सरसों एवं राई की खेती की जानकारी

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शीत ऋतु की तिलहनी फसलों मे राई – सरसों का एक प्रमुख स्थान है। सरसों के हरे पौधे से लेकर सूखे तने, शाखायें और बीज आदि सभी भाग उपयोग में आते है। सरसों की कोमल पत्तियाँ तथा कोमल शाखायें सब्जी के रूप में (सरसों का साग) प्रयोग की जाती है। सरसों का साग और मक्के दी रोटी उत्तर भारत में चाव से खाई जाती है । सरसों राई के बीज में 37 – 49 प्रतिशत तेल पाया जाता है। राई – सरसों के तेल में पाये जाने वाले असंतृप्त वसा अम्ल लिनोलिक एवं लिनालेनिक अम्ल अत्यावश्यक वसा अम्ल है। राई – सरसों का तेल खाने, सब्जी पकाने, शरीर तथा सिर मे लगाने के अलावा वनस्पति घी बनाने में भी लाया जाता है। अचार बनाने, सब्जियाँ बनाने व दाल में तड़का लगानें मे सरसों के तेल का प्रयोग बखूबी से किया जाता है। सरसो और तोरिया के तेल का उपयोग साबुन, रबर तथा प्लास्टिक आदि के निर्माण में किया जाता है । इस्पात उद्योग में इस्पात प्लेटों में शीघ्र शीतलन और चमड़े को मुलायम करने में भी तेल का प्रयोग किया जाता ह। सरसों की खली के लगभग 25 – 30 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन, 5 प्रतिशत नाईट्रोजन, 1.8 – 2.0 प्रतिशत फाॅस्फोरस तथा 1 – 1.2 प्रतिशत पोटेशियम पाया जाता है। इसका प्रयोग पशुओ को खिलाने तथा खाद के रूप मे किया जाता है। सरसों – राई को भूमि संरक्षक फसल के रूप में भी उगाया जाता है। सरसों के हरे पौधे, सूखी पत्तियों को जानवरो को चारे के रूप मे खिलाया जाता है।

सरसों एवं राई की खेती की जानकारी | Mustard Cultivation Information

सरसों एवं राई की खेती की जानकारी | Mustard Cultivation Information
सरसों एवं राई की खेती की जानकारी | Mustard Cultivation Information

कहाँ कहाँ होती है राई – सरसों की खेती – where to Mustard Cultivation in india

भारत में उगाई जाने वाली तिलहनी फसलों मे सरसों – राई का मूँगफली के बाद दूसरा स्थान है जो कि कुल तिलहन उत्पादन का 22.9 प्रतिशत है तथा तिलहनी फसलो के कुल क्षेत्रफल का 24.7 प्रतिशत क्षेत्रफल राई – सरसों के अन्तर्गत आता है। भारत मे राई – सरसों वर्ग के अन्तर्गत तोरिया, भूरी सरसों, तारामिरा, करन राई तथा काली सरसों का उत्पादन किया जाता है परन्तु राई – सरसों वर्ग की फसलों के कुल क्षेत्रफल का 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा भूरी सरसों (राई या लाहा) के अन्तर्गत आता है, जिसका अधिकांश क्षेत्रफल राजस्थान, उ. प्र., पंजाब, हरियाणा, म. प्र., बिहार, पं. बंगाल, गुजरात तथा असम में है। राई-सरसों के अन्तर्गत सर्वाधिक क्षेत्रफल वाले प्रथम तीन राज्यों में राजस्थान,उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश जबकि उत्पादन में राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं हरियाना अग्रणीय राज्य है । इन फसलों की औसत उपज में पहले स्थान पर हरियाणा (1738 किग्रा. प्रति हैक्टर), दूसरे पर राजस्थान(1234 किग्रा.) एवं तीसरे स्थान पर गुजरात (1136 किग्रा.) कायम रहे । मध्य प्रदेश में सरसों – राई की खेती 0.71 मिलियन हेक्टेयर मे की गई जिससे 074 मिलियन टन उत्पादन दर्ज किया गया तथा औसत उपज 1034 किग्रा. प्रति हेक्टेयर रही है। छत्तीसगढ़ में राई-सरसो की खेती 160.03 हजार हैक्टर में की गई जिससे 525 किग्रा. अ©सत उपज प्राप्त हुई (वर्ष 2009-10)। प्रदेश के प्रमुख राई-सरसो उगाने वाल्¨ जिलो में सरगुजा, जगदलपुर, कोरिया, जशपुर, कांकेर, जांजगीर, धमतरी एवं दंतेबाड़ा जिले आते है । सरसों की खेती प्रदेश में अगेती फसल के रूप में की जाती है। आदिवासी अंचल में सरसों की फसल बाड़ी में मक्का फसल लेने के बाद की जाती है। सिंचित दशा में धान के बाद भी सरसों की फसल ली जा रही है। जाडे की अवधि कम होने तथा सिंचाई के पर्याप्त साधन न होने के कारण प्रदेश मे सरसों की औसत उपज कम ही आती है। इन फसलों की खेती शुद्ध एवं मिश्रित फसल के रूप मे होती है।
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उपयुक्त जलवायु –

राई तथा सरसों रबी मौसम की फसल है जिसे शुष्क एवं ठण्डी जलवायु तथा चटक धूप की आवश्यकता होती है। इसकी खेती 30 से 40 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र में सफलतापूर्वक की जा सकती है। बीज अंकुरण बुआई के समय वातावरण का तापमान तथा फसल बढ़वार के लिए तापक्रम आदर्श माना गया है। वातावरण का तापक्रम से कम या 35 -40 डि सेग़्रे से अधिक होने पर फसल वृद्धि रूक जाती है। बीज में तेल की अधिकतम मात्रा के लिए 10-15 डि सेग़्रे तापक्रम उपयुक्त रहता है। पौधों में फूल आने और बीज पड़ने के समय बादल और कोहरे से भरा मौसम हानिकारक होता है क्योंकि ऐसे मौसम में कीट और रोगों का प्रकोप की अधिक सम्भावना होती है। पौध वृद्धि व विकास के लिए कम से कम 10 घंटे की धूप आवश्यक है।

भूमि का चयन एवं खेत की तैयारी –

सभी प्रकार के सरसों के लिए दोमट जलोढ़ भूमि सर्वोत्तम है। वैसे तो उत्तम जल निकास एवं भू-प्रबन्ध के साथ सरसों एवं राई सभी प्रकार की जमीन में उगाई जा सकती है। परन्तु बुलई दोमट और दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त हैं। उदासीन से हल्की क्षारीय भूमि (पीएच मान 7-8) इन फसलों की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है। शुद्ध फसल के लिये प्रायः एक जुताई मिट्टी पलट हल से करनी चाहिए तथा 3 – 4 जुताइयाँ देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए। पाटा चलाकर खेत की मिट्टी को महीन, भुरभुरी तथा समतल कर लेते हैं। इससे जमीन में आर्द्रता अधिक लम्बे समय तक के लिये संचित रहती है, जो कि सरसों व राई के उत्तम अंकुरण एवं पौध बढ़वार के लिये आवश्यक है। मिश्रित रूप में बोई जाने वाली सरसों के खेत की तैयारी प्रधान फसल की आवश्यकतानुसार ही की जाती है।

राई-सरसों की खेती के लिए प्रमुख उन्नत क़िस्मों का चुनाव –

प्रयोगों से सिद्ध हो चुका है कि अकेले उन्नत किस्मों के प्रयोग से पुरानी प्रचलित किस्मों की अपेक्षा 20-25 प्रतिशत अधिक उपज ली जा सकती है। छत्तीसगढ़ के लिए उपयुक्त उन्नत किस्मो में छत्तीसगढ़ सरसों, वरदान, रोहिनी, एनडीटी-8501, कृष्ना, जवाहर-1(जेएमडब्लूआर 93-39), माया, स्वर्ना, ज्योति, वशुंधरा, जवाहर मस्टर्ड, झुमका । भूरी सरसों में पूसा कल्यानी

टाइप-151-

यह किस्म यह किस्म पीली सरसों सिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 46% तेल होता है। 120 – 125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 14 – 15 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

क्रांति –

पीली सरसों की यह किस्म सिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 46% तेल होता है। 125 – 135 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 25 – 28 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

वरदान –

यह किस्म देर बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 46% तेल होता है। 120 – 125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 13 – 18 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

वैभव –

यह किस्म देर बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल की मात्रा 38 प्रतिशत होता है। 120 – 125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 13 – 18 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

कृष्णा –

किस्म सिंचित क्षेत्र में बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल की मात्रा 40 प्रतिशत होता है। 125 – 130 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 25 – 30 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

आरएलएम-

यह किस्म असिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 46% तेल होता है। 150 – 155 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 15 – 20 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

आरएलएम-198 –

यह किस्म असिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल दर 38% तेल होता है। 152 – 166 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 17 – 18 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

वरूणा (टी-59) –

सरसों की यह बड़े दाने वाली किस्म है। इसमें तेल दर 42% तेल होता है। 125 – 130 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 20- 25 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

पूसा बोल्ड –

सरसों की यह बड़े दाने वाली किस्म है। इसमें तेल दर 40% तेल होता है। 130 – 140 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 18 – 26 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

वसुन्धरा –

इस किस्म में तेल दर 38-40 फीसदी होता है। 130 – 135 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 20 – 21 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

जेएम-1 –

काला कत्थई बीज वाली यह किस्म सिंचित क्षेत्र में बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल की मात्रा 40 प्रतिशत होता है। 120 – 128 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 20 – 21 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

जेएम-2 –

काला कत्थई गोल बीज वाली यह किस्म सिंचित क्षेत्र में बोने हेतु उपयुक्त है। इसमें तेल की मात्रा 40 प्रतिशत होता है। 135 – 138 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 15 – 20 कुंतल प्रति है0 की दर से उपज मिलती है।

छत्तीसगढ़ सरसों-

इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय द्वारा विकसित यह किस्म 99 – 115 दिन में पक कर तैयार होती है। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ की सिंचित व अर्द्ध सिंचित परिस्थितियों के लिए उपयुक्त किस्म है। इसके दाने कत्थई रंग व मध्यम आकर के होते हैं। उपज क्षमता औसतन 11.80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसमें सफेद किट्ट (रस्ट), चूर्णिल आसिता आल्टरनेरिया झुलसा रोग तथा एफिड कीट का प्रकोप कम होता है।

सरसों की खेती के लिए बोआई उचित समय पर करें –

राई – सरसों की शुद्ध फसल खरीफ में खेत पड़ती छोड़ने के बाद या खरीफ में ज्वार, बाजरा लेने के पश्चात् बोई जाती है। सरसों मुख्यतः गेहूँ, जौ, चना, मसूर व शरदकालीन गन्ना के साथ मिलाकर बोयी जाती है। आलू व सरसों की सह फसली खेती 3:1 अनुपात में की जाती है । शरदकालीन गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य एक पंक्ति सरसो की बोई जा सकती है। गेहूँ और सरसों (9: 1), चना और सरसों (3: 1), तथा तोरिया और मसूर (1: 1) की अन्तः फसली खेती भी लाभप्रद पाई गई है।

समय पर बुआई करना खेती में सफलता की प्रथम सीढ़ी है। सरसों की बुआई का समय मुख्यतः तापक्रम पर निर्भर करता है। बुआई के समय वातावरण का तापमान 26 – 30 डि.से. होना आवश्यक है। सरसों और राई की बुआई अक्टूबर के प्रथम पखवारे में करना चाहिए। अधिक तापमान होने की दशा में बुआई में देरी कर देनी चाहिए। तोरिया की बोनी सितम्बर के दूसरे पखवारे में करना चाहिए। तोरिया की बुआई देरी से करने पर फसल पर एफिड कीट का प्रकोप अधिक होता है।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार –

अच्छी उपज लेने के लिए यह आवश्यक है कि प्रति हेक्टेयर खेत में उचित पौध संख्या स्थापित हो। सरसों की शुद्ध फसल हेतु 5 – 6 किलो प्रति हेक्टेयर तथा मिश्रित फसल उगाने के लिए 1.5-2 किलो प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता पड़ती है। तोरिया की बीज दर 4 किग्रा. प्रति हे. रखना चाहिए। बोने के पूर्व सरसों के बीज को फफूंदीनाशक रसायन जैसे कार्बेन्डिजिम (वाविस्टिन) 2 ग्राम प्रति किग्रा. बीज या थीरम (2.5 ग्राम दवा प्रति किलो बीज के हिसाब से) उचारित करना चाहिए जिससे फसल को मृदा जनित रोगों से बचाया जा सके।

बोआई की विधियाँ –

सरसों फसल की बुवाई पंक्तियों में 45 सेमी. और पौधों में 15 – 20 सेमी. के अन्तर से करना चाहिये। तोरिया की बुआई पंक्तियों में 30 सेमी. और पौधों में 10 – 15 सेमी. के अन्तर पर करना उचित रहता है। बुआई के समय यह ध्यान रखना चाहिये कि बीज उर्वरक के सम्पर्क में न आये अन्यथा अंकुरण प्रभावित होगा। अतः बीज 3 – 4 सेमी. गहरा तथा उर्वरक को 7 – 8 सेमी. गहराई पर देना चाहिए। अच्छे अंकुरण एवं उचित पौध संख्या के लिए बुआई से पूर्व बीजों को पानी में भिगोकर बोया जाना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक की सही खुराक –

सरसों भारी मात्रा में और शीघ्रता से भूमि से पोषक तत्व ग्रहण करती है। अतः खाद और उर्वरकों के माध्यम से फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की प्रतिपूर्ति आवश्यक है। बुआई के 15 – 20 दिन पूर्व 10 – 15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद खेत मे मिलाने से प©ध वृद्धि और उपज में बढ़ोत्तरी होती है। राई व सरसों की सिंचित फसल में 100 – 120 किग्रा. नत्रजन, 40 किग्रा. स्फुर व 40 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए। असिंचित अवस्था में 40 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा. स्फुर व 20 किग्रा. पोटाश प्रति हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए। पोषक तत्वो की वास्तविक मात्रा का निर्धारण मृदा परीक्षण के आधार पर किया जाता है। मृदा परीक्षण नहीं किया गया है तो तोरिया की सिंचित फसल के लिए 90 किग्रा. नत्रजन 30 किग्रा. स्फुर तथा 20 किग्रा. पोटाॅश प्रति हे. तथा असिंचित दशाओं में इसकी आधी मात्रा प्रयोग करनी चाहिए। सिंचित अवस्था में नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय कूड़ो में बीज के नीचे देना चाहिए। शेष नत्रजन पहली सिंचाई के बाद देना चाहिए। भूमि मे जिंक की कमी होने पर 5 – 10 किग्रा. जिंक (जिंक सल्फेट के माध्यम से) बुआई के समय देना लाभप्रद पाया गया है। नत्रजन को अमोनियम सल्फेट तथा फास्फोरस सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में देने से फसल को आवश्यक सल्फर तत्व भी मिल जाता है जिससे उपज और बीज के तेल की मात्रा बढ़ती है।

राई – सरसों की खेती में सिंचाई व जल प्रबंधन –

सरसो में सिंचाई देने से उपज मे वृद्धि होती है। अच्छे अंकुरण के लिए भूमि मे 10 – 12 प्रतिशत नमी होना आवश्यक रहता है। कम नमी होने पर एक हल्की सिंचाई देकर बुआई करना लाभप्रद रहता है। सरसों फसल में 2 – 3 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। इस फसल को औसतन 40 सेमी. जल की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बुआई के 25 – 30 दिन बाद (4 – 6 पत्ती अवस्था) और दूसरी सिंचाई फूल आते समय (बुआई के 70 – 75 दिन बाद) करनी चाहिए। प्रथम सिंचाई देर से करने पर पौधों में शाखायें, फूल व कलियां अधिक बनती है। सरसों में पुष्पागम और शिम्बी लगने का समय सिंचाई की दृष्टि से क्रांतिक होता है। इन अवस्थाओं पर भूमि में नमी की कमी होने से दानें अस्वस्थ तथा उपज और दाने में तेल की मात्रा में कमी होती है।

राई – सरसों की खेती में खरपतवार नियंत्रण –

राई एवं सरसों में खरपतवारों के कारण 20 – 30 प्रतिशत तक उपज मे कमी आ सकती है। फसल में बथुआ, चटरी – मटरी, सैंजी, सत्यानाशी, मौथा, हिरनखुरी आदि खरपतवारों का प्रकोप होता है। पौधों की संख्या इष्टतम होने से प्रत्येक पौधों का विकास अच्छा होता है, शाखायें अधिक निकलती है जिससे पौधों पर फलियाँ अधिक बनती है क्योंकि पौधो को उचित प्रकाश, जल और पोषक तत्व समान रूप से उपलब्ध होते है। बुआई के 15 – 20 दिन बाद एक निंदाई – गुड़ाई करें तथा पौधों – से – पौंधें की दूरी छँटाई करके 15 – 20 सेमी. कर देना चाहिए। पंक्ति में घने पौधो को उखाड़कर पौध से पौध की उचित दूरी रखने को विरलन कहते है । जब फसल में पहली फूल की शाखा निकल आये तब ऊपरी हिस्सा तोड़ देने मे शाखाये, फूल व फलियाँ अधिक बनती है जिससे उपज मे वृद्धि होती है। पौधों के इस कोमल भाग को सब्जी के रूप में बाजार में बेचा जा सकता है या पशुओं को खिलाने के लिए प्रयोग मे लाना चाहिए। खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथालिन (स्टाम्प) 0.5 – 1.5 किग्रा. या आइसोप्रोट्यूरान 1 – 1.3 किग्रा. प्रति हे. को 800 – 100 लीटर पानी में घोलकर अंकुरण से पहले छिड़काव करना चाहिए। यदि सरसों को चने क साथ लगाया गया है तब खरपतवार नियंत्रण के लिए फ्लूक्लोरालिन (बेसालिन) 0.75 – 1 किग्रा. प्रति हेक्टेयर को बुआई के पूर्व खेत मे छिड़कना चाहिए।

राई – सरसों की कटाई एवं गहाई-

तोरिया की फसल 90 – 100 दिन तथा राई की फसल 120 – 150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। पकने पर पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और बीजों का प्राकृतिक रंग आ जाता है। अपरिपक्व अवस्था में कटाई करने पर उपज में कमीं आ जाती है और तेल की मात्रा भी घट जाती है। फलियों के अधिक पक जाने पर वे चटख जाती हैं और बीज झड़ने लगते है। फल्लियों एवं पत्तियो के पील पड़ने के साथ ही फसल की कटाई हँसिये से या फिर पौधों को हाथ से उखाड़ लेना चाहिये। कटाई उपरान्त फसल को 2 – 3 सप्ताह तक खलिहाँन में सुखाया जाता है, फिर डंडो से पीटकर या बैलो की दाय चलाकर या ट्रेक्टर से मड़ाई की जाती है। आज कल मड़ाई के लिए थ्रेसर का भी प्रयोग किया जाता है। मड़ाई के बाद बीजों को भूसे से अलग करने के लिए पंखे का प्रयोग करते है या हवा में ओसाई करते है।

राई – सरसों की उपज व पैदावार की जानकारी –

सरसों एवं तोरिया की मिश्रित फसल से 3 – 5 क्विंटल तथा शुद्ध असिंचित फसल से 10 – 12 क्विंटल तथा सिंचिंत फसल से 12 – 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। उन्नत सस्य तकनीक अपनाकर असिंचित राई से 15 – 20 क्विंटल तथा सिंचित राई से 20 – 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है। भूसा भी लगभग 15 – 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है।बीज को अच्छी तरह धूप में सूखाना चाहिए। सरसों के दानों में भण्डारण के समय नमी की मात्रा 7 – 10 प्रतिशत होना चाहिए। सरसों – राई के बीज में 38 – 40 प्रतिशत , तोरिया में 42 – 44 प्रतिशत तथा भूरी व पीली सरसो में 43 – 48 प्रतिशत तेल पाया जाता है ।

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