प्याज की खेती कैसे करें (pyaj ki kheti kaise kare)

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प्याज की खेती कैसे करें (pyaj ki kheti kaise kare)

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प्याज़ एक कंद वाली फ़सल है। बिना इसके सब्ज़ी फीकी सी लगती है। आप प्याज़ के बिना सलाद की कल्पना भी नही कर सकते हैं। वैज्ञानिक नाम  allium cepa L. और एलिएसी कुल का यह पौधा हमारे दैनिक जीवन में बहुत काम का है।  इसमें गुणसूत्रों की संख्या 16 पायी जाती है। वहीं इसके ज्न्म्स्थान की बात करें तो  उद्भव स्थान मध्य एशिया (अफगानिस्तान) जाना जाता है।

प्याज़ के बारे में ये भी जाने –

  • प्याज का तीखापन का कारण : एलाइल प्रोपाइल डाईसल्फाइड नामक पदार्थ के कारण,
  • प्याज में पीले रंग का कारण : क्वेरसीटीन के नामक

वितरण व क्षेत्रफल –

हमारे देश देश भर में प्याज़ की खेती की जाती है । उत्तर प्रदेश,पंजाब,बिहार,महाराष्ट्र,तमिलनाडु व आंध्रप्रदेश में बहुतायत मात्रा में की जाती है ।

लहसुन की खेती की कैसे करें ? हिंदी में आधुनिक लहसुन की खेती की पूरी जानकारी पढ़ें

उन्नत किस्में :

लाल छिलके वाली उन्नत किस्में :
  •  पूसा रेड,नासिक रेड,हिसार – 2,एग्री फाउंड,बीएल 67, U.D.101,व U.D.103,
सफ़ेद छिलके वाली उन्नत किस्में :
  • अर्का प्रगति,पूसा सफ़ेद,पटना सफ़ेद,व्हाईट ग्रेनो,
हाइब्रिड उन्नत किस्में :
  •  एरिस्टोक्रेट,अम्पायर,क्रिस्टा,वीएल – 67,
खरीफ में उगाई जाने वाली उन्नत किस्में :
  • भीमराज,भीमा रेड,भीमा सुपर,निफाद – 53, एग्रीफाउंड,अर्का कल्याण,अर्का निकेतन,अर्का प्रगति,एग्री फाउंड डार्क रेड,

जलवायु व तापमान :

यह जलवायु वाली फसल है । इसके उचित बढ़वार  व पौधों के विकास के लिए 15-25 ०C तापमान उपयुक्त होता है ।

 

भूमि का चयन :

भारी भूमि को छोड़कर प्याज की दोमट मिटटी,बलुई दोमट में प्याज की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है ।भारी भूमि में प्याज के कंदों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता है । जिससे प्याज की पैदावार में बुरा प्रभाव पड़ता है ।

भूमि व भूमि की तैयारी –

चूँकि प्याज एक उथली जड़ वाला पौधा है । अत : इसके लिए गहरी जुताई की आवश्यकता नही पडती । फिर भी देशी हल से 4 से 5 जुताई कर देना चाहिए । हर जुताई के बाद पाटा अवश्य चलाना चाहिए । जिससे ढेले टूटकर खेत भुरभुरा बन जाए,कार्बनिक खाद जैसे कम्पोस्ट,सड़ी गली गोबर की खाद भी खेत में डालना चाहिए ।

 बुवाई का समय :

  • मैदानी क्षेत्र में : अक्टूबर ,माह की समाप्ति से नवंबर माह के मध्य तक
  • पहाड़ी क्षेत्र में
  • निचले पहाड़ी क्षेत्र में(2000 मीटर नीचे तक) : अक्टूबर में
  • ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र में (2000 मीटर ऊंचाई तक) : फरवरी से मार्च तक

बीज की मात्रा :

  • प्रत्यारोपण विधि में 8 से 10 किलोग्राम/प्रति हेक्टेयर
  • कंद द्वारा बुवाई में कंद 10 से 12 कुंतल/हेक्टेयर
  • नर्सरी द्वारा तैयार पौध हेतु 400 – 500 ग्राम/हेक्टेयर

प्याज की पौध नर्सरी में तैयार करना :

पौध के लिए नर्सरी क्षेत्र व रोपाई करने वाले क्षेत्र का अनुपात 1:20 का होता है । इस हिसाब से 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल में रोपाई के लिए 500 वर्गमीटर क्षेत्र में तैयार की गई नर्सरी पौध पर्याप्त रहती है । भूमि का चुनाव करते समय ध्यान रखें । भूमि दोमट,समतल व उचित जल निकास वाली हो । साथ ही पास में छायादार पेड़ नही होने चाहिये ।

सबसे पहले नर्सरी के चयनित भूमि की जुताई करें । भूमि को ढेले रहित भुरभुरी व पाटा चलाकर समतल बना लेना चाहिए। अब 5×1 मीटर व 15-20 सेंटीमीटर ऊंची क्यारियाँ बना लेनी चाहिए । हर क्यारी में कार्बनिक खाद जैसे गोबर की सड़ी खाद मिला दे । अथवा कम्पोस्ट अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए ।

बीज उपचारित करना :


इसके बाद क्यारियों को किसी भी फफूंदनाशक दवा से उपचारित करना चाहिए । केप्टान,थायराम,इत्यादि की 2.5 ग्राम/किग्रा० बीज की दर से उपचारित करना चाहिये ।

बीजों की बुवाई :

क्यारियों में 8-10 सेंटीमीटर दूरी पर लाइन खींचकर बीजों को 1 से 1.5 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिये । बुवाई के बाद क्यारियों पर राख,मिट्टी,गोबर की खाद बुरकें । ताकि बीज ढक जाएं । बुवाई के बाद क्यारियों पर हजारे की सहायता से हल्की सिंचाई कर दें । ताकि बीजों को अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी मिल जाये । इसके पश्चात क्यारियों को सूखी घास,गन्ना की पत्ती अथवा पुवाल से ढक देना चाहिये । एक दिन का गैप कर नियमित रूप से क्यारियों में सिंचाई करनी चाहिए ।

बीजों के अंकुरण होने के पश्चात क्यारियों से घास हटा दें,जिससे पौधों को पर्याप्त धूप व हवा मिल सके । पौध में रोगों से बचाव के लिए डायथेन एम 45 दवा का 0.25% घोल छिड़काव करें । बुवाई के 8 से 10 सप्ताह बाद पौधे रोपाई योग्य हो जाते हैं ।

रोपाई हेतु खेत की तैयारी :

प्याज की खेतु भूमि दोमट व समतल तथा उचित जल निकासी वाला होना चाहिए । खेत में 200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद फैला देनी चाहिए । इसके बाद देशी हल से 4 से 5 जुताईयाँ करनी चाहिए । हर जुताई के बाद पाटा चलाकर भूमि को ढेलेरहित बनाकर समतल करना चाहिए ।

पौध अंतरण :

15×10 सेंटीमीटर

पौधों की रोपाई :

प्याज के पौधों की रोपाई के लिए 15 सेंटीमीटर की दूरी पर कतार बना लें । अब पौध से पौध की दूरी 10 सेंटीमीटर के अंतर पर लगभग 2 से2.5 सेंटीमीटर गहराई पर सायंकाल में रोपाई कर देनी चाहिए । प्याज के पौध की रोपाई के बाद खेत में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए । जिससे जड़ों को मिट्टी में जमाव जल्दी हो ।

खाद व उर्वरक :


खेत में रोपाई के पहले 200 से 250 कुंतल/हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद मिला देनी चाहिए ।खेत में उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण से प्राप्त परिणाम के अनुसार करना चाहिए । यदि मृदा परीक्षण समय से न हुआ हो तो क्रमशः –

  • नाइट्रोजन : 100 किलोग्राम/
  • फॉस्फोरस : 50 किलोग्राम
  • पोटाश : 100 किलोग्राम
  • सल्फर : 25 किलोग्राम

प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करनी चाहिए । जिसमें नाइट्रोजन की आधी मात्रा यानी 50 किलोग्राम मात्रा व फॉस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा क्रमशः 50 व 100 किलोग्राम, जुताई से समय ही खेत में अच्छे से मिला देना चाहिए । शेष नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपाई के एक माह बाद खड़ी फसल में टॉप ड्रेसिंग द्वारा दें ।

सिंचाई व जल प्रबंधन :

प्याज की खेती से अधिकतम पैदावर प्राप्त करने के लिए खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना बेहद आवश्यक है ।
आमतौर पर प्याज की खेती में 10 से 15 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है ।

  • जाड़े के मौसम में : 12 – 15 दिन के अंतराल पर
  • गर्मी के मौसम में : 7 – 10 दिन के अंतराल पर

प्याज की फसल पर सदैव हल्की सिंचाई ही करनी चाहिए ।आवश्यकता से अधिक पानी को जल निकासी द्वारा खेत से बाहर निकाल दें अन्यथा प्याज की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ता है ।

खरपतवार नियंत्रण-

फसल पर उगने वाले खरपतवार – सत्यानाशी (कटेली),चौलाई,दूब,मोथा, मकड़ा,खरतुवा ।प्याज की फसल से खरपतवारों को निराई कर निकाल दें । अन्यथा ये खरपतवार खेत से खाद व उर्वरकों का पोषण अवशोषित कर लेते हैं । जिससे पौधों की बढ़वार कम हो जाती है । प्याज के खेत में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए टोक ई 25 को 6 लीटर/हेक्टेयर मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर रोपाई के तुरंत बाद छिड़काव करें । ऐसा करने से खरपतवार नही उग पाते । अथवा रोपाई से पहले ही बेसालिन 1 किलोग्राम सक्रिय अवयव को पूरे खेत में बिखेरकर मिट्टी में मिला देना चाहिए । जिससे खरपतवार नहीं उगते । इसके बावजूद भी यदि खरपतवार उग आए तो उन्हें निराई कर नष्ट कर देना चाहिए ।

प्याज की फसल पर लगने वाले रोग व बचाव तथा नियंत्रण :


फसल पर- प्याज का कण्ड,बैंगनी धब्बा,ग्रीवा विगलन,जीवाणु मृदु विगलन,मृदु रोमिल आसिता,प्याज किट्ट,मूल विगलन,श्वेत विगलन,आर्दपतन पौध अंगमारी जैसे रोगों का प्रकोप होता है । जिसके प्रभाव का लक्षण,बचाव,तथा रोकथाम विवरण इस प्रकार है :-

ग्रीवा विगलन –

‎● कारण व लक्षण :यह फंफूदजनित रोग है । इसके प्रभाव से प्याज के शल्क पत्र सड़ जाते हैं । तथा कन्दो के ऊतक सिकुड़ जाते हैं । जिससे कंद सूखे से हो जाते हैं ।
बचाव व रोकथाम : यह रोग लाल प्याज की किस्म में नहीं लगता । इसलिए सम्भव तो तो सफेद प्याज की खेती न करके लाल अथवा पीली प्याज की खेती करनी चाहिए ।

प्याज का झुलसा रोग-

यह एक फफूंदजनित रोग है । जो स्टेमफिलियम बेसिकंरियम नामक फंगस के कारण होता है । इस रोग के प्रभाव से पत्तियों का ऊपरी भाग झुलस जाता है ।
बचाव व रोकथाम : इस रोग से बचाव हेतु खड़ी फसल में डायथेन एम 45 का छिड़काव करें

जीवाणु मृदु विगलन –

कारण व लक्षण : यह एक जीवाणुजनित रोग है । यह रोग इर्विनिया कैरोटोवोरा नामक जीवाणु के द्वारा होता है । जिसके प्रभाव से कंद सड़ जाते हैं तथा पौधे मुरझा जाते हैं । कंद खोदने पर चिपचिपे ,बदबूदार व सड़े-गले निकलने हैं ।
बचाव व रोकथाम :
● भण्डारण से पूर्व कन्दों की ऊपरी पत्तियों की कटाई करके अच्छी प्रकार सुखाकर ही भंडारित करना चहिये ।
● भंडारण के लिए कम पानी वाले,तथा हवादार भंडार गृहों का चयन कर भंडारित करना चाहिए ।

प्याज का कण्ड –

कारण व लक्षण : यह एक फफूंदी जनित रोग है । यह यूरोसिस्टिस सेपूले नामक फफूंद के कारण होता है । अंकुरण के शुरुआत में बीजपत्र पर काले धब्बों अथवा स्पॉट के रूप में इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं । स्पॉट के फट जाने पर अनगिनत जीवाणु काले चूर्ण सदृश पूरे पौधे को संक्रमित करता है । परिणाम स्वरूप महीने भर में ही पौधा मर जाता है ।
बचाव का रोकथाम :
इस रोग से बचाव हेतु बुआई के पूर्व ही बीज को फंफूदनाशक यथा केप्टान अथवा थायराम की 2.5 ग्राम मात्रा को प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए ।
अथवा
रोपाई के पहले ही पौध को मेथिल ब्रोमाइड की 1 किलोग्राम प्रति 25 वर्गमीटर की दर से तैयार घोल से उपचारित कर लेना चाहिए ।

बैंगनी धब्बा –

कारण व लक्षण : यह फफूंदजनित रोग है ।  जो आल्टरनरिया पोराई नामक कवक के कारण होता है । जिसका प्रकोप पौधे की पत्तियों,बीज स्तम्भों तथा प्याज की गांठों पर होता है । पौधे के रोगी भाग पर धंसे हुए सफेद धब्बे बनते हैं । जिसके धब्बे के किनारे लाल या बंगनी रंग व मध्य भाग बैंगनी रंग का होता है । इस रोग से प्रभावित कंद सड़ गल जाते हैं तथा पौधे के तने व पत्तियाँ सूखकर गिर जाती हैं ।

काली फफूंदी –

कारण व लक्षण : यह एक फफूंदजनित रोग है जो एस्पर्जिलस नामक फफूंदी से होता है,यह रोग भंडार में रखे प्याज के प्याज के बल्बों में होता है,इस रोग के बचाव हेतु बल्बों का संचयन व परिवहन व उसके भंडारण बहुत अधिक सावधानी बरतनी चाहिए,
बचाव व रोकथाम :
रोगग्रस्त खेत में 2-3 साल तक बल्ब वर्गीय पौधे यथा प्याज व लहसुन न लगाएं ।इस रोग से बचाव हेतु बुआई के पूर्व ही बीज को फंफूदनाशक यथा केप्टान अथवा थायराम की 2.5 ग्राम मात्रा को प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए ।इस रोग के प्रकोप से बचाव हेतु इंडोफिल एम 45 की 2.5 किलोग्राम/हेक्टेयर मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करें ।

मृदु रोमिल आसिता-

  • रोग भी फफूंदजनित रोग है ।
  • रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर पीले रंग के अंडाकार से आयताकार आकार में धब्बे पड़ जाते हैं ।
  • जिसके कारण पौधे में हरे रंग की कमी के कारण क्लोरोफिल का अभाव हो जाता है ।
  • परिणामस्वरूप पौधा का रोगग्रस्त भाग सूख जाता है ।
  • प्याज की पैदावार पर विपरीत असर पड़ता है । कंद छोटे हो जाते हैं ।
  • ऐसे कन्दो की भंडारण क्षमता भी कम होती है ।

बचाव व रोकथाम :

  • इस रोग से बचाव हेतु बुआई के पूर्व ही बीज को उपचारित कर लेना चाहिए ।
  • फंफूदनाशक यथा केप्टान अथवा थायराम की 2.5 ग्राम मात्रा को प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए ।
  • इस रोग के प्रकोप से बचाव हेतु इंडोफिल एम 45 की 2.5 किलोग्राम/हेक्टेयर मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर फसल पर एक सप्ताह के अंतर पर छिड़काव करें ।
  • साथ ही खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था करें ।

कीट नियंत्रण – प्याज की फसल पर लगने वाले कीट व उनकी रोकथाम –

  • कीटों के प्रकोप के कारण प्याज की उपज पर बड़ा विपरीत प्रभाव पड़ता है ।
  • उपज कम हो जाती है ।
  • प्याज की फसल पर ओनियन थ्रिप्स(प्याज का भुनगा),ओनियन मैगट(प्याज की मक्खी),रिजका की सूंडी,तम्बाकू की सूंडी,आदि कीडों का बड़ा प्रकोप होता है ।

प्याज का भुनगा या थ्रिप्स –

पीले रंग के करीब से 1 मिलीलीटर लम्बे बेलनाकार कीट अपने खरोचने व चूसने वाले मुखांग से पत्तियों को खुरचकर उसका रस चूसते हैं । पौधे पर अधिक प्रकोप से पत्तियों पर चमकीले धब्बे व धीरे – धीरे नोक कत्थई हो जाती है । इस कीट के अधिक प्रकोप के प्रभाव से पत्तियाँ सूख जाती है । पौधे की बढ़वार रुक जाती है । प्याज की गांठों में विकृति उत्पन्न हो जाती है ।

प्याज की मक्खी – मैगट

इस कीट के लार्वा प्याज के तने व गाँठ में छेदकर मुलायम वाले भाग को खाकर पौधे को नुक्सान पहुचाते हैं। व्यस्क मक्खी 6 व लार्वा 8 मिलीलीटर लम्बी होती है । ये पौधे के गांठ के भाग का मांसल भाग खाकर खोखला बना देते हैं ।

रिजका की सुंडी –

  •  यह कीट प्याज के अलावा बैंगन,मिर्च,मूली की फसल को भी हानि पहुंचाता है ।
  • यह कीट भूरे-हरे रंग के ऊपर की तरह टेढ़ी-मेढ़ी धारियों वाला होता है ।
  • इस कीट की सूंडी प्याज की फसल को बहुत हानि पहुंचाती है ।
  • जिससे प्याज की पैदावार कम हो जाती है ।
  • तथा गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है ।

तम्बाकू की सूंडी-

  • इस कीट की छोटी-छोटी सूंडी होती है ।
  • जो पौधों की मुलायम पत्तियों को खाकर ठूंठ बना देती हैं ।
  • यह सब कुछ भक्षण करने वाला खतरनाक कीट है ।
  • जो प्याज के अलावा टमाटर लहसुन व तम्बाकू की फसल को भी काफी हानि पहुंचाता है ।

उपरोक्त कीटों की रोकथान हेतु उपाय-

  • सबसे पहले कीटों के अण्डों व सूडियों को निकालकर नष्ट कर देना चाहिए ।
  • साइपरमेंथ्रिन 0.15% के घोल का प्रति हे0 की दर 600 ली0 पानी में मिलाकर छिड़काव करें ।

प्याज की फसल की खुदाई :

  • अच्छी गुणवत्ता वाली प्याज लेने के लिए प्याज की समय खुदाई करना अति आवश्यक है ।
  • खुदाई में विलम्ब करने से जड़ों में नई गांठे निकलने लगती है
  • जिससे प्याज की क्वालिटी पर बुरा असर पड़ता है ।
  • प्याज प्रतिरोपण के 3 से 4 महीने बाद खुदाई करना चाहिए ।
  • प्याज की पत्तियों का करीब 70 प्रतिशत भाग, सूखकर जमीन में गिर जाये ।
  • तब खुरपी अथवा कुदाल की सहायता से प्याज की खुदाई करनी चाहिए ।
  • किसान भाई ध्यान रखें खुदाई के समय मिटटी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए ।

उपज –

किसान भाई प्याज की खेती से 200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर की दर से उपज प्राप्त कर सकते हैं,

 

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