नींबू की उन्नत खेती कैसे करें,नींबू की बगवानी लगाने की विधि

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नींबू की उन्नत खेती : आधुनिक वैज्ञानिक तरीके से नींबू की खेती कैसे करें (How to cultivate lemons in a modern scientific way)

नींबू की उन्नत खेती – Nimboo ki kheti

वानस्पतिक नाम – Citrus aurantifolia

कुल – Rutaceae 

गुणसूत्रों की संख्या :
नींबू का उद्भव : दक्षिण एशिया

महत्व –

हमारे देश मे माल्टा,चकोतरा,सन्तरा,लेमन,ग्रैपफ्रूट, किस्मों के रूप में नींबू की प्रजातियाँ पाई जाती है । इसमें विटामिन सी,, व खनिज लवण आदि प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं । नींबू वर्गीय सभी प्रजातियों में विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है।

जलवायु व तापमान :

नींबू एक नम व गर्म जलवायु का पौधा है । इसकी बढ़वार के लिए ऐसी जगह उपयुक्त होती है जहां पर पाला नही पड़ता है । नम व गर्म जलवायु जहां पर वर्ष भर रहता है । नींबू के पौधों के समुचित वृद्धि व विकास के लिए ऐसी जलवायु सर्वोत्तम होती है ।

भूमि का चयन :

नींबू की उन्नत खेती के लिए उचित जल निकास वाली दोमट व 5.5 से 7 पीएच वाली भूमि का चुनाव करना चाहिए । भूमि की सतह 4 से 6 फीट गहरी पथरीली न हो ऐसी भूमि का चयन करना बेहतर होता है ।

उन्नत किस्में –

कागजी नींबू
पहाड़ी नींबू
पन्त लेमन 1
पन्त लेमन 2
बारहमासी लेमन
यूरेका गोल
यूरेका लम्बा

नींबू का प्रवर्धन –

किसान भाई नींबू की बागवानी के लिए इन विधियों द्वारा प्रवर्धन कर सकते हैं –
बीज द्वारा
वानस्पतिक भागों द्वारा
वानस्पतिक भागों द्वारा नींबू में इन विधियों द्वारा प्रवर्धन कर सकते हैं –
कलम द्वारा
गूंटी बाँधकर
चश्मा चढ़ाकर

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बीज द्वारा नींबू का प्रवर्धन –

किसान भाई छोटे स्तर पर बागवानी करना चाहे तो बीजों को स्टील की ट्रे या किसी बक्से के ऊपर पर भी उगा सकते हैं । बड़े पैमाने में नींबू की बागवानी के लिए मिट्टी में बुवाई करना ही उपयुक्त रहता है ।नींबू के प्रवर्धन के लिए नींबू के बाग से दूर उचित जल निकास प्रबन्ध वाली भूमि,बीज क्यारी के लिए उपयुक्त होता है । किसान भाई ध्यान दें एक ही बीज शैय्या पर कई वर्षों तक नींबू के पौधे नही उगाने चाहिए ।

नींबू के बीजों की बुवाई के लिए 15 जनवरी से 15 फरवरी का समय अच्छा रहता है । अथवा 12.7 से 14.4 डिग्री सेल्सियस का तापमान का नींबू के बीजों में अंकुरण के लिए अच्छा होता है।

नींबू के बुवाई के लिए बीज शैय्या तैयार करना :

नींबू के बीजों की बुवाई में लिए आवश्यकता के अनुसार समतल दोमट भूमि व उचित जल निका वाली भूमि का चुनाव करके जुताई करनी  करके ढेले फोड़कर भूमि ढेले रहित कर लेना चाहिए ।भूमि की सतह से 15 से 20 सेंटीमीटर ऊँची 15 से 20 सेंटीमीटर दूरी पर क्यारियां बना लेना चाहिये । बुवाई से पहले बीजों को 24 घण्टे पानी में भिगोकर रखना चाहिए । जिससे अंकुरण शीघ्र हो।  बीजों पर फफूंदीजनित रोगों में प्रकोप न हो इसलिए फफूंदनाशी से बीजों को उपचारित कर लेना चाहिए । अथवा भूमि को 0.2 सांद्रता वाले थायरम घोल से उपचारित कर लेना चाहिए।  अब उपचारित बीजों को 2.5 सेंटीमीटर की दूरी के 2.5 सेंटीमीटर की गहराई में शाम के समय बुवाई कर देना चाहिए । बुवाई के बाद बीज शैय्या को बालू ढक दें।बुवाई के करीब 15 दिन बाद बीजों में अंकुरण आरम्भ हो जाता है।नर्सरी में पौधों में जड़ सड़न व तना सड़न रोग न लग जाये अतः इससे बचाव के लिए पौधों को अधिक नमी व अधिक पानी व सघनता से बचाना चाहिए। नींबू के पौधे 0.5 से 1.0 सेंटीमीटर व्यास में हो जाने पर स्वस्थरोगरहित पौधों को उखाड़कर दूसरी क्यारियों में लगा देना चाहिए । इस दौरान क्यारियों की उचित देखभाल करते रहना चाहिए । नर्सरी में पौधों को लगभग 2 साल तक रखना चाहिए।  पौधों में उचित विकास व सहित आकर होने पर इनमें चश्मा चढ़ा देना चाहिए ।

पौधे के वानस्पतिक भागों द्वारा पौधे तैयार करना –

बीज के अलावा नींबू के पौधे कलम लगना,गूंटी बांधना,चश्मा चढ़ाना विधि से प्राप्त कर सकते हैं।

नींबू के पौधे लगाने की विधि (क्यारी निर्माण व रोपण विधि) :

नींबू के पौधों की रोपाई के लिए जुलाई उपयुक्त समय है। सिंचाई प्रबन्धन उचित होने पर मार्च – अप्रैल में भी रोपाई कर सकते हैं । रोपाई के लिए वर्गाकार आयताकार विधि से किसान भाई नींबू के पौधों की रोपाई करें । किसान भाई खेत में कल्टीवेटर या देशी हल से 1 से 2 जुताई कर धेले रहित भुरभूरा व समतल बना लें । अब 6×6 मीटर की दूरी पर 90×90×90(लम्बाई×चौड़ाई×गहराई) सेंटीमीटर का गड्ढा खोद लें ।
कब इन गड्ढों को माह भर के लिए खुला छोड़ देना चाहिए ताकि गड्ढे में सूर्य के प्रकाश में  तप जाएं । अब नींबू के पौधों के रोपाई के 15 दिन पूर्व गड्ढो में 50-55 किलोग्राम गोबर की खाद,2 से 2.5 किलोग्राम सुपर फॉस्फेट,फफूंद जनित रोगों से बचने के लिए 150 ग्राम एल्ड्रिन धूल और मिट्टी,सभी को मिलाकर गड्ढे में भरते हैं। गड्ढों को दबाकर 15 से 20 सेंटीमीटर मिट्टी सतह की ऊंचाई तक भरते हैं। अब गड्ढों में सिंचाई कर देते हैं ताकि मिट्टी व खाद गड्ढ़ों में बैठ जाये । किसी ठण्डे दिन शाम को गड्ढे के बीचोंबीच नर्सरी से पिंडी सहित खोदे गए नींबू के पौधों की रोपाई कर दें । पौधों में अच्छे से मिट्टी चढ़ाने के बाद सिंचाई कर दें ।

नींबू के पौधों की निराई-गुड़ाई व देखभाल व थाला बनाने की विधि –

रोपाई के बाद पौधे को सुरक्षा की दृष्टि के लिए चारो ओर थाला बना देना चाहिए जैसे जैसे पौधा बढ़े थाले की ऊंचाई भी बढ़ाते रहना चाहिए । निराई-गुड़ाई कर अनावश्यक खरपतवार निकालकर नष्ट कर देना चाहिए । तने के चारो ओर मिट्टी चढ़ा देना चाहिए ।

सिंचाई व जल प्रबंधन :

पौधों में नमी कम होने पर सिंचाई कर चाहिए । नींबू की उन्नत खेती के लिए जल निकासी का प्रबंधन बेहद आवश्यक है ।किसान भाई ध्यान रखें कि थालों में अधिक पानी भरा न रहे ।

खाद व उर्वरक :

नींबू के पौधों की छँटाई :

पेड़ों को उचित आकार देने के लिए साथ ही रोगी कमजोर शाखाओं को खेत में लगाने के करीब 3 साल बाद काट-छाँट कर अलग कर देना चाहिए । यह कार्य वर्षा काल में करना उपयुक्त रहता है । ओरियॉनजीन रसायन 20ppm का छिड़काव करने से फल नही गिरते हैं ।

नींबू के फलों तुड़ाई व उपज :

नींबू के पेड़ से हमें पूरे वर्ष नींबू के फल मिलते रहते हैं । परिपक्व,सुड़ौल व पीले रंग नींबू को ही तोड़ना चाहिए । एक पौधे से अनुमानतः 350-600 फल प्राप्त होते हैं । इस प्रकार 1 हेक्टेयर क्षेत्र से 200 से 300 कुन्तल नींबू की उपज प्राप्त हो जाती है ।

नींबू के पेड़ में लगने वाले कीट व नियंत्रण :

एंथ्रोक्नोज : यह कवक जनित रोग है जो विशेषकर संतरे के पेड़ को चपेट में लेता है । टहनियों पर काले रंग के धब्बे पड़ जाते है जो प्रकोप बढ़ने पर भूरी होती हुई सूख जाती हैं ।
बचाव व रोकथाम : पेड़ों की रोगी व सूखी टहनियों को काटकर अलग कर देना चाहिए । टहनियों के कटे भाग पर बोर्डो मिश्रण का लेप लगाएं । साथ ही ब्लाइटोक्स 50 का 0.3% घोल बनाकर मार्च व सितम्बर में छिड़काव करें ।
नींबू के पेड़ में लगने वाले रोग व नियंत्रण :

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