आम की खेती : आम की बागवानी की जानकारी – Mango farming in hindi

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aam ki kheti आम भारत में उगने वाला एक बेहद स्वदिष्ट फल है जो गर्मियों के मौसम में खाया जाता है । इस फल का इतिहास तकरीबन 5000 साल पुराना है, हालांकि आम के स्वाद का जायका अब सात समंदर पार विदेशी भी उठाने लगे हैं । भारत में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, केसर, बादामी, तोतापरी और अल्फांसो जैसी आम की प्रजातियां काफी फेमस है । एक्सपर्ट कहते हैं कि आम स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी है, आइए जानते हैं आम में कौन से गुणकारी तत्व पाए जाते हैं और ये कैसे हमारे शरीर को फायदा पहुंचाता है । हमारे देश में उत्पादित किये जाने वाले फलों में आम का अग्रणी स्थान है । अद्वितीय स्वाद, मनमोहक खुशबू, आकर्षक रंग तथा आकार, क्षेत्र एवं जलवायु के अनुकूल उत्पादन क्षमता, पोषक तत्वों की प्रचुरता, व्यावसायिक किस्मों की उपलब्धता और जनसाधारण में लोकप्रियता के कारण इसे फलों के राजा की संज्ञा दी गयी है । कभी राजाओं और नवाबों की निजी सम्पत्ति कहलाने वाला यह फल उत्पादकता की दृष्टि से लाभकारी होने के कारण छोटे-बड़े बागवानों तक पहुँच चुका है । अब आम का बड़े स्तर पर व्यावसायिक उत्पादन भी किया जाने लगा है| परन्तु अभी भी बागों से पूर्ण क्षमता के अनुरूप उत्पादकता प्राप्त करने के लिए बागवानों को वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग किये जाने की अत्यन्त आवश्यकता है । इस लेख में उत्पादकों के लिए आम की उन्नत बागवानी, दशहरी आम की खेती, कैसे करें, आम की खेती की जानकारी का विस्तृत उल्लेख किया गया है ।

आम की खेती mango ki kheti : आम की बागवानी की जानकारी | आम की वैज्ञानिक खेती- Mango farming in hindi

अलग-अलग तरह के रंगों में आने वाले आम में कई प्रकार के विटामिन, मिनरल और एंटी ऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं. इसमें मौजूद विटामिन K न सिर्फ ब्लड क्लॉट्स में फायदेमंद है, बल्कि एनीमिया से भी बचाव करता है । बहुत कम लोग ये बात जानते होंगे कि आम हमारी हड्डियों को भी मजबूत बनाने का काम करता है । आम में विटामिन C की भी भरपूर मात्रा होती है, जो कि रक्त वाहिकाओं और हेल्दी कोलेजन के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है । विटामिन C शरीर के जख्मों को तेजी से भरने में मदद करता है . इसके अलावा भी आम कई बड़ी बीमारियों से हमारे शरीर की रक्षा कर सकता है ।

आम के फायदे – Mango Health Benefits

कैंसर का जोखिम –

एक्सपर्ट कहते हैं कि आम के पीले और नारंगी भाग में बीटा कैरोटीन पाया जाता है । बीटा कैरोटीन आम में पाए जाने वाले कई तरह के एंटी ऑक्सीडेंट्स में से एक है । आम में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट्स शरीर में फ्री रेडिकल्स से लड़ते हैं, जो कि कैंसर के बढ़ने के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं ।

कैंसर का जोखिम-

एक्सपर्ट कहते हैं कि आम के पीले और नारंगी भाग में बीटा कैरोटीन पाया जाता है. बीटा कैरोटीन आम में पाए जाने वाले कई तरह के एंटी ऑक्सीडेंट्स में से एक है । आम में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट्स शरीर में फ्री रेडिकल्स से लड़ते हैं, जो कि कैंसर के बढ़ने के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं.

डायजेस्टिव हेल्थ-

आम हमारे डायजेस्टिव सिस्टम को भी स्थिर रखता है. इसमें मौजूद एमिलेज कंपाउंड और डायट्री फाइबर कब्ज से भी राहत दिलाने का काम करते हैं. एमिइलेज कंपाउंड हमारे पेट में तमाम तरह के खाद्य पदार्थों को पचाने में मदद करते हैं और कठोर स्टार्च को भी तोड़ सकते हैं. आम से मिलने वाला फाइबर कब्ज होने पर सप्लीमेंट्स में मौजूद फाइबर से ज्यादा प्रभावशाली होता है ।

आंखों को फायदा-

आम विटामिन A से भी भरपूर होता है. लगभग एक आम विटामिन A की दैनिक जरूरत को करीब 25 प्रतिशत तक पूरा कर सकता है. ये विटामिन हमारी बॉडी के कई प्रमुख अंगों के लिए बेहद जरूरी है, जैसे कि आंख और त्वचा. विटामिन A शरीर में रीप्रोडक्शन और इम्यून सिस्टम के लिए भी जरूरी होता है ।

वेट कंट्रोल-mango ki kheti

आम में मौजूद गुणकारी तत्व तेजी से बढ़ते वजन को कंट्रोल करने में भी फायदा पहुंचा सकते हैं । एक हालिया स्टडी के मुताबिक, आम और इसमें मौजूद फाइटोकैमिकल्स शरीर में फैट सेल्स और फैट से जुड़े जीन्स पर दबाव बना सकते हैं ।
आम के छिलके के भी फायदे- एक अन्य स्टडी के मुताबिक, आम का छिलका भी शरीर में फैटी टिशू को बढ़ने से रोक सकता है । ये शरीर में बिल्कुल आम में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट्स की तरह ही काम करता है ।

इस बात का रखें ख्याल – mango ki kheti

वैसे तो आम खाना शरीर के लिए फायदेमंद है. लेकिन इसे ज्यादा मात्रा में खाने से नुकसान भी हो सकता है. कुछ लोगों में भ्रम है कि इसे खाने से वजन बढ़ सकता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इसे सही क्वांटिटी में खाने से ऐसा नहीं होता है. 100 ग्राम आम में 60 कैलोरी होती है. अगर कोई व्यक्ति अलग-अलग समय पर रोजाना 1-2 आम खा रहा है और कैलोरी को भी मॉनिटर कर रहा है तो उसका वजन नहीं बढ़ेगा ।

आम की खेती वैज्ञानिक विधि से कैसे करें, आम की बागवानी लगाने की विधि जाने – (mango gardening in hindi)

आम एक प्रकार का रसीला फल होता है। इसे भारत में फलों का राजा भी बोलते हैं। इसकी मूल प्रजाति को भारतीय आम कहते हैं, जिसका वैज्ञानिक नाम मेंगीफेरा इंडिका है। आमों की प्रजाति को मेंगीफेरा ( Mangifera Indica L.) कहा जाता है। आम का कुल Aanacardiaceae है व गुणसूत्रों की संख्या : 2n = 40 होती है।आम का उद्भव स्थल – भारत वर्मा क्षेत्र माना जाता है। इस फल की प्रजाति पहले केवल भारतीय उपमहाद्वीप में मिलती थी । इसके बाद धीरे धीरे अन्य देशों में फैलने लगी। इसका सबसे अधिक उत्पादन भारत में होता है। यह भारत, पाकिस्तान और फिलीपींस में राष्ट्रीय फल माना जाता है और बांग्लादेश में इसके पेड़ को राष्ट्रीय पेड़ का दर्जा प्राप्त है।

भारतीय उपमहाद्वीप में कई हजार वर्ष पूर्व आम के बारे में लोगों को पता चल गया था और उसकी खेती की जाती थी। चौथी से पाँचवीं शताब्दी पूर्व ही यह एशिया के दक्षिण पूर्व तक पहुँच गया। दसवीं शताब्दी तक पूर्वी अफ्रीका में भी इसकी खेती शुरू हो गई। 14वीं शताब्दी में यह ब्राजील, बरमूडा, वेस्टइंडीज और मेक्सिको तक पहुँच गया। संस्कृत भाषा में इसे आम्रः कहा जाता है, इसी से हिन्दी, मराठी, बंगाली, मैथिली आदि भाषाओं में इसका नाम “आम” पड़ गया। मलयालम में इसका नाम मान्न है। वर्ष 1498 में केरल में पुर्तगाली मसाला को अपने देश ले जाते थे। वहीं से आम और इसका नाम भी ले गए। वे लोग इसे मांगा बोलते थे। यूरोपीय भाषाओं में इसका नाम 1510 में पहली बार इटली भाषा में लिया गया। इसके बाद इटली भाषा से अनुवाद के दौरान ही यह फ्रांसीसी भाषा में आया और उससे होते हुए अंग्रेजी में आया, लेकिन अंत में “- ओ” का उच्चारण अभी तक स्पष्ट नहीं है कि यह कैसे आया। अतः यह कहा जा सकता है कि इन सभी भाषाओं ने मलयालम भाषा से इस शब्द को लिया।

aam ki kheti  – आम ऊष्ण व उपोष्ण दोनों जलवायु में उगायन जाने वाला पौधा है | समुद्र तल से 1000 ऊंचाई तक पर्वतीय इलाकों में इसकी खेती सफतापूर्वक की जाती है | आम के पौधे के समुचित विकास फलने फूलने के लिए न्यूनतम 4 से 5 ० C व अधिकतम 44०C तापमान उपयुक्त होता है | औसतन आम की बागवानी के लिए 23.8 ०C से 26.6०C तापमान आदर्श माना जाता है | आम की खेती उष्ण एवं समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में की जाती है| इसकी खेती समुद्र तल से 600 से लेकर 1500 मीटर की ऊंचाई तक वाले हिमालय क्षेत्र में भी की जा सकती है| लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से इसको 600 मीटर तक ही अधिक सफलता से उगाया जा सकता है| तापमान में उतार-चढ़ाव, समुद्र तल से ऊंचाई, वर्षा एवं आंधी इसकी उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं| केवल अधिक तापक्रम ही आम की खेती के लिए विशेष हानिकारक नहीं है, बल्कि इसके साथ वातावरण में आर्द्रता की कमी तथा तेज हवा भी पेड़ों पर प्रतिकुल प्रभाव डाल सकते हैं| छोटे पौधों को पाले से अधिक हानि हो सकती है| आम की खेती लिए 23 से 27 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान उत्तम होता है| आम की अधिकतर किस्में पर्याप्त वार्षिक वर्षा 75 से 375 सेंटीमीटर व शुष्क वातावरण वाले क्षेत्रों में अच्छी पनपती हैं| इसके लिये वर्षा का वार्षिक वितरण अधिक महत्वपूर्ण है| फल के फुल आने के समय शुष्क मौसम अच्छा होता है| फल लगने के पश्चात् हल्की वर्षा उपयोगी होती है, किन्तु अतिवृष्टि, तेज आंधी व चक्रवात से फल गिर जाते हैं| यहां तक कि कभी-कभी पूरी फसल ही नष्ट हो जाती है|

आम की खेती के लिए भूमि – आम की वैज्ञानिक खेती

आम की फसल को लगभग हर प्रकार की खेती में उगाया जा सकता है | आम के पौधों की अच्छी बढवार व फलमे फूलने की दृष्टि से उचित जल निहास वाली दोमट मिटटी उपयुक्त होती है | आम की खेती के लिए मिटटी का पीएच 5.5  से 7.5 होना चाहिए | काली व भारी भूमि आम की खेती के लिए उपयुक्त नही होती | आम के पौधों का ऐसी भूमि में उचित विकास नहीं हो पाता | आम की बागवानी जलोढ़ तथा लैटराइट मिटटी में भी उगाया जाता है | काली मृदा आम के लिए उत्तम मृदा है । आम की खेती प्रत्येक प्रकार की भूमि में की जा सकती है| यही कारण है, कि आम के बाग कम व अधिक उपजाऊ दोनों ही प्रकार की भूमि में पाए जाते हैं| कम उपजाऊ भूमि में आरम्भ से ही खाद और उर्वरक की उचित व्यवस्था करके ही आम का पौधा लगाना चाहिए, जिससे पौधो को स्थापित होने में सुविधा हो| यद्यपि आम को लगभग हर प्रकार की भूमि में लगाना सम्भव है, इसके बागों को लगाने के लिए बलुई, ढालू, पथरीली, क्षारीय तथा पानी भराव वाली भूमि अनुकूल नहीं होती है| आम की सफल खेती के लिए दोमट, जलोढ़, उचित जल निकास वाली तथा गहरी भूमि, जिनका पी एच मान 5.5 से 7.5 के मध्य हो, उपयुक्त मानी गयी हैं|

आम की खेती के लिए खेत की तैयारी – आम की वैज्ञानिक खेती

आम की खेती (बागवानी) के लिए सबसे पहले खेत को गहराई से जोतकर समतल कर लेना चाहिए| पौधों की किस्म के अनुसार, भूमि के उपजाऊपन तथा क्षेत्र में वनस्पति वर्धन पर निर्भर करता है| जिस भूमि पर पौधे तेजी से बढ़ते हैं वहां पौधों को 12 x 12 मीटर की दूरी पर लगाना चाहिए| शुष्क भूमि या उस क्षेत्र में जहां वृद्धि कम होती है 10 x 10 मीटर की दूरी पर्याप्त होती है| आम्रपाली जो कि एक बौनी किस्म है, इसके लिए 2.5 x 2.5 मीटर की दूरी पर लगाई जा सकती है| सघन बागबानी के लिए पौधें से पौधें की दूरी 3.0 x 5.0 मीटर के बीच उपयुक्त हैं| जो भूमि के उपजाऊपन पर निर्भर है|
इसके बाद निश्चित दूरी पर उचित परिमाप के (1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर) गड्ढे मई से जून माह में खोद लेने चाहिए, तथा मिट्टी को दो भागों में बांट लेना चाहिए| एक भाग में करीब 50 से 60 किलोग्राम गोबर कि सड़ी खाद मिला देनी चाहिए| गड्ढों कि भराई के लिए पहले बिना खाद मिली मिट्टी तथा बाद में गोबर की खाद मिली मिट्टी भरनी चाहिए| यदि दीमक की समस्या हो तो 200 ग्राम क्लोरपाइरीफॉस पाउडर प्रति गड्ढे की दर से गड्ढे भरने से पहले मिट्टी में मिला लेनी चाहिए ।

आम की उन्नत किस्में  – mango ki kheti

एकलभ्रूणी किस्में –

इन किस्मों के बीजों में एक ही भ्रूण पाया जाता है –बम्बई, दशहरी, लंगड़ा, चौसा, आदि |

बहुभ्रूणी किस्में –

इन किस्मों के बीज में एक से अधिक भ्रूण पाए जाते हैं –चन्द्राकिरण, बेलारी, ओलूर, बापकाई

आम की काटकर खायी जाने वाली किस्में –

मलिक, अल्फैन्सो, आम्रपाली, लंगड़ा, दशहरी, नीलम, चौसा, आदि |

चूसकर खायी जाने वाली किस्में –

मिठवा, लखनऊ सफेदा, बिगरोन, गाजीपुर, शरबती, रसपुनिया,आदि |

अगेती किस्में – (जून के द्वितीय सप्ताह से जुलाई के द्वितीय सप्ताह तक) –

अल्फैन्सों, गोपालभोग, गुलाबख़ास, बम्बई हरा, बम्बई पीला, स्वर्णरेखा, हिमसागर आदि |

आम की मध्यमी किस्में –

(जुलाई के द्वितीय सप्ताह से अगस्त के द्वितीय सप्ताह तक) – कृष्णभोग, लंगड़ा, जाफरानी, दशहरी, फजरी, आदि |

पछेती किस्में –

(अगस्त के द्वितीय सप्ताह के बाद पकने वाली) – कंचन, नीलम, मोतिया, मनपसंद, तैमूरिया, चौसा,
आम की दक्षिण भारत में उगाई जाने वाली किस्में – तोतापरी, नीलम, रेड स्माल, वलगेरा आदि |

पौधे लगाने का समय –

आम के पौधे जुलाई व अगस्त माह में लगाना उत्तम रहता है | सिंचाई का उचित प्रबंध होने पर मार्च में भी आम के पौधे लगाए जा सकते हैं | आम के पौधे लगाने के लिए गड्ढे खोदने का काम मई व जून माह में करते हैं |

आम का प्रवर्धन : –

आम के प्रवर्धन की दो विधियाँ हैं –
– बीज द्वारा व
– वानस्पतिक भागों के द्वारा

बीज द्वारा –

इस विधि में आवश्यकता के हिसाब के लंबाई व चौड़ाई वाली क्यारियाँ बना लेते हैं | क्यारियों की ऊंचाई सतह से 15-20 सेंटीमीटर रखते हैं | अब आम के फलों से गुठलियों को अलग करने के बाद,क्यारियों में 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई पर बो देते हैं | दो से तीस सप्ताह बाद बीज उग आते हैं | इन नये पौधों को रोग व कीटों से बचाते हुए 4 – 5 सप्ताह पौधशाला में लगा देते हैं | पौधशाला में लगाने के करीब 18-24 माह में ये पौध लगाने योग्य हो जाते हैं |

वानस्पतिक विधि द्वारा बीज का प्रवर्धन –

बीज से तैयार किये गये पौधों में मातृ वृक्ष के समान वास्तविक गुण नही आ पाते हैं ऐसे में मातृ वृक्ष के समान तैयार पौधे में गुणों की अभिव्यक्ति के लिये वानस्पतिक भागों द्वारा प्रवर्धन किया जाता है |

वानस्पतिक भागों से प्रवर्धन की विधियाँ –

1 – कलम बांधना (grafting)- कलम विधि से वानस्पतिक भागों द्वारा आम का प्रवर्धन चार तरीके से किया जाता है –
1. भेंट कलम द्वारा(inarching)
2. गुठली भेंट द्वारा(stone)
3. मृदु शाख कलम द्वारा(soft wood grafting)
4. विनियर चढ़ाना (veneer grafting)
2- चश्मा  चढ़ाना(budding) – चश्मा चढाने की विधि से वानस्पतिक भागों का प्रवर्धन दो विधियाँ हैं –
1- टी चश्मा चढ़ाना (T – budding)
2- फारकर्ट चश्मा चढ़ाना ( T – forkert budding)
3 गूटी बाँधना (air layering)
4 ठूंठ प्ररोह दाब लगाना (stooling)
आम का वानस्पतिक भागों द्वारा प्रवर्धन अधिकतर विनियर भेंट कलम व भेंट कलम के द्वारा ही किया जाता है |

आम के पौधे का अंतरण –

बीजू पौधे का अंतरण – 15*15 मीटर
वानस्पतिक भागों से संवर्धित पौधे के लिए – 10*10 मीटर
किस्म विशेष के लिए अंतरण –
आम्रपाली – 2.5*2.5 मीटर
बस्ती 5 व दशहरी – 9 *9 मीटर
लंगड़ा व चौसा के लिए – 10*10 मीटर

आम के पौधे लगाना – mango ki kheti

सामान्यत : आम के पौधे जुलाई माह में लगाए जाते हैं | जिन क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो वहां मार्च माह में भी आम के पौधे लगाये जाते हैं | आम लगाने के लिए समतल व उचित जल निकास वाली भूमि की जुताई करना चाहिए | पाटा चलाकर भूमि को समतल कर लेना चाहिए | अब 10 * 10 म्मित्र दूरी पर करीब 1 मीटर अथवा 90 सेंटीमीटर व्यास के गड्ढे बना लें | किसान भाई ध्यान दें गड्ढे की ऊपर की आधी व नीचे की आधी मिटटी अलग-अलग रखें | अब इन गड्ढों में 35-40 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद व 2.5-3.0 किलोग्राम सुपर फास्फेट फंफूदी जनित रोगों से बचाव के लिए 150-200 ग्राम एल्ड्रिन धूल मिलाकर रख 15-20 दिन के लिए छोड़ दें | किसान भाई गड्ढे को भूमि की सतह से 15-20 सेंटीमीटर उठा हुआ गड्ढा भरें | गड्ढे की भराई के बाद उसमें सिंचाई कर दें जिससे मिटटी गड्ढे में अच्छे से बैठ जाए | शाम के समय आम के पौधे को गड्ढे के बीच में लगाकर पौधे को चारों ओर से मिटटी से दबा देते हैं |

वृक्षारोपण –

आम के वृक्ष लगाने से पहले उस स्थान को गहराई से जोतकर समतल कर लेना चाहिए| इसके प्रश्चात् निश्चित दूरी पर उचित प्रकार के गड्ढे बनाकर उनमे गोबर की सड़ी खाद मिला देना चाहिए| यदि आप स्वय पौधे तैयार नही करते है| तो जिस किस्म के पेड़ को लगाना है, उनके पौधें अच्छी व मान्यता प्राप्त पौधशाला से कुछ दिन पहले लाकर रख लेना चाहिए| आम के पेड़ों को लगाने के लिए पूरे देश में वर्षाकाल उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इन दिनों वातावरण में काफी नमी होती है|
अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आम के पेड़ वर्षा के अन्त में तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षाकाल के प्रारम्भ में लगाना चाहिए| जिससे पौधें अच्छी प्रकार स्थापित हो सकें| पेड़ लगाने का सबसे अच्छा समय सायंकाल होता है, क्योंकि दिन की गर्मी में पेड़ मुर्झा जाते हैं| यदि आसमान बादलों से ढका हो तो दिन के समय भी पौधे लगाए जा सकते हैं| आम की खेती या बागवानी को विशेष रूप से दो विधियों से लगाना ठीक रहता है| वर्गाकार और आयताकार, वर्गाकार विधि एक अच्छी रोपण विधि है| इस विधि से पौधे लगाने पर पानी देने व अन्य कार्यों में सरलता रहती है, जैसे-

वर्गाकार विधि- आम की वैज्ञानिक खेती

यह विधि ज्यादातर मुख्य रूप से प्रयोग में लाई जाती है| यह बहुत ही आसान विधि इस विधि द्वारा पौधे लगाने के लिए कतार से कतार व पौधे से पौधे समान दूरी पर निशान लगाकर रेखाएं खींच दी जाती हैं| जिस स्थान पर खड़ी और पड़ी रेखाएं एक दूसरे को काटती हैं, उसी स्थान पर पौधों को लगाया जाता है|

आयताकार विधि- mango ki kheti

यह विधि वर्गाकार विधि के समान ही है| परन्तु इस विधि में पौधे से पौधे कि दूरी, कतार से कतार कि दूरी से कम होती है| चार वृक्ष मिलकर एक आयत का निर्माण करते हैं| इस विधि द्वारा पौधे लगाने पर वृक्षों को फैलने के लिए पर्याप्त स्थान मिल जाता है|

आम के पौधे में खाद व उर्वरक –

आम के पौधे की रोपाई से माह भर पहले तैयार गड्ढे में 45 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद,तथा नाइट्रोजन 225 ग्राम व फोस्फोरस 225 ग्राम तथा एल्ड्रिन 5 % धुल की 100 ग्राम
मात्रा डालनी चाहिए |

पेड़ की उम्र वर्ष KG गोबर की खाद/पेड़ KG नाइट्रोजन KG/पेड़ फास्फोरस KG/पेड़ पोटाश KG/पेड़
1 10 100 75 100
2 20 200 150 200
3 30 300 225 300
4 40 400 300 400
5 50 500 375 500
6 60 600 450 650
7 70 700 525 700
8 80 800 600 800
9 90 900 675 900
10 से अधिक 100 1000 750 1000

आम के पौधें में किसान भाई फास्फोरस की पूरी मात्रा दिसंबर में दें तथा नाइट्रोजन की मात्रा की दो खुराक क्रमश: जनवरी व मार्च माह में दें । किसान आम के फलों की तुड़ाई के बाद नाइट्रोजन की मात्रा जड़ों के पास निराई – गुड़ाई कर दें जिससे फलों की गुणवता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है । आम के पौधों पर बोरान की कमी होने पर महीने में 15 दिन के अंदर पर दो बार बोरेक्स अथवा सुहागा का छिड़काव करें । आम के पौधों पर शीघ्र फूल व फल आयें इसके लिए माह जुलाई व अगस्त में 5 से 10 ग्राम पाली ब्यूट्राजोल की मात्रा किसान भाई हर पौधें में डालें ।
भूमि के एक बड़े हिस्से से पोषण प्राप्त करने की क्षमता के कारण आम के पेड़ को कम उपजाऊ भूमि में भी उगाना सम्भव हैं, परन्तु पोषक तत्वों की आवश्यकता उत्पादकता बढ़ाने, प्रति वर्ष फलत पाने, भूमि की उपजाऊपन को सुरक्षित रखने तथा पौधों को स्वस्थ रखने हेतु आवश्यक है| वृक्षों को खाद की आवश्यकता भूमि की उर्वरता व पौधों की उम्र पर निर्भर करती है| पेड़ों को खाद देने से प्रतिवर्ष अच्छे फलन की सम्भावनायें बढ़ जाती है| आम में पोषक तत्वों का प्रबंधन पौध लगाने के समय से ही शुरू हो जाता हैं|
पौधा लगाते समय यदि खाद का प्रयोग किया गया हो तो लगभग एक वर्ष तक खाद डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती तत्पश्चात प्रति वर्ष 1 वर्ष के पौधों के लिये 10 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद, 100 ग्राम नत्रजन (217 ग्राम यूरिया), 50 ग्राम फास्फोरस (312 ग्राम एस एस पी) और100 ग्राम पोटाश (167 ग्राम एम ओ पी) प्रति पौधा की दर से डालना चाहिए| खाद की यह मात्रा प्रति वर्ष के गुणांक के अनुपात में 10 वर्षों तक बढ़ाते जाना चाहिए इस प्रकार 10 वर्ष के एक वृक्ष को प्रति वर्ष मिलने वाली उर्वरक की मात्रा 1 किलोग्राम नत्रजन (2.17 किलोग्राम यूरिया), 500 ग्राम फास्फोरस (3.12 किलोग्राम एस एस पी) तथा 1 किलोग्राम पोटाश (1.67 किलोग्राम एम ओ पी) होगी साथ ही 250 ग्राम जिंक सल्फेट + 250 ग्राम कापर सल्फेट तथा 125 ग्राम बोरेक्स का सूक्ष्म पोषक तत्व के रूप में प्रति वर्ष देना चाहिए|
फलों में गुणवत्ता की वृद्धि के लिये 3 प्रतिशत पोटैशियम नाइट्रेट का पर्णीय छिड़काव लाभ प्रद होता है| तथा 40 किलोग्राम गोबर की खाद में 250 ग्राम एजोस्परिलियम (जैविक खाद) मिलाकर जुलाई से अगस्त माह में थालों में प्रयोग करने से उत्पादन में वृद्धि होती है|
उर्वरकों का प्रयोग फल तोड़ने के उपरान्त जुलाई माह में एक साथ पर्याप्त नमी की अवस्था में करना चाहिए| उर्वरक डालने के पहले थालों से खरपतवार निकालकर गुड़ाई कर लेनी चाहिए बड़े वृक्षों के तने से 1.5 से 2 मीटर की दूरी पर 25 सेंटीमीटर चौड़ी एवं उतनी ही गहरी नाली बनाकर सभी खादों को नाली में डालकर मिट्टी से ढक देना चाहिए|

आम के पौधों में सिंचाई व जल निकास प्रबन्धन –

आम के पौधों पर सिंचाई जलवायु व भूमि के प्रकार पर निर्भर करती है वैसे आम के बड़े पौधों में कूंड विधि से सिंचाई करनी चाहिए । दिसम्बर-जनवरी में 20-26 के अंतर पर,मार्च से जून के बीच नियमित रूप से 12-से 15 दिन के अंतर पर करनी चाहिए | पौधों की उम्र, मौसम और मृदा के अनुसार पर्याप्त सिंचाई करनी चाहिए| आवश्यकता से अधिक तथा कम पानी देना पौधों के लिये हानिकारक होता है| जब कुछ अन्दर तक मिट्टी सूख जाय और पौधा पानी की आवश्यकता महसूस करने लगे तो उस समय पौधों को सींचना ठीक रहता है| वर्षाकाल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है| नियमित सिंचाई की आवश्यकता गर्मी में अधिक होती है| पौधा लगाने के प्रथम वर्ष में जब पौधे छोटे होते हैं एवं जड़ों का विकास नहीं हुआ रहता उस समय 2 से 3 दिन के अन्तराल पर सिचाई करना चाहिए| 2 से 5 वर्ष के पौधों को 4 से 5 दिन के अन्तराल पर तथा 5 से 8 वर्ष के पौधों को 10 से 15 दिन के अन्तराल पर सींचना चाहिए| वृक्षों के पूर्ण फलन अवस्था में फल लगने के उपरान्त 2 से 3 सिंचाई की आवश्कता पड़ती है| ध्यान रहे कि बौर आने के 2 से 3 माह पहले से बाग की सिंचाई कदापि न करें| आम के वृक्षों की थालों में सिंचाई करनी चाहिए और सिंचाई सुबह एवं सायंकाल करनी चाहिए| प्रारम्भिक अवस्था में अन्तःशस्य के रूप में फसलें ली जाती है । अतः फसलों का चयन सिंचाई की आवश्यकता को ध्यान में रखकर करनी चाहिए|

आम के पौधों में निराई व गुड़ाई –

आम के पौधों के समुचित विकास व वृद्धि के लिए साल में कम से कम दो बार थालों की सफाई व गुड़ाई जुताई करनी चाहिए |निकाई एवं गुड़ाई
आम के बागों में निकाई एवं गुड़ाई इस लिये आवश्यक है, कि पानी के साथ जड़ों को उचित वायु प्राप्त हो, फलस्वरूप जड़ों तथा शाखाओं का विकास अच्छे से हो सके| निकाई एवं गुड़ाई से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे पानी के संचालन पर प्रभाव पड़ता है| इसके अलावां बाग में कीटों का संक्रमण कम हो जाता है और पोषक तत्व पूर्ण रूप से पौधों को प्राप्त होते है| फलत मे आ चुके आम के बागों में वर्ष में तीन जुताई अवश्यक होती है, पहली जुताई बरसात से पहले, दूसरी जुताई वर्षा के बाद, तीसरी जुताई नवम्बर माह में अवश्य करनी चाहिए| वर्षा ऋतु की शुरू की जुताई से पानी के बहाव द्वारा होने वाले हानि से बचाव होता है और भूमि की पानी को रोकने की क्षमता बढ़ जाती है| वर्षा के बाद की जुताई से खरपतवारों के नियंत्रण तथा कैपिलरी के तोड़ने में सहायता मिलती है| तीसरी जुताई जो कि नवम्बर के अन्तिम सप्ताह या दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में होती है, जो कि गुजिया कीट (मिलीबग) के प्रकोप को कम करने में सहायक होती है|

अन्तः फसलें –

आम के बाग में पहले दस वर्षों तक अन्तः फसलों को लगा कर काफी लाभ कमाया जा सकता है| इससे भूमि का भी सदुपयोग होता है| संस्थान में किये गये प्रयोगों में यह पाया गया है, कि आम के बाग में लोबिया-आलू, मिर्च-टमाटर, मूंग-चना, उर्द-चना आदि फसल चक्र उपयोगी होते हैं| लोबिया-आलू फसल चक्र से सर्वाधिक आय की प्राप्ति होती है| इसके अलावा बागों में सब्जियाँ और मूंगफली, तिल, सरसों आदि तिलहनी फसलें भी उगायी जा सकती हैं| गेंदा तथा ग्लेडियोलस फूलों की अन्तः फसलें भी लाभकारी होने के कारण बागवानों द्वारा अपनायी जा रही हैं| आम के थालों में फसल नहीं बोनी चाहिए तथा ज्वार, बाजरा, मक्का, गन्ना, धान जैसी फसलों को अन्तः फसल के रूप में नहीं लगाना चाहिए|

आम के पौधों में कटाई-छटाई व पौधों की पाले से बचाव –

आम के पौधों के छुटपन से कटाई छटाई करना आरम्भ करते हैं ताकि पौधे सुडौल बने | पौधों में बारिश के बाद अक्टूबर व नवंबर में सूखी डालियों की काट छांट किसान भाई करें | जाड़े में पाला तथा गर्मी में तेज धूप से पौधों का बचाव करना अतिआवश्यक होता है| आम में पाले से तुरन्त हानि होती है, शीत ऋतु में छोटे पौधों को (1 से 2 वर्ष) तीन तरफ से टटियों से ढक देना लाभप्रद रहता है तथा दक्षिण एवं पूर्व के कोने में खुला रखते है, जिससे वायु तथा प्रकाश पौधों को मिलता रहे| तेज धूप और लू से बचाव के लिये पौधों के चारो तरफ लकड़ी की खूटी गाड़कर ऊपर घास-फूस का छप्पर रख देना चाहिए| इसके अतिरिक्त थालों का खरपतवार निकालकर हल्की सिंचाई करके थालों में कार्बनिक पदार्थ से मल्चिंग कर देते है| जिससे थाले में बराबर नमी बनी रहती है तथा भूमि का तापमान नियमित रहता है और खरपतवार की समस्या कम हो जाती है तथा धीरे-धीरे कार्बनिक पदार्थ सड़कर खाद का काम करने लगता है|

कॉट-छाट

पौधो की उचित फलत तथा विकास के लिये काट-छांट की क्रिया आवश्यक होती है, प्रारम्भिक अवस्था में पौधों को एक निश्चित आकार देने के उद्देश्य से 1 मीटर की ऊचाई तक कोई शाखा न निकलने दें तथा 1 मीटर की ऊँचाई पर दो या तीन शाखाओं को छोड़कर अन्य शाखाओं को काट देते हैं| इस तरह से पौधे का एक मजबूत तना तैयार हो जाता है| जिससे कर्षण क्रिया करने में सुविधा होती है| फलत आने के बाद वृक्षों में टूटी-फूटी, एक दूसरे पर चढ़ी हुई तथा रोग ग्रस्त शाखाओं को काट कर प्रतिवर्ष निकालते रहना चाहिए|

पौधों में फलन आना –

मान्यत आम के पौधों में कलम लगाने के 5 वर्ष बाद फलं आरम्भ हो जाती है | वहीं बीजू पौधे में 10 से 12 साल में फलन शुरू होती है |

आम के फलों की तुड़ाई –

देश के उत्तरी भाग में आम के फलों की तुड़ाई जून से अगस्त में करते हैं |

फलों की तुड़ाई छटाई –

आम की फसल से परिपक्व फलों की तुड़ाई एक सेंटीमीटर लम्बी डंठल के साथ करनी चाहिए, जिससे फलों पर स्टेम राट बीमारी लगने का खतरा नहीं रहता है| तुड़ाई के समय फलों को चोट व खरोच न लगने दें, तथा मिटटी के सम्पर्क से बचाये| आम के फलो का श्रेणीक्रम उनकी प्रजाति, आकार, भार, रंग व परिपक्ता के आधार पर करना चाहिए| फलों को लंबे समय तक भंडारण करने के लिए 12 से 14 डिग्री सेल्सियस तापमान और 80 से 85 प्रतिशत नमी में वातानुकुलित स्टोर में रख सकते है|

आम के पौधे से उपज –

आम के पौधे 5 – 10 वर्ष की आयु से 50 से 60 साल त फल देते हैं –
आम की उपज – 5 से 10 वर्ष के आयु वाले प्रति पौधों से उपज 50-60 किलोग्राम,
आम की उपज –  10 से 15 वर्ष के आयु वाले प्रति पौधों से उपज 90-100 किलोग्राम
आम की उपज – 15 से 20 वर्ष के आयु वाले प्रति पौधों से उपज 150-200 किलोग्राम
आम के पौधों से प्रति हेक्टेयर 150-200 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उपज मिल जाती है |

आम के फलों की तुड़ाई उपरान्त प्रबंधन –

फलों की तुड़ाई 1 सेंटीमीटर लम्बी डंठल के साथ करनी चाहिये, जिससे फलों पर चेप तथा स्टेम एण्ड रॉट बीमारी नहीं लगे| ऐसे फल पकने पर दाग रहित एवं आकर्षक होते हैं तथा इनकी भण्डारण क्षमता अधिक होती है| तुड़ाई के समय फलों को चोट एवं खरोंच नहीं लगने दें और उन्हें मिट्टी के संपर्क से बचायें| कृषि संस्थानों द्वारा विकसित तुड़ाई यंत्र से प्रति घंटा 600 से 800 फल तोड़े जा सकते हैं| फलों का श्रेणीकरण उनकी प्रजाति, आकार, भार, रंग एवं परिपक्वता के आधार पर करना चाहिए| तुड़ाई के बाद फलों की छायादार स्थान में पेटी बंदी करनी चाहिए| अनेक संस्थानों द्वारा फलों की पैकिंग के लिए 0.5 प्रतिशत छिद्रयुक्त गत्ते के बक्से विकसित किये गये हैं, जो भण्डारण एवं परिवहन के लिए अधिक उपयोगी पाये गये हैं| तुड़ाई उपरान्त होने वाले ऐन्ट्रेक्नोज, स्टेम एंड रॉट एवं ब्लैक रॉट रोगों के प्रबंधन के लिए फलों को 0.05 प्रतिशत प्रोक्लोरेज के गुनगुने (52+-1 डिग्री सेंटीग्रेट) पानी में 5 से 10 मिनट तक डुबाने के बाद सुखा कर पेटीबंदी करनी चाहिए| परिपक्वता अनुसार फलों को 250 से 750 पी पी एम ईथरेल (0.6 से 1.8 मिलीलीटर प्रति लीटर) के गुनगुने पानी (52+-2 डिग्री सेंटीग्रेट) के घोल में 5 मिनट डुबो कर तदुपरान्त पूर्णतः सुखा कर भण्डारित करने पर सभी फल आकर्षक पीला रंग विकसित कर समान रूप से पकते हैं| शीत भण्डारण विधि में आम की विभिन्न प्रजातियों जैसे दशहरी मल्लिका और आम्रपाली को 12 डिग्री सेंटीग्रेट, लंगड़ा को 14 डिग्री सेंटीग्रेट और चौसा को 8 से 10 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान एवं 85 से 90 प्रतिशत आपेक्षित आर्द्रता पर 2 से 3 सप्ताह तक रखा जा सकता है| दशहरी किस्म के फलों को 3 प्रतिशत कैल्सियम क्लोराइड डाईहाइड्रेट के घोल में 500 मिलीमीटर वायुमंडलीय दाब पर पांच मिनट के लिए उपचारित कर कम तापमान (12 डिग्री सेंटीग्रेट) पर 27 दिनों तक भण्डारित किया जा सकता है|

आम की बागवानी में कीट एवं रोकथाम –

भुनगा-

यह आम को सबसे अधिक हानि पहुँचाता है, इसको फुदका तथा लस्सी कीट के नाम से भी जाना जाता है| इसके बच्चे और वयस्क दोनो ही मुलायम प्ररोहो तथा फूलों का रस चूसते है| इसका प्रकोप फरवरी से मार्च तथा जून से अगस्त में अधिक होता है| यह एक प्रकार का मीठा रस विसर्जित करता है, इस पर काली फफूंदी (सूटीमोल्ड) आती है|

रोकथाम- इसके रोकथाम के लिये फफूंदीनाशक के छिड़काव के साथ ही कीटनाशक जैसे एमिडाक्लोप्रिड की 0.5 मिलीलीटर या मिथाइल-ओ-डेमेटान की 1 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए|

गुजिया-

यह भी आम के बागों को हानि पहुचाने वाला प्रमुख कीट है| जिसके नवजात तथा मादा फूलों और पत्तियों का रस चूसते है| इसका अधिक प्रकोप होने पर पेड़ों के प्ररोह पत्तियां और फल सूखने लगते है तथा फल भी नहीं बनते| यह कीट भी मधु द्रब्य विसर्जित करता है| यह कीट दिसम्बर से मई तक पाया जाता है|

रोकथाम- इसकी रोकथाम के लिये नवम्बर से दिसम्बर माह में 25 सेंटीमीटर चौड़ी 400 गेज की पालीथीन की पट्टी को तने के चारो ओर लपेट कर ऊपर व नीचे सुतली से बांध दिया जाता है और पट्टी के निचले भाग में ग्रीस लगा दिया जाता है| इससे कीट पौधों पर नहीं चढ़ पाते है| यदि कीट पेड़ पर चढ़ गया हो तो मोनोक्रोटोफास या डाइमेथोयट 1 मिलीलीटर दवा प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए|

तना छाल खाने वाले कीट-

इस कीट की सूड़िया तने मे नीचे से ऊपर की ओर छेद करती है| जिसके फलस्वरूप तने और मोटी शाखायें सूख जाती है| यह कीट आम के अलावा अन्य फल वृक्षो को भी नुकसान पहुंचाते है| इसका प्रकोप जुलाई से अगस्त माह में सबसे अधिक होता है|

रोकथाम- इसकी रोकथाम के लिए ग्रसित भाग को साफ करके उसके छिद्र में डाईक्लोरावास (डी डी वी पी) को इन्जेक्शन में भरकर डाल दें और छिद्र को मिट्टी के लेप से अच्छी तरह बन्द कर दें|

आम के बाग लगने वाले रोग एवं रोकथाम –

एन्थैक्नोज-

यह रोग 24 से 32 डिग्री सेलसियस तापक्रम, वर्षा व अधिक नमी से होता है| इसका प्रकोप नई पत्तियों व बौर पर पड़ता रोग लगने पर बौर पर धब्बे पड़कर सूख जाते हैं और अन्त में बौर गिर जाते है|

रोकथाम- इसकी रोकथाम के लिये फूल खिलने के पूर्व कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम या कापर आक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यू पी का 3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोलकर 15 दिन के अन्तराल पर दो बार करें|

डाईबैक-

यह रोग बलुई मिट्टी में लगे बाग में ज्यादा लगता है| इसमें पौधा ऊपर से सूखने लगता है| यह रोग बरसात के बाद अक्टूबर से नवम्बर माह में ज्यादा दिखता है|

रोकथाम- इसकी रोकथाम के लिये रोगग्रस्त टहनियों को काटकर हटा दें तत्पश्चात कापर आक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यू पी का 3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोलकर बनाकर छिड़काव करें साथ ही यही मात्र के घोल का 20 लीटर प्रति थाले की दर से डेन्चिंग करें|

पाउडरी मिल्ड्यू-

यह एक भयानक रोग है इसे खर्रा के नाम से भी जाना जाता है| इसका प्रकोप फरवरी से मार्च में या बढ़ते हुए तापक्रम तथा आद्रता के फलस्वरूप होता है|

रोकथाम- इसकी रोकथाम के लिये एक मौसम में कुल तीन छिड़काव करने चाहिए| पहला छिड़काव बौर निकलने के बाद परन्तु पुष्प खिलने के पहले सल्फर 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करे| दूसरा छिड़काव 10 से 15 दिन बाद जब फल सरसों के दाने के बराबर हो जाये, ट्राइडेमार्फ 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करे| तीसरा छिड़काव 10 से 15 दिन बाद या फल मटर के बराबर हो जाये, डाइनोकैप नामक दवा 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करे|

गुम्मा-

इस विकार से फूलों के स्थान पर बड़े-बड़े गुच्छे बन जाते है| ग्रसित पुष्प स्वस्थ पुष्पों की अपेक्षा अधिक मोटे तथा नर पुष्पों की अधिकता होती है| इनमें फल नहीं लगता हैं, यदि इन्हें काटा न जाये तो वर्ष भर पेड़ में लगे रहते हैं| यह दो प्रकार का होता है, पहला वानस्पतिक मालफारमेशन दूसरा फ्लोरल मालफारमेशन|

रोकथाम- इसकी रोकथाम के लिये पहले आये हुए बौरों को दिसम्बर से जनवरी में तोड़ दें| जहॉ प्रति वर्ष यह रोग आ रहा हो उस बाग में अक्टूबर के दूसरे सप्ताह मे 0.2 मिलीलीटर नैथलीन एसिटिक एसिड (एन ए ए) प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करे|

कोयलिया विकार-

यह विकार ईट के भट्टों से निकलने वाली गैस जैसे सल्फर डाईआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड और एथलीन के कारण होता है| इसमें सर्व प्रथम फल का निचला हिस्सा धीरे-धीरे काला हो जाता है|

रोकथाम- इसके रोकथाम के लिये फल क्षेत्रों में भट्टे न लगाये जाये, इसके अलावा जब फल मटर के दाने के बराबर हो जाय तो 6 से 8 ग्राम बोरेक्स प्रति लीटर पानी की दर से 10 से 15 दिन के अन्तराल पर दो छिड़काव करें|

गमोसिस-

यह विकार सूक्ष्म पोषक तत्वों जिंक, ताबां, बोरान तथा कैल्श्यिम की कमी से होता है| ग्रसित वृक्ष की टहनी की छाल मे हल्की दरारे बनकर उनमें से गोंद निकलने लगता है| प्रकोप अधिक होने पर पौधे सूख जाते हैं तथा सम्पूर्ण बाग बेजान सा दिखाई पड़ता है|

रोकथाम- इसकी रोकथाम के लिये पूर्ण विकसित पौधे को सितम्बर से अक्टूबर माह में 250 ग्राम जिंक, 250 ग्राम कापर सल्फेट, 125 ग्राम बोरेक्स तथा 100 ग्राम बुझे चूने का मिश्रण थालों में मिलाकर सिंचाई करनी चाहिए|

रोकथाम हेतु सावधानियाँ –

1. सिन्थेटिक पाइथाइड दवाओं जैसे साइपरमेथिन, डेल्टामेथ्रिन, फेनवेलरेट आदि को भुनगे की रोकथाम हेतु प्रयोग न करें, क्योंकि इससे परागण कीट एवं अन्य लाभकारी कीट नष्ट हो जाते हैं और भुनगे में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है|
2. बागों में परागण करने वाले कीटों का संरक्षण करें और मधु मक्खियों की कालोनी रखें|
3. यदि फूल खिल गये हो तो छिड़काव न करें|
4. भुनगा तथा पाउडरी मिल्ड्यू के नियंत्रण के लिए तीनों छिड़काव में फफूंद नाशक एवं कीटनाशक दवाओं को मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं|
5. कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को अन्य दवाओं के साथ न मिलायें|
6. प्रत्येक छिड़काव के लिए दवा बदल कर घोल बनाये, जिससे कीटों में दवा की प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो|
7. दवा के घोल में तरल साबुन (टीपॉल) अवश्य मिलायें|
8. दवा का छिड़काव फब्बारे के रूप में करें तथा सही सान्द्रता का प्रयोग करें|
9. अच्छी गुणवत्ता वाले कीट या फफूंदनाशक का प्रयोग करें|

बागों का जीर्णोद्धार –

पुराने, घने तथा आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी वृक्षों की सभी अवांछित शाखाओं को पहले चिह्नित कर लेना चाहिये| दिसंबर माह में चिह्नित शाखाओं को भूमि की सतह से लगभग 4.0 मीटर की ऊँचाई से छतरीनुमा आकार में काट देना चाहिये| कटाई सावधानीपूर्वक करनी चाहिए| पहले शाखा को निचली तरफ से तथा फिर ऊपर से काटना चाहिए जिससे शाखा फटे नहीं| काटने के बाद कटे भाग पर फफूंदनाशक दवा (कॉपर ऑक्सीक्लोराइड) को पानी एवं अण्डी के तेल में लेप बना कर लगायें|
मार्च से अप्रैल में इन वृक्षों में खाद, पानी एवं कीट-व्याधियों का सामायिक प्रबंधन तथा नये प्ररोहों का विरलीकरण करते हैं| एक तना पर 4 से 6 शाखाओं को ही बढ़ने देना चाहिए| एन्छेक्नोज के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3.0 ग्राम प्रति लीटर) पानी में एवं पत्ती काटने वाले कीट के लिये कार्बरिल (3.0 ग्राम प्रति लीटर) या मोनोक्रोटोफॉस (1.25 मिलीलीटर प्रति लीटर) पानी में घोलकर छिड़काव करें|
तना छेदक कीट के लिए 0.5 प्रतिशत डी डी वी पी के घोल में रूई भिगो कर छिद्रों में डालना प्रभावी होता है| नयी शाखाओं में कृन्तन के दो वर्षों के पश्चात पुष्पन एवं फलन आरम्भ हो जाता है|इस प्रकार आम के पुराने एवं अनुत्पादक बाग पुनः लाभकारी हो जाते हैं|
साथियों आम की खेती के बारे में यह आलेख अवश्य पसंद आया होगा। इस लेख में आम की खेती pdf, आम लगाने की विधि,आम की बागवानी कैसे करें,आम की जैविक खेती,आम के पेड़ में दीमक,आम की उन्नत किस्में, आम का पेड़ लगाने की विधि, आम के पेड़ में खाद, आम का पौधा लगाने की विधि सभी क्वेरीज के बारे में विस्तृत जानकारी मिल गयी होगी।

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  1. […] भी पढ़ें – आम की खेती वैज्ञानिक विधि से कैसे करें… उनमें पकने पर महत्वपूर्ण […]

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