वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि,उन्नत खेती का मूल मंत्र है वर्मी कम्पोस्ट

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वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि, उपयोगिता व महत्व(Vermi Compost-A Best Organic Manure: Method, Utility, and Importance of Making Vermi Compost)

किसान भाइयों वर्मी कम्पोस्ट निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका केचुओं की है जिसके द्वारा कार्बनिक/जीवांश पदार्थों को विघटित करके/ सड़ाकर यह खाद तैयार की जाती है। यही वर्मी कम्पोस्ट या केंचुए की खाद कहलाती है। वर्मी कम्पोस्टिंग कृषि के अवशिष्ट पदार्थ, शहर तथा रसोई के कूड़े कचरे को पुनः उपयोगी पदार्थ में बदलने तथा पर्यावरण प्रदूषण को कम करने की एवं प्रभावशाली विधा है।
वर्मी कम्पोस्ट बनाने में किन-किन कार्बनिक पदार्थों का प्रयोग किया जा सकता है

वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि- 

(अ). कृषि या फसल अवशेष – पुवाल, भूसा, गन्ने की खाई, पत्तियां, खरपतवार, फूस, फसलों के डंठल, बायोगैस अवशेष, गोबर आदि।
(ब). घरेलू तथा शहरी कूड़ा कचरा – सब्जियों के छिलके तथा अवशेष, फलों के छिलके तथा अवशेष, फलों के छिलके तथा सब्जी मण्डी का कचरा, भोजन का अवशेष आदि।
(स) कृषि उद्योग सम्बन्धी व्यर्थ पदार्थ – वनस्पति तेल शोध मिल, चीनी मिल, शराब उद्योग, बीज तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग तथा नारियल उद्योग के अवशिष्ट पदार्थ।

केचुओं की प्रजातियां –

कम्पोस्ट बनाने की सक्षम प्रजातियों में मुख्य रूप से इसेनिया फोटीडातथा इयू ड्रिल्स इयूजीनीहै जिन्हें केचुयें की लाल प्रजाति भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त पेरियानिक्स एक्सवकेटस‘, ‘लैम्पीटो माउरीटी,‘ डावीटा कलेवीतथा डिगोगास्टर बोलाई प्रजातियां भी है जो कम्पोस्टिंग में प्रयोग की जाती हैं परन्तु ये लाल केचुओं से कम प्रभावी है |

वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि –

किसी ऊंचे छायादार स्थान जैसे पेड़ के नीचे या बगीचे में 2 मीटर ×2 मीटर ×2 मीटर क्रमशः लम्बाई, चौड़ाई तथा गहराई का गड्ढा बनायें। गड्ढे के अभाव में इसी माप की लकड़ी या प्लास्टिक की पेटी का भी प्रयोग किया जा सकता है। जिसके निचले सतह पर जल निकास हेतु 10-12 छेद बना देने चाहिए।

क- सबसे नीचे ईंट या पत्थर की 11 सेमी० की परत बनाइये फिर 2.0 सेमी० मौरंग या बालू की दूसरी तह लगाइये। इसके ऊपर 15 सेमी० उपजाऊ मिट्टी की तह लगाकर पानी के हल्के छिड़काव से नम कर दें। इसके बाद अधसड़ी गोबर डालकर एक किलो प्रति गड्ढे की दर से केचुएं छोड़ दें।

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ख- इसके ऊपर 5-10 सेमी० घरेलू कचरे जैसे सब्जियों के अवशेष, छिलके आदि कटे हुए फसल अवशेष जैसे पुवाल, भूसा, जलकुंभी पेड़ पौधों की पत्तियां आदि को बिछा दें। 20-25 दिन तक आवश्यकतानुसार पानी का हल्का छिड़काव करते रहें इसके बाद प्रति सप्ताह दो बार 5-10 सेमी० सडने योग्य कूड़े कचरे की तह लगाते रहें जब तक कि पूरा गड्ढा भर न जाये। रोज पानी का छिड़काव करते रहें। कार्बनिक पदार्थ के ढेर पर लगभग 50 प्रतिशत नमी होनी चाहिए। 6-7 सप्ताह में वर्मी कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाता है। वर्मी कम्पोस्ट बनने के बाद 2-3 दिन तक पानी का छिड़काव बन्द कर देना चाहिए। इसके बाद खाद निकाल कर छाया में ढेर लगाकर सुखा देते हैं। फिर इसे 2 मिली० छन्ने से छानकर अलग कर लेते हैं। इस तैयार खाद में 20-25 प्रतिशत नमी होनी चाहिए। इस तैयार खाद को आवश्यक मात्रा में प्लास्टिक की थैलियों में भर देते है।

इसके अतिरिक्त वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण वायु पंक्ति (विन्डरो)। विधि से भी किया जा सकता है जिसमें जीवांश पदार्थ का ढ़ेर किसी छायादार जमीन की सतह पर लगाकर किया जाता है वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण रियेक्टरविधि से किया जाता है जो अधिक खर्चीला तथा तकनीकी है। ऊपरी बतायी गयी विधि अत्यन्त सरल है तथा किसान आसानी से अपना सकता है।

केंचुए का कल्चर या इनाकुलम तैयार करना

केंचुए कूड़े कचरे के ढेर के नीचे से कम्पोस्ट बनाते हुए ऊपर की तरफ बढ़ते हैं पूरे गड्ढे भी कम्पोस्ट तैयार होने के बाद ऊपरी सतह पर कूड़े कचरे की एक नयी सतह लगा देते हैं तथा पानी छिड़क कर नम कर देते है। इस सतह की ओर सभी केंचुए आकर्षित हो जाते हैं। इन्हें हाथ या किसी चीज से अलग कर इकट्ठा कर लेते है जिसे दूसरे नये गड्ढे में अन्तः क्रमण के लिए प्रयोग करते है।

वर्मी कम्पोस्ट के पोषक तत्व :

वर्मी कम्पोस्ट के अन्य जीवांश खादों की तुलना में अधिक पोषक तत्व उपलब्ध है। इसमें नाइट्रोजन 1-1.5 प्रतिशत, फास्फोरस 1.5 प्रतिशत तथा पोटाश 1.5 प्रतिशत होता है। इसके अतिरिक्त इसमें द्वितीयक तथा सूक्ष्म तत्व भी मौजूद होते है।

वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग :

धान्य फसलों, तिलहन तथा सब्जियों के लिए 5.0 से 6.0 टन वर्मी कम्पोस्ट प्रति हे० की दर से प्रयोग करना चाहिए। बुवाई के पहले इसे खेत में बिखेर कर जुताई करके भूमि में मिला देना चाहिए। फलदार वृक्षों में 200 ग्राम प्रति पौधा तथा घास के लान में 3 किग्रा०/ 10 वर्ग मीटर की दर से प्रयोग करें।

वर्मी कम्पोस्ट के लाभ :

  • मृदा के भौतिक तथा जैविक गुणों में सुधार होता है।
  • मृदा संरचना तथा वायु संचार में सुधार हो जाता है।
  • नाइट्रोजन स्थरीकरण करने वाले जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है।
  • कूड़े कचरे से होने वाले प्रदूषण पर नियंत्रण होता है।
  • वर्मी कम्पोस्ट एक लघु कुटीर उद्योग के रूप में रोजगार के नये अवसर प्रदान करता है।
  • फलों सब्जियों तथा खाद्यान्नों की गुणवत्ता बढ़ती है तथा उनके उपज में भी वृद्धि होती है।
  • यह रसायनिक उर्वरक की खपत कम करके मृदा स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने का प्रभावी उपाय है।

 

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