मिर्च की खेती : हरी मिर्च की उन्नतशील खेती

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भारत देश मे मिर्च एक नकदी फसल है। इसकी व्यवसायिक खेती करके अधिक लाभ कमाया जा सकता है। यह हमारे भोजन का प्रमुख अंग है। स्वास्थ्य की दृष्टि से मिर्च में विटामिन ए व सी पाये जाते हैं एवं कुछ लवण भी होते हैं। मिर्च को अचार, मसालों और सब्जी के रुप में भी काम में लिया जाता है। भारत में लगभग 7,92000 हेक्टेयर में इसकी खेती की जाती है, जिससे 12, 23000 टन मिर्च (Chilli) का उत्पादन होता है|

मिर्च कैप्सिकम एनम कुल-सोलेनेसी) एक गर्म मौसम का मसाला है जिसके आभाव में कोई सब्जी कितनी ही मेहनत से तैयार किया गयी हो, फीकी होती है। इसका उपयोग ताजे, सूखे एवं पाउडर-तीनों रूप में किया जाता है। इसमें विटामिन ए व सी पाया जाता है।

मिर्च की खेती – हरी मिर्च की उन्नतशील खेती करने का सबसे आसान तरीका – Green chilli farming in hindi- Capsicum farming in india, Advanced cultivation of Green chillies in hindi,

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यह मुख्य रूप से तीन तरह का होता है- मसालों वाली साधारण, आचार वाली व शिमला मिर्च। इसकी कुछ प्रजातियाँ काफी तिक्त व कुछ कम अथवा नहीं के बराबर होती है। इसकी तिक्ता एक रसायन- कैप्सेसीन के कारण होती है जिसका उपयोग औषधि निर्माण के क्षेत्र में भी होता है। इसका चमकीला लाल रंग ‘केप्सैथीन’ नाम रसायन के कारण होता है। इसमें विटामिन ए, सी फॉस्फोरस, कैल्शियम समेत कई कुछ लवण पाये जाते है. भारतीय घरों में मिर्च को अचार, मसालों और सब्जी की तरह उपयोग किया जाता है ।

मिर्च की खेती के लिए जलवायु

हरी मिर्च की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु अपयुक्त रहती है । वैसे इसकी खेती हर तरह की जलवायु में हो सकती है । तो वहीं इसके लिए ज्यादा ठंड व गर्मी दोनों ही हानिकारक होते है। इसके पौधे को करीब 100 सेन्टीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाया जा सकता है. इसके अलावा हरी मिर्च की फसल पर पाले का प्रकोप अधिक होता है । मिर्च गर्म मौसम की सब्जी है। इसकी सफल खेती वैसे क्षेत्रों की जा सकती है जहाँ वार्षिक बारिश 60-150 सेंटीमीटर होती हो। ज्यादा बारिश इसे नुकसान पहुंचाती है। तापक्रम समान्य से ज्यादा एवं कम-दोनों अवस्था में इसके उपज को कम करता है। फूल आने एक समय गर्म एवं सुखी हवा फूल-फल को गिरा कर उपज कम करती है। अच्छी वृद्धि तथा उपज के लिए उष्णीय और उप उष्णीय जलवायु की आवश्यकता होती है। अधिकांश किस्मिन के लिए 70 से. तापमान अनुकूल होता है। प्रतिकूल तापमान तथा जल की कमी से कलियाँ, पुष्प एवं फल गिर जाते हैं।

उपयुक्त मिट्टी (Suitable soil selection) व मिट्टी की तैयारी (soil preparation

हरी मिर्च की फसल को सभी प्रकार की भूमि पर उगाया जा सकता है । इसकी खेती के लिए भाइयो जमीन का पी.एच. मान 5.5 से 7 के बीच होना चाहिए। ध्यान रहे कि खेत में अच्छे जल-निकास हो सके । जलभराव की स्थिति में इसके पौधे में कई तरह के विषाणु और किट जनित रोग लग जाते हैं । साथ ही जीवांशयुक्त दोमट या बलुई मिटटी उपुयक्त होती है, जिसमें कार्बनिक पदार्थ की मात्रा अधिक हो । 4-5 गहरी जुताई और हर बार जुताई के उपरान्त पट्टा देकर खेत को अच्छी तरह तैयार कर लें। इसी समय अच्छी तरह सड़े गोबर की खाद 10 टन प्रति एकड़ के हिसाब से यवहार करें। खाद यदि अच्छी तरह सड़ा न होगा तो दीमक लगने का भय रहेगा।ध्यान रखें कि जुताई करते वक्त गोबर की अच्छी पकी हुई खाद करीब 300 से 400 क्विंटल मिला देनी चाहिए । इसके बाद उचित आकार के क्यारियाँ बना लेते हैं ।

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मिर्च की मुख्य किस्में –

किसान भाईयों को अपने क्षेत्र की अधिकतम पैदावार वाली किस्म का चयन करना चाहिए । ध्यान रहे कि किस्मों में विकार रोधी क्षमता होनी चाहिए । हरी मिर्च की उन्नत फसल तभी संभव है. जब खेत में उचित प्रबंधन, अनुकूल जल व मिटटी होगी ।
मिर्च – एन. पी, 46 ए, पूसा ज्वाला, पूसा सदाबहार।
शिमला मिर्च- पूसा दीप्ती, अर्का मोहिनी, अर्का गौरव, अर्का बसंत।
आचार मिर्च- सिंधुर ।
कैप्सेसीन उत्पादन हेतु- अपर्ना, पचास यलो।
पूसा ज्वाला, पंत सी-1, पूसा सदाबहार, जी-4, आजाद मिर्च-1, चंचल, कल्याणपुर चमन आदि है।
संकर प्रजातियां – तेजस्विनी, अग्नि, चैंपियन, ज्योति एवं सूर्या आदि।

पूसा ज्वाला :

इसके फल लंबे एवं तीखे तथा फसल शीघ्र तैयार होने वाली है। प्रति हैक्टर 15 से 20 क्विंटल मिर्च (सूखी) प्राप्त होती है।

कल्याणपुर चमन –

यह संकर किस्म है। इसकी फलियाँ लाला लंबी और तीखी होती है। इसकी पैदावार एक हैक्टेयर में 25 से 30 क्विंटल (सूखी) होती है।

कल्याणपुर चमत्कार –

यह संकर किस्म है। इसके फल लाल और तीखे होती हैं।

कल्याणपुर -1 –

यह किस्म 215 दिन में तैयार हो जाती है तथा 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है।
कल्याणपुर – 2 – यह किस्म 210 दिन में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 15 क्विंटल है।

सिंदूर –

यह कसिम 180 दिन में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टर 13.50 क्विंटल है।

आन्ध्र ज्योति –

यह किस्म पूरे भारत में उगाई जाती है। इस किस्म का उपज क्षमता प्रति हैक्टेयर 18 क्विंटल है।

भाग्य लक्ष्मी –

यह किस्म सिंचित एवं असिंचित दोनों क्षेत्रों में उगायी जाती है। असिंचित क्षेत्र में 10-15 क्विंटल एवं सिंचित क्षेत्रों में 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है। जे – 218 यह संकर किस्म है। इसकी उपज 15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है। जे

218 –

यह / संकर किस्म है। इसकी उपज 15 क्विंटल/हे. (शुष्क फल) प्राप्त हो जाती है।

पंजाब लाल –

यह एक बहुवार्षीय किस्म है। यह मोजैक वायरस, कूकर्वित मोजैक वायरस के लिए प्रतिरोधी है इसकी उपज क्षमता 47 क्विंटल/हे. है। पूसा सदाबहार – यह एक बारह मासी किस्म है जिनमें एक गुच्छे में 6-22 फल लगते हैं इसमें साल में 2 से 3 फलन होता है उपज 150 से 200 दिन में तैयार होती है। उपज 35 क्विंटल/हे.।

अन्य मुख्य किस्में –

सूर्य रेखा, जवाहर मिर्च- 218, एन.पी. – 46, ए. एम. डी. यू. -1. पंत सी. – 1, पंत सी. – 2, जे.सी.ए. – 154 (आचार के लिए) किरण एवं अपर्णा।

मिर्च की बुआई का तरीका

बीजों के पहले नर्सरी में बोते हैं। शीतकालीन मौसम के लिए जून- जुलाई एवं ग्रीष्म मौसम के लिए दिसंबर एवं जनवरी में नर्सरी में बीज की बुआई करते हैं। नर्सरी की क्यारियों की तैयारी करके बीज को एक इंच की दूरी पर पंक्तियों में बोकर मिट्टी और खाद से ढंक देते हैं। फिर पूरी क्यारियां को खरपतवार से ढँक देना चाहिए। बीज को जमने के तुरंत बाद सायंकाल में खरपतवार को हटा देते हैं । बीज को एग्रोसन जी.एन. या थीरम या कैप्टान 2 ग्राम रसायन (दवा) प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बुआई करना चाहिए।

बीज की मात्रा

एक हेक्टर मिर्च के खेती के लिए 1.25 से 1.50 कि. ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है।

मिर्च की खेती का समय –

फरवरी- जुलाई तक।

मिर्च की पौध तैयार करना-

इसके बीजों की रोपाई के लिए एक मीटर चौड़ी और 5 मीटर लम्बाई की समतल से उठी हुई क्यारी तैयार करते हैं. इन क्यारियों में 25 किलो पुरानी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद को डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. उसके बाद भाइयो इसके बीजों की रोपाई पंक्ति में की जाती है. इसके लिए क्यारी में चार से पांच सेंटीमीटर की दूरी छोड़ते हुए हलकी नाली बना लेते हैं. इन नालियों में बीज डालकर उन पर हल्की मिट्टी डालकर ढक देते हैं. उसके बाद भाइयो क्यारियों की पवारे की सहायता से सिंचाई करते हैं। सिंचाई करने के बाद क्यारियों को पुलाव या सूखी हुई घास से ढक देते है. भाइयो पुलाव से ढकने से बीजों का अंकुरण अच्छे से होता है. जब इसके बीज अंकुरित हो जाएँ तब पुलाव को हटा देते हैं. भाइयो नर्सरी में इसके बीज की रोपाई पौध लगाने के टाइम से लगभग एक से डेढ़ महीने पहले करनी चाहिए. जिससे पौध समय पर तैयार हो जाती है।

मिर्च की रोपाई का तरीका

पौधे 25 से 35 दिन बाद रोपने योग्य हो जाते हैं। 60 से.मी, 45 से.मी. xX 45 से.मी. एवं 45 X 30 से. मी. की दूरी पर क्रमश: शीतकालीन एवं ग्रीष्मकालीन मौसम में रोपना चाहिए। इसकी पौध को ढाई फिट की की दूरी पर उगाया जाता है । पौधे को फैलने के लिए आसानी से पूरी जगह मिल सके इसकी रोपाई करते समय मेड से मेड की दूरी तीन फिट और पौधे से पौधे की दूरी डेढ़ फिट रखी जाती है । पौधों की रोपाई करते वक्त पौधों की जड़ों को तीन से चार सेंटीमीटर नीचे जमीन में गाड़ना चाहिए. इसके पौधों की रोपाई कभी भी तेज़ धूप में नही करनी चाहिए । अक्टूबर और मध्य नवम्बर का महीना सबसे उपयुक्त होता है।

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खाद एवं उर्वरक

250 – 300 क्विंटल/हे. गोबर या कम्पोस्ट, 100-110 किग्रा. नाइट्रोजन, 50 किग्रा. फास्फोरस एवं 60 किग्रा./हे. पोटाश की आवश्यकता होती है। कंपोस्ट, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपाई के पहले खेत की तैयारी के समय तथा शेष नाइट्रोजन को दो बार में क्रमश: रोपाई के 40-50 एवं 80-120 दिन बाद देनी चाहिए।

सिंचाई एवं अन्य क्रियाएँ

शीतकालीन मौसम के मिर्च के खेती में सिंचाई की आवश्यकता कम होती है। सिंचाई की आवश्यकता पड़ने पर दो – तिहाई सिंचाई दिसंबर से फरवरी तक करनी पड़ती है। ग्रीष्म कालीन मौसम की खेती में 10 से 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। मिर्च की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए खेत को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए।

उर्वरक की मात्रा-

इसके लिए पौधे की रोपाई से पहले 25 से 30 गाड़ी गोबर की पुरानी खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. गोबर की खाद की जगह कम्पोस्ट खाद का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में नाइट्रोजन 135 किलो, फास्फोरस 65 किलो और पोटाश 75 किलो की मात्रा को आपस में मिलाकर खेत की आखिरी जुताई के वक्त खेत में छिड़क दें।

खरपतवार नियंत्रण-

मिर्च की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक दोनों तरीके से की जाती है आक्सीफ्लोरफेन का पौधे की रोपाई से पहले खेत में छिडकाव करना चाहिए. जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए पौधों की कम से कम तीन बार नीलाई गुड़ाई कर देनी चाहिए।

फल तोड़ाई (Fruit harvesting)

हरी मिर्च के लिए तोड़ाई फल लगने के करीब 15 से 20 दिनों बाद कर सकते हैं. पहली और दूसरी तोड़ाई में करीब 12 से 15 दिनों का अंतर रख सकते है. फल की तोड़ाई अच्छी तरह से तैयार होने पर ही करनी चाहिए ।

कटाई

शाक या सलाद के लिए प्रयोग की जानेवाली मिर्च को हरी अवस्था में ही पूर्ण विकसित हो जाने पर तोड़ लेते हैं। शुष्क मसालों के रूप में प्रयोग की जाने वाली मिर्चों को पूर्णत: परिपक्व हो जाने पर तोड़ते हैं।

पैदावार (Yield)

अगर वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए, तो इसकी पैदावार तकरीबन 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी लाल मिर्च प्राप्त की जा सकती है.

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