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Monday, November 30, 2020
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पान की खेती (pan ki kheti) – पान की वैज्ञानिक खेती के बारे में जाने

पान की खेती (pan ki kheti) – पान की वैज्ञानिक खेती के बारे में जाने

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पान की खेती कैसे की जाती है ?

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अपने घर मे ही पान की बेल कैसे लगाएं ?

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पान की खेती हमारे देश में सदियों से होती आयी है। पान को संस्कृत में नागबल्ली, ताम्बूल हिन्दी भाषी क्षेत्रों में पान मराठी में पान/नागुरबेली, गुजराती में पान/नागुरबेली तमिल में बेटटीलई,तेलगू में तमलपाकु, किल्ली, कन्नड़ में विलयादेली और मलयालम में बेटीलई नाम से जाना जाता है।पूजा पाठ के अलावा पान का उपयोग सुपारी के साथ खाने में किया जाता है।

पान में पाए जाने वाले रासायनिक तत्व –

फास्फोरस                0.13                 0.61%

पौटेशि‍यम                1.8                   36%

कैल्शियम                0.58                 1.3%

मैग्नीशियम               0.55                 0.75%

कॉपर              20-27 पी0पी0एम0          –

जिंक              30-35 पी0पी0एम0         –

शर्करा                       0.31-40 /ग्रा0          –

कीनौलिक यौगिक      6.2-25.3 /ग्रा0       –

विटामिन A,B,C, से भरपूर पान का उपयोग का औषधि निर्माण में भी किया जाता है। भारत में पान की खेती सबसे अधिक कर्नाटक,  तमिलनाडु उड़ीसा बिहार पश्चिम बंगाल असम आन्ध्रप्रदेश महाराष्ट्र   गुजरात  राजस्थान मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश में की जाती है ।

 जलवायु :

किसान भाइयों पान एक ऊष्ण कटिबंधीय पौधा है । पान की उत्तम बढ़वार के लिए नम, ठंडे व छायादार वातावरण अच्छा होता है।

पान के बरेजे के भूमि का चयन :

पान की खेती से अधिकतम लाभ लेने के लिए लाल मिट्टी मिली पडुवा मिट्टी उत्तम मानी जाती है। जिस खेत में पान की (pan ki kheti ) करने जा रहे हैं। उस खेत में तालाब की मिट्टी की मोटी परत लगभग 15 सेमी0 डाल दें । साथ ही ध्यान दें जिस पान के बरेजे जिस जगह बनाने जा रहे हैं ध्यान रखें। कि पर्याप्त ढलान होना चाहिए। ताकि बारिश का पानी आसानी से खेत से बाहर निकल जाएँ। जल भराव पान की गाँठ सड़ जाती है। साथ ही बराजों में रोग लगने का भय रहता ।


भूमि की तैयारी :

सबसे पहले मई- जून में मिट्टी पलटने वाले हल से 2-3 जुताई करनी चाहिए। हैं। जुताई करके माह भर के लिए खेत को खुला छोड़ दें। जुताई होने से मिट्टी में छिपे कीड़े-मकोड़े सूरज की तेज़ धूप नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद अगस्त में फावड़े से गुड़ाई करें साथ एक आख़िरी जुताई देशी हल से करें। ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए।

पान की खेती के लिए भूमि का उपचार व साफ़-सफ़ाई –

बरेजे बनाने के लिए खेत को साफ़ कर लें। गुड़ाई करके खेत में चूना डस्त यानी कलई डाल दें। कूडा-करकट खेत से निकालने के बाद 0.25% बोर्डों मिश्रण खेत में मिला दें। इसकें अलावा कार्बनिक खाद के रूप में खेत में 35-40 किलोग्राम गोबर की खाद में 1 किलोग्राम ट्राईकोडर्मा विरडी पाउडर की दर से अच्छी तरह मिला दें। इस प्रकार 7-10 दिन में तैयार जैविक खाद को बेल की बुवाई से पहले खेत में मिला दें।

 

पान की उन्नत क़िस्में –


उत्पादन व लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए देश के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा पान की खेती के लिए कुछ खास किस्में सुझाई गयी हैं –

बनारसी,कलकतिया, कपूरी, बांग्ला, सौंफिया, रामटेक, मघई,बंगला, देशावरी, कपूरी, मीठा व सांची आदि ।

बोआई के लिए बेल का चयन  :

पान की खेती से बरेजे हेतु बेल की साल भर पुरानी बेल की कतरन का चुनाव करें । एक बात और किनारे से 2-3 पान छोड़ कर नीचे जमीन से 90 सेंटीमीटर या यूँ कहें कि बिलकुल ऊपर यानी बीचों बीच से ही कतरन बनाएँ। ऐसी कटिंग्स की अंकुरण क्षमता अधिक होती है।बेल को ब्लेड या पनकटे से ही काट लें। बेल की कतरनों  को 200 के बंडल बना कर इकट्ठा कर लें।

पान के बेल को उपचारित करना –


बेल को बुवाई से रोग रोधी बनाने के लिए 0.25 फीसदी बोर्डों मिश्रण या ब्लाइटाक्स को 500 पीपीएम के घोल में 15-20 मिनट तक उपचारित करें। इस उपचार से बेलों में फफूँदी जनित रोगों से बचाव होता है ।

 

पान की खेती के लिए अंतरण (spacing)

पौध से पौध की दूरी 10-15 सेमी0

लाइन से लाइन की दूरी – 50-55 सेमी0       

बेलों की रोपाई करना

साथियों पान के बेलों की रोपाई के लिए उत्तम समय 11 बजे तक और शाम को 3 बजे तक रहता है। 1 गांठ और 1 पत्ती वाली बेल एक जगह पर 10 से 15 सेंटीमीटर की दूरी पर 4-5 सेंटीमीटर गहराई में लगा कर अच्छी तरह दबा देना चाहिए । कूड़ों से कूड़ों की आपसी दूरी 50 से 55 सेंटीमीटर रखते हैं । पान की बेलों की 2 लाइनों की बोआई उलटी दिशा में करते हैं ताकि सिंचाई में भी आसानी हो।

सिंचाई व जल निकास प्रबंधन –

 एक कहावत है “ धान,पान व केला ये सब पानी के चेला” पान की खेती में सिंचाई का बड़ा महत्त्व है। पान के बेल की बोआई के तुरंत बाद ओहर यानी मल्चिंग डाल कर हजारा, अथवा लुटिया या स्प्रिंकलर से हलकी सिंचाई करें। साथ स्थानीय जलवायु व मौसम के अनुसार 3-4 दिनों में 2-3 घंटे के अंतर पर सिंचाई करें। बारिश के दिनों में वैसे तो सिंचाई की कोई खास आवश्यकता नही है  फिर भी यदि बारिश ना हो । ऐसे में जरूरी हो तो हलकी सिंचाई अवश्य करें ।एक बात और जाड़े के मौसम में 7-8 दिनों बाद सिंचाई करें ।सिंचाई के बाद अतिरिक्त पानी खेत से निकाल दें ।

पान के बेलों को सहारा देना –

पान के पौधे जब सेमी0 ऊँचाई के हो जाएँ उन्हें रस्सी या जूट की सूतली से बाँस की फंटी से बाँध देना चाहिए।इससे पान की वानस्पतिक बढ़वार अच्छी होती है। जिससे पान की खेती से आप अधिकाधिक लाभ ले पाएँगे ।

खाद व उर्वरक (manures and fertilizers) –

जैविक खाद – पान की खेती में जैविक खाद के रूप में आप

तिल की खली – 50-60 कुन्तल/हेक्टेयर

नीम की खली – 25-30 कुन्तल/हेक्टेयर का प्रयोग करें इसके अतिरिक्त –

आप नीम,सरसों, व तिल की खली का भी उपयोग में ला सकते हैं। इसके अलावा उरद, दूध, दही, मट्ठे को भी पान की खेती में जैविक खाद के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।

रासायनिक उर्वरक –

नाइट्रोजन – 150 किलोग्राम

फ़ोस्फोरस – 100 किलोग्राम

पोटाश – 100 किलोग्राम

पौध सुरक्षा प्रबंधन (plant protection management )

अन्नदाता किसान साथियों ध्यान दें । फ़सल में बुवाई व सिंचाई के साथ हमें पौध सुरक्षा हेतु आवश्यक प्रबंध करने होते हैं। जिसके लिए हमें निम्न स्टेप्स अपनाने होते हैं –

  • खरपतवार नियंत्रण
  • कीट नियंत्रण
  • रोग नियंत्रण

खरपतवार नियंत्रण :

पान के खेत में समय समय निराई गुड़ाई करते रहें । खेत में अनावश्यक खरपतवार सावधानी से निकाल दें। पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ा दें।

कीट नियंत्रण –

पान की फ़सल पर सूक्ष्म लाल मकड़ी, शल्क कीट व सफ़ेद कीट का प्रकोप होता है। ये कीट पत्तियों का रस चूसते  हैं। इसके प्रभाव से बेल का बढ़ना बंद हो जाता है। जिससे पान के पत्ते सूख जातें हैं। इससे पैदावार पर बड़ा कुप्रभाव पड़ता है। इन सभी कीटों की रोकथाम के लिए 0.5 फीसदी डायमेथोएट और 5 फीसदी नीम के तेल का छिड़काव करें ।

रोग नियंत्रण –

पादगलन (foot rot ) –

पान में लगने वाला यह रोग फफूँदी से होता है।जल निकासी अच्छा न होने से यह योग तेज़ी से फैलता है। ज़मीन की सतह से जुड़ी बेलों पर इसका प्रकोप होता है। जिससे पत्तियाँ पीली पड जाती है और धीरे-धीरे सूख जाती है।

इस रोग से बचाव के लिए सबसे पहले जल निकास दुरुस्त करें । फिर पान की ज़मीन पर गिरी हुई पत्तियों को साफ़ करें। साथ ही खेत की तैयारी के समय 30-40 किलो ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर 30-40 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद में मिला दें। इससे इस रोग से बचाव हो जाएगा। इसके अलावा इसका कोई इलाज नही है।

जड़ सड़न रोग-

यह रोग भी फफूँदी से ही होता है। इसकी वजह राइजोप्टोनिया नामक फफूंद है । भूमि खरपतवार मुक्त करें साथ हाई जल निकास प्रबंधन पर ध्यान दें । पान की खेती में सूखी जड़ सड़न रोग के बचाव हेतु खड़ी फ़सल पर कार्बेंडाजिम 0.3 फीसदी या मैंकोजेब 0.2 फीसदी का महीने में 1 बार छिड़काव करें ।

पत्ती का धब्बेदार और तने का एंथ्रेक्नोज रोग –

यह एक फफूँदीजनित रोग है । जो कोलेरोट्राइकेन केपसीसी नामक फफूंद से होता है । इस रोग का प्रकोप बरसात में अधिक होता है। इस रोग के शुरुआत में पत्तियों के किनारों पर से धंसे हुए अनियमित टेढ़े मेढे़ गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं। जो बाद में काले रंग में बदल जाते हैं ।

इससे बचाव हेतु मैंकोजेब 0.3 फीसदी का छिड़काव बरसात में 10 -15 दिनों पर करें ।

तना कैंसर :

इसके प्रकोप से तने में लम्बे लम्बे भूरे भूरे धब्बे बन जाते हैं।जो धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं। जिससे तना फट जाता है। पान की खेती (pan ki kheti) पर लगने वाले इस रोग से बचाव हेतु 150 ग्राम प्लांटो बाइसिन व 150 ग्राम कापर सल्फेट का घोल 600 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें।

पान जड़ों में गांठें बनना-

पान की खेती पर गलने वाला यह रोग सूत्रकृमि द्वारा होता है।जिसके लिए मलोयडोगायनी नामक सूत्रकृमि ज़िम्मेदार है। इसका प्रकोप बेलों व पत्तियों पर होता है। बेलों पर छोटी-छोटी गाँठे बन जाती है। जिसके पत्तियों में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है । पत्तियाँ पीली पड़ जाती है। बाद में सूख जाती है।इसकी रोकथाम के लिए नीम की खली की 15-20 किलोग्राम मात्रा प्रति 100 मीटर की दर से साल भर प्रयोग करें

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