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Thursday, November 26, 2020
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तुलसी की खेती कैसे करें ? (Tulsi ki kheti in hindi)

तुलसी का वानस्पतिक परिचय –

तुलसी का विवरण इस तरह से है –

श्रेणी (Category) :

सगंधीय
समूह (Group) :

कृषि योग्य
वनस्पति का प्रकार :

शाकीय
वैज्ञानिक नाम :

ओसिमम सेक्टम
सामान्य नाम :

तुलसी

कुल :

लेमीलेऐसी
आर्डर :

लेमीएलेस
प्रजातियां :
 ओ. टेनुइफ्लोरम

उत्पति और वितरण :

यह संपूर्ण भारत में पाया जाता है।

वितरण :

भारत में तुलसी एक पवित्र पौधे के रूप में ऊगाई जाती है। इसे मंजरी या कृष्णा तुलसी के नाम से भी जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे होली बेसिल कहा जाता है। यह पौधा संपूर्ण दुनिया में नम मिट्टी में स्वभाविक रूप से मिलता है। भारत में हिन्दू तुलसी को अपने घरो, मंदिरो और खेतों में एक धार्मिक पौधे के रूप उगाते है। वे इसकी पत्तियो का उपयोग नियमित पूजा में करते है। भारतीय पौराणिक कथाओं में तुलसी से संबधित असंख्य संदर्भ हैं। इसे गमलो और घरो के बगीचे में भी उगाया जाता है। मध्यप्रदेश में यह समान्य रूप से मिलता है।

उपयोग :

 भारत मे तुलसी के पौधे का व्यापक रूप से उपयोग पूजा में किया जाता है।
 इसके उपयोग से त्वचा और बालों में सुधार होता हैं।
 यह रक्त शर्करा के स्तर को भी कम करती है और इसका चू्र्ण मुँह के छालों के लिए प्रयोग किया जाता है।
  इसमें औषधीय गुण होते हैं । इसकी पत्तियों के रस को बुखार, ब्रोकाइटिस, खांसी, पाचन संबंधी शिकायतों में देने से राहत मिलती है।
 कान के दर्द में भी तुलसी के तेल का उपयोग किया जाता है।
 यह मलेरिया और डेंगू बुखार को रोकने के लिए एक निरोधक के रूप में काम करता है।
 लोशन, शैम्पू, साबुन और इत्र में कास्मेटिक उघोग में तुलसी तेल का उपयोग किया जाता है।
 कुछ त्वचा के मलहम और मुँहासे के उपचार में भी इसका प्रयोग किया है।
 मधुमेह, मोटापा और तंत्रिका विकार के इलाज में इसका उपयोग किया जाता है।
 यह पेट में ऐंठन, गुर्दे की स्थिति और रक्त परिसंचरण को बढ़ावा देने में उपयोगी होता है।
 इसके बीज मूत्र की समस्याओं के इलाज में इस्तेमाल किये जाते है।
उपयोगी भाग :
 संपूर्ण भाग
स्वरूप :

 तुलसी एक शाखायुक्त, सुगंधित और सीधा रोयेदार शाकीय पौधा है।
 इसकी लाल या बैंगनी चतुष्कीणीय शाखाएँ होती है।
पत्तिंया :
 पत्तियाँ साधारण, एक दूसरे के विपरीत ओर, दांतेदार किनारों पर अण्डाकार, काली बैंगनी रंग की होती है।
 पत्तियाँ लगभग 3-5 से.मी. लंबी और 1.5 से 2 से.मी़. चौड़ी होती है।
फूल :
 फूल छोटे, बैंगनी और पुष्पक्रम लगभग 12-14 से.मी. लंबे होते है।
फल :
 फल छोटे, चिकने और लाल से भूरे रंग के होते है।
 फल 1.5 मिमी लंबे और 1 मिमी चौड़े होते है।
बीज :
 बीज छोटे, अंडाकार, समतल लाल या काले धब्बों के साथ पीले रंग के होते है।
परिपक्व ऊँचाई :
 परिपक्व होने पर यह 75-90 से.मी. की ऊँचाई तक बढ़ता है।

जलवायु :

 यह पौधा समान्य से उच्च वर्षा और नम स्थितियो में अच्छी तरह पनपता है।
 लंबे दिन और उच्च तापमान पौधों की वृध्दि और तेल के उत्पादन के लिए अनुकूल पाये जाते है।
 इसकी खेती के लिए दोनों उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है।
 इसे 140 – 300 C तापमान की आवश्यकता होती है।
भूमि :
 सभी प्रकार की मिट्टी में यह अच्छी तरह पनपता है।
 खनिज युक्त दोमट मिट्टी से लेकर बिना खनिज वाली मिट्टी, क्षारीय से लेकर अम्लीय मिट्टी में इसकी खेती अच्छी तरह की जा सकती है।
 अच्छी जल निकासी की मिट्टी में इसका वनस्पतिक विकास अच्छा होता है।
 जल भराव की स्थिति से बचना चाहिए।
 मिट्टी का pH मान 6.5 – 8 होना चाहिए।

भूमि की तैयारी :

 खेत को अच्छी तरह जोतकर और हेरो चलाकर क्यारियाँ बना ली जाती है।
 अच्छी से मिश्रित FYM मिट्टी में मिलाना चाहिए।
फसल पद्धति विवरण :
 तुलसी बीज आसानी से अंकुरित हो जाते है।
 चूंकि बीज छोटे होते है इसलिए इन्हे रेत और लकड़ी की राख के मिश्रण के साथ मिलाया जाता है।
 बीज अप्रैल – मई के महीनों के दौरान बोये जाते है।
 उन्हे समय – समय पर पानी दिया जाता है और अंकुरण एक से दो सप्ताह बाद होता है।
रोपाई (Transplanting) :
 6 से 10 से.मी. लंबे अंकुरित पौधो को जुलाई – अगस्त माह में पहाड़ी क्षेत्रों में और अक्टूबर – नवंबर माह में समतल क्षेत्रों में लगाया जाता है।
 पौधो को पंक्तियों में 40 से.मी. की दूरी पर लगाया जाता है।
 रोपण के तुंरत बाद खेत की सिंचाई की जाती है।

नर्सरी बिछौना-तैयारी (Bed-Preparation) :

 क्यारियों को अच्छी तरह तैयार किया जाता है। गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग किया जाता है।
 बीज नर्सरी में बोये जाते है।
 एक हेक्टेयर भूमि के लिए लगभग 20-30 कि.ग्रा. बीजों की आवश्यकता होती है।
 बुवाई के बाद FYM और मिट्टी के मिश्रण की पतली परत को बीजों के ऊपर फैलाया जाता है। स्पिंक्लिर द्दारा सिंचाई की जाती है।
 बीज अंकुरण के लिए 8-12 दिन का समय लेते है और लगभग 6 सप्ताह के बाद पौधे रोपण के लिए तैयार हो जाते है।

खाद :

 इसे कम उर्वरक की आवश्यकता होती है। बहुत ज्यादा उर्वरक से पौधा जल जाता है।
 कभी भी बहुत गर्म या ठंडे मौसम में उर्वरक नही डालना चाहिए।
 रोपण के समय आधारीय खुराक के रूप में मिट्टी में 40 कि.ग्रा./हे. P की मात्रा दी जाती है।
 पौधे के विकास के दौरान 40 कि.ग्रा./हे. N की मात्रा दो भागों में विभाजित करके दी जाती है।
सिंचाई प्रबंधन :
 रोपण के बाद विशेष रूप से मानसून के अंत में खेत की सिंचाई की जाती है।
 दूसरी सिंचाई के बाद पौधे अच्छी तरह जम जाते है।
 अंतराल को भरने और कमजोर पौधो को अलग करने का यह सही समय होता है ताकि एक समानता को प्राप्त किया जा सकें।
 गार्मियो में 3-4 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है जबकि शेष अवधि के दौरान आवश्यकता के अनुसार सिंचाई की जाती है। लगभग 20 – 25 बार सिंचाई देना पर्याप्त होता है।
घसपात नियंत्रण प्रबंधन :
 रोपण के पहले गहरी जुताई करना चाहिए।
 खरपतवार की सभी जड़े हाथों से एकत्रित करके हटा दी जाती है।
 अच्छे प्रंबधन के अंतर्गत खेत को खरपतवार मुक्त रखने के लिए 4 या 5 बार निंदाई की आवश्यकता होती है।
 निंदाई को हाथ से या ट्रेक्टर चालित कल्टीवेटर द्दारा किया जा सकता है।

तुडाई, फसल कटाई का समय :

 तुड़ाई एक चमकदार धूप वाले दिन में की जानी चाहिए।
 रोपण के बाद 90-95 दिन बाद फसल प्रथम तुडाई के लिए तैयार हो जाती है।
 पत्ती उत्पादन के लिए फूलों के प्रारंभिक स्तर पर पत्तियों की तुड़ाई की जाती है।
 फसल को जमीनी स्तर से 15-20 से.मी ऊपर काटा जाता है ।
 कटाई इस प्रकार की जाती है कि शाखाओं को काटने के बाद बचे हुए तने की फिर से उत्पत्ति हो सके।
 अखिरी कटाई के दौरान संपूर्ण पौधे को उखाड़ा जाता है।

सुखाना :

 इसे पतली परत बनाकर छायादार स्थान में 8-10 दिनों के लिए सुखाया जाता है।
 इसे अच्छे हवादार एवं छायादार स्थान में ही सुखाना चाहिए।
आसवन (Distillation) :
 तुलसी तेल को आंशिक रूप से सूखी जड़ी बूटी के भाप आसवन के द्दारा प्राप्त किया जाता है।
 आसवन सीधे अग्नि प्रज्जवलन भट्रटी द्दारा किया जाता है जो भाप जनेरटर द्दारा संचालित होता है।
पैकिंग (Packing) :
 वायुरोधी थैले इसके लिए आदर्श होते है।
 नमी के प्रवेश को रोकने के लिए पालीथीन या नायलाँन थैलों में पैक किया जाना चाहिए।
भडांरण (Storage) :
 पत्तियों को शुष्क स्थानों में संग्रहित करना चाहिए।
 गोदाम भंडारण के लिए आदर्श होते है।
 शीत भंडारण अच्छे नहीं होते है।
परिवहन :
 सामान्यत: किसान अपने उत्पाद को बैलगाड़ी या टैक्टर से बाजार तक पहुँचता हैं।
 दूरी अधिक होने पर उत्पाद को ट्रक या लाँरियो के द्वारा बाजार तक पहुँचाया जाता हैं।
 परिवहन के दौरान चढ़ाते एवं उतारते समय पैकिंग अच्छी होने से फसल खराब नही होती हैं।
अन्य-मूल्य परिवर्धन (Other-Value-Additions) :
 अदरक तुलसी
 तुलसी – चूर्ण
 तुलसी चाय
  कैप्सूल के रूप में तुलसी
 पंच तुलसी तेल

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