कुंदरू की वैज्ञानिक खेती की जानकारी

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कुंदरू को Coccinia grandis, scarlet gourd, tindora and kowai fruit भी कहा जाता है ।इसे आयुर्वेदिक में बिंबी फल के रूप में जाना जाता है । कुंदरू एक लतावाली बहुवर्षीय सब्जी की फसल है । जो कि किसी सहारे के साथ तेजी से बढ़ती है| यह अधिकतर गृह वाटिका में भारत के सभी हिस्सों में उगायी जाती है| कम ठंड पड़ने वाले स्थानों पर यह लगभग सालभर फल देती है| परन्तु जिन स्थानों पर ज्यादा ठंडक पड़ती है, वहां पर यह फसल 7 से 8 महीने फल देती है| यद्यपि यह एक अल्प उपयोगी सब्जी फसल है|

कुंदरू की वैज्ञानिक खेती की जानकारी : scarlet gourd, Ivy Gourd, tindora and kowai fruit farming

 कुंदरू की वैज्ञानिक खेती की जानकारी : scarlet gourd, Ivy Gourd farming
कुंदरू की वैज्ञानिक खेती की जानकारी : scarlet gourd, Ivy Gourd farming

कुंदरू एक ऐसी सब्जी है जिसे एक बार लगाने के बाद इसकी बेल 4-5 साल तक फल देती है। इसके बेल करीब 3 से 5 मीटर तक लंबी होती है और यह झाड़ी के सहारे फैलती है। भविष्य के बदलते हुए जलवायु परिवेश में कुंदरू एक महत्वपूर्ण सब्जी फसल के रूप में देखी जा रही है| इसलिए उत्पादक यदि इसकी वैज्ञानिक तकनीक से खेती करें, तो इसकी फसल से अच्छी उपज और लाभ प्राप्त किया जा सकता है|

कुंदरू की सब्ज़ी खाने के फ़ायदे – Benefits of scarlet gourd, Ivy Gourd, tindora and kowai fruit

इसमें फाइबर, विटामिन-ए, विटामिन बी 1, विटामिन बी 2, थायमिन, और विटामिन सी, पोटेशियम, कैल्सियम, फ्लेवोनोइड्स, एंटी बैक्टीरियल और एंटी-माइक्रोबियल, आयरन आदि पायी जाती है। इसे खाने से पाचन, कैंसर, मधुमेह, किडनी स्टोन, हृदय रोग और नर्वस सिस्टम से जुड़े रोगों में सहायता मिलती है। इसके साथ ही इससे डिप्रेशन, वजन घटाने में , थकान आदि में भी फायदेमंद है।

पाचन तंत्र के लिए कुंदरू के फायदे –

पाचन तंत्र को मजबूत करने के लिए कुंदरू का सेवन फायदेमंद होता है। इसमें अच्छी मात्रा में फाइबर होता है जो भोजन को पचाने में मदद करता है। फाइबर मल को उत्तेजित करता है और बवासीर जैसी बीमारियों के जोखिम से बचाव करता है। बहुत से लोग जंक फ़ूड खाने से भोजन का पाचन नहीं हो पाता है। इसलिए अधिक फ़ास्ट फ़ूड का सेवन करने से बचे। अपने आहार में कुंदरू को जरूर शामिल करें। (और पढ़े – क्रोन रोग क्या है)

मोटापा कम करने के लिए –

बहुत से लोग अपना वजन कम करने के लिए बहुत से घरेलू उपचार का उपयोग करते है। लेकिन अपना वजन कम करने में बहुत लोग असफल हो जाते है। अगर आप अपना वजन कम करना चाहते है तो कुंदरू को अपने भोजन में शामिल करे, क्योंकि इसमें फाइबर होता है जो वजन कम करने में मदद करता है। थोड़ा कुंदरू भोजन में करने से चर्बी कम होने लगती है और वजन संतुलित हो जाता है। (और पढ़े – मोटापा के कारण क्या है)

डायबिटीज को नियंत्रण करने में –

डायबिटीज से पीड़ित लोगो को कुंदरू की सब्जी को आहार में जरूर शामिल करना चाहिए। कुंदरू बढ़े रक्त शर्करा को कम करता है और शुगर नियंत्रण में हो जाता है। इस बात का ध्यान रखे अगर आपका शुगर नियंत्रण में तो अधिक कुंदरू का सेवन न करे, इससे शुगर अधिक कम हो सकता है।

तंत्रिका तंत्र को मजबूत करने में –

कुंदरू में घुलनशील बी 2 होता है यह शरीर के लिए फायदेमंद होती हैं। यह शरीर में ऊर्जा का उत्पादन करती है और आहार पोषक तत्वों की कमी को दूर करता है। इसके अलावा एंटीऑक्सीडेंट का अच्छा स्त्रोत होता है। यह मस्तिष्क से संबंधित रोग अल्जामइर, मिर्गी, तनाव, चिंता की समस्या को दूर करता है। कुछ अध्ययन के अनुसार कुंदरू तंत्रिका तंत्र को मजबूत कर मानसिक रोगो से बचाव करता है। अपने भोजन में कुंदरू को शामिल करे।

चयापचय को स्वस्थ्य रखने में –

चयापचय की क्रिया मनुष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण क्रिया है। जैसा की आपको पता है कुंदरू में मैग्नीशियम, थायमिन उपस्थित होता है जो परिवर्तित होकर ग्लूकोज का निर्माण करती है। ऊर्जा शरीर के लिए बहुत जरुरी होती है इससे कार्य करने में आलस नहीं आता है। कुछ वैज्ञानिको के अनुसार कुंदरू शरीर की लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण करती है। क्योंकि थायमिन और विटामिन बी 1 ऊर्जा को बढ़ाते है और चयापचय बढ़ता है।

किडनी स्टोन को ठीक करें कुंदरू –

किडनी स्टोन की बीमारी बहुत कष्टदायक होती है और अगर इसके शुरुवाती लक्षण आप में दिखाई दे रहे है तो आपको भोजन में कुंदरू का सेवन करना चाहिए। कैल्शियम युक्त भोजन का सेवन करने से गुर्दे की पथरी की समस्या कम होने लगती है। कुंदरू में अच्छी मात्रा में कैल्शियम होता है जो गुर्दे की पथरी को कम करने में मदद करता है। इसके अलावा अधिक पानी का सेवन करना चाहिए। कुछ सब्जिया जैसे पालक का अत्यधिक सेवन गुर्दे की पथरी का कारण बनती है। इसलिए पालक की सब्जी बहुत अच्छे से साफ कर सेवन करे।
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कुंदरू की खेती कहाँ पर होती है –

पहले कुंदरू की खेती एशिया और अफ्रीका के कुछ ही देशों में होती थी लेकिन अब सभी देशों में अलग अलग नाम से इसकी खेती की जाने लगी है।

उपयुक्त जलवायु – suitable climate for scarlet gourd, Ivy Gourd farming

कुंदरू की सफल खेती के लिये गर्म और आर्द्र जलवायु सर्वाधिक उपयुक्त होती है| उत्तर भारत में ठंड के कारण इसकी बढ़वार बाधित हो जाती है और लता सुषुप्ता अवस्था में चली जाती है| इसलिए कुंदरू की फसल से अच्छे उत्पादन के लिए 30 से 35 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान का होना आवश्यक है|

भूमि का चयन – suitable soil selection for scarlet gourd, Ivy Gourd farming

कुंदरू की फसल को लगभग सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है| परन्तु कार्बनिक पदार्थ युक्त बलुई दोमट भूमि सर्वाधिक उपयुक्त होती है| इसमें लवणीय मिट्टी को सहन करने की भी क्षमता होती है| हल्की एवं कमजोर भूमि में, उचित पोषक तत्वों का प्रयोग करके इसकी खेती की जा सकती है| ऐसी भूमि का चुनाव करना चाहिए जिसका पी एच मान 7.00 के लगभग हो|

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खेत की तैयारी

कुंदरू की खेती के लिए खेत को अच्छी प्रकार से तैयार करने की जरूरत पड़ती है| क्योंकि बहुवर्षीय फसल होने के कारण एक बार लगाया गया पौधा 2 से 4 वर्षों तक लगातार फल देता रहता है| मई से जून के महीने में गहरी जुताई करके खेत खुला छोड़ देते हैं| जिससे खरपतवार तथा कीट एवं रोग नष्ट हो जाएं| जुलाई के महीने में 2 से 3 बार हैरो या कल्टीवेटर से जुताई करके खेत में पाटा लगा देते हैं| लेकिन पानी निकासी का उचित प्रबंध आवश्यक है|

उन्नतशील किस्में – improved modern varieties for scarlet gourd, Ivy Gourd farming

1.इंदिरा कुंदरू -5

कुंदरू की यह प्रजाति इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर द्वारा विकसित की गई है । इसके फल हल्के हरे, अण्डाकार (फल की लंबाई 4.30 से.मी. एवं व्यास 2.60 से.मी.) होता है । यह एक अधिक उपज देने वाली प्रजाति है । इस प्रजाति से 21 कि.ग्रा. फल प्रति पौधा प्राप्त किया जा सकता है । इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 400-425 कु./है. है ।

2.इंदिरा कुंदरू-35 –

कुंदरू की यह प्रजाति भी इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर द्वारा विकसित की गई है इसके फल लम्बे हल्के हरे तथा फल 6.0 से.मी. लम्बे एवं उनका व्यास 2.43 से.मी. होता है । यह एक अधिक उपज देने वाली प्रजाति है । इस प्रजाति से 22 कि.ग्रा. फल प्रति पौधा प्राप्त किया जा सकता है । इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 410-450 कु./है. है ।

सुलभा (सी.जी.-23) –

कुंदरू की यह प्रजाति केरल कृषि विश्वविद्यालय, वेल्लानीकारा द्वारा विकसित की गई है । इसके फल लम्बे (9.25 से.मी.), गहरे हरे रंग के होते हैं यह प्रजाति रोपण के 37-40 दिन में पुष्पन में आती है एवं प्रथम तुड़ाई 45-50 दिन पर होती है । यह प्रजाति वर्षभर में लगभग 1050 फल प्रति पौधा देती है एवं इसकी उत्पादन क्षमता 400-425 कु./है. है ।

काशी भरपूर (वी.आर.एस.आई.जी.-9)-

कुंदरू की यह प्रजाति भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी द्वारा विकसित की गई है । इसके फल आकर्षक हल्के हरे, अण्डाकार एवं हल्की सफेद धारी युक्त होते हैं । यह प्रजाति रोपण के 45-50 दिन में फल देने लगती है । इस प्रजाति से 20-25 कि.ग्रा. फल प्रति पौधा प्राप्त किया जा सकता है । इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 300-400 कु./है. है ।

काशी भरपूर (वी आर एस आई जी- 9)-

कुंदरू की इस किस्म के फल आकर्षक हल्के हरे, अण्डाकार और हल्की सफेद धारी युक्त होते हैं| यह रोपण के 45 से 50 दिन में फल देने लगती हैं| इस किस्म से 20 से 25 किलोग्राम फल प्रति पौधा प्राप्त किया जा सकते है| इसकी उत्पादन क्षमता 300 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है|

खाद एवं उर्वरक –

कुंदरू की फसल से अच्छी उपज के लिए 60 से 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 से 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर डालते हैं| फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा और नत्रजन की आधी मात्रा फसल रोपण के समय तथा बाकी की नत्रजन की मात्रा को चार बार में जून या जुलाई से प्रति माह देना चाहिये| इसके साथ ही प्रति गड्ढे में 10 किलोग्राम गोबर की खाद भी फसल रोपण के पहले देनी चाहिये| सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ ही प्रति गड्ढ़ा आधा किलो नीम खली मिलाने से कीड़े मकोड़े और रोगों का प्रकोप कम होता है|

फसल प्रबंधन एवं रोपण –

कुंदरू को मुख्यतः कटिंग से ही लगाया जाता है यह देखा गया है कि पुराने प्ररोह की मोटी तना कटिंग में अंकुरण तीव्र गति से होता है । फरवरी के अंतिम सप्ताह से 15 मार्च के दौरान 15-20 से.मी. लम्बी तथा 1.5 से 2.0 से.मी. मोटी कटिंग को पोली बैग या सीधे जमीन में लगाते हैं । इन्हे अच्छी तरह तैयार किए गए गड्ढे जो कि 60 से.मी. व्यास के होते हैं पौध से पौध की दूरी 2.0 मी. तथा लाइन से लाइन की दूरी 2.00 मीटर रखते हैं । सिंचाई कुंदरू की फसल को गर्मी में 4-5 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए । फसल में पुष्पन एवं फलन के समय उचित नमी बनाये रखे । उचित जल निकास न होने तथा 18-24 घंटे तक पानी भरने की दशा में फसल पीली होकर सूख जाती है ।

कुंदरू की खेती में सिंचाई प्रबंधन – Irrigation and weed control management for scarlet gourd, Ivy Gourd farming

कुंदरू की फसल को गर्मी में 4 से 5 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिये| फसल में पुष्पन एवं फलन के समय उचित नमी बनाये रखे| उचित जल निकस न होने तथा 24 घंटे तक पानी भरने की स्थिति में फसल पीली होकर सूख जाती है|

अंतः सस्य क्रियाये –
कुंदरू फसल के खेत में खरपतवार प्रबंधन के लिए एक दो निराई की आवश्यकता फसल की प्रारंभिक अवस्था में होती है| निराई खुरपी की सहायता से करते हैं और दो पंक्तियों के बीच में हल्की गुड़ाई भी कर देते हैं, जिससे पौधों की जड़ों में वायु संचार पूर्ण रूप से हो सके|

पौधों को सहारा देना –

कुंदरू की फसल काफी वानस्पतिक वृद्धि करती है| अतः इसे सहारे की आवश्यकता होती है| साधारणतया पंडाल पद्धति में 1.5 से 1.75 मीटर के सीमेट के खम्बे या बांस के टुकड़े आदि के सहारे फसल को चढ़ाया जाता है| उत्तर भारत में डंठक के कारण नवम्बर में फसल को जड़ से 30 सेंटीमीटर छोड़कर काट दिया जाता है| गृहवाटिका में इसे घरों की छतों पर, चाहरदीवारी पर भी चढ़ाकर उगाते हैं|

कुंदरू की खेती में लगने वाले कीट एवं रोकथाम disease control for scarlet gourd, Ivy Gourd farming

फल मक्खी-

इस कीट की सूण्डी हानिकारक होती है| प्रौढ़ मक्खी गहरे भूरे रंग की होती है| इसके सिर पर काले और सफेद धब्बे पाये जाते हैं| प्रौढ़ मादा छोटे, मुलायम फलों के छिलके के अन्दर अण्डा देना पसन्द करती है तथा अण्डे से ग्रब्स (सूड़ी) निकलकर फलों के अन्दर का भाग खाकर नष्ट कर देती हैं| कीट फल के जिस भाग पर अण्डा देती है वह भाग वहाँ से टेढ़ा होकर सड़ जाता है और बाद में ग्रसित फल भी सड़ जाता है एवं नीचे गिर जाता है|

रोकथाम-
गर्मी की गहरी जुताई या पौधे के आस पास खुदाई करें ताकि मिट्टी की निचली परत खुल जाए जिससे फलमक्खी का प्यूपा धूप द्वारा नष्ट हो जाए तथा शिकारी पक्षियों को खाने के लिए खोल देता है । ग्रसित फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए । नर फल मक्खी को नष्ट करने लिए प्लास्टिक की बोतलों को इथेनाल, कीटनाशक (डाईक्लोरोवास या कार्बारिल या मैलाथियान), क्यूल्यूर को 6:1:2 के अनुपात के घोल में लकड़ी के टुकड़े को डुबाकर, 25 से 30 फंदा खेत में स्थापित कर देना चाहिए । कार्बारिल 50 डब्ल्यूपी., 2 ग्राम/लीटर या मैलाथियान 50 ईसी, 2 मिली/लीटर पानी को लेकर 10 प्रतिशत शीरा अथवा गुड़ में मिलाकर जहरीले चारे को 250 जगहों पर 1 हैक्टेयर खेत में उपयोग करना चाहिए । प्रतिकर्षी 4 प्रतिशत नीम की खली का प्रयोग करें जिससे जहरीले चारे की ट्रैपिंग की क्षमता बढ़ जाए । आवश्यकतानुसार कीटनाशी जैसे क्लोरेंट्रानीप्रोल 18.5 एससी., 0.25 मिली/लीटर या डाईक्लारोवास 76 ईसी., 1.25 मिली/लीटर पानी की दर से भी छिड़काव कर सकते हैं ।

1. गर्मी की गहरी जुताई या पौधे के आस पास खुदाई करें ताकि मिट्टी की निचली परत खुल जाए जिससे फलमक्खी का प्यूपा धूप द्वारा नष्ट हो जाये या शिकारी पक्षियों को खाने के लिये मिल जाये|

2. ग्रसित फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए|

3. नर फल मक्खी को नष्ट करने के लिए प्लास्टिक की बोतलों को इथेनाल, कीटनाशक (डाईक्लोरोवास या कार्बारिल या मैलाथियान), क्यूल्यूर को 6:1:2 के अनुपात के घोल में लकड़ी के टूकड़े को डुबाकर, 25 से 30 फंदा खेत में स्थापित कर देना चाहिए|

4. कार्बारिल 50 डब्ल्यू पी, 2 ग्राम प्रति लीटर या मैलाथियान 50 ई सी, 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी को लेकर 10 प्रतिशत शीरा अथवा गुड़ में मिलाकर जहरीले चारे को 250 जगहों पर प्रति हेक्टेयर खेत में उपयोग करना चाहिए| प्रतिकर्षी 4 प्रतिशत नीम की खली का प्रयोग करें जिससे जहरीले चारे की ट्रैपिंग की क्षमता बढ़ जाये|

5. अधिक प्रकोप की अवस्था में कीटनाशी जैसे क्लोरेंट्रानीलीप्रोल 18.5 एस सी, 0.25 मिलीलीटर या डाईक्लारोवास 76 ई सी, 1.25 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से भी छिड़काव करें| इसके साथ अन्य कीटों की रोकथाम भी सम्भव है|

कुंदरू की गाल मक्खी-

यह मक्खी पौधे के नरम तने में अण्डे देती है और तने का हिस्सा फल की तरह फूल जाता है|

रोकथाम- इसके नियंत्रण के लिए ऐसे प्रभावित तने को तोड़कर निकाल देना चाहिये|

रोग एवं रोकथाम –

मृदु चूर्णिल आसिता-

यह बीमारी बदली वाले मौसम में होती है| इसमें पुरानी पत्ती की निचली सतह पर सफेद गोल धब्बे बन जाते हैं| जो बाद में आकार एवं संख्या में बढ़ जाते हैं और पत्ती की दोनों सतह पर आ जाते हैं| बीमारी के अधिक प्रकोप के समय पत्तियाँ भूरे होकर सुकड़ जाती है|

रोकथाम- इसके नियंत्रण हेतु बाविस्टीन 0.1 प्रतिशत का घोल का छिड़काव प्रति सप्ताह तीन सप्ताह तक बीमारी की प्रारम्भिक अवस्था में ही करें| कीट एवं रोग नियंत्रण और पहचान की अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- कद्दूवर्गीय सब्जी की फसलों में समेकित नाशीजीव प्रबंधन कैसे करें

फल तुड़ाई –

कुंदरू के फलों की पहली तुड़ाई रोपण के 45 से 50 दिन पर होती है| बाद की तुड़ाई 4 से 5 दिन के अंतर पर करते रहते हैं|

पैदावार –

कुंदरू की फसल से उपज किस्म के चयन, खाद और उर्वरक की मात्रा और फसल की देखभाल पर निर्भर होती है| लेकिन उपरोक्त उन्नत तकनीक से इसकी खेती करने पर आमतौर पर हरे ताजे फलों की औसत उपज 300 से 450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है|

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