शकरकंद की खेती : Sweet potato farming

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सर्दियों में खाए जाने वाले कंदों में शकरकंद काफी प्रचलित हैं। शकरकंद को मीठा आलू भी कहा जाता हैं । शकरकंद का वैज्ञानिक नाम Ipomea batatus है। आलू की तरह शकरकंद भी जमीन में पैदा होती है और इसमें स्टार्च भरपूर मात्रा में होती है, इसलिए इसका प्रयोग शरीर में ऊर्जा बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसमें आंखों की रोशनी बढ़ाने वाला कैरोटीनॉयड रसायन भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है। जिसकी गिनती कंद वर्गीय फसलों की श्रेणी में होती हैं ।
इसका पौधा जमीन के अंदर और बहार दोनों जगह विकास करता हैं । जमीन के बाहर इसका पौधा बेल के रूप में फैलकर विकास करता हैं । शकरकंद का सबसे ज्यादा उत्पादन चीन में किया जाता हैं । जिसका इस्तेमाल खाने में कई तरह से किया जाता हैं । शकरकंद का इस्तेमाल सब्जी के रूप में किया जाता हैं । इसके अलावा बड़ी मात्रा में लोग इन्हें भुनकर और उबालकर भी खाते हैं । भुनकर खाने पर इसका स्वाद काफी लजीज होता हैं ।

शकरकंद की खेती कहाँ होती है – where to grow sweet potato farming in india

शकरकंद की खेती वैसे तो पूरे भारत में की जाती है । शकरकंद की खेती में भारत दुनिया में छठे स्थान पर आता है। लेकिन ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश,पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में इसकी खेती सब से अधिक होती है। शकरकंद की खेती में भारत दुनिया में छठे स्थान पर आता है। बाराबंकी जिले में भी शकरकंद भारी मात्रा में उगाई जाती है।

Ipomea batatus cultivation | sweet potato farming in hindi | मीठा आलू शकरकंद की खेती

शकरकंद की खेती आलू की फसल की तरह की जाती है । शकरकंद में आलू से अधिक मात्रा में स्टार्च और मिठास की मात्रा पाई जाती हैं । इसके अलावा शकरकंद में विटामिन काफी मात्रा में पाई जाती हैं । शुष्क प्रदेशों में शकरकंद मुख्य खाद फसल के रूप में कार्य करती हैं । शकरकंद मानव शरीर के लिए कई तरह से उपयोगी मानी जाती है । इसके खाने से चेहरे पर चमक और बालों में वृद्धि भी देखने को मिलती हैं. इसके अलावा इसका इस्तेमाल दिल की बीमारी में काफी लाभदायक होता हैं ।
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जलवायु व तापमान –

शकरकंद की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त मानी जाती हैं. शकरकंद की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. शकरकंद की खेती समुद्र तल से 1600 मीटर तक की ऊंचाई वाले भागों में सफलतापूर्वक की जा सकती हैं. इसकी खेती के लिए सर्दी का मौसम कम उपयोगी होता हैं. शकरकंद की खेती के लिए हल्की अम्लीय भूमि उपयुक्त होती हैं. शकरकंद की खेती किसानों के लिए अच्छी उपज देने वाली खेती मानी जाती हैm. शकरकंद की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय और उप उष्णकटिबंधीय जलवायु को उपयुक्त माना जाता हैं. भारत में इसकी खेती साधारण रूप से साल की तीनों ऋतुओं में की जा सकती हैं. लेकिन व्यावसायिक तौर पर उगाने के दौरान इसे गर्मी या बरसात के मौसम में ही उगाना चाहिए. गर्मी और बरसात के मौसम में इसके पौधे अच्छे से विकास करते हैं. सर्दियों में इसके पौधे अच्छे से विकास नही कर पाते. क्योंकि सर्दियों में पड़ने वाला पाला इसकी खेती के लिए अनुपयोगी माना जाता हैं. भारत में इसे मुख्य रूप से मध्य भारत में अधिक उगाया जाता है. इसकी खेती के लिए औसतन 80 से 100 सेंटीमीटर वर्षा काफी मानी जाती हैं । शकरकंद के कंदों को शुरुआत में अंकुरित होने के लिए 22 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती हैं. अंकुरित होने के बाद शकरकंद के पौधों को विकास करने के लिए 25 से 30 डिग्री के बीच का तापमान उपयुक्त माना जाता है. इसके पौधे गर्मियों में अधिकतम 35 डिग्री तापमान को सहन कर सकते हैं. लेकिन इस दौरान पौधों की सिंचाई की ज्यादा जरूरत होती हैं ।
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शकरकंद की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी का चुनाव –

शकरकंद की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती हैं. लेकिन व्यावसायिक तौर पर अच्छा उत्पादन लेने के लिए इसे बलुई दोमट मिट्टी में उगाना अच्छा माना जाता हैं. जलभराव, कठोर और पथरीली भूमि में शकरकंद की खेती नही करनी चाहिए. क्योंकि इस तरह की भूमि में इसके कंद अच्छे से विकास नही करते. शकरकंद के कंदों की मिठास और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए इसे हल्की अम्लीय भूमि में उगाना चाहिए. इसके लिए भूमि का पी.एच. मान 5.8 से 6.8 के बीच होनी चाहिए ।

खेत की तैयारी –

शकरकंद की खेती के लिए मिट्टी का साफ़ और भुरभुरा होना जरूरी होता हैं. इसके लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट कर खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दें. उसके बाद खेत को कुछ दिन के लिए खुला छोड़ दें ताकि भूमि में मौजूद मृदा जनित रोगों के कीट नष्ट हो जाएँ. उसके बाद खेत में जैविक खाद के रूप में पुरानी गोबर की खाद या अन्य जैविक खाद की उचित मात्रा को खेत में डालकर अच्छे से मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के लिए खेत की दो से तीन बार कल्टीवेटर के माध्यम से तिरछी जुताई कर दें । जुताई करने के बाद खेत में पानी चलाकर उसका पलेव कर दें. और पलेव करने के तीन से चार दिन बाद जब मिट्टी की ऊपरी सतह हल्की सूखी दिखाई देने लगे तब खेत की एक बार फिर से जुताई कर उसमें रोटावेटर चला दें. इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी दिखाई देने लगती हैं. उसके बाद खेत में पाटा चलाकर उसे समतल बना दें. ताकि भूमि में बारिश के वक्त जलभराव जैसी समस्याओं का सामना ना करना पड़े । शकरकंद की रोपाई समतल भूमि में मेड बनाकर की जाती हैं. इसके लिए खेत की अच्छे से जुताई करने और समतल बनाने के बाद खेत में उचित दूरी रखते हुए मेड तैयार की जाती हैं. इस दौरान प्रत्येक मेड़ों के बीच दो फिट के आसपास दूरी होनी चाहिए ।

शकरकंद की खेती की उन्नत किस्में –

शकरकंद की कई सारी उन्नत किस्में हैं. जिन्हें उनके रंग और उत्पादन के आधार पर तैयार किया गया हैं. कंदों के रंग के आधार पर इसकी तीन प्रजातियाँ पाई जाती हैं. जिनके कंदों का रंग पीला, लाल और सफ़ेद पाया जाता हैं.

पीली प्रजाति –

पीली प्रजाति के कंदों में पानी की मात्रा कम पाई जाती हैं. इस प्रजाति के कंदों में विटामिन ए की मात्रा अधिक पाई जाती हैं.

भू सोना –

इस किस्म के कंदों के छिलके और गुदा दोनों का रंग पीला दिखाई देता हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 20 टन के आसपास पाया जाता हैं. इस किस्म को सबसे ज्यादा दक्षिण भारत के राज्यों में उगाया जाता हैं. इस किस्म के पौधों में बीटा कैरोटिन की मात्रा 14 प्रतिशत तक पाई जाती हैं.

एस टी 14

शकरकंद की इस किस्म को जल्द पैदावार देने के लिए तैयार किए गया हैं. इस किस्म के कंद रोपाई के लगभग 105 से 110 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के कंद बाहर से हल्के पीले दिखाई देते हैं. और अंदर का गुदा हल्का हरापन लिए पीला दिखाई देता हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 15 से 20 टन के बीच पाया जाता हैं.

गौरी –

शकरकंद की इस किस्म के कंदों का रंग बाहर से लाल बैंगनी दिखाई देता हैं. जबकि इसके कंद के अंदर का गुदा पीला दिखाई देता हैं. इसके कंदों में बीटा कैरोटीन की मात्रा अधिक पाई जाती हैं. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 110 से 115 बाद पककर खुदाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों को रबी और खरीफ दोनों मौसम में उगा सकते हैं. इन किस्म का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 टन के आसपास पाया जाता हैं.

लाल प्रजाति

लाल प्रजाति साधारण रूप से खुरखुरी होती हैं. जबकि भूमि की दृष्टि से इस प्रजाति के कंद अधिक शक्तिशाली या सहनशील माने जाते हैं.

भू कृष्णा

शकरकंद की इस किस्म के कंदों का बाहरी रंग पीला मटियाला दिखाई देता हैं. जबकि इसके कंद का गुदा अंदर से लाल दिखाई देते हैं. शकरकंद की इस किस्म को दक्षिण भारत के राज्यों में अधिक उगाया जाता हैं. शकरकंद की इस किस्म को केंद्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान, तिरुवनंतपुरम द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 18 टन के आसपास पाया जाता हैं.

एस टी 13

शकरकंद की इस किस्म के कंद को काटने पर इसका गुदा चुकन्दर के समान लाल दिखाई देता हैं. इस किस्म के कंदों को अधिक समय तक उपयोग में लिया जा सकता हैं. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 110 से 115 दिन में पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 15 टन के आसपास पाया जाता हैं. इस किस्म के कंदों में मिठास की मात्रा कम पाई जाती हैं.

सफ़ेद प्रजाति

सफ़ेद प्रजाति के की किस्मों के जल की मात्रा सबसे ज्यादा पाई जाती हैं. इस प्रजाति के कंदों का इस्तेमाल भुनकर खाने में अधिक किया जाता हैं.

पंजाब मीठा आलू 21

शकरकंद की इस किस्म को पंजाब में अधिक उगाया जाता हैं. इस किस्म के कंद देरी से पककर तैयार होते हैं. जो रोपाई के लगभग 140 से 145 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 22 टन के आसपास पाया जाता हैं. इस किस्म के कंद बाहर से लाल दिखाई देते हैं. जबकि इनका गुदा सफ़ेद रंग का पाया जाता हैं.

श्री अरुण

शकरकंद की इस किस्म के पौधे जल्दी और अधिक पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 100 दिन बाद ही पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म का निर्माण सेंट्रल ट्यूब क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट, श्रीकरियम के द्वारा किया गया हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 30 टन के आसपास पाया जाता हैं. इस किस्म के कंद बाहर से लाल गुलाबी दिखाई देते हैं. जबकि इसके गुदे का रंग क्रीमी सफ़ेद दिखाई देता हैं.

पूसा सफ़ेद

शकरकंद की इस किस्म के कंद बाहर से हलके पीले मटियाले रंग के दिखाई देते हैं. जबकि इनको काटने पर अंदर से इनका गुदा सफ़ेद दिखाई देते हैं. इस किस्म के पौधे रोपाइ के लगभग 110 से 120 दिन बाद अच्छे से पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 25 से 30 टन के बीच पाया जाता हैं ।

शकरकंद की अन्य उन्नत क़िस्में –

इनके अलावा और भी अलग अलग प्रजाति की बहुत सारी किस्में मौजूद हैं. जिन्हें अलग अलग जगहों पर अधिक उत्पादन लेने के लिए उगाया जाता हैं. जिनमें राजेंद्र शकरकंद, कलमेघ, पूसा रेड, श्री वर्धिनी, पूसा सुहावनी, श्री नंदिनी, एच- 268, श्री वरुण, वर्षा, क्लास 4, सीओ- 1, 2, श्री रतना, जवाहर शकरकंद- 145, एच- 41, भुवन संकर, कोनकन और अशवनी जैसी बहुत सारी किस्में मौजूद हैं ।

पौध तैयार करना –

शकरकंद की खेती के लिए पहले नर्सरी में इसकी पौध तैयार की जाती हैं. इसकी पौध खेत में लगाने के लगभग एक महीने पहले तैयार की जाती हैं. इसके लिए इसके बीजों को नर्सरी में लगाकर इसकी बेल तैयार की जाती हैं. उसके बाद जब इसकी बेल तैयार हो जाती हैं, तब उनको उखाड़कर उसकी कटिंग तैयार कर खेत में लगा दी जाती हैं. इसके अलावा बाज़ार में भी इसकी कई किस्मों की बेल आसानी से मिल जाती हैं. जिन्हें किसान भाई खरीदकर अपने खेतों में लगा सकते हैं.

बीज की मात्रा और उपचार –

शकरकंद की रोपाई नर्सरी में तैयार की गई इसकी बेलों की कटिंग के द्वारा की जाती हैं. एक एकड़ खेती के लिए 250 से 340 किलो बेल की आवश्यकता होती हैं । इसके लिए बेल के शीर्ष और मध्य भाग की ही कटिंग रोपाई के लिए उपयोग में ली जाती हैं. इसकी जड़ों की कटिंग के दौरान प्रत्येक कटिंग में चार से पांच गाठें होनी चाहिए. जड़ों की कटिंग के दौरान उनकी लम्बाई 20 से 25 सेंटीमीटर होनी चाहिए. शकरकंद की तैयार की गई कटिंग को उपचारित करने के लिए मानोक्रोटोफास या सल्फ्यूरिक एसिड की उचित मात्रा के घोल में डुबोकर रखना चाहिए.

शकरकंद की बुवाई का समय और पौध रोपाई का तरीका –

शकरकंद की नर्सरी में तैयार की गई कटिंग की रोपाई खेत में मेड़ों पर की जाती हैं. मेड पर रोपाई के दौरान प्रत्येक कटिंग के बीच लगभग एक फिट की दूरी होनी चाहिए. इसकी कटिंग की रोपाई के दौरान प्रत्येक जगह दो कटिंग एक साथ लगानी चाहिए. इसकी कटिंग को भूमि में लगभग 20 सेंटीमीटर की गहराई में लगाना चाहिए. इस दौरान उनकी पत्तियां बाहर दिखाई देती रहनी चाहिए. इस विधि से रोपाई के बाद पौधों के विकास के दौरान उन पर बार बार मिट्टी चढ़ाने के लिए अधिक मेहनत नही करनी पड़ती । इसके अलावा कुछ किसान भाई इसे समतल भूमि में भी लगाते हैं. समतल भूमि में लगाने के दौरान इन्हें क्यारियों में कतारों के रूप में लगाते हैं. इस दौरान प्रत्येक कतारों के बीच दो फिट की दूरी होनी चाहिए । और पौधों से पौधों के बीच 30 से 40 सेंटीमीटर के बीच दूरी होनी चाहिए. समतल भूमि में रोपाई के दौरान इसके पौधों पर कई बार मिट्टी चढ़ानी पड़ती हैं ।

शकरकंद की खेती लगभग सभी मौसम में की जा सकती हैं. लेकिन उत्तम पैदावार सिर्फ गर्मी और बरसात के मौसम में ही देती हैं. जायद के मौसम में इसकी खेती करने के लिए इसके पौधे की रोपाई मध्य जून से अगस्त माह तक कर देनी चाहिए. इस दौरान इसकी पैदावार खरीफ की फसल के साथ प्राप्त होती हैं. लेकिन जो किसान भाई इसकी पैदावार गर्मी के मौसम में लेना चाहते हैं. वो इसकी फसल को फरवरी के आखिर में उगा सकते हैं.

पौधों की सिंचाई व जल प्रबंधन –

शकरकंद के पौधों को सिंचाई की जरूरत फसल की रोपाई के समय के आधार पर होती हैं. गर्मी के मौसम इसकी रोपाई करने के दौरान इसके पौधों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत होती हैं. इस दौरान इसके पौधों की रोपाई के तुरंत बाद उन्हें पानी दे देना चाहिए. उसके बाद पौधों के विकास के दौरान इसके पौधों को सप्ताह में एक बार पानी देते रहना चाहिए. इसके कंदों के विकास के दौरान खेत में नमी पर्याप्त मात्रा में बनी रहने से कंद अच्छे से विकास करते हैं । जबकि खरीफ की फसल के साथ इसकी रोपाई के दौरान इसके पौधों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत नही होती. क्योंकि इस दौरान इसकी रोपाई बारिश के मौसम में की जाती हैं. इसलिए पौधों को सिंचाई की कम जरूरत होती हैं. लेकिन इस दौरान अगर बारिश वक्त पर ना हो पौधों की आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करते रहना चाहिए.

उर्वरक की मात्रा – nutrition management

शकरकंद के कंदों को विकास करने के लिए उर्वरक की जरूरत ज्यादा होती हैं. इसके पौधे और कंद दोनों ही अपना विकास करने के लिए भूमि की ऊपरी सतह से आवश्यक पोषक तत्व हासिल करते हैं. इसके लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के दौरान जैविक खाद के रूप में लगभग 15 से 17 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालकर अच्छे से मिट्टी में मिला दें । जैविक खाद के अलावा रासायनिक खाद का इस्तेमाल भी इसमें किया जाता हैं. रासायनिक खाद के रूप में 40 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो पोटाश और लगभग 70 किलो फास्फोरस की मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की आखिरी जुताई के वक्त खेत में छिड़कर मिट्टी में मिला दें. इसके अलावा जब पौधे विकास करने लगे तब लगभग 40 किलो यूरिया की मात्रा को पौधों को सिंचाई के साथ देना चाहिए. इससे पौधे अच्छे से विकास करते हैं और उत्पादन भी अधिक प्राप्त होता हैं.

खरपतवार नियंत्रण – weed control in sweet potata

शकरकंद की खेती में खरपतवार नियंत्रण करना काफी अहम होता हैं. इसकी खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक दोनों तरीकों से किया जाता हैं. रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए कंदों के अंकुरण से पहले मेट्रीबिउज़ाइन और पैराकुएट की उचित मात्रा का छिडकाव खेत में कर देना चाहिए । जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण पौधों की नीलाई गुड़ाई कर किया जाता हैं. इसके पौधों की पहली गुड़ाई पौधों के अंकुरण के लगभग 20 दिन बाद हल्के रूप में कर देनी चाहिए. शकरकंद के पौधों की दो गुड़ाई काफी होती हैं. इसके पौधों की दूसरी गुड़ाई, पहली गुड़ाई के लगभग 25 दिन बाद कर देनी चाहिए ।

शकरकंद के पौधों में मिट्टी चढ़ाना

शकरकंद के पौधों में मिट्टी चढ़ाने का काम कई बार किया जाता हैं. इसके पौधों की रोपाई के लगभग एक महीने बाद इसके पौधों पर पहली बार मिट्टी चढ़ाने का काम होता हैं. जो पौधों की गुड़ाई के साथ कर देना चाहिए. मिट्टी चढ़ाने से इसके कंदों का आकार अच्छा बनता हैं. शकरकंद की खेती में मिट्टी चढ़ाने का काम कम से कम तीन बार करना चाहिए .

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

शकरकंद के पौधों में कई तरह के कीट और जीवाणु जनित रोग देखने को मिलते हैं. जिनकी वक्त रहते देखभाल ना की जाए तो पौधों को काफी ज्यादा नुक्सान पहुँचता हैं ।

माहू –

शकरकंद की खेती चेपा का रोग कीट की वजह से फैलता हैं. इस रोग के कीटों का आकार छोटा और रंग पीला, काला, लाल और हरा दिखाई देता हैं. इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों और उसके कोमल भागों पर आक्रमण कर पौधे का रस चूसते हैं. जिससे पौधे विकास करना बंद कर देते हैं. रोग बढ़ने की स्थिति में सम्पूर्ण पौधा नष्ट हो जाता हैं. इस रोग की रोकथाम के के लिए पौधों पर इमिडाक्लोप्रिड की उचित मात्र का छिडकाव करना चाहिए. इसके अलावा पौधों पर नीम के तेल का छिडकाव रोग दिखाई देने के तुरंत बाद 10 दिन के अंतराल में दो से तीन बार करना चाहिए.

अर्ली ब्लाइट

अर्ली ब्लाइट रोग को अगेती झुलसा के नाम से भी जाना जाता हैं. शकरकंद के पौधों में यह रोग फफूंद की वजह से फैलता हैं. इसकी फफूंद मौसम परिवर्तन के दौरान मौसम में अधिक नमी और उमस के कारण जन्म लेती हैं. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर भूरे पीले रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. रोग के उग्र होने की स्थिति में इन धब्बों का आकार बढ़ जाता हैं. और पौधे की पत्तियां सूखकर गिरने लगती हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मेन्कोजेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की उचित मात्रा का छिडकाव रोग दिखाई देने के बाद तुरंत कर देना चाहिए.

ब्लैक स्कार्फ (फल का काला धब्बा)

शकरकंद के पौधों में ब्लैक स्कार्फ रोग का प्रभाव इसके कंदों पर देखने को मिलता हैं. पौधों पर यह रोग अंकुरण के साथ ही दिखाई देता हैं. इस रोग के लगने से इसके कंदों पर काले भूरे धब्बे बन जाते हैं. इस रोग के लगने पर इसके पौधे विकास करना बंद कर देता हैं. और जल्द ही पौधे सूखकर नष्ट हो जाते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए फसल चक्र को अपनाना चाहिए. इसके अलावा बीज को मरकरी से उपचारित कर ही लगाना चाहिए. रोग लगी भूमि पर लगभग दो से तीन साल तक इसकी पैदावार नही करनी चाहिए.

धफड़ी रोग

शकरकंद के पौधों में धफड़ी रोग का प्रभाव खड़ी फसल और भंडारण दोनों टाइम दिखाई दे सकता हैं. शकरकंद के पौधे में यह रोग नमी की कमी की वजह से दिखाई देता हैं. इस रोग के लगने पर इसके कंदों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं, जो नमी में कमी बढ़ने पर गहरे काले दिखाई देने लगते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए खेत में हमेशा पुरानी सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए. इसके अलावा बीजों की रोपाई के वक्त उन्हें एमीसान की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए. और खेत में नमी की मात्रा उचित बनाए रखनी चाहिए.

शकरकंद का घुन

शकरकंद की खेती में इस रोग का प्रभाव पौधों की पत्तियों पर देखने को मिलता हैं. इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों और बेल के बाहरी परत को खाकर उन्हें नुक्सान पहुँचाता हैं. जिससे पौधा विकास करना बंद कर देता हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर रोगर दवा की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फल बेधक रोग

शकरकंद के कंदों में इस रोग का प्रभाव किस भी वक्त दिखाई दे सकता है. इस रोग के लगने पर इसके कीट शकरकंद के कंदों में सुरंग बनाकर उन्हें खराब कर देते हैं. जिससे कंद सड़कर खराब हो जाते हैं. इस रोग के लगने के तुरंत बाद पौधा नष्ट हो जाता हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए शकरकंद की रोपाई से पहले भूमि को कार्बरील से उपचारित कर लेना चाहिए. इसके अलावा खड़ी फसल में रोग दिखाई देने पर पौधों में कार्बरील की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

कंदों की खुदाई और सफाई

शकरकंद के पौधे रोपाई के लगभग 110 से 120 दिन बाद खुदाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस दौरान पौधे की पत्तियां पीली पड़कर गिरने लग जाती हैं. तब इसके कंदों की खुदाई कर लेनी चाहिए. इसके कंदों की खुदाई के लिए वर्तमान में कई तरह की मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा हैं. जिससे इसकी खुदाई में लगने वाला खर्च काफी कम आता हैं. इसके कंदों की खुदाई से पहले खेत में पानी चलाकर मिट्टी को गिला कर लेना चाहिए. ताकि कंदों की खुदाई के दौरान उन्हें आसानी से उखाडा जा सके.कंदों की खुदाई के बाद उनकी सफाई की जाती हैं. जिसमें इसके कंदों को पानी में साफ़ कर कुछ वक्त छायादार जगह में सूखा देते हैं. जब इसके कंद अच्छे से सूख जाते हैं तब उन्हें बोर में भरकर बाज़ार में बेचने के लिए भेज देते हैं.

पैदावार और लाभ

शकरकंद की विभिन्न किस्मों की प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार 25 टन के आसपास पाई जाती हैं. जबकि इसका बाज़ार भाव 10 रूपये प्रति किलो के आसपास पाया जाता हैं. अगर इसका भाव 6 रूपये प्रति किलो किसान भाई को मिलता हैं तो इस हिसाब से किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से सवा लाख तक की कमाई आसानी से कर सकता हैं.

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