सूरजमुखी की खेती की जानकारी

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सूर्यमुखी (हेलिऐन्थस ऐनुअस एल) के वंश नाम की उत्पत्ति ग्रीक शब्दों हेलिआस जिसका अर्थ है सूर्य एवं एन्थस मतलब फूल। । इसका फ्रैंच नाम टूर्नेसाल है, जिसका शाब्दिक अर्थ है – सूर्य के साथ घूमना। सूर्यमुखी का जन्म स्थान दक्षिण पश्चिमी अमेरिका एवं मेक्सिको माना जाता है। मेक्सिको से स्पेन होते हुए यह यूरोप पहुँची जहाँ पर अलंकारित पौधों के रूप मे सूर्यमुखी उगाई जाने लगी तथा पूर्वी यूरोप तिलहन फसल के रूप में इसकी खेती प्रारम्भ हुई। सूरज की दिशा होने में मुड़ जाने के कारण इसे सूरजमुखी कहा जाता है। सूरजमूखी पुष्पन अवस्था में यह फसल खेती के अधीन आने वाले सारे क्षेत्र को सुन्दर व दर्शनीय बना देती है । इसलिए इस फसल को सभी मौसमों की फसल की संज्ञा दी गई है । और पकने पर यह हमें उच्च कोटि का खाद्य तेल प्रदान करती है। प्रकाश व ताप असंवेदी होने के कारण इस फसल पर प्रकाश व तापक्रम का प्रभाव नहीं पड़ता है । कम अवधि (90 – 100 दिन) में तैयार होने के कारण बहु फसली खेती के लिए यह एक उत्तम फसल है।

सूरजमुखी की खेती की जानकारी | How to Sunflower farming in india । Sunflower Cultivation Information Guide

सूरजमुखी की खेती की जानकारी | How to Sunflower farming in india । Sunflower Cultivation Information Guide
सूरजमुखी की खेती की जानकारी | How to Sunflower farming in india । Sunflower Cultivation Information Guide

अतः वर्ष में किसी भी समय इसे उगाया जा सकता है। यह देश की महत्तवपूर्ण तिलहनी फसल है। इसका तेल हल्के रंग, अच्छे स्वाद और इसमें उच्च मात्रा में लिनोलिक एसिड होता है । जो कि दिल के मरीज़ों के लिए अच्छा होता है। सूर्यमुखी से कम बीज दर में थोड़े समय में अधिक बीज उत्पादन किया जा सकता है।

सूरजमुखी में पाए जाने वाले पोषक तत्व | Nutrition value in sunflower

सूर्यमुखी के बीज में 40 – 50 प्रतिशत तेल व 20 – 25 प्रतिशत तक प्रोटीन होती है। सूर्यमुखी का तेल स्वादिष्ट एवं विटामिन ए, डी और ई से परिपूर्ण होता है। इसका तेल हल्के पीले रंग, स्निग्ध गंध, उच्च धूम बिन्दु वाला होता है जिसमें बहु – असतृप्त वसा अम्ल विशेष रूप से लिनोलीइक अम्ल की अधिकता (64 प्रतिशत) होती है, जो कि रूधिर कोलेस्टेराल की वृद्धि को रोकने के अलावा उस पर अपचायक प्रभाव भी डालता है । इसलिए ह्रदय रोगियों के लिए इसका तेल लाभप्रद पाया गया है। पोषण महत्व की दृष्टि से लिनोलीइक अम्ल अत्यावश्यक वसा अम्ल है, जिसकी आपूर्ति आहार द्वारा होती है। इसलिए सूर्यमुखी का तेल अधिकांश वनस्पति तेलो की अपेक्षा बेहतर और कुसुम के तेल के समकक्ष माना जाता है। इसके तेल का उपयोग वनस्पति घी (डालडा) तैैयार करने में भी किया जाता है। इसकी गिरी काफी स्वादिष्ट होती है। इसे कच्चा या भूनकर मूँगफली की भाँति खाया जाता है। गिरी का प्रयोग चिरौंजी या खरबूजे की गिरी के स्थान पर किया जाता है। तेल निकालने के पश्चात् प्राप्त खली पशुओं को खिलाने के लिए उपयोगी है जिसमें 40 – 44 प्रतिशत प्रोटीन होती है। सूरजमुखी की उपज बाजार में अच्छे मूल्य पर आसानी से बेची जा सकती है। सूरजमुखी की फसल के साथ मधुमक्खी पालन भी किया जा सकता है।

विश्व में कहाँ कहाँ होती है सूरजमुखी की खेती – where to sunflower cultivate in world

विश्व में सूरजमुखी उत्पादन की सूची –

दुनियां में सूर्यमुखी की खेती 21.48 मिलियन हैक्टर क्षेत्र फल में की गई जिससे 1227.4 किग्रा. प्रति हैक्ट की दर से 26.366 मिलियन टन उत्पादन दर्ज किया गया । सर्वाधिक रकबे में सूर्यमुखी उगाने वाले प्रथम तीन देशो में रूस, यूक्रेन व भारत देश आते है जबकि उत्पादन में रूस, अर्जेन्टिना एवं यूक्रेन आते है । प्रति हैक्टर औसत उपज के मामले में फ्रांस प्रथम (2373.5 किग्रा), चीन द्वितिय (1785.7 किग्रा) एवं और अर्जेन्टिना तृतीय (1701.4 किग्रा.) स्थान पर स्थापित रहे है । भारत में सूर्यमुखी को लगभग 1.81 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में लगाया जाता हे जिससे लगभग 1.16 मिलियन टन उत्पादन प्राप्त होता है तथा 639 किग्रा. प्रति हैक्टर हे औशत उपज आती हे । सबसे अधिक क्षेत्र फल में सूर्यमुखी उगाने तथा अधिकतम उत्पादन देने वाले प्रथम तीन राज्यो में कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश एवं महाराष्ट्र राज्य है जबकि औसत उपज के मामले में उत्तर प्रदेश प्रथम (1889 किग्रा. प्रति हैक्टर), हरियाना द्वितिय (1650 किग्रा. प्रति हैक्टर) एवं बिहार तृतीय (1388 किग्रा) स्थान पर रहे है । छत्तीसगढ़ में सुर्यमुखी की खेती सभी जिलो में कुछ न कुछ में की जा रही है । रायगढ़, राजनांदगांव, दुर्ग, महासमुन्द एवं बिलासपुर जिलो में सूर्यमुखी बड़े पैमाने पर उगाया जा रहा है । सवसे अधिक उत्पादन देने वाले प्रथम तीन जिलों में रायगढ़, राजनांदगांव व दुर्ग जिले आते है । ओसत उपज के मामले में रायगढ़ जिले का प्रथम स्थान (1410 किग्रा. प्रति हैक्टर) है, जिसके बाद धमतरी और महासमुन्द जिलो का स्थान आता है ।
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सूरजमुखी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु –

सूरजमुखी प्रकाशकाल के प्रति असंवेदनशील, कम अवधि तथा अधिक अनुकूलन के कारण सभी मौसमों की फसल कहलाती है। सुखाग्रस्त अथवा बारानी क्षेत्रों में यह फसल देरी से (अगस्त में ) एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसे रबी के मौसम (अक्टूबर – नवम्बर) मे उगाया जाता है। सिंचाई की सुविधा हो तो जायद(गर्मी) के मौसम में भी इसे उगाया जा सकता है। उन क्षेत्रों में जहाँ समान रूप से वितरित 500 – 700 मिमी. वार्षिक वर्षा होती है तथा फूल आने के पूर्व समाप्त हो जाती है, इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। फुल और बीज बनते समय तेज वर्षा और हवा से फसल गिर जाती है। सूरजमुखी की वानस्पतिक वृद्धि के समय गर्म एवं नम जलवायु की आवश्यकता होती है, परन्तु फल आने और परिपक्व होने के समय चटक धूप वाले दिन आवश्यक है। बीज अंकुरण एवं पौध बढ़वार के समय ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती है।

बीज अंकुरण के समय 25-30 डि.से.तापक्रम अच्छा रहता है तथा 15 डि.से. से कम तापक्रम पर अंकुरण प्रभावित होता है। इसकी फसल को 20-25 डि.से. तापक्रम की आवश्यकता होती है। गर्म दिन और ठण्डी रातें फसल के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। सामान्यतौर पर फुल आते समय से अधिक तापक्रम होने पर बीज की उपज और तेल की मात्रा मे गिरावट होती है। इसी प्रकार 16 डि.से. से कम तापमान होने पर बीज निर्माण व तेल प्रतिशत मे कमी आती है। आतपौध्भिद होते हुए भी सूरजमुखी मक्का व आलू की तुलना में छाया को अधिक अच्छी तरह सहन कर सकती है। इसके पौधे का आतपानुवर्ती संचलन मुख्यतया धूप के फलस्वरूप विभेदी आक्सिन सांद्रणों के कारण तने के मुड़ने से होता है। आक्सिन के अंतर्जात उद्दीपन के कारण होने वाले इस प्रकार के संचलन को हैबिट कहते है। शीत ऋतु में कम तापमान होने के कारण फसल देर से परिपक्व (लगभग 130 दिन में) ह¨ती है, जबकि खरीफ के मोसम में उच्च तापमान ह¨ने के कारण यह शीघ्र पकती (80 दिन) है ।

सूरजमुखी की खेती के लिए उपयुक्त भूमि का चुनाव कैसे करें –

सूर्यमुखी की खेती सिंचित बलुई मृदाओं से लेकर उच्च जल धारण क्षमता वाली मटियार मृदाओ तक तथा 6.5 से 8.0 पीएच मान वाली विविध प्रकार की भूमियो मे की जा सकती है। अच्छी उपज के लिए गहरी, उर्वरा, जैवांश युक्त तथा उदासीन अभिक्रिया वाली बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम है। खरीफ की फसल हल्की, रेतीली और पानी के उत्तम निकास वाली भूमि मे ली जा सकती है। यह फसल अस्थाई सूखे का मुकाबला कर सकती है और इसलिए इसे कम वर्षा होने वाले क्षेत्रो मे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। रबी फसल के लिए दोमट – कपास की काली मिट्टी जो काफी दिनों तक नमी संरक्षित रख सके, इसके लिए उपयुक्त होती है।
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सूरजमुखी की खेती के लिए भूमि की तैयारी कैसे करें –

सूरजमुखी के लिए खेत की मृदा हल्की एवं भुरभुरी होनी चाहिए । पिछली फसल काटने के पश्चात् खेत मे एक या दो बार हल या कल्टीवेटर चलाकर खरपतवार नष्ट करते हुए मिट्टी भुरभुरी एवं समतल कर लेनी चाहिए। अंतिम जुताई करने से पूर्व 25 किलो क्लोरपायरीफास प्रति हेक्टेयर बुरक देना चाहिए। रबी की फसल के लिए भूमि की तैयारी अन्य रबी फसलों के समान ही करना चाहिए। वर्षा निर्भर क्षेत्रों मे नमी संरक्षण हेतु उपाय करना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में खरीफ की फसल काटने के तुरंत बाद, जमीन की परिस्थिति के अनुसार जुताई करनी चाहिए। दो या तीन बार कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा कर पाटा द्वारा भूमि को समतल करना चाहिए। सूर्यमुखी के बीज का छिलका मोटा होने के कारण नमी को धीमी गति से सोखते है । इसलिए बोआई के समय खेत में पर्याप्त नमी का रहना आवश्यक पाया गया है । जलभराव की स्थिति क¨ यह फसल सहन नही कर सकती है । अतः खेत मे जल निकास की पर्याप्त व्यवस्था करना भी आवश्यक है।

सूरज मुखी की खेती के लिये उन्नत किस्मों का चयन –

जेएसएल-1 (जवाहर सूर्यमुखी) –

इसका दाना मध्यम आकार का ठोस व काले रंग का चमटा होता है। यह किस्म जल्दी अर्थात् 120 से 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है । तेल की मात्रा 50 प्रतिशत तथा औसत पैदावार 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। यह किस्म मध्यप्रदेश के सभी क्षेत्रों मे खरीफ एवं रबी मौसमों के लिये उपयुक्त है।

अर्माविस्किज (ई. सी. 68415)-

इसका दाना मध्यम आकार का ठोस, हल्के काले रंग का तथा कुछ छोटा रहता है। यह किस्म 125से 130 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। उपज क्षमता 9-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह खरी मौसम के लिए मध्यप्रदेश के सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह रसियन किस्म है।

पैरिडोविक (ई. सी. 68414)

इस किस्म का दाना ई. सी. 64415 के समान ही होता है, लेकिन रंग का गहरा काल होता है। यह देरी से (130 से 135 दिनों में) पकती है तथा इसके बीज में तेल की मात्रा 42 प्रतिशत होती है। औसत पैदावार 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। खरीफ एवं रबी दोनों मौसमों मे मालवा एवं निमाड़ क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह भी रसियन किस्म है।

डीआरएसएफ-108

यह 90 – 95 दिन मे तैयार होने वाली सूखा सहनशील किस्म है। औसतन 22-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। बीज में 40 प्रतिशत तेल होता है। असिंचित क्षेत्रों में खरीफ ऋतु के लिए उपयुक्त किस्म है।

एमएलएसएफएच-82

यह 85-100 दिन में तैयार होने वाली सूखा सहनशील किस्म है। औसतन 22-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। बीज में 35 प्रतिशत तेल ह¨ता है। मध्य प्रदेश एवं छत्तिससगढ़ के लिए उपयुक्त संकर किस्म है।

मार्डन

इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 6 से 8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है | इसकी उपज समय अवधि 80 से 90 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 90 से 100 सेमी. तक होती है | इस प्रजाति की खेती बहुफसलीय क्षेत्र के लिए उपयुक्त है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 38 से 40 प्रतिशत होती है |

बी.एस.एच. – 1

इस प्रजाति की उत्पादन 10 से 15 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 100 से 150 सेमी. तक होती है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 41 प्रतिशत होती है |

एम.एस.एच.

इस प्रजाति की उत्पादन 15 से 18 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 170 से 200 सेमी. तक होती है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 42 से 44 प्रतिशत होती है |

सूर्या

इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 100 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 130 से 135 सेमी. तक होती है | इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है | इस प्रजाति में तेल की मात्र38 से 40 प्रतिशत होती है |

ई.सी. 68415

इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 110 से 115 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 180 से 200 सेमी. तक होती है | इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 38 से 40 प्रतिशत होती है|

Jwalamukhi –

यह दरमियाने कद की किस्म है। पौधे का कद 170 सैं.मी. है। फसल 120 दिनों में पक जाती है। इसकी औसत पैदावार 7.3 क्विंटल प्रति एकड़ है। तेल की मात्रा 42 प्रतिशत है।

GKSFH 2002 –

यह दरमियाने कद की दोगली किस्म है। फसल 115 दिनों में पक जाती है। इसकी औसत पैदावार 7.5 क्विंटल प्रति एकड़ है। तेल की मात्रा 42.5 प्रतिशत है।

PSH 569 –

पौधे का कद 141 सै.मी. है। फसल 98 दिनों में पक जाती है। यह किस्म पिछेती बिजाई के लिए अनुकूल है। इसकी औसत पैदावार 7.44 क्विंटल प्रति एकड़ है और 36.3 प्रतिशत तेल होता है।

PSH 996 –

यह दरमियानी ऊंची 141 सै.मी. दोगली किस्म है। फसल 96 दिनों में पक जाती है। इसकी औसत पैदावार 7.8 क्विंटल प्रति एकड़ है। इसके बीज में 35.8 प्रतिशत तेल होता है। यह किस्म पिछेती बिजाई के लिए अनुकूल है।

दूसरे राज्यों की किस्में –

किस्में – DRSF 108, PAC 1091, PAC-47, PAC-36, Sungene-85, Morden
हाइब्रिड – KBSH 44, APSH-11, MSFH-10, BSH-1, KBSH-1, TNAU-SUF-7, MSFH-8, MSFH-10, MLSFH-17, DRSH-1, Pro.Sun 09

सूरजमुखी की खेती हेतु बीज की मात्रा एवं बीज उपचार

सूरजमुखी का प्रमाणित बीज ही उपयोग में लाना चाहिए। सूरजमुखी के बीज भार में हलके (5.6 से 7.5 ग्राम प्रति 100 बीज) ह¨ते है । सूरजमुखी की संकुल किस्मों के लिए 8-10 किग्रा. तथा संकर किस्मो के लिए 6-7 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है।बुआई के पूर्व बीज को 24 घंटे पानी में भिगोकर बोने से अंकुरण प्रतिशत बढ़ता है। बोनी के पूर्व बीज को कैप्टान या थाइरम नामक फफूँदनाशक दवा (3 ग्राम दवा प्रति किलो बीज) से उपचारित करना आवश्यक है। इससे फफूँदी रोग नहीं हो पाता ।

बोआई का समय –

बहुत सी फसलो की तरह सूर्यमुखी दिन की अवधि तथा ऋतु विशेष से प्रभावित नहीं होती है और इसलिए इसकी ब¨आई किसी भी समय की जा सकती है । अत्यधिक ठण्डे मौसम को छोड़कर वर्ष के प्रायः सभी महीनो में सूर्यमुखी की बुआई की जा सकती है। खरीफ की फसल विशेषकर बारानी क्षेत्रों में अगस्त के दूसरे या तीसरे सप्ताह मे इसकी बोनी करनी चाहिये। जून व जुलाई माह में बोनी करने से उपज प्रायः कम होती है। क्योंकि परागण क्रिया करने वाले कीड़े बहुत कम आते है जिससे बीज का निर्माण ही नहीं होता या सभी बीज पोचे रह जाते है। अतः विभिन्न क्षेत्रों में बोनी का समय इस तरह निर्धारित करना चाहिए जिससे फसल मे फूल बनते समय अधिक व लगातार वर्षा न हो। सूखग्रस्त क्षेत्रों में अक्टूबर से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक ब¨नी की जा सकती है। वसन्तकालिक फसल की बोआई 15 जनवरी से 2 0 फरवरी तक करना उचित रहता है ।

सूरजमुखी की बोआई की विधियाँ –

सूर्यमुखी की बुआई कतार या डिबलिंग विधि से करनी चाहिए। संकुल किस्मों में पंक्तियों का फासला 45 सेमी. कतार से कतार तथा 15 से 20 सेमी. पौध से पौध अंतर रखना चाहिए। संकर किस्मों की बोनी 60 – 75 सेमी. दूर कतारों में तथा पौध से पौध के बीच की दूरी 20 से 25 सेमी. रखना चाहिए। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 60 – 70 हजार पौधे प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहते है। बीज क¨ 2-4 सेमी. की गहराई पर बोना उचित पाया गया है । गर्मी के समय उच्च तापमान ह¨ने के कारण मृदा की ऊपरी परत से नमी शीघ्र सूख जाती है, अतः ब¨आई 4 सेमी. की गहराई पर करना लाभकारी पाया गया है । सूरजमूखी के दानों का अंकुरण धान्यों की अपेक्षा अधिक देर से होता है, क्योकि इसके बीज का छिलका मोटा ह¨ने के कारण उनमें जल अवशोषण धीमी गति से ह¨ता है साथ ही इसका अंकुरण भी उपरिभूमिक होता है। इसके अलावा मृदा की पपड़ी (क्रस्ट) अंकुरण की गति को और अधिक मंद कर सकती है । उचित नमी एवं तापमान पर सूर्यमुखी के बीज का जमाव प्रायः 8-10 दिन में हो जाता है।

खाद एवं उर्वरक –

पौधों की बढ़वार के लिए नाइट्रोजन, स्फुर एवं पोटाश आवश्यक तत्व है। नत्रजन तत्व की कमी से पौधो की बढ़वार मंद पड़ जाती है । जड़ो का विकास, बीज का आकार, उचित दाना भराव व तेल में बढ़ोतरी के लिए फास्फोरस आवश्यक पोषक तत्व माना गया है। दाना भराव व रोग रोधित के लिए पोटाश एक उपयोगी तत्व है। पोटेशियम की अत्याधिक कमी ह¨ने से बीज खाली रह जाते है । दो या तीन वर्ष में एक बार 25 से 30 गाड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर देना चाहिये। वर्षा निर्भर क्षेत्रों में 30 किग्रा. नत्र्ाजन, 30 किग्रा. स्फुर तथा 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बोनी के साथ देना चाहिए। सिंचितक्षेत्र मे 60-8 0 किग्रा. नत्रजन , 60 किग्रा. स्फुर तथा 40 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर देना चाहिए । सिंचित क्षेत्रों में बोनी के समय स्फुर पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा देनी चाहिये। शेष आधी नत्रजन की मात्रा फसल बोने के लगभग एक महीने के बाद सिंचाई के पहले देना चाहिये। लगातार सघन कृषि पद्धतियों से जस्ते व गंधक की भूमि में कमी देखी जा रही है। तिलहनी फसल होने के कारण सूर्यमुखी को सल्फर तत्व की आवश्यकता पड़ती है। बुआई के समय 20-25 किग्रा. जिंक सल्फेट देना लाभप्रद रहता है। यदि फास्फोरस को सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में दिया जाता है, तो अलग से सल्फर देने की आवश्यकता नहीं होती है। बुआई के समय सुपर फॉस्फेट या जिंक सल्फेट नहीं दिया गया है तो फसल में फूल आने की अवस्था में जिंक सल्फेट 2.5 किग्रा. और चूना 1.25 किग्रा. को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना भी लाभकारी पाया गया है।
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सूरजमुखी की खेती में सिंचाई एवं जल निकास प्रबंधन –

खरीफ ऋतु में लगाई गई सूर्यमुखी की फसल क¨ सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है । अवर्षा अथवा सूखा की स्थिति में 1-2 सिंचाई देने से उपज में बढ़ोत्तरी होती है । भारी वर्षा होने पर खेत से जल निकासी आवश्यक है । रबी एवं जायद की सूर्यमुखी मे तीन सिंचाईयाँ प्रथम बोआई के 40 दिन बाद, द्वितिय बोआई के 75 दिन बाद (पुष्पन अवस्था) तथा तृतीय बोआई के 100 दिन बाद (दाना भरते समय) देना लाभ कारी रहता है । पुष्पन एवं दानो के विकास की अवस्था पर नमी की कमी का फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । शीतकालीन या बसन्तकालीन सूर्यमुखी की बोआई एक हलकी सिंचाई करने के बाद करना लाभप्रद होता है ।

खरपतवार नियंत्रण –

अंकुरण के 10 – 12 दिन बाद पौधों – से – पौधों का अंतर 20 सेमी. रखने के लिये अनावश्यक पौधों को उखाड़ देना चाहिये तथा एक स्थान पर केवल एक ही पौधा रखना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण हेतु कतारों के बीच में एक-दो बार गुड़ाई (बुआई के 25-30 से दिन व 40-50 दिन) करना चाहिये। सूरजमुखी का फूल भारी और बड़ा होता है जिसके कारण आँधी-पानी से पौधे गिर सकते हैं। अतः दूसरी गुड़ाई के समय पौधों पर मिट्टी चढ़ाने का कार्य भी करना चाहिए। खरपतार नियंत्रण हेतु 1 किग्रा. फ्लूक्लोरैलिन (बासालिन 45 ईसी) या पेन्डीमिथिलीन (स्टाम्प 30 ईसी) 3 लीटर प्रति हेक्टेयर का 600 – 800 लीटर पानी में मिलाकर अंकुरण से पूर्व छिड़काव करना चाहिये।

सूरजमुखी में परसेचन क्रिया –

सूरजमुखी सामान्यतः परपागित फसल है। अतः अच्छे बीज पड़ने एवं उनके भराव हेतु परसेचन क्रिया नितान्त आवश्यक है मधुमक्खियों की उपुक्त संख्या होने पर ही परागण अच्छा होता है सूरजमुखी में फूल आते समय प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मधुमक्खियों के 2-3 छत्तों को एक माह तक रख कर मुण्डकों में पर परागण की क्रिया को बढ़ाया जा सकता है। मधुमक्खियों की सुरक्षा हेतु कीटनाशकों का प्रयोग कम-से -कम करना चाहिये। ग्रीष्म ऋतु में मक्खियों की संख्या में कमी आ जाती है। अतः कृत्रिम परसेचन करना आवश्यक हो जाता है। इसके लिए पौधों में अच्छी तरह फल के मुंडक पर चारों ओर धीरे-धीरे घुमा देना चाहिये, जिससे परागकण आसानी से पूरे मुंडक में पहुँचकर परसेचन क्रिया में सहायक हो जाये। यह क्रिया प्रातः काल 7 बजे से 10 बजे के मध्य, एक दिन के अन्तराल से 3-4 बार करनी चाहिए।

पक्षियों से फसल की रखवाली –

सूरजमुखी में दाना बनते समय फसल की पक्षियों से रक्षा करना चाहिए। फसल को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने वाला पक्षी तोता होता है। इससे बचाव के लिए पक्षियो को उड़ाने वाले कुछ साधनों जैसे बिजूखा लगाना, पटाखा चलाना या ढोल बजाने की संस्तुति की गयी है।

फसल पद्धति – crop rotation in sunflower crop

सूरजमुखी दिन की लम्बाई के प्रति अपनी अभिक्रिया में प्रकाश उदासीन होने के कारण इसे प्रायः सभी प्रकार के फसल चक्रों में सम्मिलित किया जा सकता है। उत्तरी भारत में यह मक्का-तोरिया/राई-सूरजमुखी, धान-सूरजमुखी, मक्का-मटर-सूरजमुखी, मक्का-आलू-सूरजमुखी आदि फसल चक्रों में उगाई जा सकती है। अन्तः फसली खेती के अन्तर्गत सूरजमुखी + मूँगफली (2.4), अरहर + सूरजमुखी (1.2), सूरजमुखी + सोयाबीन (3.3), सूरजमुखी + उड़द (1.1), मूँगफली +सूरजमुखी (6.2 कतार अनुपात) में उगाना चाहिए।

सूरजमुखी की कटाई एवं गहाई –

सूरजमुखी की फसल खरीफ में 80-90 दिन, रबी में 105-130 दिन तथा जायद में 100-110 दिन में तैयार हो जाती है। शीत ऋतु मे कम तापमान के कारण फसल अधिक समय में परिपक्व होती है। जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ने लगें, पुष्प आधार की पिछली सतह पीली पड़ जाए और ब्रेक्ट भूरे पड़ने लगे तो उस समय फसल को काटना उपयुक्त रहता है। यह अवस्था सामान्यतया परागण के लगभग 45 दिन बाद आती है। इस समय मुंडक सूखे नहीं दिखते है,परन्तु बीज पक जाते हैं। बीजों में इस समय लगभग 18 प्रतिशत नमी होती है। कटाई हँसिया से या हाथ से उखाड़ कर करते हैं तथा मुंडक को अलग कर लेते हैं। कटाई पश्चात सूरजमुखी के मुंडकों को 5-6 दिन तक सुखाने के बाद डंडों से पीटकर बीज को अलग कर लिया जाता है। अधिक क्षेत्रफल में उगाई गई फसल की गहाई थ्रेसर से भी की जा सकती है। बीजों को साफ करने के बाद धूप में सुखा लेना चाहिए।

उपज एवं भंडारण –

सूरजमुखी की संकुल किस्मों से 15 – 20 एवं संकर क्विंटल किस्मों से 20 – 30 क्विंटल प्रति हे. उपज प्राप्त होती है। खरीफं ऋतु की अपेक्षा रबी एवं बसंत में सूर्यमुखी की उपज अधिक प्राप्त होती है। बीज को भंडारित करने के पूर्व 2-3 दिन तक अच्छी प्रकार से सुखाना आवश्यक है। जब बीजों में नमी की मात्रा 10 प्रतिशत या इससे कम हो जाय तब उनको उचित स्थान पर संग्रहित करना चाहिए। सूर्यमुखी के बीजों में सुसुप्तावस्था लगभग 45 – 50 दिन की होती है।

सूरजमुखी की खेती में फसल सुरक्षा प्रबंधन –

सूरजमुखी की फसल में लगने वाले कीट और उनकी रोकथाम –

तंबाकू सूण्डी :

यह सूरजमुखी का प्रमुख कीड़ा है और अप्रैल मई महीने में हमला करता है ये पत्तों को अपना भोजन बनाते हैं।
सूण्डियों को पत्तों सहित नष्ट कर दें। यदि इसका हमला दिखे तो फ़िप्रोनिल एस सी 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें। हमला बढ़ने की हालत में दो स्प्रे 10 दिनों के फासले पर करें या स्पिनोसैड 5 मि.ली. प्रति 10 ली. पानी या नुवान + इंडोएक्साकार्ब 1 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

अमेरिकन सूण्डी

यह कीड़ा पौधों और दानों को खाता है। इससे फफूंद लगती है और फूल गल जाते हैं। इसकी सूण्डी हरे से भूरे रंग की होती है। इसको रोकने के लिए 4 फेरोमोन कार्ड प्रति एकड़ लगाएं। यदि खतरा बढ़ जाये तो कार्बरिल 1 किलो या एसीफेट 800 ग्राम या कलोरपाइरीफॉस 1 ली.को 100 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ स्प्रे करें।

बालों वाली सूण्डी :

सूण्डी पत्तों को नीचे की ओर से खाती है जिससे पौधे सूख जाते हैं। इसकी सूण्डी पीले रंग की और बाल काले होते हैं। सूण्डियों को इकट्ठा करके नष्ट करा दें। यदि हमला दिखे तो फिप्रोनिल एस सी 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। हमला ज्यादा होने पर 10 दिनों के अंतराल पर 2 स्प्रे करें या स्पिनोसैड 5 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

तेला –

इसका हमला आंखे बनने के समय होता है। इससे पत्ते मुड़ जाते हैं और जले हुए नज़र आते हैं। यदि 10-20 प्रतिशत बूटों के ऊपर रस चूसने वाले कीड़ों का हमला दिखे तो नीम सीड करनाल एक्सटरैक 50 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

सूरजमुखी की खेती में लगने वाली बीमारियां और रोकथाम –

कुंगी-

यह बीमारी पैदावार का 20 प्रतिशत तक नुकसान करती है। यदि कुंगी का हमला दिखे तो इसकी रोकथाम के लिए ट्राइडमॉर्फ 1 ग्राम या मैनकोजेब 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 15 दिनों के अंतराल पर दूसरी बार स्प्रे करें या हैक्साकोनाज़ोल 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों के अंतराल पर दो बार स्प्रे करें।

जड़ों का गलना –

इस रोग वाले पौधे कमज़ोर हो जाते हैं और जल्दी पक जाते हैं। तने के ऊपर राख के रंग के धब्बे पड़ जाते हैं परागण के बाद पौधा अचानक सूख जाता है। इसको रोकने के लिए बिजाई के 30 दिन बाद टराईकोडरमा विराईड 1 किलो को 20 किलो रूड़ी की खाद या रेत में मिलाकर डालें। इसके इलावा कार्बेनडाज़िम 1 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

तने का गलना –

फसल बीजने के 40 दिनों के बाद यह बीमारी नुकसान करती है। प्रभावित पौधे का तना और ज़मीन के नजदीक हिस्से में फफूंद बननी शुरू हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए बिजाई से पहले 2 ग्राम थीरम से प्रति किलो बीज का उपचार करें।

ऑल्टरनेरिया झुलसा रोग –

इस रोग से बीज और तेल की पैदावार कम हो जाती है। पहले नीचे के पत्तों के ऊपर गहरे भूरे और काले धब्बे पड़ जाते हैं जो कि बाद में ऊपर वाले पत्तों पर पहुंच जाते हैं। नुकसान बढ़ने पर यह धब्बे तने के ऊपर भी पहुंच जाते हैं। यदि इसका नुकसान दिखे तो मैनकोजेब 3 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों के अंतराल पर चार बार स्प्रे करें।

फूलों का गलना –

शुरू में फूलों के ऊपर भूरे रंग के धब्बे नज़र आते हैं। बाद में यह धब्बे बड़े हो जाते हैं और फफूंद लग जाती है जो कि अंत में काले हो जाते हैं। फूल निकलने या बनने के समय यदि इसका नुकसान दिखे तो मैनकोजेब 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें ।

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