litchi farming – लीची की खेती की जानकारी

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Litchi farming – लीची की खेती आज कल सबसे फ़ायदे का सौदा है । लीची की बागवानी वैज्ञानिक विधि से लगाकर लीची का उत्पादन दुगुना किया जा सकता है । आज हम लीची की खेती के बारे में विस्तृत जानकारी देने वाले है । लीची का वैज्ञानिक नाम Litchi chinensis है । वनस्पति वैज्ञानिक लीची का ज्न्म्स्थान चाइना को मानते हैं । लीची की खेती भारत सहित पाकिस्तान, ,बांग्लादेश दक्षिण ताइवान,उत्तरी वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस, दक्षिण अफ्रीका और मेडागास्कर में की जाती है । litchi की दो तरह की प्रजातियों की बागवानी की जाती है । Lychee farming से जुड़ी पूरी जानकारी के लिए पोस्ट को पूरा पढ़ें ।

How to litchi farming with scientific method

litchi farming – लीची की खेती वैज्ञानिक विधि से कैसे करें

litchi farming - लीची की खेती की जानकारी litchi farming – लीची की खेती की जानकारी

Nutrition value in litchi

लीची में पोषक तत्वों का भंडार है

फल मस्तिष्क व हृदय के पोषण के लिए अच्छा है । लीची में प्रोटीन तथा खनिज लवण प्रतिशत पाए जाते हैं ।लीची उत्पादन के मामले में चाइना का पहला व भारत का विश्व में दूसरा स्थान है ।

Climate and temperature

जलवायु व तापमान

लीची एक उपोष्ण जलवायु का पौधा है । इसके समुचित वृद्धि व विकास के लिए हल्की नम व गर्म जलवायु उपयुक्त होती है । समुद्र तक से 1000 मीटर ऊंचाई तक लीची को आसानी से उगाया जाता है । लीची के पौधे के लिए न तो अधिक ठंड हो और न ही अधिक गर्मी ऐसी जलवायु बेहद उपयुक्त होती है । वार्षिक वर्षा 90 से 125 सेंटीमीटर वाले क्षेत्रों में लीची की बागवानी की जाती है। 75 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती होती है । लीची के पौधों के समुचित विकास के लिए 15 से 28०C तापमान उपयुक्त होता है ।

Soil selection for Lychee ki kheti

भूमि का चयन

litchi farming के लिए 5.5 से 7.0 पीएच वाली उचित जल निकास वाली गहरी जीवांश युक्त दोमट मिट्टी सर्वोत्तम रहती है । लीची में लिए अम्लीय मृदा सर्वोत्तम होती है इसलिए बिहार राज्य में लीची उत्पादक खेतों की मिट्टी में 30 प्रतिशत तक चूना पाया जाता है । लीची के लिए चयनित मृदा में कार्बनिक पदार्थ की प्रचुरता होनी चाहिए ।

Advanced varieties of Lychee –

लीची की उन्नत किस्में

– अगेती किस्में – देहरादून, अर्ली लार्ज रेड,रोज सेन्टेड
– मध्यमी किस्में – सहारनपुर प्याजी,सहारनपुर पिगलिक,शाही,गुलाब,चायना
– पछेती किस्में – इलायची, कलकतिया, गोला,रामनगर,लेट सीडलेस

Scientific methods of amplification of litchi

लीची के प्रवर्धन की वैज्ञानिक विधियाँ

किसान भाई लीची की बागवानी हेतु प्रवर्धन की निम्न विधियाँ प्रयोग में ला सकते हैं –
– गूटी द्वारा
– भेंट कलम लगाकर
– दाब कलम द्वारा
– मुकुलन द्वारा
– बीज को बोकर उक्त सभी विधियों में लीची की अधिकतम उपज हेतु गूटी अथवा दाब कलम द्वारा ही लीची का प्रर्वधन करते हैं। बीज के द्वारा उगाए गए पौधों में मातृ वृक्ष के समान पैतृक गुण नही आ पाते जिससे उत्पादन व फलों की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ता है । पौधों में फलन भी देर से होती है ।

Lychee amplification by Gooty method

गूटी विधि द्वारा लीची का प्रवर्धन –

लीची की एक उपयुक्त मोटाई की शाख पर 2.5 से 3 सेंटीमीटर वलय नीचे भाग पर बनाते हैं अब उस छीले हुए भाग को इंडोल ब्यूटारिक अम्ल (रूटोंन) से उपचारित करके उस पर वर्मीकुलाइट और घास का मिश्रण अथवा बिहार राज्य में बनाये गए विशेष मिश्रण जो कि 60 भाग तालाब की मिट्टी+20 भाग बालू + 10 भाग बोर का टुकड़ा+ 10 भाग सड़ी हुई अंडी की खली+1 भाग यूरिया से बनाया जाता है, से ढक देते हैं । एकलाथीन के कपड़े से कसकर बांध देते हैं । इससे छिले हुए भाग पर श्वसन क्रिया तो होती है किंतु वाष्पीकरण की क्रिया बन्द हो जाती है। एकलाथीन कपड़े से गूटी बांधने से 60 दिन के अंदर पतली जड़े निकल आती हैं । गूटी को सावधानी पूर्वक काटकर अलग करके गमलों में लगाकर नर्सरी में लगाते हैं । इस क्रिया में जड़ें पतली निकलती हैं जो टूटती नही है जिससे पौधे मरते नही है ।

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किसान भाई लीची का प्रवर्धन वर्षा ऋतु के आगमन यानी कि जून माह में करें । लीची की एक सुड़ौल व उपयुक्त मोटाई की डाल पर नीचे भाग पर 2 से 2.5 सेंटीमीटर का छिलका हटा दें । अब छल्ले (वलय) के रूप से छीले गए भाग पर इंडोल ब्यूटारिक अम्ल(रूटोंन) से उपचारित कर पर्याप्त नमी वाली मास घास से ढके । ऊपर से एल्काथीन के टुकड़े से लपेटकर कसकर बांधने से छीले गए वलय का वाष्पीकरण रुक जाता है। इस क्रिया के करीब 60 से 70 दिन में छीले गए साख से जड़ें निकल आती हैं । मुख्य साख से काटकर इन्हें किसी गमले में रोपकर छाया वाले स्थान पर रख देते हैं । रोपाई से पहले शाखाओं की पत्तियां कम कर देना चाहिए । जिससे वाष्पन कम हो । किसान भाइयों इस प्रकार साल भर बाद खेत में रोपाई में लिए लीची के पौधे तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार तैयार पौधों की जड़ें मोटी होती हैं जो रोपाई के समय टूट जाती हैं जिससे रोपे गए पौधे के मरने की संभावना अधिक होती है । किसान भाई उपरोक्त विधि को ही अपनाएं ।

Lychee amplification by Gooty method

रोपाई का समय

अगस्त से सितम्बर तक । सिंचाई की सुविधा होने पर फरवरी से मार्च में भी कर सकते हैं ।

Scientific method of transplanting litchi

लीची की रोपाई की वैज्ञानिक विधि

लीची की रोपाई के लिए किसान भाई माह अप्रैल से मई में आवश्यकता के अनुसार भूमि में 10×10 की दूरी पर 90 सेंटीमीटर व्यास के 90 सेंटीमीटर गहराई के गड्ढे खोद लेते हैं । गड्ढों को करीब 30-35 दिन तक सूर्य के प्रकाश में तपने के लिए खुला छोड़ देना चाहिए । एक बारिश के बाद प्रति गड्ढों में 15 से 20 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद,10 किलोग्राम लीची के बाग की मिट्टी,व 250 ग्राम फफूंदी रोगों से बचाव हेतु एल्ड्रिन धूल व 2 किलोग्राम चूना सभी को मिलाकर गड्ढों में भर दें । पूरी वर्षा तक गड्ढे खुला छोड़ दें । वर्षा के पानी से गड्ढे की मिट्टी अच्छी प्रकार से बैठ जाएगी । माह अगस्त में शाम के समय लीची के पौधों की रोपाई गड्ढों के बीचोबीच में कर देनी चाहिए । रोपाई करते समय तनो की ओर ऊंचा करते हुए मिट्टी की ढाल बना देना चाहिए जिससे सिंचाई करते समय तने में पानी न पड़े । अन्यथा जड़ों की सड़ने की सम्भवना बनी रहेगी । रोपाई के बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए ।

Irrigation and water drainage management in litchi ki kheti

लीची में सिंचाई व जल निकास प्रबंधन –

लीची के पौधों को पाले व लू से बचाव के लिए सिंचाई करनी चाहिए । तेज लू व पाले से बचाव में लिए पौधों के ऊपर घास फूस की पूरब की ओर से मुंह खुला कर पौधों को ढक देते हैं । सामान्यतः लीची में पुष्पन के पूर्व व फलन तक 2 से 3 सिंचाइयाँ करनी चाहिए ।

Weed control in litchi farming

लीची में निराई – गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण

लीची के पेड़ों की जड़ों के आस पास निराई गुड़ाई कर खरपतवार निकाल देने चाहिए ताकि पोषक तत्व सीधे पौधों तक पहुंच सकें । व खरपतवार में ही कीड़े-मकोड़े छिपे होते हैं जो पौधों को नुकसान पहुचाते हैं । इसलिए नियमित रूप से निराई गुड़ाई कर खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए ।

Pruning and care of plants

काट-छांट व पौधों की देखभाल

लीची के पौधों में पौधे में अनावश्यक कमजोर व अविकसित शाखाओं को काट छाँट कर अलग कर देना चाहिए । पौधे बड़े होने के बाद उनमें काट छाँट संभव नही हो पाता ।

Florescence and function in litchi ki kheti

लीची में पुष्पन व फलन

लीची में पुष्पन फरवरी माह में शुरू हो जाती है । पौधे लगाने के 5 से 6 वर्ष में लीची से फल मिलना आरम्भ हो जाते हैं । वैसे तो लीची में फलन 100 साल तक होती है किंतु लीची के पेड़ से अच्छी फलन 10 से 12 वर्ष के बाद ही प्रारम्भ होती है ।

Litchi fruits harvesting and yield

लीची के फलों की तुड़ाई व उपज

लीची के फल जब हल्की लाल रंग व गद्दर अवस्था में हों लीची के फलों को 20-25 सेंटीमीटर की टहनियों के साथ गुच्छे में तोड़कर 25 से 30 सेंटीमीटर गहरी टोकरियों में भरकर रख दिया जाता है । लीची से प्रति पेड़ औसतन 1.5 से 2 कुंतल उपज प्राप्त होती है । 1 हेक्टेयर से औसतन 150 से 200 कुन्तल उपज प्राप्त हो जाती है ।

Lychee Fruit Storage

लीची के फलों का भंडारण

लीची को सामान्यतः ताजी ही प्रयोग में लाएं । तथा ताजी लीची ही मंडियों में भेजें । यदि भंडारण करने की आवश्यकता पड़ जाए तो 4.4०C से 6.1०C तापमान व 90 प्रतिशत सापेक्षित आर्दता पर शीत ग्रहों में भंडारित कर देना चाहिये ।

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