रेशम कीट पालन हेतु शहतूत की खेती कैसे करें, रेशम की खेती की जानकारी

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रेशम कीट पालन हेतु शहतूत की खेती कैसे करें – रेशम की खेती की जानकारी

महत्त्व व उपयोगिता –

रेशम कीट पालन हेतु शहतूत की खेती कैसे करें, रेशम की खेती की जानकारी 1

रेशम कीट पालन हेतु शहतूत की खेती कैसे करें -रेशम की खेती की जानकारी, किसान भाई रेशम कीट पालन में शहतूत एक महत्वपूर्ण कारक है | आप इस पौधे के बिना रेशम कीट पालन की कल्पना नही कर सकते हैं | शहतूत का पौधा एक बहुवर्षीय वृक्ष है। इसके पौधे का वृक्षारोपण  एक बार करने पर आगामी 15 वर्षो तक इसकी उच्च गुणवत्ता की शहतूत पत्तियाँ रेशम कीट को प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है। अत: प्रथम शहतूत वृक्षारोपण करते समय तकनीकी मापदण्डों को ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि कोया उत्पादन लागत में लगभग 50 प्रतिशत धनराशि शहतूत पत्तियों के उत्पादन में ही व्यय होती है। अत: यह आवश्यक है कि प्रति इकाई क्षेत्र में अधिकतम शहतूत पत्तियों का उत्पादन हो जिससे रेशम उद्योग से अधिकाधिक लाभ प्राप्त किया जा सके।

रेशम कीट पालन हेतु शहतूत की उन्नत प्रजातियाँ  :

किसान भाई शहतूत की उन्नत प्रजातियों जैसे के-2, एस-146 टी.आर. -10, एस-54, प्रजातियों का चयन शहतूत पौधालय की स्थापना हेतु करें |

भूमि का चयन –

किसान भाई शहतूत के लिए ऐसी भूमि का चुनाव करें जो उसरीली न हो साथ ही जहां पानी का ठहराव न हो, एवं सिंचाई व्यवस्था हो,सामान्यत : उचित जल निकास वाली भूमि शहतूत के पौधे के लिए उपयुक्त होती है |  बलुई-दोमट भूमि शहतूत वृक्षारोपण के लिए उत्तम होती है |

रेशम कीट पालन हेतु शहतूत की खेती कैसे करें ? हिंदी में पूरी जानकारी पढ़ें
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भूमि की तैयारी – 

किसान भाइयों शहतूत के वृक्षारोपण हेतु मानसून की वर्षा से पूर्व भूमि की तैयारी प्रारम्भ की जाती है। भूमि को देशी हल अथवा रोटावेटर की मदद से 30-35 से.मी. गहरी जुताई करें साथ ही  प्रति एकड़ की दर से 8 मे.टन गोबर की की सड़ी खाद भूमि में मिलाई जाती है। भूमि में यदि दीमक के प्रकोप की सम्भावना हो तो गोबर की खाद के साथ-साथ लगभग 100 कि०ग्रा० बी0एच0सी0 पाउडर 20प्रतिशत एल्‍ड्रीन 5 प्रतिशत दीमक की रोकथाम के लिए मिट्टी में मिलाया जाना चाहिए।

वृक्षारोपण का समय –

जुलाई/ अगस्त
दिसम्बर/ जनवरी (सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों में)

शहतूत पौधालय हेतु पौधों का प्रवर्धन – 

किसान भाइयों शहतूत के पौधे निम्न विधियों द्वारा तैयार किये जाते हैं –
  • शहतूत बीज द्वारा
  • शहतूत कटिंग द्वारा
  • लेयरिंग द्वारा
  • ग्राफ़्टिंग द्वारा

सामान्यत : कम लागत एवं अच्छी गुणवत्ता के पौधें कटिंग विधि से तैयार की जाती है। इस प्रचलित विधि में शहतूत की टहनियों (जो छ: से नौ माह पुरानी हो) से कटिंग तैयार की जाती है। टहनियों को 6 इंच से 8 इंच लम्बी काट दी जाती है, जिसमें 4-5 कलियां हो। उक्त कटिंग का रोपण नर्सरी हेतु तैयार खेत में किया जाता है।

कटिंग को जमीन में तिरछा गाड़ते है एवं उसके चारों ओर मिट्टी को दबाकर सिंचाई कर दी जाती है। कटिंग में उपलब्ध भोज्य पदार्थ के उपयोग से कुछ ही दिनों में कटिंग से पत्तियां निकल आती है एवं लगभग 6 माह में 3-4 फुट लम्बी शहतूत पौध तैयार हो जाती है, जो शहतूत वृक्षारोपण हेतु उपयुक्त होती है।

रेशम कीट पालन हेतु शहतूत की खेती कैसे करें ? हिंदी में पूरी जानकारी पढ़ें
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सामान्यत:  नर्सरी से कटिंग का रोपण जुलाई/ अगस्त अथवा दिसम्बर/ जनवरी में किया जाता है। जुलाई/ अगस्त में रोपित कटिंग से दिसम्बर/ जनवरी में पौध रोपण हेतु एवं दिसम्बर/ जनवरी में रोपित कटिंग से जुलाई/ अगस्त में पौध वृक्षारोपण हेतु प्राप्त होती है। प्रदेश में पौध आपूर्ति के दो स्रोत है।राजकीय शहतूत उद्यान एवं व्यक्गित क्षेत्र की किसान नर्सरी में उपरोक्त विधि से तैयार पौधों की आपूर्ति की जाती है।

शहतूत पौध तैयार करने हेतु कटिंग की तैयारी : 

  1. उन्नत प्रजाति की शहतूत छट्टियों (6 माह से एक वर्ष तक पुरानी) कटिंग हेतु प्राप्त करनी चाहिए।
  2. टहनियों/छट्टियों को साये में पेड़ के नीचे रखना चाहिए जिससे सूखने न पाये।
  3. टहनियों से पेंसिल अथवा तर्जनी की मोटाई का 22 सेमी, की कटिंग तैयार किया जाना चाहिए जिसमें कम से कम तीन चार बड़ हों।
  4. कटिंग के सिरे लगभग 45 डिग्री कोण तेज धार के औजार से काटे जायें, जिससे सिरे पर छाल निकलने न पाये।
  5. यदि कटिंग तुरन्त लगाने की स्थिति में न हो तो कटिंग की गड्डियों को उलटाकर गहरी क्यारी अथवा गडढे में लाइनों में लगाकर उस पर मिट्टी की हल्की परत डालकर फव्वारे द्वारा प्रतिदिन हल्का-हल्का पानी डालें ताकि नमी बने रहे व सूखने न पाये।
  6. आवश्यकतानुसार इस उल्टी कटिंग के बण्‍डलों को निकालकर सीधा खेत में रोपित करें।

रेशम कीट पालन शहतूत के पौधे कटिंग का रोपण एवं रख-रखाव:

    1. भूमि की तैयारी के उपरान्त क्यारियों अथवा रेज्ड वेड को तैयार कर लिया जाए ।
    2. क्यारी अथवा रेज्ड वेड में छ:-छ: इंच की दूरी पर लम्बाई में लाईन बना लें।
    3. तैयार की गई कटिंग को लगभग 2/3 भाग 3.00 इंच की दूरी पर लाईनों मे गहरा गाड़ देवें।
    4. कटिंग रोपड़ के बाद कटिंग के चारों ओर की मिट्टी को दबा दिया जाये ।
    5. ताकि खाली जगह में हवा जाने से सूखने की सम्भावना न हो।
    6. कटिंग रोपण के बाद गोबर की भुरभुरी खाद की एक पतली पर्त क्यारी में फैलाकर तुरन्त सिंचाई अवश्य की जाय।
    7. प्रथम माह में कटिंग रोपित क्यारी में मिट्टी की ऊपरी पर्त सूखने पर पानी दिया जाय जिससे नमी बनी रहे।
    8. कटिंग रोपण के समय क्यारी में 8-10 लाईनों के रोपण के पश्चात एक फिट स्थान छोड़कर कटिंग रोपण किया जाए जिससे निराई करने में आसानी हो।
    9. एक एकड़ पौधालय पर लगभग 100 कि०ग्रा० यूरिया उचित विकास हेतु उपयुक्त है।
    10. इसका प्रयोग 4 से 6 बार लगभग 15-20 दिवस के अन्तराल पर पत्तियों को बचाते हुए किया जाना चाहिए।
    11. तत्पाश्चात् तुरन्त सिंचाई की जानी चाहिए।
    12. रासायनिक उर्वरक का प्रथम प्रयोग पौध में 6-8 पत्तियों की अवस्था आने पर किया जाए।
    13. पौधालय का समय-समय पर निरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए ।
    14. कि कीटों द्वारा पौधों को कोई हानि तो नहीं पहुंचाई जा रही है।
    15. दीमक के प्रकोप में एल्ड्रीन का छिड़काव उपयोगी होगा।
    16. कटिंग से तैयार पौधों को 6 माह के उपरान्त ट्रान्सप्लान्ट करना चाहिए।
    17. तैयार पौधों को नर्सरी से निकालते समय इस बात पर ध्यान दिया जाय कि पौधों की जड़ों को कोई नुकसान न पहुंचे।
उपरोक्तानुसार कटिंग रोपण से प्रति एकड़ लगभग 2.00 से 2.25 लाख कटिंग का रोपण नर्सरी से किया जा सकता है।

अंतरण :  रोपण एवं पौध दूरी – 

सामान्यत: झाड़ीनुमा वृक्षारोपण में 3′ x 3′ अथवा 6′..3′ x 2′ की दूरी पर वृक्षारोपण किया जाता है। इस प्रकार एक एकड़ में लगभग 5000 पौध की आवश्यकता होती है। प्रथम वर्ष शहतूत वृक्षारोपण की स्थापना से एक वर्ष शहतूत पौध के विकास में लगता है। तीसरे वर्ष में उक्त वृक्षारोपण से समयान्तर्गत एवं समुचित मात्रा में खाद/ उर्वरक के प्रयोग एवं कर्षण कार्यों से एक एकड़ क्षेत्र से लगभग 8 से 10 हजार कि०ग्रा० प्रतिवर्ष शहतूत पत्ती का उत्पादन हो सकेगा।
उक्त पत्ती पर वर्ष में 800-900 डी०एफ०एल्स० का कीटपालन किया जा सकता है, जिससे लगभग 300 कि०ग्रा० कोया उत्पादन होगा। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सामान्यत: प्रति 100 डी०एफ०एल्स० रेशम कीटपालन हेतु 800-900 कि०ग्रा० शहतूत पत्ती की आवश्यकता होती है। प्रति कि0ग्रा0 रेशम के उत्पादन पर लगभग 20 से 25 कि0ग्रा0 पत्ती का उपयोग होता है।

गैप-फिलिंग –

शहतूत पौध के वृक्षारोपण के लगभग एक माह के पश्चात् वृक्षारोपण का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक है। जो पौध सूख गये हों, उनके स्थान पर नयी शहतूत पौध का रोपण किया जाता है। इसे गैपफिलिंग कहते हे। गैपफिलिंग का कार्य वृक्षारोपण के पश्चात् एक या डेढ़ माह के अन्दर पूर्ण किया जाना चाहिए, अन्यथा बड़े पौधों के बीच छोटी पौध लगाने पर उसका विकास सही से नही होता है। प्रति पेड़ पौध घटने से पत्ती का उत्पादन एवं तदनुसार कोया उत्पादन घटता है। फलस्वरूप आय भी प्रभावित होती है।

खाद व उर्वरक का प्रयोग –

वृक्षारोपण के 2-3 माह उपरापन्त वृक्षारोपण में 50 किग्रा० नाइट्रोजन का उपयोग प्रति एकड़ दर से किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ जुलाई/ अगस्त में स्थापित वृक्षारोपण सितम्बर/ अक्टूबर में एवं दिसम्बर/ जनवरी में स्थापित वृक्षारोपण में मार्च/ अप्रैल में उर्वरक का प्रयोग किया जाना चाहिए।

शहतूत वृक्षारोपण के दो माह के उपरान्त एक हल्की गुड़ाई की जानी चाहिए। उसके उपरान्त पुन: निराई की जानी चाहिए। इसके पश्चात प्रत्येक प्रूनिंग के पश्चात गुड़ाई एवम निराई की जानी चाहिए।

सिंचाई व खरपतवार नियंत्रण –

मानसून काल में कराये गये वृक्षारोपण में प्राकृतिक वर्षा के कारण शरद काल में कराये गये वृक्षारोपण से कृषि लागत कम आती है। फिर भी वर्षाकाल मे यदि 15-20 दिवस वर्षा न हो, तो वृक्षारोपण में कृषि सिंचाई की जानी आवश्यक है। सिंचाई की व्यवस्था माह मई के बीच अवश्य की जानी चाहिए। इस समय में 15-20 दिवस के अन्दर पर भूमि की किस्म के अनुरूप सिंचाई आवश्यक है।

कटाई/छंटाई (प्रूनिंग) : 

किसान भाइयों सामान्यत: शहतूत वृक्षारोपण में एक वर्ष में दो बार प्रूनिंग की जाती है। जून/जुलाई में बाटम प्रूनिंग (जमीन के सतह से 6 इंच की ऊंचाई पर), एक दिसम्बर के मध्य प्रूनिंग (जमीन के सतह से 3 फीट की ऊँचाई पर ) की जाती है। तात्पर्य यह है कि शहतूत पौधों की कटाई-छंटाई वर्ष में दो बार इस भाँति की जाती है कि जिससे कीटपालन के समय पौष्टिक एवं प्रचुर मात्रा में शहतूत पत्तियाँ कीटपालन हेतु उपलब्ध हो सकें।
शहतूत की झाड़ियों का माह दिसम्बर में 3 फीट की उँचाई से काट (प्रून) दिया जाता है एवं मुख्य शाखाओं से निकली पतली शाखाओं को भी काटा-छाँटा जाता है। तत्पश्चात भूमि की गुड़ाई-निराई करते हूए रासायनिक खादों का प्रयोग किया जाता है कि रासायनिक खाद के प्रयोग में एवं कीटपालन हेतु पत्ती तोड़ने के सयम के बीच 20 से 25 दिन का अन्तराल हो।
इसी भाँति वर्षाकाल के प्रारम्भ में शहतूत झाड़ियों को भूमि की सतह से 6 इंच से 9 इंच  की ऊंचाई पर काट लिया जाता है एवं गुड़ाई/ खाद का प्रयोग इस प्रकार किया जाता है एवं प्रूनिंग करते समय इस बात की सावधानी रखी जाती है कि शहतूत टहनियों को क्षति न पहुंचे एवं इसकी छाल भी न उखड़े। वृक्षनुमा शहतूत पेड़ों में वर्ष में एक बार प्रूनिंग माह दिसम्बर में की जानी चाहिए।

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