कटहल की वैज्ञानिक तकनीक से उन्नत खेती – jackfruit farming

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कटहल की खेती (jackfruit farming) लगभग पुरे देश में की जाती है । देश के विभिन्न प्रांतों में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के राज्यों व पर्वतीय क्षेत्रों में भी इसकी बागवानी बड़े पैमाने पर की जाती है | कटहल की खेती में असम का स्थान अग्रणी है । इसके फल बसंत ऋतु से वर्षा ऋतु तक उपलब्ध होते हैं। कटहल के कुछ ऐसे क़िस्में होती है जिससे साल भर फल मिलते हैं ।

स्वाद एव पौष्टिकता की दृष्टि से कटहल का फल अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। कटहल के छोटे एवं नवजात मुलायम फल एक प्रमुख एवं स्वादिष्ट सब्जी के रूप में प्रयोग किये जाते हैं।

"कटहल

वैसे तो कटहल के फल को कच्चे तथा पक्के दोनों प्रकार से उपयोग करते हैं लेकिन सब्जी में इसकी स्थान ज्यादा है | कटहल का फल का उपयोग आचार के लिए भी किया जाता है | फलों में शर्करा, पेक्टिन, खनिज पदार्थ एवं विटामिन ‘ए’ का अच्छा विकास होता है। जैसे-जैसे फल बड़े होते जाते है इनमें शर्करा गुण का विकास होता है । कटहल में मीठे फलों को क्वावा कहा जाता है जो बेहद मीठे होते हैं । सभी आयु वर्ग को बहुत भाते हैं ।

मिट्टी की जानकारी व भूमि चयन

Bhumi Jankari and Soil Selection selection
कटहल का पौधा एक सदाबहार, 8-15 मी. ऊँचा बढ़ने वाला, फैलावदार एवं घने क्षेत्रकयुक्त बहुशाखीय वृक्ष होता है । कटहल के वृक्ष की छाया में कॉफी, इलाइची, काली मिर्च, जिमीकंद हल्दी, अदरक इत्यादि की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। कटहल के पौधे ज़्यादातर सभी प्रकार के भूमि में पनप जाते हैं । इसलिए कटहल की खेती (jackfruit farming) सभी तरफ़ की भूमि जें सफलतापूर्वक की जा सकती है । किंतु व्यवसायिक रूप से अधिक पैदावार व अधिक गुणवत्ता वाले फल के लिए भूमि के चयन में कुछ बातों का ख़याल रखा जाना चाहिए जैसे –
– भूमि जीवांश युक्त व कार्बनिक गुणों से भरपूर हो ।
– अधिक बढ़वार व पैदावार के लिए गहरी दोमट मिट्टी होनी चाहिए ।
– भूमि में जल निकासी की अच्छी सुविधा होनी चाहिए ।
– सिंचाई का साधन उपयुक्त होना चाहिए ।
– कटहल के लिए भूमि का पीएच मान सामान्य से थोड़ा कम हो तो अच्छी पैदावार मिलती है ।
– कटहल का पौधा अधिक पानी का जमाव सहन सहन नही करता । इस बात का किसान भाई विशेष ध्यान रखें ।

मिट्टी एवं जलवायु

Soil and Climate
कटहल का नाम ही है Jackfruit यानी दैत्य फल । इसे विशेष देखभाल की ज़रूरत नही पड़ती है । कटहल की खेती (jackfruit farming) हर तरह जलवायु वाले क्षेत्र में आसानी से की जा सकती है । कटहल की बागवानी पहाड़ो तथा पठारों पर सफलतापूर्वक की जाती है । जहां तक जलवायु की बात करें तो कटहल की बागवानी शुष्क तथा शीतोष्ण दोनों जलवायु में होती है ।
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उन्नत किस्में

Advanced varieties
कटहल की उन्नत किस्में सब्ज़ी के लिए – खजवा, स्वर्ण मनोहर, स्वर्ण पूर्ति
अन्य क़िस्में – रसदार, सिंगापुरी, गुलाबी, रुद्राक्षी हैं |सिंगापुरी किस्में वर्ष में सिर्फ एक बार फल देती है |
ऊपर दी गयी क़िस्मों में कुछ क़िस्में तो पूरे साल पैदावार देती है ।

कटहल के पौधों की रोपाई की विधि –

Method of transplanting jackfruit plants
कटहल के पके हुये कटहल से बीज से नए पौधे तैयार कर लें । एक बात का ख़याल रखें कटहल के बीजों को नर्सरी वाले स्थान पर ही लगाएँ । खेत को तैयार करने के लिए खेत की तैयारी हेतु खेत गहरी जुताई करके एक पाटा चला दें । इससे भूमि समतल हो जाएगी व साथ में मिट्टी की नमी भी सुरक्षित रहती है इसके बाद सामतल भूमि पर 10 से 12 मीटर की दूरी पर 1 मीटर व्यास एवं 1 मीटर गहराई के गड्ढे तैयार करें | इन सभी गड्ढों में 20 से 25 किलोग्राम गोबर की साड़ी खाद अथवा कम्पोस्ट, 250 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 500 म्युरियेट आफ पोटाश, 1 किलोग्राम नीम की खल्ली तथा 10 ग्राम थाइमेट को मिटटी में अच्छी प्रकार मिलाकर भर देना चाहिए |कटहल के पौधों की रोपाई की उपयुक्त समय जुलाई से सितम्बर है |

कटहल की बागवानी सिंचाई कब करें

When to do irrigate Jackfruit Gardening
शुरुआत में पौधो को पानी देते रहना होगा | शुरुआत के कुछ वर्ष तक गर्मी के मौसम में प्रति सप्ताह तथा सर्दी के मौसम में 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए | अगर पौधा बड़ा हो गयाहै तो गर्मी के दिनों में प्रत्येक 15 दिन में तथा सर्दी के मौसम में 1 लम्ह में सिंचाई करना चाहिए |नवम्बर– दिसम्बर माह में कटहल के पौधों में फूल लगता है इसलिए इन दो माह में सिंचाई नहीं करें |

निराई – गुडाई व खरपतवार नियंत्रण

Weeding – Weed Control
कटहल के पौधों को निदाई – गुडाई करके साफ रखना चाहिए | बड़े पेड़ों के बागों की वर्ष में दो बार जुताई करनी चाहिए | कटहल के बाग़ में बरसात आदि पानी बिलकुल नहीं जमना चाहिए |

अंतरफल

Interfruiting
कटहल की खेती (jackfruit farming) से अधिक फ़ायदा जब लिए अंतरफल बेहद ज़रूरी है ।पौधा छोटा – छोटा रहता है तो पौधों के बीच काफी जगह खाली रहता है | इसके बीच में अन्य फसल भी प्राप्त कर सकते हैं | दलहन, फसलें तथा सब्जी वाली फसलें तथा फलों में पपीता,अनानास आदि |

कीट एवं रोग नियंत्रण

Pest and Disease Control
कठल की खेती (jackfruit farming) में अधिक फसल सुरक्षा की ज़रूरत नही पड़ती । कटहल के पेड़ में रोग तथा कीट का प्रकोप बहुत कम होता है लेकिन इसमें लगने वाला प्रमुख रोग गलन है | यह रोग राइजोपस आर्टोकारपाई नामक कवक के कारण होता है | इसका प्रकोप फल की छोटी अवस्था में होता है | इसके कारण कटहल के फल सडकर गिरने लगते हैं इस बीमारी की रोकथाम के लिए डाइथेन एम – 45 के 2 ग्राम प्रति लीटर में घोलकर 15 दिनों के अंतराल पर 2 – 3 छिड़काव करना चाहिए | कीटों में मिली बग एवं तना छेदक प्रमुख हैं |
मिली बैग
यह कीट फल व फूल एवं डंठलों का रस चूसते हैं जिससें फल तथा फूल गिर जाता है | इसकी रोकथाम के लिए मई – जून में बगीचे की जुताई कर देनी चाहिए | इसके उपचार के लिए 3 मिली. इंडोसल्फान प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें |
तना छेदक
यह कीट पेड़ के तने में छेदकर सुरंग बना देते हैं | इससे अन्दर के जीवित भाग को खाते रहते हैं | अगर इस कीट का प्रकोप बढ़ जाता है तो पेड़ की डालियाँ एवं तना सुख जाते हैं | इसके नियंत्रण के लिए पौधों के तना एवं डाली पर जहाँ छेद नजर आयें उसे केरोसिन तेल में रुई भिंगोकर भर दें और छेद के मुह को मिट्टी से भरे दें |

उपज –

Yield
कटहल के पौधे में शुरुआत में फल कम लगता है । तथा फल लगने के बाद गिर जाता है लेकिन 10 से 12 वर्ष बाद प्रति पेड़ 100 – 250 तक प्राप्त होते हैं

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