, सरसों का माहूँ और कपास के कीट शामिल है। प्रदेश के विश्वविद्यालयों एवं अन्य संस्थानों में इन विषयों पर आगे शोधकार्य चल रहा है और जैसे-2 ज्ञान मिलता जायेगा वैसे-2 ‘‘इन्टीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेन्टʺ की पद्धति को प्रभावी ढंग से अपनाने में सफलता मिलेगी। ‘‘इन्टीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेन्टʺ (आई0पी0एम0) अपनाने से कृषि रक्षा रसायनों पर खर्चा कम आयेगा व किसान को राहत मिलेगी और पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।
(क) शस्य क्रियायें
खेती सम्बन्धी रोकथाम से जुडे कार्य
गर्मी की जुताई
  • ऐसा करने से जमीन में छुपे कीटों तथा रोगो की विभिन्न अवस्थाओं ऊपर आकर सूर्य की तेज धूप/गर्मी से नष्ट हो जाती है। तथा पक्षियों द्वारा अनेक जीवित अथवा मृत कीडे उनके भोजन बनकर नष्ट हो जाते है।

खेती की सफाई करना

  • खेतों में खरपतवार फसल के साथ-2 उग आते है। वे नाशीजीव (कीट रोगो) को संरक्षण प्रदान करते है।
  • खेत को निराई गुडाई करके साफ सुथरा रखना चाहिये। इससे नाशीजीवों की अनावश्यक वृद्धि पर अंकुश लगता है।
  • प्रतिरोधी/सहनशील किस्मों के स्वास्थ बीजो का चुनाव।
  • बीज जनित रोगों की रोकथाम के लिए स्वस्थ बीजों का चुनाव।
  • बुवाई यथा सम्भव उपयुक्त समय से करना चाहिये।
  • विलम्ब से बोई गयी फसलों पर कीट रोगो का अपेक्षाकृत अधिक प्रकोप होता है।
  • पौधों से पौधो की दूरी ज्यादा रखना चाहिये इससे निराई गुडाई एंव अन्य क्रियाओं करने में ज्यादा सुविधा होती है।
  • और साथ ही साथ कीट/रोगों का प्रकोप भी कम होता है।
  • गलियां-पगडण्डिया बनाना खेती संबंधी कार्यो की सहूलियतों के लिए फसल की 20-25 पंक्ति के बाद 1-2 पंक्ति छोड देना चाहिये।
  • उर्वरकों खादों और सूक्ष्म तत्वों का संतुलित उपयोग करना चाहिये।
  • पानी का समुचित प्रबन्ध करना चाहिये। खेत में अधिक पानी नही भरा रहना चाहियें।
  • अधिक पानी के निकास का प्रबन्ध रखना चाहिये।
  • फसल की कटाई जमीन के स्तर से बिल्कुंल सतह से करना चाहिये।

(ख) यांत्रिक नियंत्रण: यांत्रिक रोकथाम से जुडे कार्य-तरीके-

  • नाशीजीव के अण्डे -गुच्छे और उनकी झिल्लियों को इकठ्ठा करके नष्ट करना ।
  • अथवा उन्हे उनकी रोकथाम करने वाले प्राणी समूह की हिफाजत के सिलसिले में बॉस के पिजरों में रखना चाहिये।
  • कीट अथवा रोगो द्वारा ग्रसित पौधो के प्रभावित हिस्से अलग अलग करना चाहियें।
  • लाइट ट्रेप अथवा फेरोमोन ट्रेप का उपयोग करना चाहिये।

(ग) जैविक नियंत्रण- 

इसके लिए परभक्षी एंव परजीवी कीटों को संरक्षण प्रदान चाहिये। तथा आवश्यकता पडने पर उन्हे बाहर से लाकर भी छोडते रहना चाहिये।

(घ) खरपतवारों की रोकथाम से जुडे कार्य

  • मेडों और सिचाई के लिए बनायी गयी नालियों में खरपतवार नही रहने देना चाहिये।
  • बारहमासी लम्बे समय तक बने रहने वाले खरपतवार घास पात इत्यादि नष्ट करने के लिए जहां कही सम्भव हो गर्मी के मौसम में जुंताई करनी चाहिये।
  • जहां कही संभव हो खेत में पहले से मौजूद खरपतवार नष्ट कर देना चाहिये।
  • बुवाई करने वाले बीजों को खरपतवार रहित रखना चाहियें।
  • बुवाई के 4-6 सप्ताह बाद आवश्यकतानुसार हाथ में निराई गुडाई करना चाहियें।

रबी की विभिन्न फसलों में नाशीजीव प्रबन्धन

(क) गेहूँ
  • खरपतवारों के नियंत्रण हेतु उपर्युंक्त सुझायें गये तरीके अपनायें।
  • तनाछेदक कीट के नियंत्रण हेतु कीट का प्रकोप दृष्टि गोचर होते ही उसके अण्ड परजीवी ट्राइकोग्रामा को खेत में सप्ताहिक छोडते रहना चाहिये।
  • अनावृत्त कण्डुआ से ग्रसित पौधों को उखाडकर बाल का झिल्ली फटने से पहले जला दे या जमीन में गाडकर नष्ट कर देना चाहियें।
  • जब माहू कीट का प्रकोप हो वहॉ पर यह देख ले कि इन्द्रगोप सरसों का मित्र कीट भंग की संख्या मौजूद है कि यदि भृग है तो कीटनाशक रसायनों का उपयोग कदापि न करें यह कीट अन्यत्र से लाकर भी छोडना चाहिये।

चूहा नियंत्रण –

चूहो की रोकथाम के लिये ज्यादातर गर्मी के मौसम में बडे पैमाने पर कार्यक्रम चलाकर इनकी संख्या कम की जा सकती है। खडी फसल की विभिन्न अवस्थाओं के दौरान चूहों की उपस्थिति के लिये निरीक्षण करते रहना चाहिये। चूहे बहुत तेजी से आस पास के इलाकों से खेत में बस जाते है। इसलिए इसका प्रभावी नियंत्रण तभी से चूहों की संख्या वृद्धि को काफी सीमा तक रोका जा सकता है।

  • खेतो की गहरी जुताई करना ताकि गहराई में स्थित बिल टूट कर नष्ट हो जाय।
  • फसल बोने के लिये जमीन तैयार करते समय खेतों की मेडो का आकार में करना ।
  • और उनकी कटाई छिलाई करना चाहिये। चूहों के छिपाने की जगह न रहे।
  • सभी पुराने बिलों का हटा देना और शरण लेने के सभी सम्भावित स्थानों में पूरी तरह वंचित कर देना चाहिये।
  • इनके लिए स्थानीय रूप से पिंजरों (चूहेदानी) का भी इस्तेमाल करना चाहिये।
उक्त तरीकों को अपनाने से यदि यह रोकथाम पर्याप्त संतोषजनक रूप से नही हो पाती है तो निम्न रासयनिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिये।
  • पहले दो दिन तक विषरहित चारा खिलाकर फिर जिंक फास्फाइड एक भाग सरसो का तेल एक भाग तथा मिलाकर बनाया हुआ जहरीला चारा 10 से 15 ग्राम प्रति जीवित बिल प्रयोग करे। अथवा।
  • बेरियम कार्बेनेट 100 ग्राम गेहू का आटा 860 ग्राम शंक्कर 15 ग्राम तथा 2.5 ग्राम सरसों या अन्य मीठा तेल मिलाकर बनाया हुआ जहरीला चारा प्रयोग करें। अथवा।
  • बिलों में 0.005 प्रतिशत ब्रोमैडियोलोन की बनी 1 से 2 केक (11 ग्राम केक प्रति बिल) कागज अथवा पोलीथीन में लपेटकर रखनी चाहिए। यह विष धीरे-2 प्रभाव करता है और चूहों का खून बहने से उनकी मृत्यु हो जाती है।
  • बिल्ली, उल्लू तथा दो मुहां सांप की संख्या में बढ़ावा देना चाहिए।
(ख) राई सरसों की फसल पर एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन (आई.पी.एम.) निगरानी एंव आंकलन-
  • हर 10 दिन या 15 दिनों के अन्तर पर मुख्य सरसों उत्पादन क्षेत्रों में तीव्रगामी सर्वेक्षण करके नाशीजीव व उनके प्राकृतिक शत्रुओं तथा प्रमुख बीमारियों की संख्या एवं स्तर का आंकलन करना चाहिये।
  • आर्थिक क्षति स्तर-सरसों के चेपा के लिये 30 प्रतिशत (तीस प्रतिशत) प्रभावित पौधों या 30 से 35 माहूò प्रति 10 सेमी० 0 तने की लम्बाई में आर्थिक हानि स्तर माना जायें।
प्रतिरोधी जातियों का बोना
विभिन्न रोगो के लियें प्रतिरोधी को बोने से फसल को उन रोगो के प्रकोप से बचाया जा सकता है। निम्नलिखित कुछ प्रजायितों उनके आगे दर्शाये गये रोगो के लिये कुछ प्रतिरोधी सिद्ध हुई है। इनकी बुवाई को बढ़ावा देना चाहिये।
प्रतिरोधी प्रजाति
रोग का नाम जिसके लिए प्रतिरोधी है
आर0 सी0 781
आल्टरनेरिया झुलसा
टी 4ए वाई0आर0टी0 3, टी0 6
सफेद रतुआ
आर0एच0 30
चेंपा एवं सफेद रतुआ
  • सरसों के माहूँ के प्रकोप की रोकथाम के लिये अगेती बुवाई (अक्टूबर के पहले पखवारे तक) करनी चाहिए।
  • सरसों की प्रजाति टी.-59 अगेती बोई जाती है। ये प्रजातियाँ चेंपा के प्रकोप से बच जाती है।
  • जहॉ सरसों पर माहूँ का प्रकोप अधिक होता है। वहॉ तोरिया सरसों बोना चाहिए इस पर चेंपा का प्रभाव कम होता है। बीज एवं भूमि जनक रोग से बचने के लिये बुवाई से पहले बीज को किसी फफूँद नाशक दवा से उपचारित कर लेना चाहिए। बीज एवं भूमि जनक रोग से बचने के लिये बुवाई से पहले बीज को किसी फफूòदी नाशक दवा से उपचारित कर लेना चाहियें।
यांत्रिक नियंत्रण की विधियॉ
  • पौधे की चेपा (माहू) से प्रभावित टहनियों का दिसम्बर के अन्त तक तोड़ कर जमीन में दबा देना चाहियें।
  • रोग ग्रस्त पत्तियों को प्रकोप की प्रारम्भिक अवस्था में ही तोड़कर नष्ट कर देना चाहियें।
  • झुण्ड वाले कीड़ो की सूडियों या अण्डो को इकठ्ठा करे नष्ट कर देना चाहिये।
जैविक नियंत्रण की विधियॉ
सरसों के नाशीजीव के प्राकृतिक श़त्रुओं जैसे भृंग क्राइसोपा सिरीफेड आदि का फसल वातावरण में संरक्षण करना चाहियें।
नाशीजीव व उनके प्राकृतिक शत्रुओें की संख्या 2:1 का अनुपात होना चाहियें।
रासायनिक नियंत्रण
आवश्यकतानुसार फसल से सम्बन्धितत संस्तुत रसायनों का प्रयोग करें। इसको अन्तिम उपाय के रूप में अपनाना चाहिये । इसके लिये सरसों के नाशीजीवों के प्राकृतिक शत्रुओं के लिये सुरक्षित पर्यावरण हेतु सुरक्षित रसायनों का उपयोग करना चाहिये। रसायनों का उपयोग तभी करना चाहिये जबकि नाशीजीवों की संख्या आर्थिक हानि स्तर से अधिक हो जाये। अगर नाशीजीव व उनके प्राकृतिक शत्रुओं की संख्या का अनुपात 2: 1 है तो कोई भी रसायन या कोई कीटनाशक दवाई नहीं छिड़कनी चाहिये।
(ग) चना
चना की फसल उत्तर प्रदेश राज्य के सभी जिलों में बहुतायत में उगाई जाती है ।  क्योंकि यह एक प्रमुख दलहनी फसल है। इस फसल को अकेले या सरसों, गेहूँ, जौ आदि फसलों के साथ उगाया जाता है। चने की फसल का अनेक प्रकार की कीट/बीमारियों से भारी नुकसान पहुँचाया जाता है। जैसे चने का कटुआ कीट चने के उगते पौधों को जमीन की सतह से काट कर गिरा देता है।
दूसरा चना का फलीछेदक कीट प्रारम्भ में चने के पौधों की पत्तियाँ खाकर नुकसान पहुँचाता है। परन्तु जब चने में फलियॉ बनने लगती है तब इस कीट का प्रकोप अधिक हो जाता है। उस अवस्था में यह कीट फली में छेद बनाकर घुस जाता है । अथवा कभी-2 आधा बाहर लटकता रहता है और फली में बनने वाले सभी दानों को खा जाता है ।
जिससे फलियॉ खाली रह जाती है। चना फलीछेदक को कीटनाशक रसायनों से नियंत्रण करना प्रायः असम्भव सा हो रहा है । क्योंकि इस कीट में विभिन्न कीटनाशकों के प्रति अवरोध क्षमता पैदा हो गई है। इन सब कारणों से यह आवश्यक हो गया है कि चने की फसल मे एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन को अपनाकर हानिकारक कीटों एवं बीमारियों की रोकथाम की जाय।
इस विधि में एक से अधिक नियंत्रण के तरीकों को अपना कर कीट/बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। दूसरे कीटनाशक रसायनों का प्रयोग को कम करके वातावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है।

चने के हानिकारक कीट – 

  • कटवर्म या कटुआ कीट
  • चना का फलीछेदक
  • चेपा या एफिड
  • दीमक

चने में लगने वाली बीमारियॉ-

  • उकठा(विल्ट)
  • जड़ गलन
  • चने की एस्कोकाइटा ब्लाइट (अंगमारी)
चने के हानिकारक कीट/बीमारियों के प्राकृतिक शत्रु
(अ) परभक्षी (प्रेडेटर)
(ब) परजीवी कीट (पैरासाइट)
(स) कीट रोग जनक
(द) फफॅूदी रोगनाशक
1- क्रइसोपा
1- कैम्पोलेटिल क्लोरिडी
1- एन0पी0बी0 2- डीपेल-8 एल (बेसीलस थूरिनजेनिसस)
ट्राइकोडरमा विरिडी द्वारा बीज शोधन करना। (फ्यूजेरियम, राइजोटोनियॉ एवं मैकरोफोमिना के नियंत्रण हेतु)
2- इन्द्र गोप भृंग
2- ब्राकोन ततैया
3- सिरफिड मक्खी
3- एपेन्टेलिस
4- परभक्षी बग
4- किलानस
5- मकड़ियॉ
6- परभक्षी चिडियॉ- कौआ, मैना, मौर, आदि।

प्रतिरोधी प्रजातियों को लगाना-

  • एक्कोकाइटा अंगमारी रोग के विरूद्ध: गौरव (एच-75-35) जी0एन0जी0-146 एवं वी0जी0-261 प्रजातियाँ लगाना।
  • उकठा रोग के विरूद्ध: जे0जी0-315, आई0सी0सी0-32 काबुली चना। अवरोधी, के0डब्लू0आर0-108 के0जी0डी0-1168ए जे.जी.-16, डी.सी.पी.-92-3
  • जड़ गलन (रूट राट) के विरूद्ध: जे.जी. 16 चने की फसल में एकीकृत नाशीजीव प्रबन्ध की निम्न विधियों को अपनाकर कीट/बीमारियों का नियंत्रण करना: चने की फसल में एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन की निम्न विधियों को अपनाकर कीट/बीमारियों का नियंत्रण करना:
चने की फसल में एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन की निम्न विधियों को अपनाकर कीट/बीमारियों का नियंत्रण करना
  • गर्मी में गहरी जुताई करें जिससे जमीन में छिपे कीट ऊपर आकर धूप से नष्ट हो जायें।
  • रोग एवं नाशीजीव के लिये प्रतिरोधीर जातियों का चयन करके बुवाई करें
  • स्वस्थ बीजों का चयन और प्रयोग करके
  • कीटनाशकों एवं फफòूदीनाशकों से बीज उपचार करके।
  • शीघ्र बुवाई को बढ़ावा देकर।
  • सरसो अलसी व गेहूं की फसल को चने की फसल के साथ इन्टरक्राप (सहफसली खेती) के रूप में बुवाई करके।
  • पक्ति से पक्ति व पौधे से पौधे के बीच उचित फसला रखकर।
  • पानी व खाद की मात्रा का उचित प्रबन्ध करके।
  • उचित फसल चक्र अपना करके।
  • फसल के अन्त में फसल के अवशेषों को नष्ट करके।

  (क) यात्रिक नियंत्रण-

  • चने की फलीछेदक की सूडियॉ को हाथ से पकड़कर नष्ट कर देना चाहिये।
  • फेरोमोन ट्रेप (गंधपारा) द्वारा वयस्क कीटों को पकड़कर नष्ट कर देना चाहिये।
  • प्रकाश प्रपंच (लाइट ट्रेप) वयस्क कीट द्वारा एकत्रित करके नष्ट कर देना चाहियें।

(स) जैविक नियंत्रण-

परजीवी परभक्षी कीटों का संरक्षण निम्न प्रकार से करें ताकि एंव रोगो का उचित नियंत्रण किया जा सकें।
  • कीटानाशकों दवाइयों के प्रयोग को न करके या कम करके।
  • नाशीजीव व उनके प्राकृतिक शत्रुओं की संख्या के अनुपात को एक मार्ग दर्शक के रूप में अपनाकर।
  • आर्थिक क्षति स्तर को अपनाकर।
  • कीटनाशको के प्रयोग को केवल प्रभावित क्षेत्र में ही सिर्फ बहुत ही अवश्यकता पड़ने पर करने से।
  • चिडि़या के बैठने के लिये बॉस पर लकडि़या बॉधकर खेत में गाड़ दे। फसल पकते समय इसे अवश्य हटा दिया जायें।

(द) एन0पी0वी0 द्वारा चना फलीछेदक का नियंत्रण-

  • यह चने के फलीछेदक के सूòडो मे लगने वाला एक विषाणु जनित (वायरस) रोग है इसे रोग के लगने के कारण सूडियां उल्टा लटकाकर या गिर कर मर जाता है।
  • इस रोग से ग्रसित मृत 250 सूòडियों का रस 200-300 लीटर पानी मे मिलाकर 0.5 प्रतिशत गुड के साथ प्रति एक सूडी प्रति 10 पौधे दिखाई पडने पर छिड़काव करना चाहियें।
एन0पी0वी0 छिड़काव के समय निम्नलिखित सावधानियॉ बरतनी चाहिये-
  • एन0पी0वी0 का छिडकाव सूर्यास्त के समय करना चाहियें जिससे सूर्य की रोशनी की पराबैगनी किरणों के दुष्प्रभाव से एन0पी0वी0 को बचाया जा सके।
  • एन0पी0वी0 का छिडकाव घोल पहले से बनाकर नही रखना चाहियें घोल तभी बनाना चाहियें जबकि छिडकाव करना हों।
  • छिडकाव घोल को हिलाकर स्प्रे पम्प में डालना चाहियें।
  • छिडकाव इस प्रकार करना चाहियें कि एन0पी0वी0 का घोल सम्पूर्ण पत्तियों पर लग जाय।

जैविक नियंत्रण विधियॉ-

दलहनी फसलों मे उनके नाशीजीव के अनेक प्रकार के प्राकृतिक शत्रु पाये जाते है। जिनका प्रयोग नाशीजीव के नियंत्रण हेतु किया जा सकता है।
दलहनी फसलों के नाशीजीव के प्राकृतिक शत्रु-
(अ) परभक्षी
(ब) परजीवी कीट
(स) परभक्षी पक्षी
(द) कीट रोग: एन0पी0वी0
परभक्षी मक्खियॉ
केम्पोलेटिस क्लेरिडी
कौआ
एन0पी0वी0
परभक्षी कीट
ब्रेकोन ततैया
मैना
क्राइसोपा
एपन्टलीज ततैया
बया
इन्द्रगोप भ्रंग
किलोनिस
मोर आदि
सिराफिड लाई
ट्राइकोग्रामा
परभक्षी बग
परभक्षी माइट(किलनी)
उपयुक्त जैव नियंत्रण कारकों का संरक्षण करके एवं अधिक फसलों के खेतो में छोडकर दलहनी फसलों के हानिकारक कीटों का नियंत्रण किया जा सकता है। उपयुक्त लाभदायक जीवों की पहचान कृषकों को अवश्य करना चाहियें। विभिन्न दलहनी फसलों की रोग प्रजातियां का विवरण फसलों के विवरण में देखे।
दलहनी फसलों में लगने वाले रोगो के उपचार हेतु निम्न प्रमुख कार्यक्रम अपनायें-
  • रोग विशेष की प्रतिरोधी प्रजातियों एवं रोग मुक्त बीजों की बुवाई करें।
  • एक किलो बीज को 2.5 थारइम अथवा 2.5 ग्राम पी0एन0बी0 (ब्रासीकोल) से उपचारित करे।
  • रोग ग्रसित पौधो को जड़ से निकाल कर नष्ट कर दें।
  • गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें तथा उसमें हरी खाद के लिये फसलें उगाये ताकि उकठा के रोगाणु नष्ट हो जाये।
  • अनाजो के साथ फसल चक्र अपनाये क्योकि वे उकठा से प्रभावित नही हो।
  • अरहर के बाझ रोग के उपचार हेतु रोग के वाइक कीट को नष्ट करने हेतु कीटनाशक का प्रयोग करें जिससे रोग ज्यादा न फैले।
  • फाइटोथेरा अंगमारी (अरहर) के लिये यह आवश्यक है कि खेत में पानी न भरने पाये। इसके लिये ढलान की ओर नालियों बना दे तथा बीज मेेडो पर बोये।
  • आवश्यकतानुसार डायथेन एम-45,0.03 प्रतिशत या ब्लाइटोक्स 0.4 प्रतिशत का छिडकाव करें।
  • उर्द-मूंग की पीली चितेरी विषाणु रोग के बचाव हेतु इसके कारक सफेद मक्खी को मारने के लिये संस्तुत रसायनों का छिड़काव करें।
  • मूंग व उर्द चूर्ण कवक के उपचार हेतु घलनशील गंधक का 0.4 प्रतिशत का घोल आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।
  • मूंग व उर्द के सरकोस्पोरो पत्र बुदकी अथवा मैक्रोफोनिया अंगमारी के लिये समय-समय पर कार्बान्डाजिम का उपयोग करें।
  • चना की शुष्क मूल विगलन (राइजक्टोनिया वटाटोकोला) की रोकथाम हेतु शीघ्र बुवाई करें। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों का समय से सिंचित करने से रोग कम हो जाता है।
फसल : अरहर-
(क) कर्षण नियंत्रण-
  • शीघ्र पकने वाली क्रमशः टी-21 यू0पी00एस0-120 को फली भेदको से देर से पकने वाली प्रजातियों (टी-7 व टी-17) में कमी हानि होती है। उत्तर भारत में मध्यम समय से पकने वाली प्रजाति जैसे बहार चना फली भेदक के प्रकोप से बच जाती है।
  • गर्मियों मे अरहर की पेड़ी या इघर उधर उगे पौधो को नष्ट कर देना चाहियें।
  • कफोलो भृंग को हाथ से चुनकर तथा फली बग को झागकर इकठ्ठा करके नष्ट कर दें।
(ब) रासायनिक नियंत्रण-
  • फली भेदक का नियंत्रण करने के लिये इन्डोसल्फान (0.07 प्रतिशत या मोनोक्रोटोफास (0.04 प्रतिशत) या डाइमेथेएट (0.03 प्रतिशत) का प्रयोग करना चाहियें। जहॉ फली भेदक मक्खी की समस्या हो मोनोक्रोटोफास या डाइमेथोएट को प्राथमिकता दें।
चना का नियंत्रण-
(क) कर्षण नियंत्रण-
  • देश के उत्तरी भागों मे फसल शीघ्र बोने से चना में फली भेदक का प्रकोप कम हो जाता है।
  • ग्रीष्म ऋतु में गहरी जुताई करने से कटुआ तथा चना फली भेदक के छुपे हुए कोशिका नष्ट हो जाते है।
  • जिन क्षेत्रों में दीमक की समस्याओं होतो सडी खाद का प्रयोग करें।
(ब) रासायनिक नियंत्रण
  • चना फली भेदक के नियंत्रण के लिये नीम के बीजो की गिरी का सत 5 प्रतिशत या इण्डोसल्फान (0.07 प्रतिशत ) का छिडकाव करें। मैलाथियान (5 प्रतिशत) या इण्डोसल्फान (4 प्रतिशत) घूल से धूलने करें।
(स) जैविक नियंत्रण
  • न्यूक्लीयर पालीहेड्रोसिस विषाणु का 250-500 गिडार तुल्य का एक सप्ताह के अन्तराल पर 2-3 बार छिड़काव करें।
आई0पी0एम0 प्रदर्शनों के अन्तर्गत रासायनिक नियंत्रण हेतु सावधानियॉ-
  • IPC कीटनाशकों का प्रयोग तभी करना चाहियें जबकि नाशीजीव की संख्या आर्थिक हानि स्तर को पार कर जाय।
  • कीटनाशकों का प्रयोग केवल आवश्यकता होने पर करना चाहिये।
  • सिर्फ उन्ही कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहियें जो कि सिर्फ हानिकारक कीटों को मारते है तथा लाभदायक कीटो या जैविक नियंत्रण कारकों को कोई हानि नही पहुòचाते है।
  • एक से अधिक कीटनाशकों को मिलाकर कभी नही छिडकाव करना चाहिये।
  • किसान भाइयों को कीटनाशकों का उपयोग सही समय पर करना चाहियें।
  • कीटनाशकों के छिडकाव आदि के लिये पानी की मात्रा सही होनी चाहियें। पानी की कम मात्रा से छिडकाव ठीक से नही हो पाता है।
  • हमेशा कीटनाशकाें के छिडकाव के समय हवा के बहाव का रूख अवश्य ही ध्यान में रखना चाहियें।
  • सदैव कीटनाशकों के छिडकाव के बाद हाथ व पैरों को साबुन से साफ करना चाहिये। तथा बाद में स्नान करना चाहिेये।
  • कीटनाशकों को उपयोग करते समय बीडी तम्बाकू आदि का सेवन नही करना चाहियें।
  • छिडकाव करते समय आòख पर चश्मा व मुòह पर कपड़ा अवश्य बॉधना चाहियें
  • केवल उन्ही कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिये जो कि भारत सरकार की रजिस्ट्रेशन कमेटी से पंजीकृत हो या निकट के विश्वविद्यालय या राज्य सरकार द्वारा निर्धारित किये गये है।
  • किसान भाई कीटनाशकों को खरीदते समय उन पर लगे लेबिल आई0एस0आई0 आदि चिन्हों की बनने व आर खत्म होने की तारीख को अवश्य ही पढ़ लें ।
  • पर्यावरण के लिये उपयुक्त कीटनाशकों का ही प्रयोग करना चाहिये। 
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