तरबूज़ की खेती (tarbooj ki kheti) कैसे करें, तरबूज़ की उन्नत खेती की तकनीक

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तरबूज़ की खेती (tarbooj ki kheti) कैसे करें, तरबूज़ की उन्नत खेती की तकनीक

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किसान साथियों आज हम जिस खेती के बारे में बताने जा रहे है। उसे हम रिफ़्रेसिंग फ़्रूट कहें तो कोई ताज्जुब नही होगा। हर वर्ग हर, अमीर ग़रीब हर तबके तक पहचने वाला यह फल गर्मी के मौसम में बड़े स्वाद के साथ खाया जाता है। अब तो आप जान ही गये होंगे ! जी बिलकुल, हम बात कर रहे हैं तरबूज़ के बारें में। तरबूज़ की खेती के पहले आइए बात करते हैं तरबूज की इतिहास व वानास्पतिक के बारे में –

अफ़्रीका जन्मभूमि का यह पौधा व वनस्पति शास्त्र की दुनिया में सिटुलस वुलगेरिस (citrullas vulgaris) के नाम से जाना जाता है।

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कुकरबिटेसी (cucurbitaceae ) परिवार के इस पौधे में 24 जोड़े गुणसूत्र पाए जाते हैं।  90 प्रतिशत पानी की मात्रा को इसके पायी जाती है। तरबूज़ को काटकर व जूस बनाकर दोनो प्रकार से खाया जाता है । तरबूज़ के जूस में थोड़ा सा काला नमक व काली मिर्च मिलाकर लोग इसे एक ताजगी देने वाले रिफ़्रेशमेंट पेय पदार्थ के रूप में प्रयोग करते हैं। यह बेहद शुष्क भूमि में उगाया जा सकता है । इसलिए इसे रेगिस्तानी फल के नाम से भी जाना जाता है।

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तरबूज़ की खेती के बारे में जानने से पहले आइए हम जानते हैं इसके पोषक तत्वों के बारें में –

जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है तरबूज़ में पानी की मात्रा 90 प्रतिशत होटी है। इसके अलावा तरबूज़ में प्रोटीन,कार्बोहाइड्रेट,फ़ोस्फोरस,कैलशियम, प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसके साथ साथ थायमिन, एस्कार्बिक अम्ल, रिबोफलेविन, व विटामिन a भी पाया जाता है।

 

जलवायु –

तरबूज़ गर्म व शुष्क जलवायु का पौधा है। इसके पौधे की समुचित बढ़वार के लिए गर्म दिनों व लम्बी रातों वाले मौसम की आवश्यकता होती है। तरबूज़ के पौधे नम व कम जलवायु नही सहन कर पाते।

 

तापमान –

तरबूज़ की खेती के लिए इसके पौधे हेतु अनुकूलित तापमान के बारे में जानना बेहद आवश्यक है । तरबूज़ के बीजों के अंकुरण के आवश्यक मृदा तापमान (soil temperature) 25 से 30 और इतना ही इसके पौधों की बढ़वार के लिए आवश्यक होता है। और फल बनते समय मिट्टी का तापमान 24 से 27 डिग्री तापमान आदर्श माना जाता है।

 

भूमि का चयन –

हमारे देश में जलवायु के आधार पर आमतौर पर साल में दो फ़सलें ली जाती हैं। तरबूज़ की अगेती फ़सल के लिए उत्तम जीवांश युक्त रेतीली दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है। भूमि में उचित जल निकास प्रबंधन भी होना चाहिए। भारी मिट्टी में तरबूज़ के पौधों की बढ़वार अच्छी नही होती है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। तरबूज़ के उत्पादन के लिए 6.5 से 7.0 पीएच मान वाली भूमि का चुनाव करना चाहिए।

 

गंगा व यमुना सहित नदियों के तट पर तरबूज़ की खेती सफलतापूर्वक की जाती है। और समुचित पैदावार भी प्राप्त की जाती है। आप में से कई किसान भाई खेती किसानी टीम को अपनी सफलता की कहानी बताते हैं।जल्द ही उनकी कहानी भी प्रकाशित की जाएगी।

 

भूमि की तैयारी –

तरबूज़ की खेती के लिए भूमि की तैयारी कैसे करें?

खेत में तरबूज़ की खेती करने के लिए 2 से 3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करना चाहिए। हर जुताई के उपरांत पाटा लगाकर भूमि को समतल कर लेना चाहिए। ढेले फूटकर मिट्टी भुरभुरी बना लेना चाहिए। वहीं नदियों के किनारे बुवाई करने के लिए थाले बना लेना चाहिए। इसके लिए 60 सेंटीमीटर लम्बा 60 सेंटीमीटर चौड़ा व 60 सेंटीमीटर गहरा गड्ढा खोद लें।

 

उन्नत क़िस्में –

तरबूज़ की खेती के लिए उन्नत प्रजातियाँ (improved varieties) –

क़िस्म का नाम
क़िस्म का गुण
समय
उपज
अर्का ज्योति फल का आकार गोल,त्वचा हरी, गहरे रंग की धारियाँ 90-110 दिन 350-400 कुन्तल/हेक्टेयर
अर्का मानिक फल गोल,अंडाकार, त्वचा पर फीके हरे रंग की धारियाँ,मीठा 85-115 दिन 600 कुन्तल/प्रति हेक्टेयर
पूसा वेदाना बीजरहित,गूदा गुलाबी, 85-90 दिन 150-200 कुन्तल/प्रति हेक्टेयर
शुगर बेबी अमेरिकन क़िस्म,फल गोल,बहुत मीठा,फल परकाले हार रंग की धारी 80-90 दिन 200-250 कुन्तल/प्रति हेक्टेयर
आसाही यामेटो जापानी क़िस्म,गूदा गहरा गुलाबी,कुरकुरा, 90-100 225-250 कुन्तल/प्रति हेक्टेयर

इसके अलावा इम्प्रूव्ड शिप्पर,न्यू हेम्प शापर मिडगेट, मधु, मिलन, मोहिनी, सुरुचि, सेंचुरी, अमरूथ, आदि उन्नत प्रजातियों की खेती की सफलता पूर्वक की जाती है।

बुवाई का समय –

भारत में विभिन्न जलवायु के आधार तरबूज़ की बुवाई अलग अलग समय पर की जाती है-

भारत के उत्तरी मैदानी भागों में 25 फ़रवरी से 15 मार्च तक
उत्तर पूर्वी भारत में नवम्बर से जनवरी तक
पश्चिमी भारत में नवम्बर से जनवरी तक
पश्चिम बंगाल में दिसम्बर से जनवरी तक
उत्तरी भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में अप्रैल से मई तक

 

बीज की मात्रा –

तरबूज़ की खेती से अधिकतम व्यवसायिक पैदावार प्राप्त करने के लिए स्वस्थ, सुडौल व निरोगी बीज होना चाहिए। बीज की मात्रा इस प्रकार है –

छोटी बीज वाली क़िस्मों के लिए – 3.0 – 3.5 किलोग्राम
बड़े बीज वाली क़िस्मों के लिए – 5.0 किलोग्राम
अधिक उपज वाली व उन्नत क़िस्मों के लिए 300-450 किलोग्राम

 

अंतरण (spacing)-

लम्बी लताओं वाली क़िस्मों के लिए लाइन से लाइन की दूरी – 3.5 mtr.

माध्यम लताओं वाली क़िस्मों के लिए लाइन से लाइन की दूरी – 2.0 mtr.

नदियों के तट पर बुवाई के लिए लाइन से लाइन की दूरी – 1.2 mtr.

उक्त सभी क़िस्मों में पौधे से पौधे की दूरी – 0.6 mtr. तक रखें ।

 

बुवाई की विधि –

तरबूज़ की खेती के लिए बीजों की रोपाई हेतु 60 सेमी0 लम्बा,60 सेमी0 चौड़ा व 60 सेमी0 गहराई वाले गड्ढे खोदकर उसमें farmyard manures गोबर की खाद और नाइट्रोजन, फ़ोस्फोरस पोटाश की मात्रा को खोदी गयी मिट्टी में मिला दें। बीजों को बुवाई के दो दिन पहले पानी में भिगो दें। 1 – 2 बीजों को एक गड्ढे में बोएँ। वहीं अगर पौध प्रतिरोपण करना हो तो 150-200 mm. वाली एल्काथिन वाली थैलियों में बीजों को बो दें। पौधों 2-3 पत्तियाँ आने पर थैली हटाकर खेत में रोपित कर दें।

 

पादप नियंत्रक (plant regulators) –

तरबूज़ के पौधों में मादा फूलों की बढ़ोतरी के लिए प्लांट रेगुलटरों का इस्तेमाल करें। इसके लिए 2, 4-5 ट्राई आयोडो बैंजोइक अम्ल (टीबा) 25-50 ppm का छिड़काव करें।

 

इसका पहला छिड़काव अंकुरण के 15-20 दिन के अंदर पर तथा दूसरा छिड़काव 10 से 15 दिन अंतराल पर करें। एक सर्वे के मुताबिक़ इन प्लांट रेगुलटरों के प्रयोग से डेढ़ गुना तक पैदावार में वृद्धि की जा सकती है।

कृषि विश्वविद्यालय में हुए प्रयोग के आधार पर जिबरेलिक एसिड को 50 लीटर पानी में घोल बनाकर तरबूज़ के पौधे पर जब 4-5 पत्तियाँ आ जाएँ तब छिड़काव करने पर प्रति हेक्टेयर 175 कुन्तल तक की पैदावार प्राप्त की गयी है।

इसके अलावा टिविजन -20,व सेलवेट -99 के प्रयोग से भी उपज में आशातीत लाभ प्राप्त किया गया है।

 

खाद व उर्वरक –

तरबूज़ की खेती में खाद व उर्वरक का उपयोग नीचे दिए अनुसार करना चाहिए –

कंपोस्ट/गोबर की खाद 15-22 टन
नाइट्रोजन 55-110 किलोग्राम
फ़ोस्फोरस 55-80 किलोग्राम
पोटाश 55-110 किलोग्राम

 

नाइट्रोजन की आधी मात्रा व गोबर की खाद, फ़ोस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा को खेत की तैयारी के समय जुताई के दौरान मिट्टी में मिला देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष बची आधी मात्रा को दो भाग बनाकर पहले भाग को पौधों में लताएँ निकलते समय टॉप ड्रेसिंग से देना चाहिए। तथा दूसरे भाग को फल बनते समय ऊपरी छिड़काव के माध्यम दें।

 

सिंचाई व जल प्रबंधन –

जलवायु व मिट्टी की क़िस्म के अनुसार तरबूज़ के खेत में सिंचाई करना चाहिए। गर्मी की फ़सल पर 3 से 5 दिन व सामान्य मौसम में 10 से 15 दिन के अंतर पर किसान साथी सिंचाई करें।

 

तरबूज़ की खेती में कीट नियंत्रण –

तरबूज़ की फ़सल पर रेड पम्पकिन बीटल से रोकथाम के लिए पौधों के अंकुरण के तुरंत बाद 0.2%  कार्बोरियल रसायन का इस्तेमाल करें।

 

वहीं फल मक्खी के प्रकोप से तरबूज़ की खेती को बचाने के लिए फेनीथियोजन(0।05%) को गुड मिलाकर फल बनते समय खेत में छिड़काव करना चाहिए।

 

माहूँ अथवा चेंपा से रोकथाम हेतु मोनोक्रोटोफ़ोस या डाईमेथोएट की 0.05% मात्रा छिड़काव करना चाहिए।

 

तरबूज़ की खेती में लगने वाले रोग व उनकी रोकथाम –

 

फ़सल पर आमतौर चूर्णी फफूँदी व एंथरेक्नोज रोगों का प्रकोप होता है। इनकी रोकथाम के लिए क्रमश: केलिक्सिन 0.05 % मात्रा को 10 दिन के अंतर में छिड़कें। तथा एंथरेक्नोज से बचाव हेतु हेक्साकैप 0.25 % मात्रा का छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए।

 

तरबूज़ की खेतों पर फफूँदी जनित डाउनी मिल्ड्यू की रोकथाम के लिए मैनकोज़ेब 0.25% प्रतिशत का छिड़काव 8-10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।

 

फलों की तुड़ाई –

तरबूज़ के फल में गहरे हरे रंग की त्वचा जब हल्का सफ़ेद पीले रंग की हो जाए तो समझ लें। तरबूज़ के फल तुड़ाई योग्य हो गये हैं। वैसे भी बुवाई के 90-120 दिन बाद तरबूज़ के फल तुड़ाई लायक हो जाते हैं।

 

उपज (yield) –

उन्नत क़िस्म, मृदा की क़िस्म व जलवायु, बुवाई सहित फ़सल की देखभाल की दशाओं को देखते हुए 200-250 प्रति हेक्टेयर व संकर क़िस्मों से 300 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक की उपज प्राप्त की जा सकती है।

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